Anantam IASHindi Note · 18 April 2026

भारत में ऑफ-बजट वित्तपोषण की चिंताएँ (यूपीएससी अर्थव्यवस्था)

ऑफ-बजट उधार राजकोषीय तस्वीर को विकृत कर देते हैं। IRFC, FCI, CAG की चिंताओं, अनुच्छेद 293 और 2022 के बाद अतिरिक्त-बजटीय संसाधनों पर लगी रोक को समझें।

ऑफ-बजट वित्तपोषण (Off-Budget Financing) से तात्पर्य ऐसे व्यय से है जो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, स्वायत्त निकायों या विशेष प्रयोजन वाहनों (SPV) द्वारा बाजार से उधार लेकर किया जाता है। इन उधारों पर सरकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष गारंटी होती है, लेकिन इन्हें केंद्र या राज्य के बजट में पूरी तरह नहीं दिखाया जाता। एक क्लासिक उदाहरण: जब केंद्र सरकार रेलवे के पूंजीगत खर्च के लिए धन जुटाना चाहती है, तो वह भारतीय रेल वित्त निगम (Indian Railway Finance Corporation – IRFC) के माध्यम से बाजार में बॉन्ड जारी करवा सकती है। सरकार पुनर्भुगतान की गारंटी देती है और अंततः देयता राजकोष पर ही आती है — किंतु वार्षिक बजट की जाँच-परख से बाहर। इसी प्रकार की संरचनाओं का उपयोग भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India – FCI) के माध्यम से खाद्य सब्सिडी, उर्वरक, सिंचाई और बिजली के वित्तपोषण के लिए किया जाता रहा है।

समस्या की व्यापकता

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का अनुमान था कि ऑफ-बजट व्यय ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 1 प्रतिशत हिस्सा लिया है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) ने अपनी 2019 की केंद्रीय लेखा रिपोर्ट में ऐसी व्यवस्थाओं के व्यापक उपयोग पर ध्यान खींचा और इन्हें FRBM अनुशासन का उल्लंघन बताया। राज्य स्तर पर SPV, राज्य-स्वामित्व वाली विद्युत वितरण कंपनियों और विकास निगमों द्वारा लिया गया उधार अक्सर राज्य की FRBM सीमा के आधे के बराबर या उससे अधिक रहा है।

ऑफ-बजट वित्तपोषण कैसे काम करता है

चिंताएँ

वित्तीय जवाबदेही में कमी

ऑफ-बजट व्यय संसद की वार्षिक विनियोग प्रक्रिया के दायरे से बाहर रहता है। विधायक बजट चर्चा के दौरान इसके आकार, उद्देश्य या दक्षता की जाँच नहीं कर पाते। सरकार की शुद्ध उधार तस्वीर वास्तविक से कम दर्शायी जाती है।

कमज़ोर राजकोषीय अनुशासन

जब सरकार को प्राथमिकताओं को वित्तपोषित करते हुए FRBM घाटा लक्ष्य पूरा करने में कठिनाई होती है, तब ऑफ-बजट मार्ग एक बच निकलने का रास्ता बन जाता है। इससे घोषित घाटे के आँकड़ों की विश्वसनीयता और FRBM अधिनियम द्वारा लगाए गए अनुशासन का क्षरण होता है।

बढ़ा हुआ वित्तीय जोखिम

जब संप्रभु गारंटी पर उधार लेने वाले सार्वजनिक उपक्रम ऋण चुकाने में असफल हो जाते हैं, तो वह देयता राजकोष पर आ जाती है। जोखिम असंतुलित है: अच्छे समय में लाभ उपक्रम को मिलता है; बुरे समय में बोझ जनता के खज़ाने पर पड़ता है।

राजकोषीय आँकड़ों की पवित्रता में कमी

सरकारी गारंटियाँ और प्रतिबद्धताएँ आदर्श रूप से ऋण एवं देयता विवरण में समेकित होनी चाहिए। ऐसा न होने पर शीर्षक-स्तर का राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटा और ऋण-GDP अनुपात व्यवस्थित रूप से कम दिखाए जाते हैं, जिससे रेटिंग एजेंसियाँ, निवेशक और नागरिक गुमराह होते हैं।

ब्याज का बोझ

सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा जारी बॉन्ड सामान्यतः संप्रभु प्रतिफल से अधिक ब्याज दर पर होते हैं। अंततः राजकोष की लागत सीधे सरकारी उधार की तुलना में अधिक पड़ती है।

क्लासिक केस अध्ययन

CAG की सिफारिशें

CAG ने केंद्रीय लेखाओं के अनुपालन लेखा-परीक्षण में निम्नलिखित सिफारिशें की हैं:

2022 के बाद की कार्रवाई

केंद्र सरकार

राज्य सरकारें

राज्य क्यों विरोध करते हैं

राज्यों का तर्क है कि विकास की आवश्यकताएँ औपचारिक उधार सीमाओं से अधिक हैं और ऑफ-बजट वाहन महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे का वित्तपोषण करते हैं। केरल ने 2023-24 में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और केंद्र द्वारा उसकी उधारी में कटौती को अनुच्छेद 293 की असंवैधानिक व्याख्या बताते हुए चुनौती दी। यह मामला संविधान पीठ को भेजा गया है और इसके राजकोषीय संघवाद पर महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं।

हाल के घटनाक्रम (2024-26)

आगे की राह

यूपीएससी प्रासंगिकता

ऑफ-बजट वित्तपोषण सरकारी बजट, FRBM, राजकोषीय संघवाद और CAG लेखा-परीक्षण पर GS III का एक आवर्ती विषय है। मेन्स प्रश्न इसे राजकोषीय पारदर्शिता और केंद्र-राज्य संबंधों से जोड़ते हैं। प्रीलिम्स में CAG रिपोर्ट, अनुच्छेद 293 और IRFC व FCI जैसे विशिष्ट SPV पर प्रश्न आ सकते हैं। अभ्यर्थियों को डेटा-समृद्ध उत्तर लिखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के केरल मामले, 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों और बजट प्रकटनों पर नज़र रखनी चाहिए।