भारत में बहुस्तरीय कृषि: लाभ और यूपीएससी प्रासंगिकता (पर्यावरण)
बहुस्तरीय / बहु-मंज़िल कृषि पर यूपीएससी मार्गदर्शिका: लाभ, ग्रीन सोहरा वनीकरण, कृषि-वानिकी, किसान आय दोगुनी करना और 2024-26 के अद्यतन।
बहुस्तरीय कृषि — जिसे बहु-स्तरीय या बहु-मंज़िला सस्य-विन्यास भी कहा जाता है — अंतरफ़सली खेती का वह रूप है जिसमें भिन्न ऊँचाई, जड़-तंत्र और परिपक्वता-अवधि वाले पेड़, झाड़ियाँ और फसलें एक ही भूमि-खंड पर एक साथ उगाई जाती हैं। ऊँची छत्र-प्रजातियाँ ऊपरी स्तर पर; मध्यम-ऊँचाई वाली झाड़ियाँ मध्य स्तर पर; और भूमि-स्तरीय फसलें तथा कंद-मूल नीचे रहते हैं। यह व्यवस्था इस बात का अनुकरण करती है कि प्राकृतिक वन किस तरह वनस्पतियों को परत-दर-परत सजाता है और सूर्यप्रकाश, जल, पोषक-तत्व तथा स्थान का अनुकूलतम उपयोग करता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (ICAR) ने एक दशक से अधिक समय से बहु-स्तरीय प्रणालियों को किसान की आय दोगुनी करने और जलवायु-अनुकूल जीविकाएँ बनाने के सबसे आशाजनक मार्गों में से एक के रूप में बढ़ावा दिया है। मेघालय के ग्रीन सोहरा वनीकरण कार्यक्रम के माध्यम से अब यह मॉडल सार्वजनिक नीति में प्रमुखता से प्रवेश कर चुका है।
ग्रीन सोहरा कार्यक्रम
2022 में केंद्रीय गृह मंत्री ने पूर्वी खासी पहाड़ियों में चेरापूँजी–मौसिनराम पट्टी के पुनरुद्धार हेतु ग्रीन सोहरा वनीकरण कार्यक्रम का शुभारंभ किया। सोहरा चेरापूँजी का स्थानीय नाम है — वह क्षेत्र जो कभी विश्व की सर्वाधिक वर्षा का पर्याय था। दशकों के वन-विनाश, कोयला-खनन और स्थानांतरी कृषि ने इस भू-परिदृश्य के विस्तीर्ण क्षेत्रों को अवकर्षित कर दिया है; वर्षा-प्रतिरूप बदल गए हैं; भूजल और मिट्टी की उर्वरता ध्वस्त हुई है।
इस कार्यक्रम के तहत:
- स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर असम राइफल्स वनीकरण प्रयास का नेतृत्व करता है।
- 80% भूमि पर पारंपरिक, दीर्घकालीन देशी पेड़ (ओक, खासी पाइन, रोडोडेंड्रॉन और स्थानीय कठोर-काष्ठ वृक्ष) लगाए जाते हैं।
- 20% भूमि पशु-चारा पौधों, सजावटी पौधों और नर्सरी के लिए — ताकि समुदाय की ज़रूरतें पूरी हों और दीर्घकालीन वृक्षों पर दबाव घटे।
यह 80:20 डिज़ाइन स्वयं बहु-स्तरीय चिंतन का अनुप्रयोग है — एक ही वनीकरण भू-परिदृश्य के भीतर पारिस्थितिक और आजीविका क्षेत्रों का पृथक्करण।
बहुस्तरीय कृषि वास्तव में है क्या
बहुस्तरीय कृषि पौधों को ऊर्ध्वाधर परतों में व्यवस्थित करती है:
| स्तर | विशिष्ट प्रजातियाँ | कार्य |
|---|---|---|
| उद्गम छत्र | नारियल, सुपारी, सागौन | उच्चतम सूर्यप्रकाश अवशोषण, दीर्घकालीन आय |
| ऊपरी छत्र | आम, काजू, कटहल | फल + काष्ठ, छाया-नियमन |
| मध्य झाड़ी | कॉफ़ी, कोको, काली-मिर्च लताएँ | छाया-प्रिय व्यापारिक फसलें |
| शाकीय | केला, पपीता, अनानास | अल्प-चक्रीय आय |
| भूमि-स्तर | अदरक, हल्दी, कंद | मिट्टी-नमी, जड़-विविधीकरण |
मुख्य जैविक सिद्धांत: लंबे घटकों के पत्ते तीव्र-प्रकाश-माँगी होते हैं; छोटे घटकों के पत्ते छाया-सहिष्णु। इससे ज़मीन का हर वर्ग-मीटर अनेक ऊँचाइयों पर और वर्ष के अनेक महीनों में सूर्यप्रकाश का उपयोग कर पाता है।
