संसद असल में कैसे चलती है: बैठकें, पास होते विधेयक और जाँच-परख का ढहना
14वीं लोकसभा ने 71 प्रतिशत विधेयक समितियों को भेजे, 17वीं ने 16 प्रतिशत। बैठकों, प्रश्नकाल, निलंबन और उत्पादकता के आँकड़ों से संसदीय जाँच-परख की सही तस्वीर।
14वीं लोकसभा ने अपने 71 प्रतिशत विधेयक विस्तृत जाँच के लिए समितियों को भेजे। 17वीं ने सिर्फ़ 16 प्रतिशत। इसी दौर में सदन ने अपने 35 प्रतिशत विधेयक एक घंटे से भी कम चर्चा में पास कर दिए। संसद के कामकाज का कोई भी आकलन इन्हीं दो आँकड़ों से शुरू होना चाहिए, क्योंकि दोनों मिलकर एक ऐसी संस्था की तस्वीर बनाते हैं जो कानून बनाना जारी रखे हुए है और जाँच-परख काफ़ी हद तक छोड़ चुकी है।
बैठकों के दिन: सात दशक की गिरावट
| लोकसभा | हर साल बैठकों के दिन (लगभग) |
|---|---|
| पहली लोकसभा (1952-57) | ~135 |
| 14वीं लोकसभा (2004-09) | ~70 |
| 17वीं लोकसभा (2019-24) | ~55 |
17वीं लोकसभा में पाँच साल में सिर्फ़ 274 बैठकें हुईं, जो पूरा कार्यकाल चलने वाली किसी भी लोकसभा में सबसे कम हैं। अंतरराष्ट्रीय तुलना और भी असहज है: ब्रिटेन की संसद साल में करीब 150 से 170 दिन बैठती है और US Congress लगभग 260 दिन।
बैठकों के दिन ही बाकी सब चीज़ों की नींव हैं। कम दिन का मतलब है कम सवाल, कम बहस और समितियों को कम वक़्त, इसलिए यह अकेला रुझान हर दूसरे पैमाने तक फैल जाता है।
समितियों को भेजना: सबसे तेज़ गिरावट
| लोकसभा | समितियों को भेजे गए विधेयक |
|---|---|
| 14वीं लोकसभा | 71% |
| 15वीं लोकसभा | 27% |
| 17वीं लोकसभा | 16% |
1993 में विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ (Departmentally Related Standing Committees) बनने के बाद से 16 प्रतिशत सबसे कम आँकड़ा है।
यह बात सुर्खी से कहीं ज़्यादा गंभीर है। समितियाँ विधेयक को खंड दर खंड जाँचती हैं, विशेषज्ञों और प्रभावित समूहों से राय लेती हैं, और सदन की टकराव वाली नौटंकी से दूर काम करती हैं, इसीलिए वे ऐतिहासिक रूप से दलों के बीच सहमति बनाती रही हैं। जो विधेयक समिति से नहीं गुज़रता, उसकी जाँच सिर्फ़ सदन के पटल पर होती है। और जब पटल का वक़्त भी दबा दिया जाए, तो जाँच होती ही नहीं।
बहस के बिना कानून
| पैमाना, 17वीं लोकसभा | आँकड़ा |
|---|---|
| 1 घंटे से कम बहस में पास विधेयक (लोकसभा) | 35% |
| 1 घंटे से कम बहस में पास विधेयक (राज्यसभा) | 34% |
| पेश होने के 2 हफ़्ते के भीतर पास विधेयक | 58% |
2019 का जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक और 2023 का महिला आरक्षण विधेयक, दोनों पेश होने के दो दिन के भीतर पास हो गए। दोनों ही पहले दर्जे के संवैधानिक बदलाव थे।
प्रश्नकाल: जवाबदेही बस रस्म बनती हुई
| पैमाना, 17वीं लोकसभा | लोकसभा | राज्यसभा |
|---|---|---|
| प्रश्नकाल का इस्तेमाल | 60% | 52% |
| मौखिक उत्तर के लिए सूचीबद्ध प्रश्न जिनका जवाब सचमुच मिला | 24% | 31% |
2024 के शीतकालीन सत्र में हंगामे ने प्रश्नकाल को और घटा दिया, और कुछ हफ़्तों में दोनों सदन तय समय के 10 प्रतिशत से भी कम चले।
प्रश्नकाल ही वह एक नियमित तरीका है जिससे कोई सांसद किसी मंत्री को रिकॉर्ड पर जवाब देने के लिए मजबूर कर सकता है। इसका क्षरण कोई प्रक्रियागत असुविधा नहीं है; यह जवाबदेही के सबसे बड़े औज़ार की विदाई है।
निलंबन
| पैमाना | आँकड़ा |
|---|---|
| कुल निलंबन, 17वीं लोकसभा | 206 |
| अकेले शीतकालीन सत्र 2023 में निलंबन | 146 |
