Anantam IASHindi Note · 4 September 2026

बक्सर की लड़ाई 1764: ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की क़ानूनी हुकूमत कैसे मिली

22 अक्टूबर 1764 को हेक्टर मुनरो ने मीर क़ासिम, शुजा-उद-दौला और शाह आलम द्वितीय की मिली-जुली फ़ौज को हराया। इलाहाबाद की संधि 1765 ने ईस्ट इंडिया कंपनी को दीवानी का हक़ दे दिया।

बक्सर की लड़ाई 1764 22 अक्टूबर 1764 को आज के बिहार में गंगा किनारे बक्सर (बक्सर/बाक्सर) के समतल मैदान पर लड़ी गई। यही वह लड़ाई थी जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपनी निजी फ़ौज रखने वाली एक व्यापारिक कंपनी से बदलकर बंगाल, बिहार और उड़ीसा का क़ानूनी मालिक बना दिया। इससे पहले हुई प्लासी की लड़ाई 1757 साज़िश से तय की गई एक छोटी लड़ाई थी, जबकि बक्सर उस दौर की तीन सबसे बड़ी हिंद-मुस्लिम ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ी गई असली फ़ौजी टक्कर थी: बंगाल के हटाए गए नवाब मीर क़ासिम, अवध के नवाब वज़ीर शुजा-उद-दौला और नाम भर के मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय। मेजर हेक्टर मुनरो ने क़रीब 7,072 कंपनी सैनिकों के साथ इनकी मिली-जुली 40,000 से 50,000 की फ़ौज को कुछ ही घंटों में हरा दिया — अनुशासित पैदल सेना और निर्णायक घुड़सवार पीछा, यही दो चीज़ें काम आईं। नौ महीने बाद अगस्त 1765 में हुई इलाहाबाद की संधि ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी — यानी लगान वसूलने और दीवानी न्याय चलाने का हक़ — कंपनी को सौंप दी। ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का पूरा ढाँचा इसी एक मंज़ूरी से निकलता है। ज़्यादातर आधुनिक इतिहासकार, जिनमें आर.सी. मजूमदार और बिपन चंद्र भी हैं, प्लासी को नहीं बल्कि बक्सर को भारत में ब्रिटिश राज की असली संवैधानिक शुरुआत मानते हैं।

बक्सर की लड़ाई 1764: एक नज़र में ज़रूरी तथ्य

पृष्ठभूमि: प्लासी से बक्सर तक

प्लासी और बक्सर के बीच के सात साल में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के तीन नवाब निचोड़ डाले। प्लासी के बाद गद्दी पर बिठाया गया मीर जाफ़र प्लासी के वक़्त तय हुई रकम नहीं चुका सका और डचों से साज़िश करने लगा। 1760 में कंपनी ने उसकी जगह उसके दामाद मीर क़ासिम को बिठा दिया — जो कंपनी की उम्मीद से कहीं ज़्यादा क़ाबिल शासक निकला।

मीर क़ासिम ने 1762 में अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर कर ली, ताकि कलकत्ता में बैठी कंपनी से फ़ासला बना रहे। उसने अपनी फ़ौज को यूरोपीय ढंग की कवायद पर ढाला, आर्मीनियाई गुरगिन ख़ान को सेनापति बनाया, मुंगेर में हथियार कारख़ाना खड़ा किया जहाँ यूरोपीय दर्जे की बंदूक़ें बनती थीं, और लगान की व्यवस्था भी सुधारी। सबसे बड़ी बात, उसने प्लासी के बाद चली आ रही सबसे बड़ी धाँधली पर हाथ डाला: कंपनी के कर्मचारी कंपनी को मिली चुंगी-मुक्त व्यापार की परमिट, यानी दस्तक, अपने निजी कारोबार पर भी लगा रहे थे। इससे देसी व्यापारी बरबाद हो रहे थे, क्योंकि उन्हें पूरी चुंगी देनी पड़ती थी।

जब कंपनी ने बातचीत से इनकार कर दिया, तो मीर क़ासिम ने मार्च 1763 में भीतरी चुंगी ही पूरी तरह ख़त्म कर दी और इस तरह देसी और कंपनी, दोनों के व्यापारियों को शून्य पर बराबर कर दिया। कंपनी को यह मंज़ूर नहीं हुआ। जंग छिड़ गई। 1763 भर चली लड़ाइयों में — कटवा, मुर्शिदाबाद, गिरिया, सूती, उधवा नाला — मेजर एडम्स ने मीर क़ासिम की फ़ौज को हरा दिया। अक्टूबर 1763 के पटना क़त्लेआम में वाल्टर राइनहार्ट ने मीर क़ासिम के हुक्म पर क़रीब 200 यूरोपीय क़ैदियों को मार डाला, जिससे कंपनी को प्रचार के लिए एक बड़ा मुद्दा मिल गया। मीर क़ासिम भागकर पश्चिम में अवध चला गया।

