सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमन) अधिनियम, 2021: यूपीएससी संपूर्ण मार्गदर्शिका
सहायक प्रजनन तकनीक (ART) विनियमन अधिनियम 2021 पर यूपीएससी मार्गदर्शिका — IVF क्लिनिक, शुक्राणु एवं अंडाणु बैंक, पात्रता शर्तें, बहिष्करण, LGBTQ+ चिंताएँ तथा 2024-26 के नवीनतम घटनाक्रम।
भारत वैश्विक प्रजनन उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है — चिकित्सा पर्यटन का प्रजनन खंड $450 मिलियन से अधिक मूल्यांकित है तथा प्रजनन क्लिनिक बाज़ार 2030 तक $3 बिलियन को पार करने का अनुमान है। दशकों के अनियमित विस्तार के बाद बने सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Assisted Reproductive Technology Regulation Act, 2021) ने अंततः IVF केंद्रों, शुक्राणु एवं अंडाणु बैंकों तथा ART सेवाओं के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान किया है। यूपीएससी जीएस-I (महिलाएँ, सामाजिक मुद्दे) और जीएस-II (विधायन, स्वास्थ्य) के अभ्यर्थियों के लिए यह नैतिक, सामाजिक और संवैधानिक आयामों वाला एक महत्वपूर्ण अधिनियम है।
भारत में बाँझपन (infertility) की दर लगभग 8-10 प्रतिशत है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वैश्विक औसत 17.5 प्रतिशत से कम होने के बावजूद अनुमानतः 2.8 करोड़ दंपतियों को प्रभावित करती है। ICMR के 2024 के राष्ट्रीय बाँझपन सर्वेक्षण के प्रारंभिक संकेत बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में देरी से विवाह, जीवनशैली रोग तथा पर्यावरणीय प्रदूषण ने इस संख्या को बढ़ाया है। ऐसी स्थिति में 2021 का अधिनियम एक नैतिक, चिकित्सा-तकनीकी और संवैधानिक चौराहे पर खड़ा है — यह तय करता है कि कौन माता-पिता बन सकता है, किन शर्तों पर, और किस मूल्य पर।
वैचारिक ढाँचा
सहायक प्रजनन तकनीक क्या है?
सहायक प्रजनन तकनीक (ART) उन सभी विधियों को सम्मिलित करती है जो शुक्राणु अथवा डिंब (अपरिपक्व अंडकोशिका / oocyte) को मानव शरीर के बाहर संचालित कर गर्भाधान प्राप्त करती हैं तथा युग्मक (gametes) या भ्रूण को महिला की प्रजनन प्रणाली में स्थानांतरित करती हैं।
सरल शब्दों में, ART वह छत्र-शब्द है जो परखनली शिशु तकनीक से लेकर अंडाणु ठंडा करके भविष्य के लिए सुरक्षित रखने तक की समस्त प्रक्रियाओं को समेटता है। यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक-नैतिक हस्तक्षेप भी है क्योंकि इसके माध्यम से जैविक माता-पिता, गर्भधारण माता तथा कानूनी अभिभावक की भूमिकाएँ अलग-अलग हो सकती हैं।
ART के प्रमुख प्रकार:
- युग्मक दान (Gamete donation) — शुक्राणु अथवा अंडाणु दान।
- परखनली निषेचन (In-vitro fertilisation / IVF)।
- अंतःकोशिकीय शुक्राणु अंतःक्षेप (Intracytoplasmic Sperm Injection / ICSI)।
- गर्भकालीन सरोगेसी (Gestational surrogacy) — पृथक सरोगेसी अधिनियम के तहत विनियमित।
