भारत में तिलहन: खाद्य तेल आयात निर्भरता और NMEO (यूपीएससी अर्थव्यवस्था)
भारत में तिलहन 2025: खाद्य तेल आयात, NMEO-ऑयल पाम, NMEO-तिलहन, बजट 2025-26 की आत्मनिर्भरता योजना और यूपीएससी के लिए विश्लेषण।
भारत विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा तिलहन उत्पादक है – और साथ ही वनस्पति तेलों का विश्व का सबसे बड़ा आयातक। देश की खाद्य तेल ज़रूरत का लगभग 55-60% आयात किया जाता है, जिस पर प्रतिवर्ष 1.3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी मुद्रा खर्च होता है। घरेलू उत्पादन और खपत के बीच की यह संरचनात्मक खाई तिलहन को भारत की कृषि नीति का सबसे महत्त्वपूर्ण खंड बनाती है, जिसे यूपीएससी जीएस-III (खाद्य सुरक्षा, कृषि विपणन, पशुपालन अर्थशास्त्र) में विस्तार से पढ़ा जाता है।
यह मार्गदर्शिका भारत की तिलहन अर्थव्यवस्था, आयात निर्भरता बनी रहने के कारणों और नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स – ऑयल पाम (NMEO-OP), नए NMEO-तिलहन मिशन तथा बजट 2025-26 की घोषणाओं के माध्यम से नीतिगत प्रतिक्रिया को स्पष्ट करती है।
तिलहन: मूल चित्र
भारत में विविध तिलहनों की खेती होती है – मूँगफली, सरसों-राई, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, रामतिल, अरंडी और अलसी। नौ तिलहन विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में उगाए जाते हैं, जिनमें खरीफ़ (सोयाबीन, मूँगफली) और रबी (सरसों) दोनों मौसम महत्त्वपूर्ण हैं।
मुख्य आँकड़े:
- तिलहन क्षेत्रफल: लगभग 27-29 मिलियन हेक्टेयर (कुल बोए गए क्षेत्र का 14%)
- उत्पादन: 38-41 मिलियन टन (2023-24); इसमें लगभग 10-11 मिलियन टन घरेलू खाद्य तेल
- घरेलू खाद्य तेल माँग: लगभग 25-27 मिलियन टन
- आयात बिल: 2022-23 में 1.38 लाख करोड़ रुपये; 16.5 मिलियन टन आयातित
केवल पाम ऑयल खाद्य तेल आयात का 55-60% है, इसके बाद सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल आते हैं। भारत पाम ऑयल मुख्यतः इंडोनेशिया और मलेशिया से, सोयाबीन तेल अर्जेंटीना और ब्राज़ील से, तथा सूरजमुखी तेल यूक्रेन, रूस और अर्जेंटीना से आयात करता है।
भारत इतना खाद्य तेल क्यों आयात करता है?
