Anantam IASHindi Note · 18 April 2026

सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBCs) — यूपीएससी राजव्यवस्था

भारतीय संविधान में 'सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों' की संकल्पना, अनुच्छेद 15(4), न्यायिक कसौटियाँ, NALSA निर्णय और ओबीसी आरक्षण से जुड़े प्रमुख विवादों की यूपीएससी केंद्रित विवेचना।

“सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग” (SEBCs) की अवधारणा संवैधानिक समानता के सामान्य वायदे और सकारात्मक भेदभाव की विशिष्ट आवश्यकता के बीच की कड़ी है। यह अनुच्छेद 15(4), अनुच्छेद 15(5), अनुच्छेद 15(6) तथा अनुच्छेद 342A में उल्लिखित है। यूपीएससी राजव्यवस्था के लिए SEBC बहस आरक्षण नीति, संघवाद (SEBC की पहचान कौन करे) और अधिकारों की न्यायशास्त्र (NALSA, ट्रांसजेंडर) को एक साथ जोड़ती है।

संवैधानिक प्रावधान

SEBCs कौन हैं? न्यायिक कसौटियाँ

अनुच्छेद 15(4) “पिछड़े वर्गों” को परिभाषित नहीं करता। संविधान पहचान का अधिकार राज्य को देता है, किंतु न्यायालय यह देख सकते हैं कि कसौटियाँ प्रासंगिक एवं युक्तियुक्त हैं या नहीं। न्यायिक निर्णयों ने निम्नलिखित सिद्धांत विकसित किए हैं:

सामाजिक और शैक्षिक — दोनों आवश्यक

एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य (1963) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 15(4) के अंतर्गत पिछड़ापन सामाजिक और शैक्षिक — दोनों होना चाहिए। यह पिछड़ापन अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के समतुल्य, यद्यपि समान नहीं, होना चाहिए।

जाति एक कारक हो सकती है, एकमात्र नहीं

पिछड़ेपन के अनेक संकेतक

न्यायालयों ने माना है कि निर्धनता, व्यवसाय, निवास-स्थान, साक्षरता एवं सामाजिक प्रथाएँ — सभी पिछड़ेपन में योगदान देते हैं। इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

वर्ग और जाति एक नहीं

अनुच्छेद 15(4) “वर्गों” की बात करता है, “जातियों” की नहीं। जैसा सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया, जाति और वर्ग समानार्थी नहीं हैं। इसलिए पिछड़ेपन की पहचान में जाति को छोड़ देने से वर्गीकरण स्वतः दूषित नहीं होता, बशर्ते अन्य कसौटियाँ पूरी हों।

सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण

न्यायालय ने चार विचारों में संतुलन बनाया है:

विचारन्यायिक सुरक्षा उपाय
सीमित राज्य संसाधनआरक्षण डेटा के बिना सामूहिक उन्नति का साधन नहीं बनना चाहिए
अनारक्षित नागरिकों के अधिकारसमान अवसर सुनिश्चित होना चाहिए
दक्षता एवं जनहितअनुच्छेद 335 — SC/ST दावों और प्रशासनिक दक्षता में संतुलन
जाति प्रथा को स्थायित्व से बचावअग्रणी वर्गों (क्रीमी लेयर) को बाहर करें

ऐतिहासिक निर्णय

NALSA निर्णय और ट्रांसजेंडर व्यक्ति SEBC के रूप में

राष्ट्रीय विधि सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (NALSA, 2014) में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता दी और उन्हें सभी मूल अधिकार दिए। महत्त्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने केंद्र सरकार को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को SEBCs मानते हुए शिक्षा एवं रोज़गार में OBC प्रकार का आरक्षण देने का निर्देश दिया।

अद्यतन संदर्भ: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 NALSA के कई निर्देशों को क्रियान्वित करता है। तथापि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राज्य-स्तरीय आरक्षण का कार्यान्वयन असमान है। कर्नाटक, तमिलनाडु एवं कुछ अन्य राज्यों ने आरक्षण या क्षैतिज कोटे की अधिसूचना जारी की है।

102वाँ और 105वाँ संविधान संशोधन: संघीय तनाव

102वें संविधान संशोधन (2018) ने अनुच्छेद 338B और 342A सम्मिलित कर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा दिया और SEBCs की पहचान केंद्रीकृत कर दी।

जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल (2021) में न्यायालय ने माना कि 102वें संशोधन के पश्चात केवल केंद्र (राष्ट्रपति, संसद की सहमति से) ही SEBCs को अधिसूचित कर सकता है।

इसके जवाब में संसद ने 105वाँ संविधान संशोधन (2021) पारित किया, जिसने राज्यों की अपनी SEBC सूचियाँ बनाए रखने की शक्ति पुनः बहाल की। यह प्रकरण SEBC पहचान में जीवंत संघवाद को दर्शाता है।

OBCs का उप-वर्गीकरण

रोहिणी आयोग (2017) को 27% केंद्रीय कोटे के भीतर OBCs के उप-वर्गीकरण का कार्य सौंपा गया। इसके निष्कर्ष — जो अभी पूर्णतः सार्वजनिक नहीं हुए — संकेत देते हैं कि कुछ ही उप-जातियों ने OBC लाभों का असंगत हिस्सा अर्जित किया है। यह दविंदर सिंह के SC उप-वर्गीकरण तर्क की प्रतिध्वनि है।

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मेंस कोण:

सामान्य प्रश्न

SEBCs का पूरा नाम क्या है?

SEBCs का पूरा नाम ‘Socially and Educationally Backward Classes’ अर्थात् सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग है। ये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 15(6) और 342A में उल्लिखित हैं।

NALSA निर्णय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कैसे प्रभावित किया?

2014 के NALSA निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता दी और उन्हें SEBCs मानते हुए शिक्षा व रोज़गार में OBC प्रकार का आरक्षण देने का निर्देश दिया।

102वाँ और 105वाँ संविधान संशोधन क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

102वें संशोधन (2018) ने SEBC पहचान की शक्ति केंद्र को दी; 105वें संशोधन (2021) ने राज्यों की यह शक्ति पुनः बहाल की। यह SEBCs में संघवाद का जीवंत उदाहरण है।

क्रीमी लेयर क्या है?

इंदिरा साहनी निर्णय (1992) में स्थापित क्रीमी लेयर OBC के उस अग्रणी वर्ग को संदर्भित करती है जो आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पर्याप्त रूप से उन्नत हो गया है और इसलिए आरक्षण का लाभ नहीं उठाना चाहिए।

रोहिणी आयोग किससे संबंधित है?

2017 में गठित रोहिणी आयोग को 27% केंद्रीय OBC आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का कार्य सौंपा गया, ताकि लाभ अधिक न्यायसंगत रूप से वितरित हो सकें।