- युग्मकों एवं भ्रूणों का क्रायोप्रिज़र्वेशन (Cryopreservation / प्रशीतन संरक्षण)।
- पूर्व-आरोपण आनुवंशिक निदान (Pre-implantation genetic diagnosis / PGD)।
भारत की स्थिति: विनियमन की आवश्यकता क्यों
उद्योग का विकास
- भारत में 3,000 से अधिक IVF क्लिनिक हैं — जिनमें कई अपंजीकृत हैं।
- भारतीय दंपतियों में 8-10 प्रतिशत बाँझपन — लगभग 2.8 करोड़ दंपति।
- मात्रा की दृष्टि से भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा IVF बाज़ार है।
- यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका से सीमा-पार प्रजनन पर्यटन।
विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत का प्रजनन बाज़ार 15 प्रतिशत से अधिक की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) पर बढ़ रहा है। यह वृद्धि देरी से विवाह, करियर-केंद्रित जीवनशैली, अंडाणु संरक्षण की बढ़ती माँग तथा सस्ती लागत के कारण है — IVF का एक चक्र अमेरिका में $12,000-$15,000 का है, जबकि भारत में लगभग ₹1-3 लाख में उपलब्ध है। इसी कारण भारत प्रजनन पर्यटन का प्रमुख गंतव्य बन गया है।
2021 से पूर्व की समस्याएँ
- कोई कानून नहीं, केवल दिशानिर्देश — ICMR (2005, 2010 में संशोधित)।
- अनैतिक प्रथाएँ: लिंग चयन, वाणिज्यिक अंडाणु बिक्री, दाताओं का शोषण।
- दाताओं की अपर्याप्त सूचित सहमति।
- ART के माध्यम से बहु-गर्भधारण से होने वाली चिकित्सा जटिलताएँ।
- ART से जन्मे बच्चों का परित्याग।
2018-19 के मध्य कई समाचार रिपोर्टों ने उजागर किया कि गुजरात, दिल्ली एवं पंजाब के कई अनधिकृत क्लीनिक गरीब महिलाओं को अंडाणु बिक्री के लिए प्रलोभित कर रहे थे, बिना उन्हें हार्मोनल उत्तेजन के दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों की पूर्ण जानकारी दिए। यह स्थिति भारत के संवैधानिक अनुच्छेद 21 के तहत गरिमामय जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन थी और इसी ने अधिनियमन की राजनीतिक तात्कालिकता उत्पन्न की।
अब संशोधन क्यों
- सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2019 पर प्रवर समिति ने अनुशंसा की कि चिकित्सा/तकनीकी पहलुओं के लिए ART अधिनियम को सरोगेसी अधिनियम से पहले लाया जाए।
- ART को विनियमित करने वाले देशों के साथ वैश्विक संरेखण।
- दाताओं और बच्चों के लिए संवैधानिक संरक्षण।
ART अधिनियम, 2021 की प्रमुख विशेषताएँ
क्षेत्र (Scope)
अधिनियम ART को उन सभी तकनीकों को सम्मिलित करते हुए परिभाषित करता है जो शरीर के बाहर शुक्राणु या डिंब को संचालित कर गर्भाधान प्राप्त करना चाहती हैं — युग्मक दान, IVF और गर्भकालीन सरोगेसी।
ART क्लिनिकों एवं बैंकों का विनियमन
- प्रत्येक ART क्लिनिक और बैंक को भारत के राष्ट्रीय बैंक एवं क्लिनिक रजिस्ट्री (National Registry of Banks and Clinics of India) के अंतर्गत पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
