एरी रेशम और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन: असम का अहिंसा वाला रेशम अब प्रीमियम बाज़ार में
एरी रेशम और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन: असम का अहिंसा वाला रेशम अब OEKO-TEX Standard 100 पर खरा उतरता है, जिससे दुनिया के प्रीमियम बाज़ार और उत्तर-पूर्व की रोज़ी-रोटी, दोनों मज़बूत होते हैं।
एरी रेशम (Eri silk) और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन मिलकर भारत के उत्तर-पूर्व की कपड़ा अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा क़दम हैं। एरी रेशम सामिया रिसिनी पतंगे के कोयों (cocoon) से बनता है और मुख्य रूप से असम, मेघालय और नागालैंड में तैयार होता है। दुनिया के गिने-चुने व्यापारिक रेशमों में यह अकेला ऐसा है जिसे पतंगे के अपने आप कोया छोड़कर बाहर निकल जाने के बाद इकट्ठा किया जाता है, इसलिए इसे “अहिंसा वाला” या अहिंसा रेशम कहते हैं। पिछले कुछ साल में उत्तर-पूर्व के कई एरी रेशम उत्पादों को, जिनमें असम के उत्पादकों का धागा और कपड़ा भी शामिल है, OEKO-TEX Standard 100 सर्टिफिकेशन मिला है। यह दुनिया का सबसे जाना-पहचाना लेबल है जो बताता है कि कपड़े की जाँच हो चुकी है और उसमें नुक़सानदेह रसायन नहीं हैं। अहिंसा वाले उत्पादन और बिना रसायन वाले सर्टिफिकेशन का यह जोड़ एरी रेशम को दुनिया के प्रीमियम और सस्टेनेबल फ़ैशन बाज़ार में जगह दिला रहा है।
UPSC के लिहाज़ से एरी रेशम और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन की यह कहानी अर्थव्यवस्था (कपड़ा, रेशम उत्पादन, निर्यात), समाज (उत्तर-पूर्व के आदिवासी समुदायों की रोज़ी-रोटी) और करेंट अफ़ेयर्स, तीनों से जुड़ती है। इसमें दो बातें ऐसी हैं जो प्रीलिम्स के आम सवालों में सही निकलती हैं: एरी रेशम सचमुच अहिंसा वाला रेशम है, और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन यही पक्का करता है कि जाँच में रसायन नहीं मिले।
एक नज़र में ज़रूरी बातें
| बात | ब्यौरा |
|---|---|
| रेशम कीट की प्रजाति | सामिया रिसिनी (एरी / एंडी रेशम कीट) |
| किन पौधों पर पलता है | अरंडी, केसेरू, टैपिओका |
| मुख्य उत्पादक राज्य | असम, मेघालय, नागालैंड (उत्तर-पूर्व भारत) |
| “अहिंसा” रेशम क्यों कहते हैं | पतंगा ख़ुद बाहर निकलता है; किसी प्यूपा को मारा नहीं जाता |
| सर्टिफिकेशन | OEKO-TEX Standard 100 — 300 से ज़्यादा नुक़सानदेह रसायनों की जाँच |
| OEKO-TEX कौन चलाता है | 17 जाँच संस्थानों का अंतरराष्ट्रीय संघ, मुख्यालय ज़्यूरिख़ में |
| बढ़ावा देने वाली एजेंसी | केंद्रीय रेशम बोर्ड (कपड़ा मंत्रालय); NERTPS; सिल्क समग्र |
| यह क्यों मायने रखता है | यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और जापान के प्रीमियम सस्टेनेबल फ़ैशन बाज़ार खुलते हैं |
एरी रेशम है क्या
सामिया रिसिनी नाम का रेशम कीट अरंडी (Ricinus communis), केसेरू (Heteropanax fragrans) और टैपिओका की पत्तियों पर पाला जाता है। बॉम्बिक्स मोरी से बनने वाले मशहूर शहतूती रेशम से इसका फ़र्क़ यह है कि एरी का कोया एक सिरे से खुला रहता है। प्यूपा की अवस्था पूरी होने पर पतंगा उसी खुले सिरे से रेंगकर बाहर आ जाता है और ख़ाली कोया पीछे छूट जाता है, जिससे धागा काता जाता है। ख़ुद बाहर निकलने की यही बात एरी को अहिंसा वाला रेशम बनाती है। शहतूती, तसर और मूगा रेशम में कोयों को उबालकर या भाप देकर प्यूपा मारना पड़ता है, एरी में नहीं।
