Anantam IASHindi Note · 18 April 2026

कृषि विपणन में ग्रामीण हाटों की भूमिका (यूपीएससी अर्थव्यवस्था)

भारत 2025 में ग्रामीण हाट एवं GrAMs: ग्रामीण आवधिक बाज़ार, मनरेगा संबंध, e-NAM, बजट 2025-26 तथा यूपीएससी-अनुकूल विश्लेषण।

APMC और e-NAM से बहुत पहले से भारत की ग्रामीण उपज ग्रामीण हाटों के माध्यम से प्रवाहित होती रही है — साप्ताहिक या पाक्षिक ग्रामीण बाज़ार जो आज भी भारत के गाँवों में फैले हुए हैं। अनुमान है कि देश भर में लगभग 22,000 ऐसे ग्रामीण आवधिक बाज़ार संचालित हैं, जिन्हें हाट, रायथु बाज़ार, रायथा संथे, मंडी अथवा पेठ के नामों से जाना जाता है। नीतिगत चर्चाओं में प्रायः उपेक्षित रहने के बावजूद, दूरस्थ क्षेत्रों के छोटे एवं सीमांत किसानों द्वारा उत्पादित विपणन योग्य अधिशेष का लगभग 90% हिस्सा इन्हीं ग्रामीण हाटों के माध्यम से बेचा जाता है। ग्रामीण कृषि बाज़ारों (GrAMs) में उनके रूपांतरण को केंद्रीय बजट 2018-19 में प्राथमिकता के रूप में चिह्नित किया गया था और बजट 2025-26 तथा डिजिटल कृषि मिशन के अंतर्गत इसे नई तत्परता मिली है।

ग्रामीण हाट क्यों महत्वपूर्ण हैं

APMC का कवरेज विरल है

एक औसत भारतीय APMC लगभग 450 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की सेवा करता है — जो एम.एस. स्वामीनाथन समिति द्वारा अनुशंसित 80 वर्ग किलोमीटर के मानक से कहीं अधिक है। मध्य भारत, पूर्वोत्तर और पहाड़ी क्षेत्रों के अनेक गाँव निकटतम मंडी से 30-50 किलोमीटर दूर हैं। विपणन योग्य अधिशेष में लगभग 40% का योगदान करने वाले छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए APMC तक पहुँचने का परिवहन व्यय प्रायः सीमांत मूल्य-लाभ से अधिक होता है।

वैकल्पिक विपणन अवसंरचना

ग्रामीण हाट इस अंतराल को भरते हैं:

खेत-से-थाली की शृंखला को छोटा करना

अंतिम उपभोक्ताओं और स्थानीय खुदरा विक्रेताओं को सीधी बिक्री सक्षम करके ग्रामीण हाट मध्यस्थों की कई परतों को समाप्त कर देते हैं, जिससे किसानों के लिए मूल्य-प्राप्ति बढ़ती है और उपभोक्ताओं के लिए खुदरा मूल्य-अंतर घटता है।

छोटे किसानों पर केंद्रित

ये बाज़ार ठीक उसी जनसंख्या की सेवा करते हैं जिसे APMC और e-NAM प्रायः छोड़ देते हैं — आदिवासी, पहाड़ी तथा वर्षाश्रित क्षेत्रों के किसान जिनके पास इतना अधिशेष नहीं होता कि APMC तक जाना सार्थक हो।

हब-एंड-स्पोक संभावना

बड़े APMC और e-NAM से जुड़ी मंडियों के फीडर के रूप में GrAMs एक हब-एंड-स्पोक संरचना बना सकते हैं जहाँ समुच्चयन (aggregation) गाँव के स्तर पर ही हो।

एकीकृत आदान बाज़ार

अनेक हाट बीज, जैविक खाद, औज़ार, कृषि-ऋण परामर्श तथा पशु आहार के बिक्री-केंद्र का दोहरा दायित्व भी निभाते हैं।

स्वामित्व और अधिशासन

ग्रामीण हाटों का स्वामित्व और प्रबंधन विभिन्न संस्थाओं के समुच्चय द्वारा होता है:

इस खंडित अधिशासन ने मानकीकरण, अवसंरचना निवेश और डिजिटलीकरण को बाधित किया है।

GrAMs योजना: दृष्टि और मंद प्रगति

घोषणा (बजट 2018-19): विद्यमान 22,000 ग्रामीण हाटों को मनरेगा-वित्तपोषित अवसंरचना के माध्यम से ग्रामीण कृषि बाज़ारों (GrAMs) में उन्नत करना और उन्हें e-NAM से जोड़ना। GrAMs को APMC अधिनियमों के नियामकीय प्रावधानों से मुक्त रखना था, जिससे सीधे किसान-उपभोक्ता लेन-देन संभव हो।

2021 तक प्रगति: 22,000 के लक्ष्य का केवल लगभग 6% GrAMs के रूप में क्रियान्वित हो सका। कारण:

हालिया घटनाक्रम (2024-26)

बजट 2025-26:

डिजिटल कृषि मिशन (2024-26): एग्रिस्टैक (Agristack) और डिजिटल फ़सल सर्वेक्षण GrAMs को सक्षम बनाएँगे कि वे ख़रीदारों के लिए वास्तविक समय में अधिशेष उपलब्धता प्रदर्शित कर सकें; किसान आईडी सीधे डिजिटल भुगतान की अनुमति देंगे।

पीएम-किसान + PACS संबंध: विश्व की सबसे बड़ी अनाज-भंडारण योजना के अंतर्गत अनेक PACS को हाटों के समीप ख़रीद एवं भंडारण केंद्र के रूप में पुनरुद्देश्यित किया जा रहा है।

FPO को बढ़ावा: 10,000 FPO योजना (विस्तारित एवं गहरी) उन्नत हाटों के माध्यम से सामूहिक बिक्री को प्रोत्साहित करती है, जो e-NAM से जुड़े हैं।

16वाँ वित्त आयोग: राज्यों के ज्ञापन ग्रामीण हाट अवसंरचना को सशर्त अनुदानों (tied grants) के पात्र के रूप में रेखांकित करते हैं — विद्युतीकरण, शीत-भंडारण, छायादार मंच, स्वच्छता इत्यादि।

MPI 2024: ग्रामीण बाज़ार तक पहुँच और पोषण-विविधता के बीच सहसंबंध ने त्वरित GrAM उन्नयन के नीतिगत औचित्य को प्रबल किया है।

चुनौतियाँ

आगे का रास्ता

यूपीएससी प्रासंगिकता

संभावित प्रश्न: “ग्रामीण हाट भारत के छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए विपणन का मेरुदंड बने हुए हैं। बजट 2025-26 के संदर्भ में APMC पहुँच के अंतराल को पाटने में GrAMs की भूमिका की समीक्षा कीजिए।” (जीएस III, 250 शब्द)