भारत में पेरी-अर्बन इलाक़ों का पानी प्रबंधन: शहरीकरण की छूटी हुई कड़ी
शहर और गाँव के बीच बसे पेरी-अर्बन इलाक़ों में पानी और साफ़-सफ़ाई का प्रबंधन क्यों अटका है, 74वें संशोधन, जनगणना नगरों और जल जीवन मिशन के आँकड़ों के साथ UPSC नोट्स।
भूमिका
पेरी-अर्बन इलाक़ों का पानी प्रबंधन (peri-urban water governance) भारत के शहरीकरण की कहानी की छूटी हुई कड़ी है। शहरों के किनारे बसे गाँव अब पूरी तरह ग्रामीण नहीं रहे, लेकिन उनमें से कई पर अभी तक शहरी निकाय जैसा शासन नहीं है। उन पर शहर वाला दबाव है, ज़मीन के दाम ऊपर हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं, टैंकर का बाज़ार चल रहा है, भूजल पर बोझ है, गंदा पानी बहाया जा रहा है और जवाबदेही बँटी हुई है, जबकि नगरपालिका जैसी क्षमता उनके पास नहीं है।
इसीलिए शहर और गाँव के बीच बसे इन पेरी-अर्बन इलाक़ों के पानी प्रबंधन को UPSC का सदाबहार विषय मानिए, कोई गुज़रती हुई ख़बर नहीं। जल जीवन मिशन से भारत ने गाँवों में नल के पानी की पहुँच बहुत बढ़ाई है और शहरों के लिए साफ़-सफ़ाई के राष्ट्रीय कार्यक्रम भी हैं, लेकिन गाँव और शहर के बीच का यह इलाक़ा अक्सर दोनों के बीच से फिसल जाता है। नतीजा शासन की एक खाई है, जो पीने के पानी, गंदे पानी, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय पैसे और शहरी नियोजन, सब पर असर डालती है।

मतलब और परिभाषा
पेरी-अर्बन इलाक़े शहरों के आसपास के वे हिस्से हैं जहाँ ज़मीन का ग्रामीण और शहरी इस्तेमाल आपस में घुल-मिल जाता है। इनमें पुराने गाँव, जनगणना नगर (census town), औद्योगिक इलाक़े, अनौपचारिक कॉलोनियाँ, फ़ार्महाउस और तेज़ी से बढ़ती बस्तियाँ शामिल हो सकती हैं। इनकी अर्थव्यवस्था अब मुख्य रूप से खेती वाली नहीं रही, लेकिन इनका शासन अब भी पंचायतों या कम संसाधन वाले स्थानीय निकायों के भरोसे चलता है।
UPSC के लिहाज़ से यह शब्द इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह शहरीकरण को स्थानीय शासन से जोड़ता है। शहर अपनी नगरपालिका की सीमा पर ख़त्म नहीं होता। उसके पानी की माँग, कचरे का निपटान, मकानों का फैलाव और मज़दूरों का बाज़ार बाहर की तरफ़ फैलते हैं। यह दबाव सबसे पहले पेरी-अर्बन इलाक़े झेलते हैं।
एक नज़र में ज़रूरी तथ्य
| संकेतक | आँकड़ा | स्रोत |
|---|---|---|
| 2001 में जनगणना नगर | 1,362 | MoHUA की जनगणना 2011 शहरी बदलाव PDF |
| 2011 में जनगणना नगर | 3,894 | MoHUA की जनगणना 2011 शहरी बदलाव PDF |
| JJM: नल के पानी वाले ग्रामीण परिवार | क़रीब 15.82 करोड़, 03.03.2026 तक 81.71% | PIB की जल जीवन मिशन विज्ञप्ति |
| JJM की शुरुआत का आधार आँकड़ा | 2019 में 3.23 करोड़ ग्रामीण परिवारों के पास नल कनेक्शन थे | PIB की JJM लोग और पंचायत विज्ञप्ति |
| JJM का सेवा मानक | प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर, BIS:10500 गुणवत्ता | PIB की हर घर नल से जल विज्ञप्ति |