वहाँ उसने अवध के नवाब वज़ीर शुजा-उद-दौला और 1758 से भटक रहे मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय को कंपनी के ख़िलाफ़ एक मोर्चा बनाने के लिए राज़ी कर लिया। अक्टूबर 1764 में तीनों फ़ौजें बक्सर में आ जुटीं।

मिली-जुली फ़ौज और उसकी कमज़ोरियाँ

बक्सर में जुटी मिली-जुली फ़ौज काग़ज़ पर बहुत मज़बूत दिखती थी। शुजा-उद-दौला के पास सबसे बड़ी टुकड़ी थी — ऊँचे दर्जे के ईरानी और अफ़ग़ान घुड़सवार। शाह आलम द्वितीय के पास फ़ौज नहीं, मुग़ल तख़्त का रुतबा था, भले वह कितना ही घट चुका हो। मीर क़ासिम ख़ज़ाना और मार्कर और राइनहार्ट के नीचे यूरोपीय तालीम पाए सिपाही लेकर आया था।

लेकिन इस गठजोड़ में तालमेल नहीं था। मीर क़ासिम को शुजा-उद-दौला पर भरोसा नहीं था, क्योंकि वह उसका ख़ज़ाना ज़मानत के तौर पर रखकर लौटाने से मना कर चुका था। शुजा-उद-दौला को उस मुग़ल बादशाह के साथ खड़े होना खलता था जिसकी हुकूमत वह अब मानता ही नहीं था। मीर क़ासिम को राइनहार्ट पर बेवफ़ाई का शक था, इसलिए उसने अपने यूरोपीय ढंग के सिपाहियों को मैदान से दूर रिज़र्व में रखा। शाह आलम द्वितीय की अपनी कोई फ़ौज नहीं थी, और उसकी राजनीतिक सोच पहले ही उस ताक़त की तरफ़ मुड़ चुकी थी जो उसे दिल्ली वापस बिठा सके।

हेक्टर मुनरो की कंपनी फ़ौज की अपनी मुश्किलें थीं। बक्सर से कुछ ही हफ़्ते पहले बंगाल के सिपाहियों ने मांझी में तनख़्वाह के बकाया और सख़्त अनुशासन के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी थी। मुनरो ने 24 सरग़नाओं को तोप के मुँह से उड़वा दिया — यह ख़ौफ़नाक सज़ा असरदार साबित हुई और कंपनी ने आगे भी इसका इस्तेमाल किया। बक्सर में लड़ने वाले बंगाल के सिपाही मुनरो की सख़्ती को अच्छी तरह जानते थे।

लड़ाई कैसे चली

22 अक्टूबर 1764 की सुबह शुजा-उद-दौला की फ़ौज भारतीय तरीक़े से जमी: आगे तोपख़ाना, पीछे पैदल सेना, दोनों किनारों पर घुड़सवार। मुनरो ने अपने क़रीब 7,000 सैनिकों को यूरोपीय ढंग की सीधी कतारों में लगाया — पैदल सेना की तीन पंक्तियाँ, बीच-बीच में तोपें और किनारों पर घुड़सवार।

लड़ाई की शुरुआत लंबी दूरी की तोपबाज़ी से हुई। फिर शुजा-उद-दौला ने कंपनी के बाएँ हिस्से पर घुड़सवार हमला बोला, जो उस वक़्त कुछ खुला पड़ा था। इस हमले से कंपनी की कतार टूटते-टूटते बची, लेकिन मुनरो ने अपना रिज़र्व झोंक दिया और अंग्रेज़ पैदल सेना की अनुशासित गोलाबारी ने पास से ही अवध के घुड़सवारों को चीर डाला। मीर क़ासिम के यूरोपीय ढंग के सिपाही रिज़र्व में ही पड़े रहे और लड़ाई में उतरे ही नहीं।

दोपहर तक शुजा-उद-दौला की फ़ौज बिखरने लगी। नवाब वज़ीर ख़ुद भाग निकला और पीछा रोकने के लिए नदी पर बनी अपनी ही नावों वाली पुल उड़ा दी — इससे उसके अपने हज़ारों सैनिक ग़लत किनारे पर फँस गए। मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय अपने ख़ेमे में ही बैठा हिसाब लगाता रहा और दिन ढलने से पहले मुनरो के आगे हथियार डाल दिए। मीर क़ासिम अपने जवाहरात लेकर निकल भागा और भटकते हुए गुमनामी में खो गया।

बक्सर की लड़ाई 1764 एक ही दिन में ख़त्म हो गई। कंपनी ने 130 तोपें और ऐसा ख़ज़ाना क़ब्ज़े में लिया जिसका अंदाज़ा 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक लगाया जाता है।