2023 के शीतकालीन सत्र में भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक निलंबन हुआ, और उसी सत्र में आपराधिक कानून सुधार वाले विधेयक, यानी भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, पूरी विपक्षी जाँच के बिना पास कर दिए गए।
व्यवस्था बनाए रखने के लिए निलंबन एक जायज़ अधिकार है। लेकिन ज़्यादातर विपक्ष को निलंबित करके देश की आपराधिक संहिताएँ पास कर देना अलग बात है, उकसावा चाहे जो भी रहा हो।
उत्पादकता के आँकड़े गुमराह क्यों करते हैं
| पैमाना | लोकसभा | राज्यसभा |
|---|---|---|
| कुल उत्पादकता, 17वीं लोकसभा | 88% | 73% |
| शीतकालीन सत्र 2024 | 52% | 39% |
उत्पादकता तय समय के मुकाबले इस्तेमाल हुए समय को नापती है। यह नहीं बताती कि उस समय में विचार-विमर्श हुआ या नहीं। जो सदन एक दोपहर में बीस विधेयक पास कर दे, उसका स्कोर अच्छा आएगा। इसके उलट 15वीं लोकसभा ने हंगामे में अपना 30 प्रतिशत से ज़्यादा समय गँवाया और स्कोर खराब रहा, जबकि बहस उसमें ज़्यादा हुई।
दोनों तरह की नाकामी, हंगामा और जल्दबाज़ी, खराब कानून बनाती हैं। उत्पादकता के आँकड़े में इनमें से सिर्फ़ एक दिखती है।
ईमानदार निदान
दो कहानियाँ आमने-सामने हैं। एक कहती है कि विपक्ष हंगामा करता है और संसद को चलने नहीं देता। दूसरी कहती है कि सरकार सत्र कम से कम रखती है और बिना जाँच के कानून बनाती है। आँकड़े दोनों का साथ देते हैं, और दोनों एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं: जिस विपक्ष के पास न समिति का रास्ता बचा है, न सवालों के जवाब, वह हंगामे तक पहुँचता है, और हंगामा फिर छोटे सत्रों को जायज़ ठहरा देता है।
यह एक दुष्चक्र है, और कोई भी पक्ष अकेले इससे बाहर नहीं निकल सकता। और यही सबसे बड़ा तर्क है ऐसे नियमों के लिए जो किसी पक्ष के संयम पर निर्भर न हों।
आगे का रास्ता
- बैठकों के न्यूनतम दिन तय हों, जैसा कई राज्य विधानसभाएँ और दूसरे लोकतंत्र करते हैं।
- समिति को भेजना डिफ़ॉल्ट बने, और अपवाद की स्थिति में कारण लिखित में दर्ज हों।
- प्रश्नकाल की रक्षा हो, इसे ऐसे समय पर रखा जाए कि हंगामा उसे न खा जाए, और जहाँ मौखिक उत्तर न मिलें वहाँ लिखित उत्तर अनिवार्य हों।
- विपक्ष को तय समय मिले, क्योंकि जिस विपक्ष के पास अपने निर्धारित दिन हों, उसे बिना तय दिन छीनने की ज़रूरत कम पड़ती है।
- उत्पादकता के साथ विचार-विमर्श के आँकड़े भी छपें, ताकि पैमाना काम की मात्रा नहीं, जाँच-परख दिखाए।
सामान्य प्रश्न
भारत की संसद हर साल कितने दिन बैठती है?
17वीं लोकसभा में करीब 55 दिन सालाना, जबकि पहली लोकसभा में यह लगभग 135 दिन और 14वीं में लगभग 70 दिन था। तुलना के लिए, ब्रिटेन की संसद साल में करीब 150 से 170 दिन बैठती है और US Congress लगभग 260 दिन।
17वीं लोकसभा में कितनी बैठकें हुईं?
पाँच साल में सिर्फ़ 274 बैठकें, जो पूरा कार्यकाल चलने वाली किसी भी लोकसभा में सबसे कम हैं। बैठकों के दिन कम होने का मतलब है सवाल, बहस और समिति के काम के मौके कम, इसीलिए यही आँकड़ा गिरावट के बाकी ज़्यादातर पैमानों की जड़ में है।
कितने विधेयक समितियों को भेजे गए?
17वीं लोकसभा में 16 प्रतिशत, जबकि 15वीं में 27 प्रतिशत और 14वीं में 71 प्रतिशत थे। 1993 में विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ बनने के बाद यह सबसे कम दर है।
विधेयक कितनी तेज़ी से पास होते हैं?
17वीं लोकसभा के 58 प्रतिशत विधेयक पेश होने के दो हफ़्ते के भीतर पास हो गए, और 35 प्रतिशत लोकसभा में एक घंटे से कम चर्चा में पास हुए, जबकि राज्यसभा में यह आँकड़ा 34 प्रतिशत रहा।
प्रश्नकाल का क्या हाल हुआ है?