यह मॉडल सामान्यतः इन जगहों पर प्रयुक्त होता है:
- रोपण कृषि — केरल के गृह-उद्यान, कर्नाटक की कॉफ़ी स्टेट, पूर्वोत्तर के सुपारी-बगान।
- बगीचे जहाँ वृक्षों के बीच का स्थान अन्यथा बेकार जाता।
- कृषि-वानिकी प्रणालियाँ — सिल्वोपाश्चर, गली-फ़सली, छायादार बारहमासी।
लाभ
आर्थिक
- प्रति इकाई क्षेत्र पर अधिक आय: एक ही एकड़ से अनेक उत्पाद।
- वर्ष भर आय का समान वितरण — भिन्न फसलें भिन्न महीनों में पकती हैं, जिससे नकदी-प्रवाह सुचारु होता है।
- जोखिम विविधीकरण: एक फसल विफल हो या कीमतें गिरें, तो अन्य खेत सँभाल लेती हैं।
- मौसमी उछाल की जगह वर्ष भर रोज़गार।
पारिस्थितिक
- मिट्टी की रक्षा: सतत भू-आवरण अपवाह और मृदा-कटाव घटाता है।
- सूक्ष्म-जलवायु का नियमन: पेड़ों की छत्रछाया पवन-वेग, वाष्पीकरण और दिन के ताप-तनाव को घटाती है।
- कार्बन पृथक्करण: बारहमासी जैवभार ज़मीन के ऊपर और नीचे कार्बन संग्रह करता है।
- जैव-विविधता: पक्षी, परागकण और मृदा-जीव एकल-खेती की तुलना में कहीं अधिक नीच (niches) पाते हैं।
- जल-धारण: बहु-परत जड़-तंत्र विभिन्न मिट्टी-गहराइयों से जल लेते हैं और अंतःस्राव बढ़ाते हैं।
सस्य-वैज्ञानिक
- सतत छाया से प्रभावी खरपतवार-नियंत्रण।
- भिन्न गहराइयों पर मृदा-नमी का कुशल उपयोग।
- लीच हुए पोषक-तत्वों का उपयोग — गहरी जड़ वाले वृक्ष खनिजों को पत्ती-गिरावट के माध्यम से सतह पर लौटाते हैं।
- फसल और आवास विविधता से कीट-दबाव में कमी।
आपदा और जलवायु अनुकूलन
- उच्च-तीव्रता वाली वर्षा, भूस्खलन और मृदा-कटाव के प्रभाव को घटाती है — विशेषकर हिमालयी और पूर्वोत्तर ढलानों पर।
- चक्रवात-प्रवण तटों पर वायुरोधक ज़मीनी फसलों की रक्षा करते हैं।
- मियावाकी-शैली के सघन रोपण (प्रायः साथ में उल्लिखित) केवल 3 वर्षों के रख-रखाव से वनों को 30 गुना तक तेज़ी से बढ़ा सकते हैं।
भारत में यह कहाँ फिट बैठता है
- केरल के गृह-उद्यान — विश्व की सर्वाधिक अध्ययन की गई बहु-स्तरीय लघु-किसान प्रणाली, जो एक एकड़ पर 5–7 परतें सँभालती है।
- पूर्वोत्तर भारत — पारंपरिक प्रणालियाँ सुपारी, संतरा, केला, काली-मिर्च, अदरक को मिलाती हैं।
- कॉफ़ी और चाय बागान — छाया-वृक्ष अनिवार्य; बहु-स्तरीय ही मूल विधि है।
- सतत कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन (NMSA) और कृषि-वानिकी उप-मिशन के तहत कृषि-वानिकी कार्यक्रम।
चुनौतियाँ
- ज्ञान-अंतर: स्थिर बहु-स्तरीय प्रणाली का डिज़ाइन वह कृषि-वानिकी विशेषज्ञता माँगता है जो अधिकांश प्रसार सेवाओं के पास नहीं है।
- लंबी परिपक्वता: छत्र-वृक्षों को परिपक्व होने में 5–10 वर्ष लगते हैं — लघु किसानों को बीच की आय चाहिए।
- जब छत्र परस्पर ढँक जाएँ तो यांत्रिकीकरण कठिन होता है।
- भूमि-स्वामित्व की समस्याएँ — बटाईदार किसानों के पास बारहमासी पौधे लगाने का कोई प्रोत्साहन नहीं।
- ऋण और बीमा उत्पाद एकल फसलों के लिए बने हैं, बहु-स्तरीय प्रणालियों के लिए नहीं।
- लघु वनोपज के लिए बाज़ार-जुड़ाव कमज़ोर है।
नीतिगत समर्थन