भारत का रेशम परिवार
भारत दुनिया का अकेला देश है जो रेशम की चारों व्यापारिक क़िस्में बनाता है:
- शहतूती रेशम — बॉम्बिक्स मोरी से, सबसे बड़ी क़िस्म, ज़्यादातर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में।
- तसर रेशम — एंथेरिया माइलिटा से बनने वाला जंगली रेशम, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में।
- मूगा रेशम — एंथेरिया असमेंसिस से बनने वाला सुनहरा-पीला रेशम, असम को GI टैग मिला हुआ है, सबसे दुर्लभ क़िस्म।
- एरी रेशम — सामिया रिसिनी से, इसे एंडी या शांति वाला रेशम भी कहते हैं।
शहतूती को छोड़ बाक़ी तीनों क़िस्में अच्छी-ख़ासी मात्रा में अकेले उत्तर-पूर्व से आती हैं।
OEKO-TEX Standard 100 क्यों मायने रखता है
OEKO-TEX कपड़ा उद्योग के लिए एक स्वतंत्र जाँच और सर्टिफिकेशन व्यवस्था है, जिसे सत्रह शोध और जाँच संस्थानों का अंतरराष्ट्रीय संघ चलाता है और जिसका मुख्यालय ज़्यूरिख़ में है। इसका सबसे बड़ा लेबल OEKO-TEX Standard 100 है। यह बताता है कि कपड़े के हर हिस्से की — धागे और कपड़े से लेकर बटन और ज़िप तक — तीन सौ से ज़्यादा नियंत्रित नुक़सानदेह रसायनों की सूची पर जाँच हुई है और सब तय सीमा से नीचे मिले हैं।
किन चीज़ों की जाँच होती है
OEKO-TEX Standard 100 में इनकी जाँच होती है:
- नियंत्रित और प्रतिबंधित एज़ो रंग,
- फ़ॉर्मेल्डिहाइड,
- कीटनाशक,
- सीसा, कैडमियम, पारा, क्रोमियम VI जैसी भारी धातुएँ,
- पेंटाक्लोरोफ़ीनॉल और टेट्राक्लोरोफ़ीनॉल,
- क्लोरीन वाले फ़ीनॉल और बेंज़ीन,
- थैलेट और प्लास्टिसाइज़र,
- और REACH जैसे नियमों के तहत चिंता वाली दूसरी चीज़ें।
यानी जिस उत्पाद पर Standard 100 का लेबल है, वह इंसान की त्वचा के संपर्क के लिए सुरक्षित माना जाता है। सबसे सख़्त श्रेणी में तो यह बच्चों के कपड़ों और अंदरूनी कपड़ों के लिए भी ठीक रहता है।
भारतीय रेशम के लिए यह क्यों बड़ी बात है
दुनिया के ज़्यादातर प्रीमियम फ़ैशन ख़रीदार, ख़ासकर यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और जापान में, दोबारा ऑर्डर देने से पहले किसी तीसरे पक्ष से रसायनों की स्वतंत्र जाँच माँगते हैं। OEKO-TEX या इसके जैसा कोई सर्टिफिकेशन (Bluesign, GOTS) न हो तो भारतीय रेशम उत्पादक प्रीमियम और लग्ज़री बाज़ार की ऊँची क़ीमतों और लंबे ऑर्डरों तक पहुँच ही नहीं पाते। इसलिए उत्तर-पूर्व के एरी रेशम उत्पादों को हाल में मिला OEKO-TEX Standard 100 सर्टिफिकेशन एक ऐसा बाज़ार खोल देता है जो पहले पहुँच से बाहर था।
उत्पादन की पूरी कड़ी
एरी रेशम और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन की कहानी एक छोटे किसान परिवार के घर से शुरू होती है।
कीट पालन
घर वाले आम तौर पर अरंडी या केसेरू लगाते हैं, उन्हीं पत्तियों पर एक के बाद एक रेशम कीट की फ़सलें पालते हैं, और पतंगे के अपने आप निकल जाने के बाद कोये इकट्ठा करते हैं। हर फ़सल में क़रीब 25 से 30 दिन लगते हैं। साल में कई फ़सलें ली जा सकती हैं, क्योंकि यह प्रजाति बहुफ़सली (multivoltine) है, यानी यूरोप के एकफ़सली रेशम की तरह साल में एक ही पीढ़ी तक सीमित नहीं।