17वीं लोकसभा के दौरान यह लोकसभा में तय समय के करीब 60 प्रतिशत और राज्यसभा में 52 प्रतिशत ही चला। मौखिक उत्तर के लिए सूचीबद्ध प्रश्नों में से लोकसभा में सिर्फ़ 24 प्रतिशत और राज्यसभा में 31 प्रतिशत का ही जवाब मिला।
17वीं लोकसभा में कितने सांसद निलंबित हुए?
कुल 206 निलंबन, जिनमें 2023 के शीतकालीन सत्र के 146 शामिल हैं, यानी भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक निलंबन। उसी सत्र में आपराधिक कानून सुधार वाले विधेयक, यानी BNS, BNSS और BSA, पूरे विपक्ष की मौजूदगी के बिना पास कर दिए गए।
उत्पादकता के आँकड़े गुमराह क्यों करते हैं?
क्योंकि उत्पादकता तय समय के मुकाबले इस्तेमाल हुआ समय नापती है, बहस की गुणवत्ता नहीं। 17वीं लोकसभा के कुल आँकड़े, लोकसभा के लिए 88 प्रतिशत और राज्यसभा के लिए 73 प्रतिशत, सत्र स्तर की गिरावट छिपा लेते हैं: 2024 के शीतकालीन सत्र में लोकसभा 52 प्रतिशत और राज्यसभा 39 प्रतिशत पर रही, और पहले हफ़्ते के ज़्यादातर दिनों में दोनों सदन 10 प्रतिशत से भी नीचे थे।
समिति को विधेयक भेजना क्यों मायने रखता है?
स्थायी समितियाँ विधेयक को खंड दर खंड जाँचती हैं, विशेषज्ञों और हितधारकों से राय लेती हैं और सदन की चकाचौंध से बाहर काम करती हैं, जिससे ऐतिहासिक रूप से दलों के बीच सहमति बनती रही है। जो विधेयक समिति को नहीं भेजा जाता, उसकी जाँच सिर्फ़ सदन के पटल पर होती है, और जब पटल का समय भी कम हो तो व्यावहारिक रूप से कोई जाँच नहीं होती।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
- 17वीं लोकसभा में पाँच साल में लगभग कितनी बैठकें हुईं?
(a) 274
(b) 412
(c) 560
(d) 701
उत्तर: (a) 274 बैठकें, जो पूरा कार्यकाल चलने वाली किसी भी लोकसभा में सबसे कम हैं। - समितियों को भेजे गए विधेयकों का अनुपात 14वीं लोकसभा के 71 प्रतिशत से घटकर 17वीं में कितना रह गया?
(a) 46 प्रतिशत
(b) 34 प्रतिशत
(c) 27 प्रतिशत
(d) 16 प्रतिशत
उत्तर: (d) 16 प्रतिशत, जो 1993 में DRSC बनने के बाद सबसे कम है। - विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ कब बनाई गईं?
(a) 1985
(b) 1993
(c) 2004
(d) 2014
उत्तर: (b) DRSC व्यवस्था 1993 से है और विधेयकों की विस्तृत जाँच का संसद के भीतर यही मुख्य तरीका है। - 2023 के शीतकालीन सत्र में कितने सांसद निलंबित हुए?
(a) 37
(b) 78
(c) 146
(d) 206
उत्तर: (c) उस एक सत्र में 146 सांसद निलंबित हुए, जो भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक निलंबन है; पूरी 17वीं लोकसभा में यह संख्या 206 रही। - संसदीय उत्पादकता, जैसा इसे आम तौर पर नापा जाता है, क्या दर्शाती है?
(a) बहस की गुणवत्ता
(b) तय समय के मुकाबले इस्तेमाल हुआ समय
(c) पास हुए विधेयकों की संख्या
(d) सदस्यों की उपस्थिति
उत्तर: (b) यह समय के इस्तेमाल का पैमाना है, इसीलिए ऊँची उत्पादकता और नाममात्र की बहस साथ-साथ चल सकती हैं।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- भारत की संसद बहस किए बिना कानून बनाती जा रही है। बैठकों, समिति को भेजे जाने और बहस के समय के आँकड़ों की मदद से इस दावे की परीक्षा कीजिए। (250 शब्द)
- विभाग संबंधित स्थायी समितियाँ सदन में सीमित समय की भरपाई के लिए बनाई गई थीं। उन्हें विधेयक कम भेजे जाने के नतीजों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
- प्रश्नकाल कार्यपालिका की जवाबदेही का मुख्य औज़ार है। इसकी मौजूदा हालत का मूल्यांकन कीजिए और सुधार सुझाइए। (150 शब्द)
- सदस्यों का सामूहिक निलंबन संसदीय विशेषाधिकार के इस्तेमाल पर सवाल खड़े करता है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150 शब्द)
- क्या भारत में संसद की बैठकों के न्यूनतम दिन कानूनन तय होने चाहिए? कारण सहित उत्तर दीजिए। (250 शब्द)