Anantam IASHindi Note · 4 May 2026

बायोपायरेसी (Biopiracy) — हल्दी, बासमती, नीम, TKDL रक्षा (UPSC विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)

बायोपायरेसी — हल्दी, बासमती, नीम पेटेंट मामले, ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL), जैव-विविधता अधिनियम, CBD, नागोया प्रोटोकॉल और WIPO 2024 संधि — UPSC GS III विस्तृत नोट्स।

1995 में अमेरिकी पेटेंट एवं ट्रेडमार्क कार्यालय (US Patent and Trademark Office) ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिसिसिपी मेडिकल सेंटर के दो शोधकर्ताओं को “घावों को भरने में हल्दी के उपयोग” का पेटेंट दे दिया — एक ऐसी उपचार-पद्धति जिसका प्रयोग भारतीय दादियाँ सहस्राब्दियों से करती आई हैं। उस पेटेंट को रद्द करने में भारत को दो वर्ष और पर्याप्त धन लगा — संस्कृत और उर्दू के प्राचीन ग्रंथों से 32 संदर्भ प्रस्तुत करने पड़े। हल्दी का यह मामला (और बाद में बासमती, नीम, दार्जिलिंग चाय) ने भारत को ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) के निर्माण की प्रेरणा दी — जो आज परम्परागत ज्ञान-संरक्षण का वैश्विक मानक है।

UPSC GS III के लिए बायोपायरेसी एक क्रॉसओवर विषय है — बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), जैव-विविधता, परम्परागत ज्ञान और अंतर्राष्ट्रीय विधि के बीच। प्रीलिम्स और मेन्स — दोनों में बार-बार पूछा जाता है।

बायोपायरेसी क्या है

बायोपायरेसी स्वदेशी समुदायों के जैविक संसाधनों या परम्परागत ज्ञान का अनधिकृत विनियोग (unauthorised appropriation) है — जो व्यक्तियों या निगमों द्वारा, आम तौर पर पेटेंट के माध्यम से, उचित मुआवज़े या सहमति के बिना किया जाता है।

इसके रूप:

प्रसिद्ध भारतीय बायोपायरेसी मामले

हल्दी (1995, अमेरिका)

बासमती (1997, अमेरिका)

नीम (1994, यूरोप)

दार्जिलिंग चाय (2003)

अन्य

परम्परागत ज्ञान संवेदनशील क्यों है

ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL)

सिंहावलोकन

TKDL कैसे कार्य करता है

पहुँच की व्यवस्था

TKDL सार्वजनिक पहुँच (2024)

2024 में भारत ने ग़ैर-वाणिज्यिक शोध और शैक्षणिक उपयोग के लिए TKDL को सार्वजनिक पहुँच के लिए खोल दिया — जिससे इसकी उपयोगिता का विस्तार हुआ।

सम्बन्धित विधिक ढाँचा

जैव-विविधता अधिनियम 2002 (2023 में संशोधित)

जैविक विविधता पर अभिसमय (CBD) 1992

नागोया प्रोटोकॉल 2010

पादप क़िस्म एवं किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम 2001

वस्तुओं के भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999

भारत की विशिष्ट शक्तियाँ

वैश्विक चुनौतियाँ

आगे की राह

हालिया घटनाक्रम (2024-26)

परम्परागत ज्ञान संरक्षण ढाँचा — एक तुलना

उपकरणस्तरप्रमुख विशेषता
TKDLराष्ट्रीय (CSIR-आयुष)3.6 लाख+ सूत्र, 13 पेटेंट कार्यालयों को पहुँच
जैव-विविधता अधिनियम 2002राष्ट्रीयNBA, ABS
GI Act 1999राष्ट्रीय600+ भारतीय GI
CBD 1992वैश्विकसंरक्षण, सतत उपयोग, ABS
नागोया प्रोटोकॉल 2010वैश्विकआनुवंशिक संसाधनों पर ABS
WIPO TK संधि 2024वैश्विकमूल-प्रकटीकरण

UPSC प्रासंगिकता

प्रीलिम्स बिंदु

मेन्स कोण

निबंध कोण

अभ्यास प्रश्न — “बायोपायरेसी भारत की जैव-विविधता और परम्परागत ज्ञान के लिए 21वीं सदी की चुनौती है। भारत की प्रतिक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।” (250 शब्द)

TKDL आज वैश्विक मानक है — भारत ने केवल एक डेटाबेस नहीं, एक मॉडल निर्यात किया। मई 2024 की WIPO संधि बीस वर्षों की कूटनीति की उपलब्धि है। अगली चुनौती है — आदिवासी और मौखिक परम्पराओं तक यही संरक्षण विस्तारित करना, और AI-युग में भारत की जैव-विविधता के डिजिटल अनुक्रम डेटा की रक्षा करना।

सामान्य प्रश्न

बायोपायरेसी (Biopiracy) क्या है?