हरित क्रांति का पूर्वाग्रह: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चावल-गेहूँ के विस्तार ने सरसों जैसी पारंपरिक तिलहन फ़सल-चक्र को विस्थापित किया।
वर्षा-आधारित खेती: तिलहन क्षेत्र का लगभग 72% वर्षा-आधारित है, जिससे उपज मानसून की अनिश्चितता पर निर्भर रहती है। अमेरिका, ब्राज़ील और अर्जेंटीना की तुलना में प्रति हेक्टेयर उपज बहुत कम है।
कम बीज प्रतिस्थापन दर: अधिकांश तिलहनों के लिए 30% से नीचे, जिससे उत्पादकता ठहरी हुई है।
सीमांत जोत: तिलहन अधिकतर छोटे, उप-सीमांत खेतों पर उगाए जाते हैं, जहाँ ऋण, मशीनीकरण और विस्तार सेवाओं की पहुँच सीमित है।
मूल्य नीति: सस्ते पाम ऑयल आयात ने घरेलू प्रभावी मूल्य को नीचा रखा, जिससे किसान क्षेत्र विस्तार के लिए प्रोत्साहित नहीं हुए।
बदलती खपत: बढ़ती आय और शहरीकरण ने प्रति व्यक्ति खाद्य तेल खपत को 19 किग्रा/वर्ष से ऊपर पहुँचा दिया है – जो घरेलू उत्पादन क्षमता से कहीं अधिक है।
आत्मनिर्भरता क्यों आवश्यक है
- विदेशी मुद्रा व्यय: खाद्य तेल कच्चे तेल और सोने के बाद तीसरा सबसे बड़ा आयात मद है।
- व्यापार संतुलन: आयात बिल चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ाता है।
- स्वास्थ्य: पाम ऑयल खपत हृदय रोग जोखिम से जुड़ी है; सरसों, मूँगफली और तिल जैसे स्वदेशी तेल स्वस्थ विकल्प देते हैं।
- सहयोगी अर्थव्यवस्था: घरेलू पेराई से खल (ऑयल केक) बनता है – जो डेयरी, मुर्गीपालन और मत्स्यपालन उद्योगों का महत्त्वपूर्ण कच्चा माल है।
- खाद्य सुरक्षा: कुछ आपूर्तिकर्ता देशों पर भारी निर्भरता भू-राजनीतिक आपूर्ति-झटकों के प्रति भारत को संवेदनशील बनाती है (जैसा 2022 के यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न सूरजमुखी तेल संकट में देखा गया)।
राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन – ऑयल पाम (NMEO-OP)
2021 में 11,040 करोड़ रुपये के आवंटन से शुरू NMEO-OP के लक्ष्य हैं:
- ऑयल पाम क्षेत्रफल को लगभग 3.7 लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 2025-26 तक 10 लाख हेक्टेयर, और आगे 2029-30 तक 16.7 लाख हेक्टेयर करना।
- क्रूड पाम ऑयल (CPO) उत्पादन 2025-26 तक 11.2 लाख टन और 2029-30 तक 28 लाख टन तक पहुँचाना।
- किसानों को अंतरराष्ट्रीय मूल्य उतार-चढ़ाव से बचाने हेतु वायबिलिटी प्राइस (VP) – सुनिश्चित भुगतान – उपलब्ध कराना।
- इनपुट सहायता (पौध सामग्री, सिंचाई, मशीनीकरण) प्रदान करना, जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह पर विशेष ध्यान है।
NMEO-तिलहन (2024): नया स्तंभ
अक्टूबर 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन – तिलहन (NMEO-Oilseeds) को 2024-25 से 2030-31 के लिए 10,103 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ स्वीकृति दी, जो सरसों, मूँगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी और तिल सहित नौ पारंपरिक तिलहनों को कवर करता है।
प्रमुख घटक:
- बीज अवसंरचना के लिए 65 तिलहन हब, 347 ज़िलों में विस्तार
- घरेलू खाद्य तेल उत्पादन को 12.7 मिलियन टन (2022-23) से बढ़ाकर 2030-31 तक 20.2 मिलियन टन करना
- घरेलू माँग का 72% स्थानीय उत्पादन से पूरा करने का लक्ष्य
