Anantam IASHindi Note · 4 May 2026

दुर्लभ मृदा धातुएँ — चीन का एकाधिकार, भारत के भंडार और नीति (यूपीएससी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)

दुर्लभ मृदा तत्व — 17 धातुएँ, चीन की 60% हिस्सेदारी, IREL, मोनाज़ाइट रेत, भारत की नीति, QUAD क्रिटिकल मिनरल्स — यूपीएससी GS-III नोट्स।

हर आईफ़ोन, हर F-35 लड़ाकू विमान, हर इलेक्ट्रिक कार और हर पवन-टरबाइन में दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements, REEs) की सूक्ष्म किंतु अनिवार्य मात्राएँ निहित हैं। चीन वैश्विक उत्पादन के लगभग 60% और शोधन क्षमता (refining capacity) के 85% पर नियंत्रण रखता है। जब-जब व्यापारिक तनाव बढ़ता है, बीजिंग विश्व को इस लीवर की याद दिलाता है। भारत के पास विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा REE भंडार है, फिर भी अपनी अधिकांश आवश्यकता का आयात — आपने सही अनुमान लगाया — चीन से ही करता है। यही विरोधाभास भारत के नए क्रिटिकल मिनरल्स मिशन 2024 और IREL (इंडिया) लिमिटेड में पुनर्जीवित रुचि के मूल में है।

यूपीएससी GS-III के लिए, दुर्लभ मृदाएँ अर्थव्यवस्था, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, सामरिक खनिज और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अंतर्गत बार-बार आने वाला विषय है।

21वीं सदी की भू-राजनीति का बड़ा हिस्सा अब "ऊर्जा संक्रमण (energy transition)" की धुरी पर घूम रहा है — और इस संक्रमण की धातुएँ ही दुर्लभ मृदा तत्व हैं। 2023 में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार 2040 तक REE की वैश्विक माँग चार गुना बढ़ने का अनुमान है। ऐसे में आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) की सुरक्षा अब केवल आर्थिक प्रश्न नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।

दुर्लभ मृदा धातुएँ क्या हैं

दुर्लभ मृदा तत्व (REEs) 17 धात्विक तत्वों का समूह हैं:

नाम के विपरीत, ये पृथ्वी की पर्पटी (Earth's crust) में विशेष रूप से दुर्लभ नहीं हैं — यह पद इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि ये बहुत कम ही सांद्र निक्षेपों में पाए जाते हैं और उन्हें अयस्कों से तथा एक-दूसरे से अलग करना तकनीकी रूप से कठिन होता है। उदाहरणार्थ, सीरियम पृथ्वी पर ताम्बे से अधिक प्रचुर है।

हल्की बनाम भारी REEs

अद्वितीय गुण और उपयोग

REEs में विशिष्ट चुम्बकीय, संदीप्त (luminescent), विद्युत्-रासायनिक और उत्प्रेरकीय (catalytic) गुण होते हैं।

हरित संक्रमण में भूमिका

एक 3 मेगावाट का अपतटीय पवन-टरबाइन लगभग 600 किलोग्राम नियोडिमियम (Nd) मांगता है। एक टेस्ला मॉडल 3 की मोटर में लगभग 1 किलोग्राम REE होता है। यदि भारत को 2070 तक नेट-ज़ीरो प्राप्त करना है, तो REE आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा अब "ग्रीन" नीति का हृदय है, परिधि नहीं।

चीन का प्रभुत्व और उसके परिणाम

चीन का प्रभुत्व आकस्मिक नहीं — यह डेंग शियाओपिंग के "मध्य-पूर्व में तेल है, चीन में दुर्लभ मृदाएँ हैं" (1992) के दीर्घकालिक दृष्टिकोण का परिणाम है। आज पश्चिम और भारत मिलकर इस एकाधिकार को तोड़ने में जुटे हैं — यह कहानी भू-राजनीति, औद्योगिक नीति और प्रौद्योगिकी का संगम है।

भारत के भंडार और संसाधन

संस्थागत ढाँचा

भारतीय नीति की समस्याएँ

नीतिगत बदलाव और हालिया सुधार

क्रिटिकल एवं स्ट्रैटेजिक मिनरल्स सूची (2023)

खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम 2023

राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल्स मिशन (जनवरी 2025)

IREL का विस्तार

सामरिक साझेदारियाँ

भारत बनाम चीन: सामरिक तुलना

आयामचीनभारत
विश्व उत्पादन हिस्सा~60%~1%
शोधन क्षमता~85%नगण्य
भंडार रैंक1st5th
स्थायी चुम्बक उत्पादन~90% वैश्विकपायलट चरण
सामरिक भंडारस्थापितयोजना चरण
निजी क्षेत्र भागीदारीराज्य-संचालित2023 के बाद खुला

आगे का मार्ग

नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)

यूपीएससी प्रासंगिकता

प्रीलिम्स बिंदु

मेन्स अभ्यास प्रश्न

अभ्यास प्रश्न — "भारत दुर्लभ मृदा से समृद्ध देश है, फिर भी दुर्लभ मृदा-निर्भर अर्थव्यवस्था क्यों है? नीतिगत सुधार सुझाइए।"

दुर्लभ मृदाएँ 21वीं सदी का तेल हैं। जो इन्हें नियंत्रित करता है, वही EV, अक्षय ऊर्जा, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स को नियंत्रित करता है। भारत किसी चीनी रिफ़ाइनरी को ऑक्साइड निर्यातक बने रहने का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है। 2023-25 के नीतिगत सुधार अंततः सही दिशा में संरेखित हो चुके हैं; अगली परीक्षा क्रियान्वयन की है।

सामान्य प्रश्न

दुर्लभ मृदा तत्व (REE) क्या होते हैं?