बायोपायरेसी स्वदेशी समुदायों के जैविक संसाधनों या परम्परागत ज्ञान का अनधिकृत विनियोग है — आम तौर पर पेटेंट के माध्यम से, बिना उचित मुआवज़े या सहमति के।

TKDL क्या है और इसे कब शुरू किया गया?

ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) 2001 में CSIR और आयुष मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया डिजिटल डेटाबेस है। 2024 तक इसमें 3.6 लाख से अधिक सूत्रीकरण प्रलेखित हैं और यह 5 भाषाओं में उपलब्ध है। 230+ पेटेंट आवेदन TKDL साक्ष्य के आधार पर रद्द हुए हैं।

हल्दी पेटेंट मामला क्यों ऐतिहासिक है?

1995 में अमेरिकी पेटेंट कार्यालय ने हल्दी के घाव-निवारण गुणों पर पेटेंट दिया। CSIR ने 32 संस्कृत/उर्दू/हिंदी संदर्भ प्रस्तुत कर 1997 में पेटेंट रद्द कराया — यह विकासशील देश द्वारा परम्परागत ज्ञान-रक्षा का पहला बड़ा अंतर्राष्ट्रीय विजय था।

CBD और नागोया प्रोटोकॉल में क्या अंतर है?

जैविक विविधता पर अभिसमय (CBD, 1992) तीन वैश्विक लक्ष्य निर्धारित करता है — संरक्षण, सतत उपयोग और लाभ-साझेदारी। नागोया प्रोटोकॉल (2010) इसका अनुपूरक है — विशेष रूप से आनुवंशिक संसाधनों की पहुँच और लाभ-साझेदारी (ABS) पर केंद्रित। भारत ने 2012 में अनुसमर्थन किया।

WIPO आनुवंशिक संसाधन एवं TK संधि 2024 क्या है?

मई 2024 में WIPO में हुई ऐतिहासिक संधि — पेटेंट आवेदनों में आनुवंशिक संसाधनों और परम्परागत ज्ञान के मूल का प्रकटीकरण आवश्यक करती है। भारत ने इसका दो दशकों तक प्रबल समर्थन किया था। यह बायोपायरेसी रोकने की दिशा में पहला बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय उपकरण है।

राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण (NBA) कहाँ स्थित है?

राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण (NBA) चेन्नई में स्थित है। यह जैव-विविधता अधिनियम 2002 के अंतर्गत स्थापित वैधानिक निकाय है, जो विदेशी संस्थाओं को जैविक संसाधनों के वाणिज्यिक उपयोग की अनुमति देता है।

जैव-विविधता संशोधन अधिनियम 2023 ने क्या बदलाव किए?

2023 के संशोधन ने आयुष शोधकर्ताओं और घरेलू उद्योग की पहुँच को आसान बनाया, जबकि विदेशी संस्थाओं के लिए अनुपालन सख़्त किया। आपराधिक दंडों को कम कर सिविल जुर्माने में बदला गया।

भौगोलिक संकेतक (GI) से बायोपायरेसी कैसे रुकती है?

GI विशिष्ट भौगोलिक मूल वाले उत्पादों (जैसे दार्जिलिंग चाय, बासमती, मैसूर सिल्क) की पहचान की रक्षा करता है। 2024 तक भारत में 600+ GI पंजीकृत हैं — विदेशी ट्रेडमार्क प्रयासों के विरुद्ध रक्षा-कवच के रूप में काम करते हैं।

TKDL तक पहुँच किनको दी गई है?

TKDL तक गोपनीयता समझौतों के तहत 13 अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों को पहुँच दी गई है — जिनमें USPTO, EPO, JPO शामिल हैं। 2024 से ग़ैर-वाणिज्यिक शोध और शैक्षणिक उपयोग के लिए सार्वजनिक पहुँच भी खुल गई है।

बायोपायरेसी UPSC के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

यह GS III (IPR, जैव-प्रौद्योगिकी, विज्ञान-तकनीक) और GS II (अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ) — दोनों को जोड़ता है। मेन्स में संरक्षण-नीति पर प्रश्न आते हैं, प्रीलिम्स में मामले, संस्थाएँ और संधियाँ। निबंध में संस्कृति-विरासत-नवाचार के संगम का विषय है।