- 2016–17 से NMSA के तहत कृषि-वानिकी उप-मिशन (SMAF)।
- राष्ट्रीय कृषि-वानिकी नीति 2014 — विश्व में अपनी तरह की पहली।
- NAPCC के तहत ग्रीन इंडिया मिशन।
- राष्ट्रीय बाँस मिशन।
- कृषि-वानिकी प्रणालियों पर जैविक खेती के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना।
- PM-KISAN नकद हस्तांतरण बीच की आय प्रदान करते हैं।
आगे का रास्ता
- स्तर-वार प्रसार प्रशिक्षण — प्रखंड-स्तर के प्रसार कर्मियों को कृषि-वानिकी डिज़ाइन में प्रशिक्षित करना।
- वृक्षों की परिपक्वता-अवधि से मेल खाती छूट-अवधि के साथ समर्पित ऋण-रेखा।
- कार्बन क्रेडिट का मौद्रिकीकरण — बहु-स्तरीय प्रणालियाँ स्वैच्छिक कार्बन बाज़ारों के लिए अर्ह हैं।
- भू-चिह्नित रोपण पंजी — ताकि किसान सब्सिडी और परिस्थिति-तंत्र सेवाओं का दावा कर सकें।
- कृषि-वानिकी उत्पादों पर MSP का विस्तार — वर्तमान में कुछ ही वस्तुओं तक सीमित।
- ICAR-केंद्रीय कृषि-वानिकी अनुसंधान संस्थान (CAFRI), झाँसी और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में अनुसंधान।
नवीनतम घटनाक्रम (2024–26)
अद्यतन संदर्भ:
- ग्रीन सोहरा कार्यक्रम का विस्तार (2024): नए चरण री-भोई और पश्चिम खासी पहाड़ी ज़िलों के अतिरिक्त गाँवों को आच्छादित करते हैं।
- राष्ट्रीय कृषि-वानिकी नीति का संशोधन प्रारूप (2024–25) कार्बन बाज़ारों और डिजिटल भू-अभिलेखों को एकीकृत करता है।
- केंद्रीय बजट 2024–25 में कृषि-वानिकी उप-मिशन के तहत कृषि-वानिकी और बाँस के लिए अतिरिक्त आवंटन।
- वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (G20 भारत 2023 में प्रारंभ) अप्रत्यक्ष रूप से बहु-स्तरीय प्रणालियों से जैवभार की माँग बढ़ाता है।
- LiFE मिशन (Lifestyle for Environment) सतत खाद्य-उत्पादन को — जिसका बहु-स्तरीय कृषि एक स्तंभ है — प्राथमिकता क्षेत्र के रूप में चिह्नित करता है।
- पूर्वोत्तर राज्यों के लिए ICAR 2024 के कार्य-पैकेज झूम के मुक़ाबले बहु-स्तरीय पर बल देते हैं।
यूपीएससी प्रासंगिकता
प्रश्न-पत्र मानचित्रण: GS प्रश्न-पत्र III — कृषि, पर्यावरण; साथ ही GS प्रश्न-पत्र I — भारतीय भूगोल और भू-उपयोग।
प्रारंभिक परीक्षा संकेत:
- ग्रीन सोहरा वनीकरण कार्यक्रम मेघालय में है; निष्पादन असम राइफल्स द्वारा।
- सोहरा चेरापूँजी का स्थानीय नाम है।
- कृषि-वानिकी का ICAR नोडल संस्थान है CAFRI, झाँसी।
- भारत की राष्ट्रीय कृषि-वानिकी नीति 2014 में अपनाई गई — वैश्विक स्तर पर अपनी तरह की पहली।
- कृषि-वानिकी उप-मिशन सतत कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन के अधीन है।
- मियावाकी पद्धति की उत्पत्ति जापान में हुई और यह भारतीय शहरों में सघन रोपण अभियानों में उपयोग होती है।
- केरल के गृह-उद्यान एक क्लासिक पारंपरिक बहु-स्तरीय प्रणाली हैं।
मुख्य परीक्षा कोण:
- “चर्चा कीजिए कि किस प्रकार बहु-स्तरीय कृषि और कृषि-वानिकी किसान की आय दोगुनी करने तथा जलवायु-अनुकूलन में योगदान कर सकती है।”
- “भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के एक मॉडल के रूप में ग्रीन सोहरा वनीकरण कार्यक्रम का मूल्यांकन कीजिए।”