श्रिंकफ्लेशन: छिपी हुई महंगाई, इकाई बिक्री मूल्य और CPI में इसकी गिनती
श्रिंकफ्लेशन का अर्थ, छोटे पैक का गणित, BLS, ONS और भारत का सांख्यिकी मंत्रालय इसे कैसे मापते हैं, भारत का इकाई बिक्री मूल्य नियम और स्किम्पफ्लेशन।
श्रिंकफ्लेशन वह स्थिति है जब किसी सामान का पैक छोटा हो जाता है, लेकिन उसकी कीमत वही रहती है या बढ़ जाती है। बिस्कुट के कुछ ग्राम कम, रोल पर कुछ शीट कम, बोतल में थोड़ा कम तेल, और लेबल पर दाम वही। दुकान की शेल्फ पर दाम नहीं हिलता, लेकिन हर ग्राम का दाम बढ़ जाता है। इसीलिए इसे छिपी हुई महंगाई कहा जाता है। यह शब्द अक्सर ब्रिटिश अर्थशास्त्री पिप्पा माल्मग्रेन के नाम से जोड़ा जाता है। इसका असर किराने की दुकान से कहीं आगे जाता है, क्योंकि यह इस सवाल से जुड़ा है कि कोई देश मुद्रास्फीति कैसे मापता है और खरीदार को कानूनन क्या जानने का हक है।
ज्यादातर पाठकों के मन में इसे लेकर दो गलत धारणाएँ होती हैं। पहली, कि श्रिंकफ्लेशन सरकारी मुद्रास्फीति के आंकड़ों से पूरी तरह बच निकलता है। दूसरी, कि यह गैरकानूनी है। दोनों बातें सही नहीं हैं। सांख्यिकी एजेंसियाँ छोटे पैक को कीमत बढ़ने के रूप में गिनने की कोशिश करती हैं। और भारत में छोटा पैक तब तक कानूनी है, जब तक लेबल उसकी शुद्ध मात्रा के बारे में सच बताता है। असल में श्रिंकफ्लेशन कीमत की बढ़ोतरी को खरीदार की नजर से छिपाता है। लेबल से जुड़े नियम इसी समस्या को हल करने के लिए बने हैं।
श्रिंकफ्लेशन क्या है?
श्रिंकफ्लेशन किसी सामान की प्रति इकाई कीमत में बढ़ोतरी है। यह बढ़ोतरी स्टिकर पर दाम बढ़ाकर नहीं, बल्कि पैक में मात्रा घटाकर की जाती है। यह शब्द “shrink” (सिकुड़ना) और “inflation” (मुद्रास्फीति) को जोड़कर बना है। इसका करीबी रिश्तेदार स्किम्पफ्लेशन है, जिसमें मात्रा वही रहती है, लेकिन गुणवत्ता घटा दी जाती है। नीचे की तालिका में जरूरी बातें एक जगह दी गई हैं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| अर्थ | उसी या ज्यादा कीमत पर कम मात्रा, जिससे प्रति इकाई कीमत बढ़ जाती है |
| शब्द की उत्पत्ति | अक्सर पिप्पा माल्मग्रेन को श्रेय दिया जाता है; ब्रायन डोमिट्रोविच ने अपनी 2009 की किताब इकोनोक्लास्ट्स (Econoclasts) में यह शब्द एक अलग, पूरी अर्थव्यवस्था वाले अर्थ में इस्तेमाल किया था |
| संबंधित शब्द | स्किम्पफ्लेशन: उसी कीमत पर घटी हुई गुणवत्ता या सेवा; यह नाम NPR के प्लैनेट मनी ने अक्टूबर 2021 में दिया |
| भारत का लेबल नियम | विधिक माप विज्ञान (पैकबंद वस्तुएँ) नियम, 2011 के तहत 1 अप्रैल 2022 से पहले से पैक खुदरा सामान पर इकाई बिक्री मूल्य अनिवार्य |
| मानक पैक आकार | नियम 5 और अनुसूची II, जो सूचीबद्ध सामानों के पैक आकार तय करते थे, 1 अप्रैल 2022 से हटा दिए गए |
| उपभोक्ता कानून | उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019: धारा 2(9) में मात्रा के बारे में सूचना पाने का अधिकार; धारा 2(47) में अनुचित व्यापार व्यवहार |