REE 17 धात्विक तत्वों का एक समूह है — 15 लैंथेनाइड्स (लैंथेनम से लूटीशियम) तथा स्कैंडियम और यिट्रियम। इनके चुम्बकीय, संदीप्त, उत्प्रेरकीय और विद्युत्-रासायनिक गुण इन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स, EV, पवन ऊर्जा और रक्षा के लिए अनिवार्य बनाते हैं।

REE को "दुर्लभ" क्यों कहते हैं जबकि वे प्रचुर होते हैं?

नाम भ्रामक है। पृथ्वी की पर्पटी में सीरियम जैसे तत्व ताम्बे से अधिक प्रचुर हैं। "दुर्लभ" इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे विरले ही सांद्र निक्षेपों में मिलते हैं और उन्हें पृथक करना तकनीकी रूप से कठिन व महँगा है।

चीन का REE पर एकाधिकार कैसे बना?

दशकों के राज्य-निवेश, सस्ते श्रम, ढीले पर्यावरणीय मानकों और दीर्घकालिक रणनीति के परिणामस्वरूप। 1992 में डेंग शियाओपिंग ने REE को चीन का सामरिक संसाधन घोषित किया। आज चीन उत्पादन का 60% और शोधन का 85% नियंत्रित करता है।

भारत का REE भंडार कहाँ है?

भारत के अधिकांश REE भंडार समुद्र-तटीय मोनाज़ाइट रेत में हैं — तमिलनाडु, केरल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और झारखंड के तट। आंध्र प्रदेश का कडप्पा बेसिन भी एक नया महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत का कुल भंडार लगभग 6.9 मिलियन टन है — विश्व में 5वाँ स्थान।

IREL की भूमिका क्या है?

IREL (इंडिया) लिमिटेड परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन सार्वजनिक उपक्रम है और भारत में दुर्लभ मृदा का प्रमुख उत्पादक है। यह मोनाज़ाइट से थोरियम और REE का पृथक्करण करता है। हाल ही में यह डाउनस्ट्रीम — चुम्बक निर्माण — की ओर बढ़ रहा है।

MMDR संशोधन अधिनियम 2023 का क्या महत्व है?

यह अधिनियम पहली बार निजी क्षेत्र को REE सहित सामरिक खनिजों के अन्वेषण और खनन की अनुमति देता है। पूर्व में परमाणु खनिजों का सरकारी एकाधिकार था। 12 खनिज परमाणु अनुसूची से हटाए गए और लिथियम तथा REE सहित 6 खनिज नीलामी हेतु प्रस्तुत किए गए।

राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल्स मिशन क्या है?

जनवरी 2025 में स्वीकृत यह मिशन ₹16,300 करोड़ का परिव्यय रखता है। इसका उद्देश्य घरेलू अन्वेषण, विदेशी अधिग्रहण (KABIL के माध्यम से), पुनर्चक्रण, R&D और सामरिक भंडारण के माध्यम से क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना है।

QUAD क्रिटिकल मिनरल्स पहल क्या है?

2023 में आरंभ यह पहल अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच सहयोग है, जिसका उद्देश्य REE तथा अन्य क्रिटिकल मिनरल्स की चीन-केंद्रित आपूर्ति श्रृंखला को विविधीकृत करना है। 2024 के QUAD शिखर सम्मेलन में इसे और सशक्त किया गया।

दुर्लभ मृदा को 21वीं सदी का तेल क्यों कहा जाता है?

जैसे 20वीं सदी में तेल औद्योगिक एवं भू-राजनीतिक शक्ति का आधार था, वैसे ही REE आज EV, पवन ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, रक्षा प्रणालियों और AI हार्डवेयर के लिए अपरिहार्य हैं। आपूर्ति का संकेन्द्रण और चीन का प्रभुत्व भी तेल-कार्टेल जैसी भू-राजनीतिक शक्ति प्रदान करता है।

भारत REE-समृद्ध होते हुए भी आयात पर निर्भर क्यों है?

भारत के पास भंडार हैं किंतु शोधन और पृथक्करण की क्षमता नगण्य है। मोनाज़ाइट में थोरियम होने के कारण प्रसंस्करण जटिल है, निजी निवेश ऐतिहासिक रूप से सीमित रहा, और डाउनस्ट्रीम — चुम्बक, फ़ॉस्फ़र — का पारिस्थितिकी तंत्र विकसित नहीं हो सका। यही नीतिगत कमी अब सुधारों के माध्यम से दूर की जा रही है।