- पंजीकरण 5 वर्षों के लिए वैध, अगले 5 वर्षों के लिए नवीकरणीय।
- विनियमों के उल्लंघन पर रद्दीकरण संभव।
- शिकायत निवारण और दंड व्यवस्था।
ART सेवाएँ देने की शर्तें
युग्मक दाताओं के लिए आयु संबंधी आवश्यकताएँ:
| दाता का प्रकार | आयु सीमा |
|---|---|
| पुरुष | 21-55 वर्ष |
| महिला | 23-35 वर्ष |
दाता प्रतिबंध:
- एक महिला अपने जीवनकाल में केवल एक बार अंडाणु दान कर सकती है।
- दाता विवाहित होनी चाहिए तथा कम-से-कम एक जीवित स्वयं की संतान होनी चाहिए।
ART सेवाएँ माँगने की शर्तें
- केवल बाँझ विवाहित दंपति (भारतीय या विदेशी) ही ART सेवाएँ माँग सकते हैं।
- अकेली महिलाएँ (भारतीय या विदेशी) — विधवा, तलाकशुदा — ART माँग सकती हैं।
- अंडाणु दाता के पक्ष में बीमा कवरेज आवश्यक है।
- भ्रूण आरोपण से पूर्व आनुवंशिक रोग परीक्षण अनिवार्य है।
अपराध और दंड
- युग्मकों की बिक्री या क्रय — आपराधिक अपराध।
- ART से जन्मे बच्चों का परित्याग — आपराधिक अपराध।
- लिंग चयन — आपराधिक अपराध (PCPNDT अधिनियम को सुदृढ़ करता है)।
- दंड: जुर्माना और कारावास।
राष्ट्रीय एवं राज्य बोर्ड
- केंद्रीय निरीक्षण के लिए राष्ट्रीय रजिस्ट्री।
- निगरानी और प्रवर्तन के लिए राज्य बोर्ड।
तुलनात्मक झलक: भारत बनाम वैश्विक मॉडल
तुलनात्मक संदर्भ अधिनियम की सीमाओं को स्पष्ट करता है। ब्रिटेन, स्पेन और इज़राइल जैसे देश LGBTQ+ व्यक्तियों, अकेले पुरुषों तथा सहजीवी (live-in) दंपतियों को ART का अधिकार देते हैं। यह तुलनात्मक संक्षिप्त तालिका मेन्स उत्तर लेखन में उपयोगी है:
| देश/मॉडल | नियामक संस्था | LGBTQ+ पहुँच | विशिष्टता |
|---|---|---|---|
| भारत | राष्ट्रीय ART बोर्ड | बहिष्कृत | विवाहित दंपति/अकेली महिला तक सीमित |
| ब्रिटेन (UK) | HFEA | पूर्ण पहुँच | दाता-गुमनामी समाप्त (18 वर्ष पर पहचान का अधिकार) |
| स्पेन | स्वास्थ्य मंत्रालय | पूर्ण पहुँच | अकेली महिलाओं और समलैंगिक दंपतियों के लिए सबसे उदार यूरोपीय व्यवस्था |
| अमेरिका | FDA + राज्य कानून | पूर्ण पहुँच | निजी, बीमा-आधारित मॉडल |
| इज़राइल | स्वास्थ्य मंत्रालय | पूर्ण पहुँच | राज्य द्वारा सब्सिडी सबसे उदार |
ART अधिनियम, 2021 से जुड़ी चिंताएँ
LGBTQ+ समुदाय का बहिष्करण
- समलैंगिक दंपति स्पष्ट रूप से पात्रता से बाहर।
- लिव-इन दंपति बहिष्कृत।
- LGBTQ+ व्यक्ति ART तक पहुँच से बाहर।
- LGBTQ+ अधिकारों पर नवतेज सिंह जौहर (2018) और नवजीत (2019) के संवैधानिक ढाँचे को चुनौती।
नवतेज सिंह जौहर निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 377 को अपराध-मुक्त करते हुए स्पष्ट कहा कि लैंगिक अभिविन्यास के आधार पर भेदभाव अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। ART अधिनियम का बहिष्करणीय रुख इस संवैधानिक उद्घोषणा से सीधे टकराता है। 2023 में सर्वोच्च न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने सुप्रियो चक्रवर्ती बनाम भारत संघ मामले में भले ही समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से मना कर दिया, परंतु बहुसंख्य पीठ ने स्वीकारा कि समलैंगिक दंपतियों के लिए नागरिक संघ के अधिकारों का मूल्यांकन कार्यपालिका को करना होगा।