कताई और बुनाई
एरी के कोये एक सिरे से खुले होते हैं, इसलिए शहतूती रेशम की तरह इनसे लगातार धागा नहीं खींचा जा सकता। इन्हें या तो हाथ से तकली और चरख़े पर काता जाता है, या छोटी मोटर वाली कताई इकाइयों पर। फिर धागा नागालैंड और मिज़ोरम के आदिवासी इलाक़ों में कमर वाले करघों (loin-loom) पर, और असम तथा मेघालय में फ़्रेम करघों पर बुना जाता है। एरी का कपड़ा मैट रहता है, गरमी देता है, लिनन की तरह गिरता है और उस पर सिलवटें अपने आप पड़ती हैं।
रंगाई
आम रेशम रंगाई में रसायनों की लंबी सूची लगती है, जबकि OEKO-TEX पास करने के लिए प्राकृतिक या कम असर वाले रंग और साफ़ पानी चाहिए। उत्तर-पूर्व के कई क्लस्टर अब हल्दी, नील, लाख और अख़रोट की छाल जैसे प्राकृतिक रंगों और कम तापमान वाली रंगाई का इस्तेमाल करते हैं, ताकि OEKO-TEX सर्टिफिकेशन बना रहे।
रोज़ी-रोटी और अर्थव्यवस्था पर असर
रेशम उत्पादन भारत के सबसे ज़्यादा मज़दूरी वाले कृषि-उद्योगों में है। शहतूत के हर हेक्टेयर से खेती और कोया-बाद के काम में क़रीब छह वयस्क मज़दूरों को रोज़गार मिलता है; एरी रेशम हज़ारों छोटी जोतों में बँटा है और उत्तर-पूर्व में कई लाख लोगों को काम देता है। एरी रेशम और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन का जोड़ प्रति किलो धागे पर मिलने वाला दाम काफ़ी बढ़ा देता है, बाज़ार के हिसाब से 30 से 50 प्रतिशत तक, और निर्यात के लिए क़र्ज़ तथा फ़ैशन ब्रांडों से साझेदारी भी खोल देता है, जो बिना ब्रांड वाले माल को कभी नहीं मिलती थी।
सरकारी मदद केंद्रीय रेशम बोर्ड, उत्तर पूर्वी क्षेत्र वस्त्र संवर्धन योजना (NERTPS), सिल्क समग्र कार्यक्रम और राज्यों के हथकरघा तथा हस्तशिल्प मिशनों के रास्ते आती है।
पर्यावरण के मोर्चे पर एरी
पर्यावरण पर असर के मामले में एरी रेशम ज़्यादातर दूसरे रेशों से बेहतर बैठता है।
- अरंडी और केसेरू ख़राब मिट्टी में भी चल जाते हैं और इन्हें सिंचाई कम चाहिए।
- कोया इकट्ठा करने में जीव नहीं मारा जाता, जबकि आम रेशम में प्यूपा मरते हैं।
- प्राकृतिक रंगाई से गंदे पानी का बोझ घटता है।
- हाथ से काते और बुने उत्पादों में मशीनी ऊर्जा बहुत कम लगती है।
इसके साथ जब OEKO-TEX का रसायन-सुरक्षा सर्टिफिकेशन जुड़ जाता है, तो एरी रेशम उस बढ़ती माँग में फ़िट बैठता है जो सचमुच टिकाऊ और नैतिक तरीक़े से बने रेशों के लिए ऊँची क़ीमत देने को तैयार है।
GI टैग और ब्रांड का ढाँचा
एरी रेशम को अभी अपना एक साझा GI टैग नहीं मिला है, लेकिन इससे जुड़े कई उत्पादों को मिल चुका है, जैसे असम मूगा, सुआलकुची की रेशम बुनाई और कुछ ख़ास आदिवासी बुनाइयाँ। GI ब्रांडिंग और OEKO-TEX सर्टिफिकेशन साथ मिलकर भारतीय रेशम को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दोहरा संकेत देते हैं: यह कहाँ का है, और यह रसायनों के लिहाज़ से सुरक्षित है।
और गहराई में जाने के लिए असम के मूगा रेशम और भारत की कपड़ा एवं हथकरघा नीति पर हमारे लेख भी देखिए।
सामान्य प्रश्न
एरी रेशम को अहिंसा वाला रेशम क्यों कहते हैं?
