Anantam IASHindi Note · 23 August 2026

ड्रोन युद्ध और असममित ख़तरे: $500 की मशीन $50 मिलियन का विमान क्यों तबाह कर सकती है

हवाई ताक़त के लिए पहले पूरी वायुसेना चाहिए थी। कुछ सौ डॉलर का बदला हुआ कमर्शियल ड्रोन आज करोड़ों के विमान, रडार या ईंधन डिपो को नाकाम कर सकता है। लागत की यही असमानता पूरी रणनीतिक समस्या है।

बीसवीं सदी के ज़्यादातर हिस्से में हवा से किसी ठिकाने पर हमला करने के लिए पूरी वायुसेना चाहिए थी: विमान, पायलट, एयरबेस, और इन तीनों को पालने लायक पैसे वाला देश। ड्रोन युद्ध ने यह शर्त ही हटा दी। कुछ सौ डॉलर में बना, थोड़ा-बहुत बदला हुआ कमर्शियल ड्रोन आज करोड़ों के विमान, रडार, ईंधन डिपो या गोला-बारूद के भंडार को नुक़सान पहुँचा सकता है।

यही उलटफेर, यानी सस्ता हमलावर बनाम महँगा बचाव करने वाला, असली रणनीतिक समस्या है। बाकी सब कुछ इसी से निकलता है।

ड्रोन असममित ख़तरा क्यों हैं

कम लागत, बड़ी चोट। एक छोटे कमर्शियल या बदले हुए ड्रोन की क़ीमत कुछ सौ या कुछ हज़ार डॉलर होती है, और वह करोड़ों की संपत्ति तबाह कर सकता है।

पकड़ में न आना। छोटे ड्रोन का रडार क्रॉस-सेक्शन (radar cross-section) कम होता है, आवाज़ कम होती है और गर्मी की पहचान भी कम बनती है। ऊपर से वे नीचे, धीमे और ज़मीन से सटकर उड़ते हैं। परंपरागत वायु-रक्षा रडार तो इसके ठीक उलट किस्म के निशाने के लिए बने थे।

झुंड। कई ड्रोन एक साथ चलकर बचाव तंत्र को थका देते हैं। ज़्यादातर मार भी गिराए जाएँ, तो कुछ भीतर घुस ही जाते हैं। झुंड रडार की तस्वीर गड़बड़ा देते हैं, इंटरसेप्टर का गोला-बारूद ख़त्म करा देते हैं और कमांड सिस्टम को उलझा देते हैं।

चलायमानता और चौंकाने की ताक़त। हमला ट्रकों, छतों, नावों, जंगलों या सरहदी इलाक़ों कहीं से भी शुरू हो सकता है। ऑपरेशन स्पाइडर्स वेब ने दिखाया कि आम दिखने वाले ट्रकों में छिपाए गए ड्रोन नज़दीक से रणनीतिक एयरबेस पर वार कर सकते हैं, और इससे सुरक्षित पिछले इलाक़े वाली पूरी धारणा ही ढह जाती है।

दोहरे इस्तेमाल वाले पुर्ज़े। मोटर, बैटरी, सेंसर, कैमरा, GPS मॉड्यूल और सॉफ़्टवेयर, सब बाज़ार में खुले मिलते हैं। सप्लाई चेन में ऐसी कोई एक गर्दन नहीं है जिसे दबाकर रोका जा सके।

AI और स्वायत्तता। AI वाले ड्रोन ख़ुद निशाना पहचानते हैं, रुकावटों से बचते हैं, आपस में तालमेल बिठाते हैं और ऑपरेटर से संपर्क टूटने के बाद भी मिशन जारी रखते हैं। इससे जैमिंग की काट सीधे-सीधे कमज़ोर पड़ जाती है।

फ़ाइबर-ऑप्टिक नियंत्रण। जो ड्रोन असली केबल के सहारे उड़ाए जाते हैं, उनमें जाम करने लायक कोई रेडियो लिंक ही नहीं होता। इससे इलेक्ट्रॉनिक युद्ध पर टिके काउंटर-ड्रोन सिस्टम की पूरी श्रेणी बेकार हो जाती है।