प्रतिबंधात्मक अंडाणु दाता मानदंड
- विवाहित + कम-से-कम एक जीवित संतान + केवल एक बार दान — दाता पूल को गंभीर रूप से सीमित करता है।
- बाँझ दंपतियों के लिए दाता अंडाणुओं तक पहुँच कम होती है।
व्यवहार में देखा गया है कि महानगरों के क्लीनिकों में दाता अंडाणुओं की प्रतीक्षा सूची 6 से 18 महीने तक पहुँच गई है, जिससे बाँझ दंपति विदेशी क्लिनिकों — विशेषकर थाईलैंड, साइप्रस तथा यूक्रेन — की ओर रुख कर रहे हैं। यह एक प्रकार से विनियमन के विपरीत प्रभाव का उदाहरण है, जहाँ अति-संरक्षण ने काले बाज़ार और सीमा-पार पलायन को जन्म दिया है।
गोपनीयता संबंधी चिंताएँ
- राष्ट्रीय रजिस्ट्री के साथ दाता और कमीशन-कर्ता पक्ष की जानकारी साझा करना अनिवार्य।
- पुट्टास्वामी (2017) के निर्णय के तहत निजता के अधिकार के संभावित उल्लंघन।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 के क्रियान्वयन के साथ संरेखण आवश्यक होगा।
सरोगेसी अधिनियम के साथ अतिव्यापन
- ART अधिनियम और सरोगेसी अधिनियम सेवाओं के आधार पर क्लिनिक विनियमन की भिन्न-भिन्न प्रावधान रखते हैं।
- दोहराव और नियामक जटिलता उत्पन्न करता है।
परिभाषागत अंतराल
- गैर-चिकित्सकीय कारणों से पूर्व-आरोपण आनुवंशिक निदान के लिए स्पष्ट प्रावधान का अभाव।
- पृथक अधिनियम के साथ सरोगेसी का अतिव्यापन।
लैंगिक आयाम
- प्रतिबंधात्मक महिला दाता मानदंड महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता से टकराते हैं।
- ट्रांस व्यक्तियों के प्रजनन अधिकारों की कोई मान्यता नहीं।
NALSA बनाम भारत संघ (2014) निर्णय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को संविधान के अंतर्गत ‘तीसरे लिंग’ के रूप में मान्यता दी, और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने उन्हें कानूनी पहचान दी। फिर भी ART अधिनियम केवल ‘पुरुष’ और ‘महिला’ दाता श्रेणियों को मान्यता देता है — यह एक अनसुलझा संवैधानिक अंतराल है, जो आगामी न्यायिक चुनौतियों का विषय बनेगा।
सरकारी योजनाएँ एवं संस्थागत ढाँचा
| उपकरण | उद्देश्य |
|---|---|
| ART (विनियमन) अधिनियम, 2021 | IVF क्लिनिक, बैंक, सेवाओं का विनियमन |
| सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 | परोपकारी सरोगेसी का विनियमन |
| राष्ट्रीय ART बोर्ड | केंद्रीय निरीक्षण |
| राज्य ART बोर्ड | राज्य-स्तरीय प्रवर्तन |
| ICMR दिशानिर्देश | वैज्ञानिक मानक |
| PCPNDT अधिनियम, 1994 | लिंग चयन की रोकथाम |
| MTP अधिनियम (2021 में संशोधित) | गर्भावस्था समाप्ति |
| आयुष्मान भारत | प्रजनन उपचार को कवर नहीं करता |
चुनौतियाँ
- प्रवर्तन में अंतराल: कई क्लिनिक अपंजीकृत।