| साफ़-सफ़ाई की चिंता | छोटे और मझोले क़स्बों के लिए मल-कीचड़ और सेप्टेज प्रबंधन (faecal sludge and septage management) बहुत ज़रूरी है | SBM-U की FSSM तकनीकी सलाह |
पृष्ठभूमि
भारत का संवैधानिक ढाँचा 73वें और 74वें संविधान संशोधन के ज़रिए पंचायतों और नगरपालिकाओं, दोनों को मानता है। दिक़्क़त यह है कि कई बस्तियाँ आर्थिक रूप से पहले शहरी बन जाती हैं और प्रशासनिक रूप से बहुत बाद में। कोई जनगणना नगर आबादी और काम-धंधे के पैमाने पर शहरी दर्जे की शर्तें पूरी कर सकता है, फिर भी उसके पास क़ानूनी शहरी निकाय नहीं होता।
2001 से 2011 के बीच जनगणना नगरों की बढ़त यह बदलाव साफ़ दिखाती है। MoHUA के जनगणना 2011 शहरी बदलाव दस्तावेज़ के मुताबिक़ जनगणना नगरों की संख्या 2001 में 1,362 से बढ़कर 2011 में 3,894 हो गई। ये ठीक वही जगहें हैं जहाँ ग्रामीण शासन के औज़ार अक्सर कमज़ोर पड़ते हैं और शहरी बुनियादी ढाँचे की योजना अभी पहुँची नहीं होती।
संवैधानिक और नीतिगत ढाँचा
74वें संशोधन ने शहरी शासन के लिए नगरपालिकाएँ बनाईं और बदलाव के दौर से गुज़र रहे इलाक़ों के लिए नगर पंचायत की कल्पना की। पेरी-अर्बन बस्तियों के लिए यही संवैधानिक पुल है। जब इस पुल का इस्तेमाल नहीं होता, तो बस्ती शहरी पानी की माँग झेलते हुए भी बिखरी हुई पंचायती क्षमता पर टिकी रह जाती है।
नीतिगत कार्यक्रम भी एक बँटवारा बनाते हैं। जल जीवन मिशन गाँव के घरों में नल कनेक्शन पर ध्यान देता है, जबकि AMRUT और शहरी साफ़-सफ़ाई के कार्यक्रम क़ानूनी शहरी इलाक़ों पर। पेरी-अर्बन इलाक़े इन दोनों ज़िम्मेदारियों के बीच से फिसल सकते हैं, जब तक राज्य ख़ुद इस बदलाव की योजना न बनाएँ।
पेरी-अर्बन पानी के दबाव की ख़ास बातें
साझा जगह से पानी और बेतरतीब सप्लाई
बहुत सी पेरी-अर्बन बस्तियों को पानी गिनी-चुनी सार्वजनिक टोंटियों, कभी-कभार आने वाली पाइपलाइन या टैंकर से मिलता है। दिक़्क़त सिर्फ़ बुनियादी ढाँचे की नहीं है। दिक़्क़त यह भी है कि कोई जवाबदेह संस्था नहीं है जो सप्लाई, बिलिंग, रखरखाव और शिकायत निपटारे की योजना बनाए।
भूजल पर निर्भरता
तेज़ निर्माण और औद्योगिक गतिविधि बोरवेल से पानी खींचना बढ़ा देती है। जब पानी दोबारा भरने वाले स्थानीय इलाक़ों पर क़ब्ज़ा हो जाता है और तालाब ग़ायब हो जाते हैं, तो भूजल का दबाव मौसमी नहीं, ढाँचागत समस्या बन जाता है।
साफ़-सफ़ाई तो है, सीवर नहीं
पेरी-अर्बन घरों में अक्सर सेप्टिक टैंक या घर पर ही बनी व्यवस्था होती है। अगर टैंक समय पर ख़ाली न हों और ट्रीटमेंट की जगह दूर हो, तो मल-कीचड़ नालियों, खेतों या तालाबों में गिरा दिया जाता है। SBM-U की FSSM तकनीकी सलाह यहीं सीधे काम आती है।
गाँव से शहर की तरफ़ पानी का बहाव
शहर अक्सर आसपास के जलाशयों, नदियों और भूजल से पानी खींचते हैं। पेरी-अर्बन इलाक़े के लोग इसकी पर्यावरणीय और सामाजिक क़ीमत चुकाते हैं, जबकि उन्हें न गाँव वाली सुरक्षा मिलती है और न शहर वाली सेवा।