इलाहाबाद की संधि 1765

बक्सर के बाद कंपनी ने अगले नौ महीने अपनी पकड़ पक्की करने में लगाए। रॉबर्ट क्लाइव मई 1765 में दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनकर भारत लौटा और उसने ख़ुद बातचीत की। नतीजा अगस्त 1765 में हुई इलाहाबाद की संधि के दो अलग-अलग दस्तावेज़ थे — एक मुग़ल बादशाह के साथ और दूसरा अवध के नवाब वज़ीर के साथ।

शाह आलम द्वितीय के साथ संधि (12 अगस्त 1765)

शुजा-उद-दौला के साथ संधि (16 अगस्त 1765)

इस समझौते ने कंपनी की पश्चिमी सरहद पर अवध को एक बीच का राज्य बना दिया, मुग़ल बादशाह को नाम भर के अलावा कंपनी का पेंशनयाफ़्ता बना दिया, और सबसे बड़ी बात, कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की सरकारी लगान-सत्ता में बदल दिया।

दोहरी सरकार और उसकी नाकामी

रॉबर्ट क्लाइव के इस समझौते से जो व्यवस्था बनी, उसे बंगाल की दोहरी सरकार (1765-1772) कहते हैं। कंपनी के पास दीवानी थी, यानी लगान वसूली और दीवानी न्याय। नवाब — उस वक़्त नजम-उद-दौला — के पास निज़ामत थी, यानी फ़ौजदारी न्याय, क़ानून-व्यवस्था और फ़ौजी मामले, और उसका ख़र्च कंपनी से मिलने वाले भत्ते से चलता था।

असल में दोनों काम कंपनी ही भारतीय नायबों के ज़रिए करती थी। मुहम्मद रज़ा ख़ान एक साथ नायब दीवान और नायब नाज़िम था और कंपनी के आगे जवाबदेह था। यह व्यवस्था जानबूझकर ऐसी बनाई गई थी कि कंपनी के हाथ में ताक़त रहे और ज़िम्मेदारी कोई न हो। क्लाइव के हिमायती इसे बीच का इंतज़ाम बताते थे; एडमंड बर्क जैसे आलोचकों ने बाद में इसे प्रशासनिक कायरता कहा, जिसने 1770 का भयानक बंगाल अकाल पैदा किया। उस अकाल में क़रीब 1 करोड़ लोग मरे, यानी सूबे की आबादी का लगभग एक-तिहाई।

वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1772 में आख़िरकार दोहरी सरकार ख़त्म की, ख़ज़ाना मुर्शिदाबाद से कलकत्ता ले आया और दीवानी का काम सीधे कंपनी के अफ़सरों के हाथ में दे दिया। बक्सर की लड़ाई 1764 से लेकर 1793 की स्थायी बंदोबस्त तक का सफ़र यही कहानी है कि कंपनी ने बक्सर में जीती हुई हुकूमत की ज़िम्मेदारियाँ धीरे-धीरे कैसे क़बूल कीं।

बक्सर प्लासी से ज़्यादा अहम क्यों था

UPSC के लिहाज़ से दोनों लड़ाइयों को पाँच पैमानों पर रखकर देखना काम आता है।

पैमानाप्लासी 1757बक्सर 1764
जीत किस तरह कीसाज़िश से मिलीफ़ौजी
सामने कौनएक नवाबतीन हिंद-मुस्लिम ताक़तें
कंपनी का सेनापतिरॉबर्ट क्लाइव (लेफ़्टिनेंट कर्नल)हेक्टर मुनरो (मेजर)
कंपनी को क्या मिलानवाब पर असरदीवानी के ज़रिए क़ानूनी हुकूमत
लंबे समय का असरराजनीतिक शुरुआतसंवैधानिक शुरुआत

बिपन चंद्र अपनी किताब History of Modern India में बक्सर को ज़्यादा अहम मानते हैं, क्योंकि इसने दिखा दिया कि कंपनी बची हुई सारी बड़ी भारतीय ताक़तों के गठजोड़ को खुले मैदान में हरा सकती है, और क्योंकि इलाहाबाद की संधि से कंपनी को मुग़ल बादशाह की दी हुई मंज़ूरी मिली — यानी उपमहाद्वीप के सबसे मालदार सूबों पर हुकूमत का मान्यता प्राप्त संवैधानिक हक़। प्लासी ने कंपनी को एक नवाब दिया; बक्सर ने पूरा सूबा।

UPSC तैयारी के लिहाज़ से अहमियत

GS पेपर I (आधुनिक भारत) में बक्सर की लड़ाई 1764 कई विषयों से जुड़ती है:

मुख्य परीक्षा जैसे प्रश्न

सामान्य प्रश्न

बक्सर की लड़ाई 1764 किन-किन के बीच लड़ी गई?