ख़तरे की श्रेणियाँ

प्रकारभूमिका
निगरानी ड्रोनटोह लेना, तोपख़ाने के लिए निशाना बताना, सीमा पर नज़र रखना, लक्ष्य पहचानना
हथियारबंद ड्रोनबम, ग्रेनेड या मिसाइल लेकर चलना
लॉइटरिंग म्यूनिशनकामिकाज़े ड्रोन, जो इलाक़े पर मँडराते हैं और फिर निशाने से जा टकराते हैं
स्वार्म ड्रोनकई ड्रोन मिलकर बचाव तंत्र पर भारी पड़ते हैं
FPV ड्रोनफ़र्स्ट-पर्सन-व्यू ड्रोन, कम लागत में सटीक हमले के लिए
समुद्री ड्रोनजहाज़ों, बंदरगाहों और समुद्री ढाँचे के ख़िलाफ़ बिना चालक वाले सतही या पनडुब्बी सिस्टम
डिकॉय ड्रोनवायु-रक्षा को भ्रमित करके महँगी मिसाइलें ख़र्च करा देते हैं

डिकॉय वाली श्रेणी पर ख़ास ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वह लागत की इस असमानता को सीधे हथियार बना देती है। एक सस्ता डिकॉय अगर महँगे इंटरसेप्टर को दगवा दे, तो ख़ुद नष्ट होकर भी वह आर्थिक रूप से जीत जाता है।

हाल के युद्धों ने क्या दिखाया

यूक्रेन-रूस। ड्रोन ने टैंक, तोपख़ाने, खाइयों, जहाज़ों, एयरबेस, ऊर्जा ढाँचे और रणनीतिक बमवर्षकों तक को निशाना बनाया। ऑपरेशन स्पाइडर्स वेब ने दिखाया कि सस्ते ड्रोन दुश्मन के इलाक़े में गहरे भीतर खड़े महँगे रणनीतिक विमानों के लिए ख़तरा बन सकते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर। भारत के इस ऑपरेशन ने ड्रोन युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और परतदार वायु-रक्षा के आपसी मेल को सामने रखा, जिसमें उत्तर और पश्चिम भारत के कई सैन्य ठिकानों पर हुई ड्रोन और मिसाइल हमलों की कोशिशें नाकाम की गईं।

बचाव करने वाले की उलझन

काउंटर-ड्रोन सोच अब तक तीन परतों पर टिकी रही है: पहचानो, जाम करो, रोको। तीनों अब दबाव में हैं।

पहचान छोटे, नीचे और धीमे उड़ने वाले ड्रोन के आगे नाकाम रहती है और झुंड आते ही भर जाती है। जैमिंग उन स्वायत्त ड्रोन के आगे बेकार है जो बिना लिंक के मिशन पूरा कर लेते हैं, और फ़ाइबर-ऑप्टिक नियंत्रण के आगे तो पूरी तरह बेअसर है। इंटरसेप्शन काम तो करता है, पर अर्थशास्त्र में हार जाता है, क्योंकि लाखों की मिसाइल से हज़ारों का ड्रोन गिराना घाटे का सौदा है और यह सौदा बार-बार, बड़े पैमाने पर दोहराना पड़ता है।

इससे एक साफ़ नतीजा निकलता है: जवाब मौजूदा तरीक़े का बेहतर संस्करण नहीं हो सकता। इसके लिए लागत-संतुलित बचाव चाहिए, यानी और ज़्यादा इंटरसेप्टर मिसाइलों की जगह दिशात्मक ऊर्जा हथियार (directed-energy weapons), तोप आधारित नज़दीकी सिस्टम, जाल और काउंटर-ड्रोन ड्रोन।

आगे का रास्ता

याद रखने लायक नई नज़र यह है: ड्रोन युद्ध ने हवाई ताक़त को ज़्यादा घातक नहीं बनाया है। उसने उसे सस्ता बना दिया है, और सस्ता होना यह बदल देता है कि उसे इस्तेमाल कौन कर सकता है।

सामान्य प्रश्न

ड्रोन को असममित हथियार क्यों कहा जाता है?

क्योंकि कम लागत वाला एक प्लेटफ़ॉर्म अपने से कहीं ताक़तवर विरोधी पर भारी सैन्य, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक क़ीमत थोप सकता है। कुछ सौ या कुछ हज़ार डॉलर का एक छोटा कमर्शियल या बदला हुआ ड्रोन करोड़ों के विमान, ईंधन डिपो, रडार सिस्टम, गोला-बारूद भंडार, बिजली ग्रिड या सैन्य वाहनों को नुक़सान पहुँचा सकता है।

छोटे ड्रोन पकड़ में क्यों नहीं आते?