- बीज से खेत-द्वार तक एकीकृत मूल्य-श्रृंखला समर्थन
हाल के घटनाक्रम (2024-26)
बजट 2025-26: केंद्रीय बजट में NMEO-तिलहन के लिए अतिरिक्त आवंटन किया गया और तिलहन पर विशेष ज़ोर देते हुए उच्च-उत्पादक बीजों पर एक राष्ट्रीय मिशन की घोषणा की गई। बजट ने तिलहन को दलहन के साथ रणनीतिक आत्मनिर्भरता प्राथमिकता के रूप में पुनः स्थापित किया।
शुल्क नीति: सितंबर 2024 में सरकार ने क्रूड पाम ऑयल, क्रूड सोयाबीन ऑयल और क्रूड सूरजमुखी ऑयल पर मूल सीमा-शुल्क 0% से बढ़ाकर 20% कर दिया, तथा परिष्कृत संस्करणों पर 12.5% से बढ़ाकर 32.5% कर दिया – सरसों की गिरती कीमतों के दौर के बाद किसानों की रक्षा हेतु।
MSP संशोधन: 2024-25 में सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाकर 5,950 रुपये/क्विंटल, मूँगफली का 6,783 रुपये/क्विंटल और सोयाबीन का 4,892 रुपये/क्विंटल किया गया।
खाद्य प्रसंस्करण के लिए PLI: ब्रांडेड खाद्य तेल कंपनियाँ खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के अंतर्गत लाभ पा रही हैं, जिससे मूल्य-संवर्धन और गहरा हो रहा है।
MPI 2024 कड़ी: नीति आयोग के MPI 2024 के पोषण अभाव संकेतक, PDS में सरसों और मूँगफली जैसे सस्ते, स्वस्थ घरेलू खाद्य तेलों की आवश्यकता को पुष्ट करते हैं।
16वाँ वित्त आयोग: ऑयल पाम की क्षमता वाले राज्यों (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मिज़ोरम, नागालैंड) ने FC-16 (2026-31) अनुशंसाओं में सिंचाई एवं प्रसंस्करण अवसंरचना हेतु बँधे अनुदान (tied grants) माँगे हैं।
आगे का मार्ग (डल्वई समिति और आगे)
- उत्पादकता पर ज़ोर: उच्च-उपज, अल्प-अवधि किस्में; वर्षा-आधारित क्षेत्रों में मृदा एवं नमी संरक्षण; संतुलित उर्वरक उपयोग।
- अंतर-फ़सल: दलहन-तिलहन और बागवानी-तिलहन अंतर-फ़सल से प्रति हेक्टेयर कृषि आय बढ़ाना।
- द्वितीयक स्रोत: चावल की भूसी, बिनौला, नारियल और वृक्ष-जनित तिलहनों (TBOs) का विस्तार।
- FPO-प्रसंस्करणकर्ता सम्पर्क: NDDB (सरसों के लिए) जैसी सहकारी संस्थाएँ और संगठित पेराई इकाइयों से जुड़े FPO।
- उपभोक्ता जागरूकता: NFHS-समर्थित सार्वजनिक पोषण कार्यक्रमों के माध्यम से स्वस्थ स्वदेशी तेलों का प्रोत्साहन।
- सावधानीपूर्वक पाम ऑयल विस्तार: पारिस्थितिक हानि सीमित रखें, वन-भूमि के परिवर्तन से बचें, IUCN की जैव विविधता चेतावनियों का सम्मान करें और पूर्वोत्तर में जल-संतुलन की रक्षा करें।
यूपीएससी प्रासंगिकता
- जीएस-III (कृषि): फ़सल पैटर्न, MSP, विपणन, NMEO-OP, NMEO-तिलहन।
- जीएस-III (अर्थव्यवस्था): व्यापार संतुलन, CAD, आयात प्रतिस्थापन, बजट 2025-26।
- जीएस-III (पर्यावरण): ऑयल पाम बनाम वनों की कटाई, जैव विविधता प्रभाव।
- प्रारंभिक परीक्षा संकेत: डल्वई समिति, NMEO-OP आवंटन, NMEO-तिलहन आवंटन, वायबिलिटी प्राइस, TBOs, MSP में सूचीबद्ध 9 तिलहन।
संभावित प्रश्न: "एक प्रमुख तिलहन उत्पादक होते हुए भी भारत वनस्पति तेलों का विश्व का सबसे बड़ा आयातक है। संरचनात्मक कारणों की जाँच कीजिए और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में NMEO-तिलहन का मूल्यांकन कीजिए।" (जीएस-III, 250 शब्द)