UPSC के लिए महत्व
- GS-I: शहरीकरण, पलायन और बदलती ग्रामीण-शहरी बस्तियाँ।
- GS-II: स्थानीय शासन, 74वाँ संशोधन, अधिकारों का हस्तांतरण और सेवाएँ पहुँचाना।
- GS-III: जल संसाधन, बुनियादी ढाँचा, पर्यावरण और टिकाऊ शहरीकरण।
- निबंध: शहर, टिकाऊपन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शासन की खाई जैसे विषयों के लिए उपयोगी।
- प्रीलिम्स: जनगणना नगर, नगर पंचायत, जल जीवन मिशन, SBM-U और FSSM पूछे जा सकते हैं।
- इंटरव्यू: दिल्ली NCR, बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम और दूसरे शहरी किनारों के मुद्दों से जुड़ाव।
विस्तार से: शहरीकरण की छूटी हुई कड़ी
शासन की दिक़्क़त वर्गीकरण से शुरू होती है। किसी गाँव में घनी बसावट, ग़ैर-खेती रोज़गार और बाज़ार से जुड़ाव आ सकता है, लेकिन अगर वह नगरपालिका व्यवस्था से बाहर रहता है, तो उसकी पानी की योजना छोटी ही रहती है। पंचायतों के पास तकनीकी स्टाफ़, आमदनी का आधार या योजना बनाने का अधिकार नहीं होता कि वे तेज़ी से शहरी होते पानी के सिस्टम सँभाल सकें।
जल जीवन मिशन ने घरों तक नल कनेक्शन पहुँचाने में बड़ी प्रगति की है। PIB के मुताबिक़ 3 मार्च 2026 तक क़रीब 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवारों, यानी 81.71% के घरों में नल से पानी आ रहा था। यह गाँवों की मज़बूत उपलब्धि है। लेकिन पेरी-अर्बन भारत को कनेक्शन की गिनती से ज़्यादा चाहिए: पानी के स्रोत का टिकाऊपन, गंदे पानी का निपटान, ज़मीन के इस्तेमाल पर नियंत्रण और सेवा की जवाबदेही।
| शासन की दिक़्क़त | पेरी-अर्बन में दिखने वाला लक्षण | नीति का जवाब |
|---|---|---|
| वर्गीकरण की खाई | बस्ती काम-काज में शहरी, पर प्रशासन में ग्रामीण | नगर पंचायत का इस्तेमाल और सोचा-समझा बदलाव |
| पानी के स्रोत पर दबाव | बोरवेल पर निर्भरता और टैंकर का बाज़ार | पानी दोबारा भरने वाले इलाक़े बचाइए और खिंचाई पर नियम बनाइए |
| साफ़-सफ़ाई की खाई | सेप्टिक टैंक हैं, पर आगे सफ़ाई की कड़ी नहीं | FSSM और जगह-जगह छोटे ट्रीटमेंट को बढ़ाइए |
| पैसे की खाई | शहरी दर्जे की सेवाओं के लिए स्थानीय आमदनी कम | उपभोक्ता शुल्क, अनुदान और मिलाकर जुटाया गया बुनियादी ढाँचा वित्त |
दूसरी दिक़्क़त साफ़-सफ़ाई की है। अगर मल-कीचड़ सुरक्षित तरीक़े से इकट्ठा, ढोया और साफ़ न किया जाए, तो अकेले शौचालय सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्या हल नहीं करते। छोटे और मझोले क़स्बे अक्सर महँगे सीवर नेटवर्क तुरंत नहीं बना सकते। यहीं जगह-जगह बने FSSM, तय समय पर टैंक ख़ाली करना और स्थानीय ट्रीटमेंट प्लांट काम के हो जाते हैं।
चुनौतियाँ
पहली चुनौती यह है कि किसकी ज़िम्मेदारी है, यह साफ़ नहीं। जब पानी की सप्लाई, भूजल, ज़मीन का इस्तेमाल, नालियाँ और कचरा अलग-अलग एजेंसियों के पास हों, तो नतीजों के लिए कोई एक संस्था जवाबदेह नहीं रहती। लोग टैंकर के पानी पर शहर वाले दाम चुकाते हैं और शिकायत निपटारा गाँव वाले स्तर का पाते हैं।
