Anantam IASHindi Note · 24 August 2026

क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता और राज्यों की राजनीति

भारत ने क़रीब हर उस क्षेत्रीय माँग को जगह दी जिसे संविधान की भाषा में ढाला जा सका। पंजाब, जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और उत्तर प्रदेश का पूरा रिकॉर्ड एक ही बात कहता है।

भारत ने क़रीब हर उस क्षेत्रीय माँग को जगह दी है जिसे संविधान की भाषा में ढाला जा सका, और जिसे नहीं ढाला जा सका उससे लड़ा है। पूरा रिकॉर्ड यही कहता है कि विद्रोह को ख़त्म करने में असली हथियार ताक़त नहीं, संघवाद रहा है।

यह PSIR Optional Notes का 33वाँ अध्याय है, जो पेपर I के भारतीय शासन और राजनीति वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।

UPSC पाठ्यक्रम

क्षेत्रवाद, अलगाववादी और विद्रोही आंदोलन; सांप्रदायिकता; जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर के संदर्भ में राज्यों की राजनीति।

एक पन्ने में

  • भारत में क्षेत्रवाद ने चार शक्लें ली हैं: अलग राज्य की माँग, राज्य के भीतर स्वायत्तता की माँग, भाषा और संस्कृति की हिफ़ाज़त की माँग, और अलग होने की माँग। पहली तीन को आम तौर पर जगह मिल गई।
  • 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम से शुरू हुआ भाषाई पुनर्गठन पहली बड़ी स्वीकृति है। इसने संघ को कमज़ोर नहीं, मज़बूत किया — यही उल्टी लगने वाली बात लिखने लायक़ है।
  • असमान संघवाद (asymmetric federalism) यहाँ का पक्का औज़ार है: ग्यारह राज्यों के लिए अनुच्छेद 371 वाले प्रावधान, छठी अनुसूची की स्वायत्त परिषदें, और पहले अनुच्छेद 370।
  • पंजाब: पंजाबी सूबा की माँग 1966 में पूरी हुई; आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973); अस्सी के दशक भर चली उग्रवाद की लहर; ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) और उसके नतीजे; राजीव-लोंगोवाल समझौता (1985); नब्बे के शुरू से हालात सामान्य।
  • जम्मू-कश्मीर: 1947 में विलय, अनुच्छेद 370 और दिल्ली समझौता (1952), स्वायत्तता का घिसते जाना, 1989 से उग्रवाद, फिर 2019 का पुनर्गठन।
  • पूर्वोत्तर को तीन समस्याओं से समझना सबसे अच्छा रहता है: मूल निवासी होने का सवाल और बाहर से आना, राज्य से कम दर्जे वाली स्वायत्तता, और राज्यों की सीमा पर बिना निपटे ज़मीनी दावे।
  • उत्तर प्रदेश मंडल और मंदिर वाले फेरबदल की प्रयोगशाला है। कांग्रेस के दबदबे से चौकोनी मुक़ाबले तक, और फिर दो-कोनी मुक़ाबले तक का सफ़र यहीं दिखता है।
  • सांप्रदायिकता का सैद्धांतिक पक्ष अध्याय 30 में है। यहाँ वह राज्यों के स्तर पर काम करती दिखती है, जहाँ वही औज़ार बार-बार लौटते हैं: गोलबंदी, दंगा, फिर चुनावी जमावड़ा।

क्षेत्रवाद और उसे दी गई जगह

भाषाई पुनर्गठन

धर आयोग (1948) ने भी और JVP समिति (1949 — नेहरू, पटेल, पट्टाभि सीतारमैया) ने भी भाषा के आधार पर राज्य बनाने से मना किया था। पोट्टि श्रीरामुलु के आमरण अनशन और दिसंबर 1952 में उनकी मौत के बाद 1953 में आंध्र राज्य बना। फिर फज़ल अली आयोग (1953) ने पूरे देश के पुनर्गठन की सिफ़ारिश की, और राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 से चौदह राज्य और छह केंद्रशासित प्रदेश बने।