उनका रडार क्रॉस-सेक्शन कम होता है, आवाज़ कम होती है और गर्मी की पहचान भी कम बनती है, और वे नीचे, धीमे तथा ज़मीन से सटकर उड़ते हैं। परंपरागत वायु-रक्षा रडार तेज़, ऊँचाई पर उड़ने वाले धातु के निशानों के लिए बने हैं, जो इसके क़रीब-क़रीब उलट प्रोफ़ाइल है।

ड्रोन स्वार्म क्या होता है?

कई ड्रोन एक साथ चलकर बचाव तंत्र पर भारी पड़ते हैं। ज़्यादातर गिरा भी दिए जाएँ, तो कुछ भीतर घुस सकते हैं। झुंड रडार की तस्वीर गड़बड़ा देते हैं, इंटरसेप्टर का गोला-बारूद ख़त्म करा देते हैं और कमांड सिस्टम को उलझा देते हैं, इसलिए मुठभेड़ कामयाब रहने पर भी बचाव करने वाला लागत में हार जाता है।

लॉइटरिंग म्यूनिशन क्या है?

इसे कामिकाज़े या आत्मघाती ड्रोन भी कहते हैं। यह किसी इलाक़े पर निशाने का इंतज़ार करते हुए मँडराता है और फिर उससे जा टकराता है। यह निगरानी और हमला दोनों को एक ही ख़र्च होने वाले प्लेटफ़ॉर्म में जोड़ देता है, जिससे निशाना ढूँढ़ने और उस पर वार करने के बीच का फ़ासला ही मिट जाता है।

ड्रोन का दोहरा इस्तेमाल नियमन को क्यों मुश्किल बनाता है?

क्योंकि मोटर, बैटरी, सेंसर, कैमरा, GPS मॉड्यूल और सॉफ़्टवेयर, सब नागरिक कामों के लिए बाज़ार में खुले मिलते हैं। ऐसी कोई एक जगह नहीं है जहाँ सैन्य ड्रोन के पुर्ज़े रोके जा सकें और जायज़ कारोबार पर असर न पड़े।

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ड्रोन के ख़तरे को कैसे बदल देता है?

AI वाले ड्रोन निशाना पहचान सकते हैं, रुकावटों से बच सकते हैं, दूसरे ड्रोन से तालमेल बिठा सकते हैं और ऑपरेटर से संपर्क टूटने के बाद भी मिशन जारी रख सकते हैं। यह आख़िरी क्षमता जैमिंग की असरदारी को सीधे घटा देती है, जबकि जैमिंग ही अब तक काउंटर-ड्रोन का मुख्य तरीक़ा रही है।

फ़ाइबर-ऑप्टिक ड्रोन क्या होते हैं?

ये वे ड्रोन हैं जो रेडियो फ़्रीक्वेंसी की जगह असली फ़ाइबर-ऑप्टिक केबल से नियंत्रित होते हैं। जाम करने लायक कोई RF लिंक ही नहीं होता, इसलिए ये इलेक्ट्रॉनिक युद्ध पर टिके काउंटर-ड्रोन सिस्टम को पूरी तरह बेकार कर देते हैं और सेनाओं को अपना काउंटर-ड्रोन तरीक़ा नए सिरे से सोचने पर मजबूर करते हैं।

हाल के संघर्षों ने क्या दिखाया?

यूक्रेन-रूस युद्ध में ड्रोन ने टैंक, तोपख़ाने, खाइयों, जहाज़ों, एयरबेस, ऊर्जा ढाँचे और रणनीतिक बमवर्षकों पर हमले किए, और ऑपरेशन स्पाइडर्स वेब ने दिखाया कि सस्ते ड्रोन दुश्मन के इलाक़े में गहरे भीतर खड़े महँगे विमानों के लिए ख़तरा बन सकते हैं। भारत के ऑपरेशन सिंदूर ने ड्रोन युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और परतदार वायु-रक्षा के आपसी मेल को सामने रखा।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

