Anantam IASHindi Note · 4 May 2026

भारत में बंधुआ मज़दूरी: व्यवस्था उन्मूलन अधिनियम 1976, पुनर्वास और आधुनिक दासता की चुनौती (UPSC भारतीय समाज)

बंधुआ मज़दूरी (Bonded Labour) — संवैधानिक ढाँचा, बंधुआ मज़दूर व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम 1976, बंधुआ मुक्ति मोर्चा निर्णय, पुनर्वास योजना 2016, आधुनिक दासता की चुनौती और 2024-26 के नवीनतम घटनाक्रम — UPSC GS-I/II/III।

1982 में सर्वोच्च न्यायालय ने People’s Union for Democratic Rights (PUDR) बनाम भारत संघ मामले में घोषित किया कि न्यूनतम वेतन से कम भुगतान अनुच्छेद 23 (Article 23) के अंतर्गत बलात् श्रम (forced labour) के समान है। यह संवैधानिक अंतर्दृष्टि — कि “बल” का स्वरूप शारीरिक होना अनिवार्य नहीं — आगामी चार दशकों तक भारत की क़ानूनी प्रतिक्रिया को आकार देती रही। फिर भी ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2023 (Global Slavery Index) के अनुसार भारत में 1.1 करोड़ लोग अब भी आधुनिक दासता (modern slavery) की स्थितियों में रहते हैं — जिनमें ऋण-बंधन (debt bondage) और बलात् श्रम शामिल हैं। समस्या पारंपरिक जातीय बंधन से आज के मानव-तस्करी, ईंट-भट्टों, घरेलू कार्य और यौन-तस्करी में रूप बदल चुकी है।

यह लेख बंधुआ मज़दूरी के विरुद्ध क़ानूनी ढाँचे का अनुसरण करता है, 1976 के अधिनियम और पुनर्वास की केंद्रीय क्षेत्रक योजना (Central Sector Scheme) का मूल्यांकन करता है, और आधुनिक दासता की समकालीन चुनौती का मानचित्रण करता है। UPSC GS-I (समाज), GS-II (सुशासन एवं सामाजिक न्याय) और GS-III (आंतरिक सुरक्षा) — तीनों दृष्टिकोणों से यह विषय एक केंद्रीय विषय है।

बंधुआ मज़दूरी क्या है?

बंधुआ मज़दूर व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम 1976 (Bonded Labour System (Abolition) Act 1976) बंधुआ मज़दूरी को बलात् श्रम की उस व्यवस्था के रूप में परिभाषित करता है जिसमें ऋणी (debtor) किसी ऋणदाता (creditor) के साथ मौखिक या लिखित समझौता करके सेवा देता है —

मूल तत्व ऋण-बंधन (debt bondage) है — एक अग्रिम (advance) या ऋण जिसे श्रमिक श्रम के माध्यम से चुकाता है, अक्सर ऐसे हेर-फेर वाले मूल्यांकनों पर कि ऋण व्यावहारिक रूप से अदेय बना रहता है। यानी ‘ऋण’ केवल आर्थिक तंत्र नहीं — यह बंदी बनाने का साधन है।

संवैधानिक ढाँचा

ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में बंधुआ मज़दूरी की जड़ें जाति-आधारित कृषि-व्यवस्था में गहरी हैं — दलित और आदिवासी असमानुपातिक रूप से भूमिहीनता, ऋण-निर्भरता और विरासत-बंधनों के माध्यम से बंधे रहे हैं। औपनिवेशिक अभिलेख बेगार व्यवस्था, गुजरात की हाली व्यवस्था, कर्नाटक की जीता व्यवस्था, बिहार की कमियौती, और तमिलनाडु की पन्नैयल जैसी जाति-आधारित बंधन-व्यवस्थाओं को दर्ज करते हैं।