असली विश्लेषण की बात यही है, और परीक्षक इसी पर नंबर देते हैं: उम्मीद थी कि पुनर्गठन से तोड़ने वाली प्रवृत्तियाँ बढ़ेंगी, हुआ ठीक उल्टा। राज्य को भाषाई पहचान का वाहन बना देने से भाषा राष्ट्रीय एजेंडे से हट गई, और जो शिकायत अलगाववाद तक जा सकती थी वह आम राज्य-राजनीति में बदल गई। इसके उलट पाकिस्तान को देखिए, जहाँ बांग्ला को जगह न देने ने सीधे 1971 तक पहुँचाया।

बंबई 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात में बँटा, पंजाब का पुनर्गठन 1966 में हुआ। बाद के राज्य — 2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, और 2014 में तेलंगाना — भाषा पर नहीं बने। उनके पीछे विकास की शिकायत थी, और उप-क्षेत्रीय पहचान।

असमान इंतज़ाम

अनुच्छेद 371 और 371A से 371J महाराष्ट्र, गुजरात, नगालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, सिक्किम, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा और कर्नाटक के लिए ख़ास इंतज़ाम देते हैं। इनमें नगालैंड वाला अनुच्छेद 371A सबसे मज़बूत है: नगा धार्मिक या सामाजिक रीति, प्रथागत क़ानून और उसकी प्रक्रिया, नगा प्रथागत क़ानून से जुड़े दीवानी-फ़ौजदारी न्याय, ज़मीन की मिल्कियत, ज़मीन का हस्तांतरण — इन पर संसद का कोई भी अधिनियम तब तक लागू नहीं होता जब तक राज्य विधानसभा ख़ुद तय न करे।

छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम में स्वायत्त ज़िला और क्षेत्रीय परिषदें देती है। इन्हें ज़मीन, जंगल, झूम खेती, उत्तराधिकार और सामाजिक रीति पर क़ानून बनाने का हक़ है, और अपनी अदालतें भी हैं।

पंजाब

यहाँ का क्रम परीक्षा में पूछा जाता है, इसलिए इसे कसा हुआ याद रखिए।

पचास के दशक से अकाली दल पंजाबी सूबा की माँग उठाता रहा। इसे भाषा के लिबास में लिपटी धार्मिक माँग कहकर टाला गया, और 1966 में मान लिया गया, जब पंजाब को पंजाब, हरियाणा और केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ में बाँटा गया। पहाड़ी इलाक़े हिमाचल प्रदेश को गए। चंडीगढ़ का दर्जा और नदी के पानी का बँटवारा उसी वक़्त अधर में छोड़ दिया गया, और आज तक वहीं है।

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) यहाँ का सबसे अहम दस्तावेज़ है, और इसे लगातार ग़लत बताया जाता रहा है। इसकी राजनीतिक माँग राज्य को ज़्यादा स्वायत्तता देने की थी — केंद्र के पास सिर्फ़ रक्षा, विदेश, मुद्रा और संचार रहें। साथ में धार्मिक और आर्थिक माँगें भी थीं। केंद्र ने इसे अलगाववाद का घोषणापत्र मानकर पढ़ा, जिससे दोनों तरफ़ रुख़ सख़्त हो गया।

अस्सी के दशक की शुरुआत में उग्रवाद बढ़ा। जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार ने स्वर्ण मंदिर परिसर से हथियारबंद गुटों को हटाया, पर इसकी क़ीमत मंदिर की इमारत ने भी चुकाई और सिख भावना ने भी। अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हुई, और उसके बाद दिल्ली समेत कई जगह सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई, जिसकी जवाबदेही आज भी ज़िंदा शिकायत है। जुलाई 1985 के राजीव-लोंगोवाल समझौते में चंडीगढ़ पंजाब को देना तय हुआ, नदी के पानी और इलाक़े के सवाल न्यायाधिकरणों को सौंपे गए। लोंगोवाल की हत्या और समझौते पर अमल न होने से यह बेअसर हो गया। नब्बे के शुरू तक उग्रवाद दबा दिया गया, पर इसमें बहुत सारी ग़ैर-न्यायिक हत्याएँ हुईं, जिन्हें अध्याय 32 वाले नागरिक स्वतंत्रता आंदोलन ने दर्ज किया है।