दूसरी चुनौती पैसे की है। पेरी-अर्बन स्थानीय निकायों के पास अक्सर नगर निगमों जैसा कर आधार और उधार लेने की क्षमता नहीं होती। फिर भी उन पर शहरीकरण का पूरा ख़र्च आता है: सड़क, नाली, पानी, स्ट्रीट लाइट, कचरा और साफ़-सफ़ाई।
तीसरी चुनौती पर्यावरण की है। इलाक़े को शहरी मानकर योजना बनने से पहले ही आर्द्रभूमि, तालाब और पानी निकलने के रास्ते पाट दिए जाते हैं। ये क़ुदरती सिस्टम एक बार ख़त्म हो जाएँ, तो बाढ़ भी बढ़ती है और पानी की कमी भी।
आगे का रास्ता
राज्य सरकारें तेज़ी से शहरी होते जनगणना नगरों की पहचान करें और उनके लिए बदलाव की योजना बनाएँ। संवैधानिक औज़ार पहले से मौजूद है: बदलाव के दौर वाले इलाक़ों के लिए नगर पंचायत। क़ानूनी दर्जा बदलने के साथ स्टाफ़, पानी की इंजीनियरिंग में मदद, हिसाब-किताब की व्यवस्था और नागरिकों के लिए शिकायत मंच भी आने चाहिए।
पानी की योजना में घरेलू कनेक्शन के साथ स्रोत का टिकाऊपन भी जुड़े। बस्ती के संकट में बदलने से पहले ही जल-ग्रहण क्षेत्र, तालाब, पानी दोबारा भरने वाले इलाक़े और पानी की गुणवत्ता की स्थानीय जाँच को बचाया जाए।
भारत को पेरी-अर्बन साफ़-सफ़ाई पर भी ज़ोर देना होगा। तय समय पर टैंक ख़ाली करना, GPS से जुड़ी सेप्टेज गाड़ियाँ, मल-कीचड़ के ट्रीटमेंट प्लांट, तंग गलियों के लिए छोटी सेसपूल गाड़ियाँ और साफ़ किए हुए पानी का दोबारा इस्तेमाल, ये सब उस खुले में फेंकने को रोक सकते हैं जो साफ़-सफ़ाई की कमाई हुई बढ़त को मिटा देता है।
प्रीलिम्स पॉइंटर
- पेरी-अर्बन इलाक़े ग्रामीण और शहरी बस्तियों के बीच के बदलाव वाले हिस्से हैं।
- 74वाँ संविधान संशोधन नगरपालिकाओं और नगर पंचायतों की व्यवस्था देता है।
- जनगणना नगर 2001 में 1,362 से बढ़कर 2011 में 3,894 हो गए।
- जल जीवन मिशन अगस्त 2019 में शुरू हुआ था।
- JJM का लक्ष्य ग्रामीण घरों के लिए चालू हालत में नल कनेक्शन है।
- JJM का सेवा मानक तय गुणवत्ता का प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर पानी है।
- BIS:10500 पीने के पानी की गुणवत्ता के मानकों से जुड़ा है।
- जहाँ सीवर नहीं है, वहाँ मल-कीचड़ और सेप्टेज प्रबंधन अहम हो जाता है।
- स्वच्छ भारत मिशन-शहरी शहरी साफ़-सफ़ाई देखता है।
- नगर पंचायत गाँव से शहर बनने के दौर वाले इलाक़ों के लिए है।
- भूजल पर नियंत्रण पेरी-अर्बन शासन का बड़ा मुद्दा है।
- जगह-जगह गंदे पानी की सफ़ाई से बड़े सीवर सिस्टम पर दबाव घटता है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- पेरी-अर्बन भारत शहरी शासन की छूटी हुई कड़ी है। पानी की सप्लाई और साफ़-सफ़ाई के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
- जनगणना नगरों और बदलाव वाले इलाक़ों को सँभालने के लिए 74वें संविधान संशोधन का बेहतर इस्तेमाल कैसे हो सकता है?