क्योंकि एरी का कोया एक सिरे से खुला रहता है और पतंगा ख़ुद बाहर निकल आता है; उसके बाद ही ख़ाली कोये से धागा काता जाता है। बाक़ी व्यापारिक रेशमों में कोयों को उबालने या भाप देने की जो अवस्था आती है, उसमें प्यूपा मर जाता है, एरी में ऐसा नहीं होता।
भारत में एरी रेशम कहाँ बनता है?
मुख्य रूप से असम, मेघालय, नागालैंड, मिज़ोरम और उत्तर-पूर्व के दूसरे राज्यों में। छोटे-छोटे इलाक़े बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी हैं।
OEKO-TEX Standard 100 क्या है?
OEKO-TEX Standard 100 एक अंतरराष्ट्रीय सर्टिफिकेशन है, जो बताता है कि किसी कपड़े की तीन सौ से ज़्यादा नुक़सानदेह रसायनों के लिए जाँच हो चुकी है और सब तय सीमा से नीचे मिले हैं, यानी वह इंसान की त्वचा के संपर्क के लिए सुरक्षित है।
भारतीय रेशम के लिए OEKO-TEX सर्टिफिकेशन क्यों ज़रूरी है?
क्योंकि दुनिया के प्रीमियम ख़रीदार, ख़ासकर यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और जापान में, किसी तीसरे पक्ष से रसायनों की स्वतंत्र जाँच माँगते हैं। OEKO-TEX से वे ऊँचे दाम वाले और दोबारा मिलने वाले ऑर्डर खुलते हैं, जो बिना सर्टिफिकेशन वाले माल को नहीं मिलते।
एरी रेशम किस कीट से बनता है?
सामिया रिसिनी से, जिसे एरी रेशम कीट भी कहते हैं। इसे ज़्यादातर अरंडी और केसेरू की पत्तियों पर पाला जाता है।
क्या एरी रेशम और मूगा रेशम एक ही चीज़ हैं?
नहीं। मूगा रेशम एंथेरिया असमेंसिस से आता है और उसका सुनहरा-पीला रेशा सिर्फ़ असम में बनता है, जबकि एरी रेशम सामिया रिसिनी से आता है और उसका रेशा मैट, हल्के सफ़ेद से भूरे रंग तक का होता है। दोनों उत्तर-पूर्व के रेशम हैं, लेकिन जीव और बनावट, दोनों लिहाज़ से अलग हैं।
भारत में रेशम उत्पादन को कौन बढ़ावा देता है?
कपड़ा मंत्रालय के तहत आने वाला केंद्रीय रेशम बोर्ड, जो राज्यों के रेशम विभागों और उत्तर पूर्वी क्षेत्र वस्त्र संवर्धन योजना (NERTPS) के साथ मिलकर काम करता है।
क्या एरी रेशम को GI टैग मिला है?
एरी रेशम के लिए एक साझा राष्ट्रीय GI टैग अभी बन ही रहा है। उत्तर-पूर्व के इससे जुड़े उत्पादों और बुनाई की शैलियों के अपने GI टैग हैं, जबकि एरी रेशम की पहचान फ़िलहाल केंद्रीय रेशम बोर्ड की ब्रांडिंग और समुदायों के बनते हुए लेबलों से बनती है।