जम्मू-कश्मीर

2019 तक

अक्टूबर 1947 में विलय-पत्र (Instrument of Accession) के तहत विलय हुआ, बाक़ी रियासतों जैसी ही शर्तों पर, बस एक फ़र्क़ के साथ: बाक़ी रिश्ता तय करने के लिए राज्य की अपनी संविधान सभा बनी। अनुच्छेद 370 ने अस्थायी विशेष दर्जा दिया — संसद की ताक़त रक्षा, विदेश और संचार तक सीमित, बाक़ी विषयों पर राज्य की सहमति ज़रूरी। नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला के बीच दिल्ली समझौते (1952) ने शर्तें तय कीं। 1953 में अब्दुल्ला की बर्ख़ास्तगी से स्वायत्तता के घिसने का लंबा दौर शुरू हुआ, जिसमें एक के बाद एक राष्ट्रपति के आदेश केंद्रीय प्रावधानों को वहाँ बढ़ाते चले गए।

1987 के विवादित चुनाव के बाद 1989 से उग्रवाद शुरू हुआ। इसके साथ सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम आया, कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, और सुरक्षा बलों की मौजूदगी वहाँ की राजनीति का सबसे बड़ा सच बन गई। बीच के दशकों में चुनाव भी हुए, कुछ दौर अपेक्षाकृत शांत भी रहे, और बातचीत बार-बार नाकाम भी हुई।

2019 के बाद

2025 के प्रश्न में 2019 के बाद की राजनीतिक तस्वीर गढ़ने वाले मुख्य कारण पूछे गए थे। जवाब में राय नहीं, क्रम और असर चाहिए।

विश्लेषण के काम की बात यह है: 2019 ने एक असमान संघीय व्यवस्था की जगह एक केंद्रीकृत प्रशासनिक इंतज़ाम रख दिया। असली कसौटी यह है कि विशेष दर्जा जो काम करता था, वह अब आम संघीय राजनीति से हो पाएगा या नहीं।

पूर्वोत्तर

यहाँ तीन समस्याएँ आपस में उलझी हुई हैं। जवाब राज्यवार नहीं, इन्हीं तीन के हिसाब से लिखिए।

मूल निवासी होना और बाहर से आना। 1979–85 का असम आंदोलन बिना काग़ज़ के आई आबादी के ख़िलाफ़ था, जिससे 1985 का असम समझौता निकला, जिसमें 24 मार्च 1971 की कट-ऑफ़ तारीख़ तय हुई। बहुत बाद में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की कवायद 2019 में पूरी हुई, और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 पर विवाद खड़ा हुआ। त्रिपुरा में आबादी का ढाँचा ऐसा बदला कि मूल निवासी अल्पसंख्यक हो गए; वहाँ अपना उग्रवाद पैदा हुआ, और छठी अनुसूची वाली परिषद भी।

स्वायत्तता और राज्य का दर्जा। असम से ही नगालैंड (1963), मेघालय (1972), मिज़ोरम (1987) और अरुणाचल प्रदेश (1987) बने। 1986 का मिज़ो समझौता भारत में विद्रोह ख़त्म करने की सबसे कामयाब मिसाल है: मिज़ो नेशनल फ़्रंट का नेतृत्व सरकार में आ गया, और राज्य तब से शांत है। नगा सवाल आज भी खुला है। 1997 में संघर्षविराम हुआ, 2015 में रूपरेखा समझौता हुआ, पर अलग झंडे, अलग संविधान और राज्यों की सीमाओं के पार फैले नगालिम की माँगें बची रह गईं।

राज्यों के भीतर ज़मीन और जातीयता। बोडोलैंड की परिषदें, और 1993, 2003, 2020 के समझौते; असम–मिज़ोरम और असम–मेघालय के सीमा विवाद; और 2023 से चल रहा मणिपुर का टकराव, जिसमें मैतेई और कुकी-ज़ो समुदाय आमने-सामने हैं। इस टकराव में तीन चीज़ें एक साथ जुड़ी हैं: अनुसूचित जनजाति का दर्जा, पहाड़ और घाटी में ज़मीन के अधिकार, अलग प्रशासन की माँग।