स्वतंत्रता के बाद, पहली पंचवर्षीय योजना ने बंधुआ मज़दूरी को एक समस्या के रूप में स्वीकार किया, परंतु क़ानूनी कार्रवाई 1975-77 के आपातकाल तक धीमी रही। यह विडंबना है कि बुनियादी अधिकारों के निलंबन के दौर में ही दलित-आदिवासी बंधनमुक्ति का सबसे बड़ा क़ानून बना।

बंधुआ मज़दूर व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम 1976

आपातकाल के दौरान अधिनियमित यह क़ानून —

सर्वोच्च न्यायालय का न्यायशास्त्र

बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984)

न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती का ऐतिहासिक निर्णय —

PUDR बनाम भारत संघ (1982)

नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1984)

बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास के लिए केंद्रीय क्षेत्रक योजना (2016)

यह योजना निम्नलिखित प्रावधान करती है —

बंधन के आधुनिक रूप

आज बंधुआ मज़दूरी निम्नलिखित में दिखाई देती है —

पारंपरिक बनाम आधुनिक बंधन: तुलनात्मक तालिका

आयामपारंपरिक बंधनआधुनिक बंधन
कारणजाति, विरासत-ऋणप्रवास, मौसमी अग्रिम, तस्करी
क्षेत्रकृषि, घरेलू सेवाईंट-भट्टे, गारमेंट, यौन कार्य, घरेलू कार्य
दृश्यतास्थानीय, परिचितअंतर-राज्यीय, छिपी हुई
क़ानूनी पहचानस्पष्ट (जाति-आधारित)जटिल (अनुबंध की आड़)
प्राथमिक पीड़ितदलित, आदिवासी पुरुषमहिलाएँ, बच्चे, प्रवासी श्रमिक
अनुक्रिया-संस्थाज़िला प्रशासनअंतर-राज्यीय समन्वय, NCRB, AHTU

मानव तस्करी का सम्बंध

मानव तस्करी — IPC की धारा 370 (अब BNS 2023 की धारा 143) के अंतर्गत अपराधीकृत — अक्सर बंधन का वाहक बनती है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 और किशोर न्याय अधिनियम 2015 अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करते हैं। एक व्यक्तियों की तस्करी (निवारण, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक एक दशक से अधिक समय से विचाराधीन है।

बच्चों की बंधुआ मज़दूरी

बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम 2016 14 वर्ष से कम के बच्चों को सभी व्यवसायों में और किशोरों (14-18) को ख़तरनाक व्यवसायों में नियोजित करने को निषिद्ध करता है। राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (NCLP) योजना मुक्ति, पुनर्वास और संक्रमणकालीन शिक्षा प्रदान करती है। बाल बंधन बाल तस्करी और बलात् भिक्षावृत्ति से ओवरलैप करता है।

क्रियान्वयन में अंतराल

वैश्विक संदर्भ

नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)

बंधुआ मज़दूर पुनर्वास योजना का संशोधन। श्रम और रोज़गार मंत्रालय ने 2024 में दिशा-निर्देश अद्यतन किए ताकि मुक्ति-प्रमाण-पत्रों (Release Certificates / RCs) को सरल बनाया जा सके और DBT (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण) के माध्यम से क्षतिपूर्ति-भुगतान को तेज़ किया जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी। People’s Union for Civil Liberties और बंधुआ मुक्ति मोर्चा की अनुवर्ती याचिकाओं के माध्यम से राज्य-अनुपालन की निरंतर निगरानी।

BNS 2023। भारतीय न्याय संहिता 2023 (जुलाई 2024 से प्रभावी) तस्करी और बलात् श्रम से जुड़े अपराधों को धारा 143-144 के अंतर्गत समेकित करती है, जो IPC की धारा 370 का स्थान लेती है।

NALSA अभियान। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (National Legal Services Authority) ने ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से बंधुआ मज़दूरों की पहचान और पुनर्वास का सतत अभियान शुरू किया है।