बक्सर की लड़ाई 1764 एक तरफ़ मेजर हेक्टर मुनरो की अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की क़रीब 7,072 सैनिकों वाली फ़ौज और दूसरी तरफ़ बंगाल के हटाए गए नवाब मीर क़ासिम, अवध के नवाब वज़ीर शुजा-उद-दौला और मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय की मिली-जुली फ़ौज के बीच लड़ी गई, जिसमें कुल मिलाकर क़रीब 40,000 से 50,000 सैनिक थे।

बक्सर कहाँ है?

बक्सर बिहार में गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर बसा एक क़स्बा है, जो पटना से क़रीब 130 किलोमीटर पश्चिम में उत्तर प्रदेश की सीमा के पास पड़ता है। लड़ाई का मैदान आज के बक्सर ज़िले में ही है और वहाँ एक स्मारक बना हुआ है।

इलाहाबाद की संधि 1765 क्या थी?

इलाहाबाद की संधि दरअसल अगस्त 1765 में हुए दो अलग-अलग समझौते हैं। पहला 12 अगस्त को मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ हुआ, जिसमें हर साल 26 लाख रुपये ख़िराज के बदले बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी को मिली। दूसरा 16 अगस्त को शुजा-उद-दौला के साथ हुआ, जिसमें 50 लाख रुपये हर्जाना और कंपनी की सहायक फ़ौज रखना मंज़ूर करने के बदले उसे ज़्यादातर अवध वापस मिल गया।

दीवानी का हक़ क्या था?

दीवानी मुग़ल व्यवस्था का वह प्रशासनिक हक़ था जिसके तहत किसी सूबे में लगान वसूला जाता था और दीवानी न्याय चलाया जाता था। बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी शाह आलम द्वितीय ने 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दी। इससे कंपनी भारत के सबसे मालदार हिस्से की क़ानूनी लगान-सत्ता बन गई, जबकि नवाब के पास नाम भर की निज़ामत यानी पुलिस-अधिकार रह गए।

बक्सर को प्लासी से ज़्यादा अहम क्यों माना जाता है?

बक्सर को इसलिए ज़्यादा अहम माना जाता है क्योंकि यह साज़िश नहीं, असली फ़ौजी जीत थी, इसमें तीनों बड़ी हिंद-मुस्लिम ताक़तों का गठजोड़ हारा, और इससे कंपनी को बंगाल के लगान पर मुग़ल बादशाह की दी हुई क़ानूनी हुकूमत मिली। प्लासी ने कंपनी को असर दिलाया; बक्सर ने संवैधानिक अधिकार। ज़्यादातर इतिहासकार बक्सर को ही ब्रिटिश राज की असली शुरुआत मानते हैं।

बंगाल की दोहरी सरकार क्या थी?

बंगाल की दोहरी सरकार वह व्यवस्था थी जो रॉबर्ट क्लाइव ने 1765 में बनाई, जिसमें दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी के पास रही और निज़ामत नवाब के पास, लेकिन दोनों काम कंपनी के आगे जवाबदेह भारतीय नायबों से कराए जाते थे। इसी व्यवस्था को 1770 के बंगाल अकाल के लिए बड़े पैमाने पर ज़िम्मेदार माना गया और वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1772 में इसे ख़त्म कर दिया।

बक्सर के बाद मीर क़ासिम, शुजा-उद-दौला और शाह आलम द्वितीय का क्या हुआ?

मीर क़ासिम अपने जवाहरात लेकर बक्सर से निकल भागा, रुहेलखंड और दिल्ली में भटकता रहा और 1777 में कोटवाल में ग़रीबी की हालत में मरा। शुजा-उद-दौला को घटे हुए अवध पर सहायक संधि के तहत बहाल किया गया और 1775 में उसकी मौत हुई। शाह आलम द्वितीय 1771 तक इलाहाबाद में कंपनी का पेंशनयाफ़्ता बना रहा, फिर मराठे उसे दिल्ली वापस ले गए; बाद में 1788 में रुहेला सरदार ग़ुलाम क़ादिर ने उसकी आँखें फोड़ देने की ज़िल्लत भी उसे झेलनी पड़ी।

बक्सर की लड़ाई 1764 में कितना नुक़सान हुआ?

अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के 847 सैनिक बक्सर में मरे और घायल हुए। दूसरी तरफ़ की फ़ौज के क़रीब 2,000 लोग मारे गए, 130 तोपें छिन गईं और 50 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच का ख़ज़ाना कंपनी के हाथ लगा। ज़्यादातर नुक़सान लड़ाई में नहीं, बल्कि शुजा-उद-दौला के अपनी ही नावों वाली पुल उड़ा देने के बाद हुई भगदड़ में हुआ।