AFSPA इन तीनों में से गुज़रता है। जस्टिस जीवन रेड्डी समिति ने 2005 में इसे हटाने की सिफ़ारिश की थी; 2022 से असम, नगालैंड और मणिपुर के हिस्सों से इसे धीरे-धीरे हटाया जा रहा है, और यही मौजूदा दिशा है। सुप्रीम कोर्ट ने Extra Judicial Execution Victim Families Association (2016) में कहा कि हद से ज़्यादा बल पर सशस्त्र बलों को मिली छूट लागू नहीं होती।

उत्तर प्रदेश, और राज्यों की राजनीति आम तौर पर

उत्तर प्रदेश इसीलिए मानक उदाहरण है कि राष्ट्रीय स्तर वाला फेरबदल सबसे पहले और सबसे पूरा वहीं हुआ। कांग्रेस का दबदबा ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम के जोड़ पर टिका था। मंडल ने OBC वोट तोड़कर समाजवादी पार्टी की तरफ़ किया; बहुजन समाज पार्टी ने अस्सी के दशक में कांशीराम के संगठन से अपना अलग दलित आधार खड़ा किया; राम जन्मभूमि आंदोलन ने जवाबी गोलबंदी जमाई; और कांग्रेस चौथे नंबर पर खिसक गई। नब्बे और दो हज़ार के दशक में राज्य में चौकोनी मुक़ाबला चला, फिर 2014 के बाद यह दो-कोनी हो गया।

राज्यों की राजनीति के आम सबक़: राज्यों की दलीय व्यवस्थाएँ राष्ट्रीय व्यवस्था से लगातार अलग होती जा रही हैं; क्षेत्रीय दल वहीं मज़बूत हैं जहाँ कोई साफ़ भाषाई या उप-क्षेत्रीय पहचान मौजूद है, और जहाँ नहीं है वहाँ कमज़ोर हैं; और राष्ट्रीय नतीजे राष्ट्रीय प्रचार से कहीं ज़्यादा राज्य स्तर के गठबंधनों के गणित से तय होते हैं।

जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं

  • भाषाई पुनर्गठन को ऐसी रियायत बताना जिसने संघ को कमज़ोर किया। सबूत उल्टी तरफ़ जाते हैं, पाकिस्तान में बांग्ला वाला उलटा उदाहरण इसी का हिस्सा है।
  • आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को अलगाववादी दस्तावेज़ कह देना। उसकी राजनीतिक माँग राज्य की स्वायत्तता थी। उसे अलगाववाद पढ़ा गया — यह इतिहास का हिस्सा है, इसे इसी तरह लिखिए।
  • यह लिखना कि अनुच्छेद 370 निरस्त कर दिया गया। उसे उसी के अपने प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति के आदेश से निष्क्रिय किया गया, और In Re: Article 370 (2023) ने इसी रास्ते को सही माना।
  • पूर्वोत्तर को एक ही समस्या मान लेना। बाहर से आना और मूल निवासी होना; स्वायत्तता और राज्य का दर्जा; राज्य के भीतर ज़मीनी टकराव — तीनों अलग हैं, और तीनों के हल भी अलग रहे हैं।
  • जगह देने वाले रिकॉर्ड को छोड़ देना। 1986 के बाद का मिज़ोरम सबसे मज़बूत सबूत है कि जहाँ अकेली ताक़त नाकाम रही, वहाँ संघीय समायोजन ने विद्रोह ख़त्म किया।
  • राज्यों की राजनीति को राष्ट्रीय नतीजों से जोड़े बिना लिखना। राष्ट्रीय नतीजा अब राज्यों की दलीय व्यवस्थाएँ तय करती हैं।

पहले पूछा जा चुका है

  • 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर की बदलती राजनीतिक तस्वीर को गढ़ने वाले मुख्य कारण बताइए। (2025, पेपर I, 10 अंक)