- LGBTQ+ व्यक्तियों का बहिष्करण — संवैधानिक चुनौती की संभावना।
- दाता पूल का संकुचन: कठोर मानदंड।
- निजता बनाम रजिस्ट्री: संतुलन आवश्यक।
- लागत निषेधात्मक: IVF के एक चक्र पर ₹1-3 लाख; बीमा/आयुष्मान से बाहर।
- नैतिक चिंताएँ: आनुवंशिक स्क्रीनिंग के संदर्भ में सुजननिकी (eugenics) की आशंकाएँ।
आगे की राह
- LGBTQ+ व्यक्तियों, लिव-इन साथियों को मान्यता देने वाले समावेशी संशोधन।
- दाता पूल बढ़ाने हेतु शिथिल दाता मानदंड।
- DPDP अधिनियम 2023 के साथ संरेखित निजता संरक्षण।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ एकीकरण — कम आय वाले दंपतियों के लिए सब्सिडी।
- नियामक जटिलता घटाने हेतु सरोगेसी अधिनियम के साथ सामंजस्य।
- ART विकल्पों एवं अधिकारों के बारे में जागरूकता अभियान।
- ART शिकायतों के लिए समर्पित न्यायाधिकरण।
- अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएँ: ब्रिटेन का मानव प्रजनन एवं भ्रूण-विज्ञान प्राधिकरण (HFEA) मॉडल।
नीतिगत स्तर पर एक चरणबद्ध दृष्टिकोण आवश्यक है — पहले चरण में पात्रता का विस्तार और दाता मानदंडों का युक्तिकरण, दूसरे चरण में बीमा एवं आयुष्मान भारत में बाँझपन उपचार का समावेश, और तीसरे चरण में ART अधिनियम और सरोगेसी अधिनियम का विलयन कर एक ‘प्रजनन स्वास्थ्य संहिता’ (Reproductive Health Code) बनाना। ऐसी संहिता न केवल नियामक दोहराव समाप्त करेगी, बल्कि प्रजनन अधिकारों को मानवाधिकार के रूप में संहिताबद्ध भी करेगी।
नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)
- समलैंगिक विवाह पर सर्वोच्च न्यायालय (अक्टूबर 2023): समलैंगिक विवाह को वैध करने से इनकार; LGBTQ+ का ART अधिकार अनसुलझा।
- ART अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाएँ (2023-24): LGBTQ+, लिव-इन दंपति बहिष्करणों पर उच्च न्यायालयों के समक्ष कई जनहित याचिकाएँ।
- DPDP अधिनियम, 2023: डेटा निजता ढाँचे को ART रजिस्ट्री नियमों के साथ संरेखण आवश्यक।
- राष्ट्रीय ART बोर्ड क्रियाशील (2022-23): कार्यात्मक प्रवर्तन प्रारंभ।
- राज्य बोर्डों का गठन 2024 तक प्रमुख राज्यों में।
- प्रजनन पर्यटन में उछाल (2024): कोविड-पश्चात पुनरुत्थान; भारत का IVF बाज़ार 15%+ CAGR पर बढ़ रहा।
- कर्नाटक ART क्लिनिक विनियम (2024): केंद्रीय अधिनियम के पूरक राज्य नियम।
- महिला आरक्षण अधिनियम, 2023: क्रियान्वयन के बाद महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी विधान को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद।
- बजट 2024-25: आयुष्मान भारत में ART को सम्मिलित नहीं किया गया — पहुँच की चुनौती जारी।
- जाति जनगणना (बिहार 2023): जातियों में बाँझपन की घटनाएँ उजागर — संरचित डेटा अभी नहीं।
- वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक 2024 (WEF): भारत 146 में 129वें स्थान पर; प्रजनन अधिकार संकेतक पीछे।