- जल जीवन मिशन ने नल के पानी की पहुँच बढ़ाई है, लेकिन स्रोत का टिकाऊपन अब भी चुनौती है। विश्लेषण कीजिए।
- छोटे क़स्बों में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए मल-कीचड़ और सेप्टेज प्रबंधन केंद्रीय है। चर्चा कीजिए।
- भारत में शहरीकरण अक्सर संस्थाओं में सुधार से तेज़ चलता है। पानी प्रबंधन पर इसके नतीजों का परीक्षण कीजिए।
- पेरी-अर्बन बस्तियों को पानी के लिहाज़ से सुरक्षित और जलवायु के हिसाब से मज़बूत बनाने का नीतिगत ढाँचा सुझाइए।
निष्कर्ष
पेरी-अर्बन पानी प्रबंधन इसलिए मायने रखता है क्योंकि भारत के आने वाले शहर वहीं बन रहे हैं, आधिकारिक नाम मिलने से पहले। अगर इन बस्तियों को अनदेखा किया गया, तो इन्हें भूजल का दबाव, असुरक्षित साफ़-सफ़ाई, बाढ़ और बिना जवाबदेही वाली सेवाएँ विरासत में मिलेंगी।
हल यह नहीं है कि गाँवों को रूमानी बना दिया जाए या नगरपालिकाओं पर और बोझ डाल दिया जाए। हल है सोचा-समझा बदलाव: शहर के किनारे को वर्गीकृत कीजिए, पैसा दीजिए, स्टाफ़ दीजिए और नियम बनाइए, इससे पहले कि संकट ही शासन का सामान्य तरीक़ा बन जाए।
UPSC के उत्तरों के लिए मूल पंक्ति यह है: भारत का शहरी भविष्य सिर्फ़ महानगरों में तय नहीं होगा, बल्कि उन पेरी-अर्बन बस्तियों में होगा जो शहर बनती जा रही हैं, पर जिन पर शासन अभी शहरों जैसा नहीं है।
सामान्य प्रश्न
पेरी-अर्बन पानी प्रबंधन क्या है?
पेरी-अर्बन पानी प्रबंधन का मतलब है कि गाँव से शहर बनने के दौर वाले इलाक़ों में पानी की सप्लाई, भूजल, साफ़-सफ़ाई और गंदे पानी को कैसे सँभाला जाता है। इन इलाक़ों पर शहरी दबाव तो होता है, पर पूरी नगरपालिका जैसी क्षमता नहीं होती।
यह UPSC के लिए क्यों ज़रूरी है?
यह शहरीकरण, स्थानीय शासन, जल संसाधन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के टिकाऊपन को आपस में जोड़ता है। GS-I, GS-II, GS-III और निबंध, सबके उत्तरों में काम आता है।
जनगणना नगर क्या होता है?
जनगणना नगर वह बस्ती है जो जनगणना के शहरी पैमाने पूरे करती है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह क़ानूनी नगरपालिका भी हो। ऐसे नगर आबादी के हिसाब से शहरीकरण और क़ानूनी शहरी शासन के बीच की खाई सामने ला देते हैं।
नगर पंचायत की भूमिका क्या है?
नगर पंचायत गाँव से शहर बनने के दौर वाले इलाक़े के लिए है। 74वें संशोधन के तहत यह बेहतर पेरी-अर्बन शासन तक पहुँचने का संवैधानिक रास्ता दे सकती है।
जल जीवन मिशन इससे कैसे जुड़ा है?
जल जीवन मिशन ने गाँव के घरों में नल के पानी के कनेक्शन बढ़ाए। पेरी-अर्बन इलाक़ों में इस उपलब्धि के साथ स्रोत का टिकाऊपन, गंदे पानी का प्रबंधन और शहरी दर्जे की सेवा जवाबदेही भी जुड़नी चाहिए।
FSSM क्या है?
FSSM का मतलब है मल-कीचड़ और सेप्टेज प्रबंधन (faecal sludge and septage management)। इसमें सेप्टिक टैंक और घर पर बनी साफ़-सफ़ाई व्यवस्था से निकले कचरे को सुरक्षित तरीक़े से निकालना, ढोना, साफ़ करना और फिर निपटाना या दोबारा इस्तेमाल करना शामिल है।