  1. लॉइटरिंग म्यूनिशन का सबसे सही वर्णन क्या है?
    (a) सिर्फ़ निगरानी करने वाला प्लेटफ़ॉर्म
    (b) ऐसा ड्रोन जो इलाक़े पर मँडराता है और फिर निशाने से टकरा जाता है
    (c) ज़मीन से छोड़ी जाने वाली क्रूज़ मिसाइल
    (d) एक डिकॉय सिस्टम
    उत्तर: (b) इसे कामिकाज़े या आत्मघाती ड्रोन भी कहते हैं; यह खोज और हमला दोनों को एक ही ख़र्च होने वाले प्लेटफ़ॉर्म में जोड़ देता है।
  2. छोटे ड्रोन परंपरागत वायु-रक्षा रडार से मुख्य रूप से किस वजह से बच निकलते हैं?
    (a) तेज़ रफ़्तार
    (b) कम रडार क्रॉस-सेक्शन और नीची, धीमी उड़ान
    (c) स्टेल्थ कोटिंग
    (d) 30,000 फ़ीट से ऊपर उड़ान
    उत्तर: (b) तेज़, ऊँचे और धातु वाले निशानों के लिए बने रडार छोटे, धीमे और नीचे उड़ने वाले प्लेटफ़ॉर्म पर अटक जाते हैं।
  3. फ़ाइबर-ऑप्टिक ड्रोन क्यों अहम हैं?
    (a) वे RF से चलने वाले ड्रोन से तेज़ उड़ते हैं
    (b) उन्हें रेडियो-फ़्रीक्वेंसी वाले इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जाम नहीं किया जा सकता
    (c) वे ज़्यादा भारी पेलोड ले जाते हैं
    (d) उन्हें किसी ऑपरेटर की ज़रूरत नहीं होती
    उत्तर: (b) असली नियंत्रण केबल उस RF लिंक को ही हटा देती है जिस पर जैमिंग वार करती है।
  4. ऑपरेशन स्पाइडर्स वेब किससे जुड़ा है?
    (a) भारतीय काउंटर-ड्रोन अभियान
    (b) रणनीतिक विमानों पर यूक्रेनी ड्रोन हमले
    (c) एक NATO अभ्यास
    (d) चीनी स्वार्म परीक्षण
    उत्तर: (b) इसने दिखाया कि आम दिखने वाले वाहनों में छिपाए गए सस्ते ड्रोन दुश्मन के इलाक़े में गहरे भीतर रणनीतिक एयरबेस पर वार कर सकते हैं।
  5. ड्रोन झुंड बचाव करने वाले के लिए सबसे बड़ी समस्या कौन-सी खड़ी करते हैं?
    (a) उनकी रफ़्तार
    (b) लागत की अदला-बदली: इंटरसेप्टर ड्रोन से कहीं ज़्यादा महँगे पड़ते हैं
    (c) उनकी ऊँचाई
    (d) उनकी मारक दूरी
    उत्तर: (b) जब महँगा इंटरसेप्टर सस्ता ड्रोन गिराता है तो कामयाब मुठभेड़ भी आर्थिक रूप से घाटे की रहती है, और झुंड गोला-बारूद ख़त्म करा देते हैं।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. ड्रोन युद्ध ने हवाई ताक़त का लोकतंत्रीकरण किया है और आधुनिक संघर्ष की लागत-तर्क को उलट दिया है। भारत की रक्षा मुद्रा पर इसके निहितार्थों की जाँच कीजिए। (250 शब्द)
  2. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध पर टिकी काउंटर-ड्रोन रणनीति तकनीकी बदलाव से पिछड़ती जा रही है। चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
  3. ड्रोन तकनीक के दोहरे इस्तेमाल वाले स्वभाव से नियमन और रोकथाम के सामने खड़ी चुनौतियों का आकलन कीजिए। (150 शब्द)
  4. हाल के संघर्षों में ड्रोन ऊँचे मूल्य की रणनीतिक संपत्तियों के लिए ख़तरा बनते दिखे हैं। भारत के एयरबेस और ढाँचागत सुरक्षा के लिए इससे मिलने वाले सबक़ पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
  5. ड्रोन युद्ध में स्वायत्त रूप से निशाना चुनने से उठने वाले नैतिक और क़ानूनी सवालों पर चर्चा कीजिए। (150 शब्द)