- MPI 2024 (नीति आयोग): मातृ एवं प्रजनन स्वास्थ्य संकेतक में सुधार।
- SDG India सूचकांक 2023-24: SDG 3 (अच्छा स्वास्थ्य) और SDG 5 (लैंगिक समानता) पर निगरानी।
- ICMR राष्ट्रीय बाँझपन सर्वेक्षण (2024): चालू — साक्ष्य आधार प्रदान करेगा।
- क्रायोप्रिज़र्वेशन एवं अंडाणु दान बहस: दाता मानदंडों को शिथिल करने पर नीतिगत परामर्श।
यूपीएससी प्रासंगिकता
- प्रारंभिक परीक्षा (Prelims बिंदु): ART (विनियमन) अधिनियम 2021, राष्ट्रीय रजिस्ट्री, दाता आयु मानदंड (पुरुष 21-55, महिला 23-35), PCPNDT अधिनियम 1994, सरोगेसी अधिनियम 2021, MTP संशोधन 2021, राष्ट्रीय ART बोर्ड का गठन वर्ष, पंजीकरण अवधि (5 वर्ष), DPDP अधिनियम 2023।
- जीएस-I: महिलाओं की भूमिका; महिला मुद्दे; सामाजिक मुद्दे।
- जीएस-II: विधायन, कल्याणकारी योजनाएँ।
- जीएस-III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नैतिकता।
- निबंध: “जैव-प्रौद्योगिकी के युग में प्रजनन अधिकार।”
मेन्स अभ्यास प्रश्न
आपके उत्तर में निम्नलिखित होना चाहिए:
- ART और उसके दायरे को परिभाषित करें।
- अधिनियम की प्रमुख विशेषताओं का विवरण दें — क्लिनिक पंजीकरण, दाता मानदंड, पात्रता, अपराध।
- लाभों को स्वीकार करें — मानक, दाता संरक्षण, जवाबदेही।
- बहिष्करणों की आलोचना करें — LGBTQ+, लिव-इन दंपति, सीमित दाता पूल।
- संवैधानिक अधिकारों का आह्वान — पुट्टास्वामी निजता, नवतेज सिंह जौहर समानता।
- समावेशी संशोधन, निजता सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य एकीकरण प्रस्तावित करें।
ART अधिनियम, 2021 बहुत विलंब से आया परंतु बहुप्रतीक्षित है। यह एक बहु-अरब डॉलर के अनियमित उद्योग को कानूनी ढाँचे के अंतर्गत लाता है। फिर भी विवाह, यौनिकता और दाता पात्रता पर इसके बहिष्करणीय प्रावधान उजागर करते हैं कि कैसे विधायन एक साथ संरक्षण और भेदभाव कर सकता है। अभ्यर्थी का कार्य है — विनियमन का स्वागत करते हुए सभी के लिए प्रजनन अधिकारों की माँग करना — केवल उनके लिए नहीं जिनका पारिवारिक रूप 20वीं शताब्दी के साँचे में फिट बैठता है।
सामान्य प्रश्न
ART (विनियमन) अधिनियम, 2021 क्या है?
यह अधिनियम भारत में सहायक प्रजनन तकनीक (Assisted Reproductive Technology) क्लिनिकों, शुक्राणु एवं अंडाणु बैंकों तथा IVF, ICSI जैसी सेवाओं को विनियमित करता है। यह राष्ट्रीय रजिस्ट्री में अनिवार्य पंजीकरण, दाता मानदंड और दंडात्मक प्रावधान निर्धारित करता है।
ART अधिनियम के अंतर्गत अंडाणु एवं शुक्राणु दाताओं की आयु सीमा क्या है?
पुरुष दाता की आयु 21 से 55 वर्ष तथा महिला दाता की आयु 23 से 35 वर्ष होनी चाहिए। महिला दाता विवाहित होनी चाहिए, कम-से-कम एक जीवित स्वयं की संतान होनी चाहिए, और वह अपने जीवनकाल में केवल एक बार अंडाणु दान कर सकती है।
क्या समलैंगिक दंपति या LGBTQ+ व्यक्ति ART सेवाएँ प्राप्त कर सकते हैं?