उत्तर का ढाँचा

2019 के बाद जम्मू-कश्मीर की बदलती राजनीतिक तस्वीर को गढ़ने वाले मुख्य कारण बताइए। (10 अंक, 150 शब्द)

शुरुआत। बदलाव को एक लाइन में रखिए: एक असमान संघीय व्यवस्था की जगह केंद्रीकृत प्रशासनिक इंतज़ाम आया, और उसके बाद की सारी राजनीति इसी बात पर है कि वह जगह कौन भरेगा।

पहला कारण, संवैधानिक बदलाव। अगस्त 2019 का राष्ट्रपति आदेश और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम: अनुच्छेद 370 निष्क्रिय, राज्य दो केंद्रशासित प्रदेशों में बँटा, लद्दाख बिना विधानसभा के।

दूसरा कारण, अदालत की मुहर। In Re: Article 370 (दिसंबर 2023) ने क़दम को सही ठहराया, और प्रावधान को अस्थायी माना। साथ में निर्देश दिया कि जल्द से जल्द राज्य का दर्जा लौटे, सितंबर 2024 तक चुनाव हों।

तीसरा कारण, परिसीमन। 2020–22 के आयोग ने विधानसभा सीटें 83 से 90 कीं — छह जम्मू को, एक कश्मीर को — जिससे क्षेत्रीय संतुलन बदला।

चौथा कारण, राजनीतिक फेरबदल। 2020 में गुपकार गठबंधन बना; उसी साल ज़िला विकास परिषद के चुनाव हुए; 2024 में दस साल बाद विधानसभा चुनाव हुए, जिनसे नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेतृत्व वाली सरकार बनी, जो पुरानी स्थिति लौटाने के पक्ष में है।

पाँचवाँ कारण, बचे हुए सवाल। राज्य का दर्जा लौटना; लद्दाख की छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे की माँग; मूल निवास और ज़मीन के नियम; सुरक्षा हालात, जो ख़त्म नहीं, सिर्फ़ बदले हैं।

समापन। खुला सवाल यही है कि जोड़ने का जो काम विशेष दर्जे के ज़िम्मे था, वह अब आम संघीय राजनीति कर पाएगी या नहीं।

आख़िरी दौर का रिवीज़न

  • धर 1948 और JVP 1949 भाषाई राज्यों के ख़िलाफ़; पोट्टि श्रीरामुलु, आंध्र 1953; फज़ल अली 1953; राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956; बंबई का बँटवारा 1960; पंजाब 1966; 2000 और 2014 के नए राज्य।
  • असमानता: अनुच्छेद 371 और 371A–371J; असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम में छठी अनुसूची की परिषदें।
  • पंजाब: पंजाबी सूबा 1966; आनंदपुर साहिब प्रस्ताव 1973; ऑपरेशन ब्लू स्टार जून 1984; नवंबर 1984 की हिंसा; राजीव-लोंगोवाल समझौता जुलाई 1985।
  • जम्मू-कश्मीर: विलय अक्टूबर 1947; अनुच्छेद 370; दिल्ली समझौता 1952; अब्दुल्ला की बर्ख़ास्तगी 1953; 1989 से उग्रवाद; अगस्त 2019 का आदेश और पुनर्गठन अधिनियम; In Re: Article 370 दिसंबर 2023; परिसीमन 83 से 90; विधानसभा चुनाव 2024।
  • पूर्वोत्तर: असम आंदोलन 1979–85, 1985 का समझौता 1971 की कट-ऑफ़ के साथ; NRC 2019; नगालैंड 1963, मेघालय 1972, मिज़ोरम और अरुणाचल 1987; मिज़ो समझौता 1986; नगा संघर्षविराम 1997, रूपरेखा समझौता 2015; बोडो समझौते 1993, 2003, 2020; मणिपुर 2023 से।
  • AFSPA: जीवन रेड्डी समिति 2005; EEVFAM (2016); 2022 से धीरे-धीरे वापसी।
  • उत्तर प्रदेश: मंडल और मंदिर ने कांग्रेस का जोड़ तोड़ा; SP और BSP; चौकोनी मुक़ाबला, फिर 2014 के बाद दो-कोनी।

आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।