जातिगत जनगणना 2025। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगली राष्ट्रीय जनगणना (अप्रैल 2025) में जातिगत गणना को मंज़ूरी दी है — बंधुआ मज़दूरी की जातिगत संरचना पर सटीक आधारभूत डेटा के लिए यह अनिवार्य है।

MPI 2024। वैश्विक बहु-आयामी ग़रीबी सूचकांक 2024 ने रिपोर्ट किया कि 2005-06 और 2019-21 के बीच 41.5 करोड़ भारतीय बहु-आयामी ग़रीबी से बाहर आए; बंधुआ-संवेदनशीलता बहु-आयामी ग़रीबी से सीधे जुड़ी है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023। परिसीमन (delimitation) के बाद का क्रियान्वयन क़ानून-निर्माण में अधिक महिलाओं को लाएगा; तस्करी और बंधन-क़ानूनों के लिए उनकी भागीदारी अहम है।

वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक 2024 भारत 146 देशों में 129वें स्थान पर रहा; बंधुआ और तस्करी-पीड़ित व्यक्तियों में महिलाओं का अनुपात असमान रूप से अधिक है — विशेषतः घरेलू कार्य और यौन-तस्करी में।

नीतिगत सिफ़ारिशें

Prelims संकेत-शब्द

अनुच्छेद 23 (बलात् श्रम), अनुच्छेद 24 (बाल श्रम); बंधुआ मज़दूर व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम 1976; बंधुआ मुक्ति मोर्चा (1984); PUDR (1982); नीरजा चौधरी (1984); बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास की केंद्रीय क्षेत्रक योजना 2016; IPC की धारा 370 (अब BNS धारा 143); अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956; ILO सम्मेलन 29; ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स (वॉक फ्री फ़ाउंडेशन); NCLP योजना; AHTU (Anti Human Trafficking Unit)।

UPSC प्रासंगिकता

GS पेपर I — भारतीय समाज

GS पेपर II — सुशासन, सामाजिक न्याय

GS पेपर III — आंतरिक सुरक्षा

संभावित Mains प्रश्न

  1. “भारत में बंधुआ मज़दूरी पारंपरिक जाति-आधारित बंधन से आधुनिक दासता में रूपांतरित हुई है।” परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
  2. “बंधुआ मज़दूरी के उन्मूलन में पुनर्वास सबसे कमज़ोर कड़ी है।” चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
  3. “ILO 2014 प्रोटोकॉल का अनुसमर्थन भारत की आधुनिक दासता-प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करेगा।” टिप्पणी कीजिए। (150 शब्द)
  4. “बलात् श्रम का संवैधानिक निषेध उतना ही पुराना है जितनी इसकी निरंतरता।” इस विरोधाभास का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

निबंध-विषय। “अधूरा उन्मूलन”; “ऋण से मुक्ति”; “श्रम की गरिमा अनिवार्य है”।

बंधुआ मज़दूरी एक संवैधानिक विफलता है जो इसलिए बनी हुई है क्योंकि राज्य की प्रतिक्रिया प्रतिक्रियात्मक, अल्प-वित्त-पोषित और खंडित रही है। इसे समाप्त करने के लिए चाहिए — बड़े पैमाने पर पहचान, गहराई से पुनर्वास, और बिना किसी अपवाद के अभियोजन।

सामान्य प्रश्न

बंधुआ मज़दूरी की क़ानूनी परिभाषा क्या है?

बंधुआ मज़दूर व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम 1976 के अनुसार, बंधुआ मज़दूरी वह बलात् श्रम है जिसमें ऋणी न्यूनतम वेतन से कम पर, अनिश्चित कालावधि के लिए, बिना रोज़गार/आवागमन की स्वतंत्रता के, ऋणदाता को सेवा देने पर बाध्य हो। मूल तत्व ऋण-बंधन है।

कौन-से संवैधानिक अनुच्छेद बंधुआ मज़दूरी पर लागू होते हैं?

अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी और बलात् श्रम का निषेध), अनुच्छेद 24 (14 वर्ष से कम के बाल श्रम का निषेध), अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार — बंधुआ मुक्ति मोर्चा 1984), तथा अनुच्छेद 42 और 43 (DPSP — न्यायसंगत कार्य-स्थितियाँ और जीवन-योग्य वेतन)।

बंधुआ मुक्ति मोर्चा निर्णय (1984) में क्या तय हुआ?

न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती के निर्णय ने तीन सिद्धांत स्थापित किए — (1) फ़रीदाबाद की पत्थर-खदानों में बंधुआ मज़दूर पाए गए; (2) श्रमिक के दावा करते ही प्रमाण-भार नियोजक पर आ जाता है; और (3) पुनर्वास राज्य का संवैधानिक दायित्व है, इसके बिना मुक्ति निरर्थक है।

बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास के लिए वित्तीय सहायता कितनी है?

केंद्रीय क्षेत्रक योजना 2016 के अंतर्गत — वयस्क पुरुष को 1 लाख रुपए, महिलाओं/बच्चों/दिव्यांगों को 2 लाख रुपए, और यौन शोषण/तस्करी/ट्रांसजेंडर के चरम मामलों में 3 लाख रुपए। मुक्ति पर 20,000 रुपए की तत्काल सहायता भी दी जाती है।

PUDR बनाम भारत संघ (1982) निर्णय का महत्व क्या है?

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यूनतम वेतन से कम भुगतान अनुच्छेद 23 के अंतर्गत बलात् श्रम है। यानी ‘बल’ को केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रखा जा सकता — आर्थिक दबाव भी बलात् श्रम का गठन करता है।

भारत में बंधुआ मज़दूरी के आधुनिक रूप क्या हैं?

ईंट-भट्टे, पत्थर-खदानें, चावल मिलें, घरेलू कार्य, यौन-तस्करी, बीड़ी रोलिंग, और गारमेंट-निर्यात की उप-संविदा शृंखलाएँ। प्रवासी श्रमिक, महिलाएँ और बच्चे विशेष रूप से असुरक्षित हैं।

BNS 2023 ने तस्करी से सम्बंधित प्रावधानों को कैसे बदला?

भारतीय न्याय संहिता 2023 (जुलाई 2024 से प्रभावी) ने तस्करी और बलात् श्रम के अपराधों को धारा 143-144 के अंतर्गत समेकित किया, जो IPC की धारा 370 का स्थान लेती है। यह प्रावधानों को आधुनिक संदर्भ में पुनर्व्यवस्थित करता है।

ILO 2014 प्रोटोकॉल क्या है? क्या भारत ने इसका अनुसमर्थन किया है?

ILO 2014 प्रोटोकॉल बलात् श्रम सम्मेलन 1930 का अद्यतन है जो आधुनिक दासता, मानव तस्करी और बलात् श्रम के विरुद्ध मज़बूत प्रावधान देता है। भारत ने अभी तक इसका अनुसमर्थन नहीं किया है, हालाँकि नागरिक समाज और कई विशेषज्ञ इसकी सिफ़ारिश करते रहे हैं।

ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2023 में भारत की क्या स्थिति है?

वॉक फ्री फ़ाउंडेशन के ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2023 के अनुसार भारत में लगभग 1.1 करोड़ लोग आधुनिक दासता की स्थितियों में रहते हैं। पूर्ण-संख्या में भारत सूची में सबसे ऊपर के देशों में है, हालाँकि प्रति-व्यक्ति दर अन्य देशों से कम है।

बंधुआ मज़दूरी के क्रियान्वयन में मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?

अल्प-पहचान (मार्च 2023 तक केवल ~3.15 लाख मुक्तियाँ बनाम 2030 का 1.84 करोड़ का लक्ष्य), विलंबित पुनर्वास, सतर्कता समितियों का कमज़ोर कार्यकरण, अभियोजन में निम्न दोषसिद्धि-दर, अंतर-राज्यीय समन्वय की कमी, और गवाह-संरक्षण का अभाव।