नहीं। ART अधिनियम 2021 के अंतर्गत केवल बाँझ विवाहित विषमलैंगिक दंपति तथा अकेली महिलाएँ (विधवा या तलाकशुदा) ही पात्र हैं। समलैंगिक दंपति, लिव-इन दंपति और LGBTQ+ व्यक्ति स्पष्ट रूप से बहिष्कृत हैं — यह बहिष्करण नवतेज सिंह जौहर निर्णय के संदर्भ में संवैधानिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
ART क्लिनिक के पंजीकरण की वैधता कितने वर्ष की है?
पंजीकरण 5 वर्षों के लिए वैध होता है तथा अगले 5 वर्षों के लिए नवीकरणीय है। नियमों के उल्लंघन पर पंजीकरण रद्द किया जा सकता है तथा दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है।
ART अधिनियम के अंतर्गत प्रमुख अपराध और दंड क्या हैं?
युग्मकों की बिक्री या क्रय, ART से जन्मे बच्चों का परित्याग, और लिंग चयन — ये तीनों आपराधिक अपराध हैं। दंड में भारी जुर्माना तथा कारावास सम्मिलित है। अधिनियम PCPNDT अधिनियम 1994 के लिंग-चयन निषेध को सुदृढ़ करता है।
ART अधिनियम और सरोगेसी अधिनियम में क्या अंतर है?
ART अधिनियम IVF क्लिनिकों, बैंकों तथा युग्मक संचालन की चिकित्सा-तकनीकी प्रक्रियाओं को विनियमित करता है, जबकि सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम 2021 केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है तथा वाणिज्यिक सरोगेसी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। दोनों अधिनियम एक साथ अधिनियमित हुए और परस्पर पूरक हैं।
क्या आयुष्मान भारत के तहत IVF उपचार उपलब्ध है?
नहीं। IVF और अन्य ART प्रक्रियाएँ वर्तमान में आयुष्मान भारत PMJAY के अंतर्गत कवर नहीं की जातीं। एक IVF चक्र पर ₹1-3 लाख खर्च आता है, जिससे यह उपचार निम्न और मध्य आय वर्ग के लिए लगभग दुर्गम बन जाता है। बजट 2024-25 में भी इसे सम्मिलित नहीं किया गया।
राष्ट्रीय ART बोर्ड और राज्य बोर्डों की भूमिका क्या है?
राष्ट्रीय ART बोर्ड केंद्रीय निरीक्षण, नीति निर्माण तथा राष्ट्रीय रजिस्ट्री का संचालन करता है। राज्य बोर्ड राज्य-स्तरीय प्रवर्तन, क्लिनिक निरीक्षण तथा शिकायत निवारण के लिए जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय बोर्ड 2022-23 में क्रियाशील हुआ और 2024 तक प्रमुख राज्यों में राज्य बोर्डों का गठन हो चुका है।
ART अधिनियम पर निजता संबंधी प्रमुख चिंताएँ क्या हैं?
दाताओं और कमीशन-कर्ता दंपतियों की संवेदनशील जानकारी राष्ट्रीय रजिस्ट्री के साथ साझा करना अनिवार्य है। पुट्टास्वामी निर्णय (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना। DPDP अधिनियम 2023 के क्रियान्वयन के साथ ART रजिस्ट्री नियमों को संरेखित करना होगा ताकि डेटा संरक्षण सुनिश्चित हो।
यूपीएससी मेन्स में ART अधिनियम पर कैसे प्रश्न पूछे जा सकते हैं?
जीएस-I में महिला मुद्दों एवं सामाजिक मुद्दों के अंतर्गत; जीएस-II में विधायन, स्वास्थ्य नीति एवं कल्याणकारी योजनाओं के तहत; जीएस-III में विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं नैतिकता के अंतर्गत; निबंध में ‘जैव-प्रौद्योगिकी के युग में प्रजनन अधिकार’ जैसे विषयों पर। उत्तर में अधिनियम की विशेषताएँ, बहिष्करण, संवैधानिक चुनौतियाँ तथा सुधार की दिशा को संतुलित रूप से प्रस्तुत करना चाहिए।