| अमेरिका इसे कैसे गिनता है | श्रम सांख्यिकी ब्यूरो: प्रति औंस प्रभावी कीमत, यानी दर्ज की गई कीमत को आकार से भाग देने पर मिलने वाली संख्या |
| अमेरिका में मापा गया असर | 2015-2019 के दौरान सभी वस्तुओं वाले सूचकांक पर हर साल करीब 0.01% (BLS); दिसंबर 2019 से दिसंबर 2024 तक की 34.5% बढ़ोतरी में 0.06 प्रतिशत अंक (GAO) |
| फ्रांस का नियम | 1 जुलाई 2024 से 400 वर्ग मीटर से बड़े स्टोरों को छोटे किए गए सामान के पास दो महीने तक एक नोटिस लगाना होता है |
श्रिंकफ्लेशन काम कैसे करता है
श्रिंकफ्लेशन कीमत के बदलाव को उस आंकड़े से हटा देता है जिसे खरीदार देखता है। फिर वह इस बदलाव को उस आंकड़े में डाल देता है जिसे खरीदार शायद ही कभी जाँचता है। पैक के सामने छपा रुपये वाला दाम वही रहता है। छोटे अक्षरों में छपी मात्रा घट जाती है। इसलिए वजन, आयतन या गिनती की हर इकाई की कीमत बढ़ जाती है, भले ही आम अर्थ में किसी ने “दाम बढ़ाया” न हो।
इसे ठोस आंकड़ों में देखिए। बिस्कुट का एक पैक 100 ग्राम के 20 रुपये में बिकता है, यानी 0.20 रुपये प्रति ग्राम। कंपनी पैक को घटाकर 90 ग्राम कर देती है और दाम 20 रुपये ही रखती है। अब कीमत है 20 रुपये भाग 90, यानी करीब 0.222 रुपये प्रति ग्राम।
तो कीमत कितनी बढ़ी? अगर आपने 10% कहा, तो आप अकेले नहीं हैं, और आप गलत भी हैं। मात्रा 10% घटी, लेकिन प्रति ग्राम कीमत करीब 11.1% बढ़ी, क्योंकि 0.222 को 0.20 से भाग देने पर 1.111 आता है। कटौती जितनी गहरी, फर्क उतना बड़ा। उसी दाम पर पाँचवाँ हिस्सा छोटा किया गया पैक 25% महंगा होता है, 20% नहीं। यही छोटा-सा गणित वह पूरी वजह है जिसके कारण आगे बताए गए नियम पैक की कीमत के बजाय प्रति इकाई कीमत पर ध्यान देते हैं।
श्रिंकफ्लेशन के कुछ आम रूप हैं, जैसे:
- कम वजन या छोटा आयतन, जैसे 1 किलो का बैग 900 ग्राम का हो जाना, या 1 लीटर की बोतल 900 मिलीलीटर की हो जाना;
- कम टुकड़े, जैसे रोल पर कम शीट या पैक में कम बिस्कुट;
- नए डिजाइन वाला पैक, जो शेल्फ पर उतना ही बड़ा दिखता है, लेकिन उसमें सामान कम होता है।
कंपनियाँ छोटा पैक क्यों चुनती हैं
जब लागत बढ़ती है और कंपनियाँ दाम को छूना नहीं चाहतीं, तब वे छोटे पैक का सहारा लेती हैं। अमेरिका का श्रम सांख्यिकी ब्यूरो (Bureau of Labor Statistics, BLS) इसकी वजह साफ शब्दों में बताता है। निर्माता पैक का आकार इसलिए बदलते हैं, क्योंकि बाजार के शोध के मुताबिक उपभोक्ता आकार के बदलाव से ज्यादा कीमत के बदलाव पर प्रतिक्रिया करते हैं। जब कच्चे माल की लागत बढ़ती है, तो कंपनी के पास दो रास्ते होते हैं: सूची कीमत बढ़ाए, या उसी कीमत पर कम सामान दे। दूसरे रास्ते पर आम तौर पर कम शिकायतें आती हैं।
गोल दाम इस चुनाव को और तीखा बना देता है। कोई नमकीन अगर 10 रुपये जैसे जाने-पहचाने दाम पर बिकता है, तो खरीदार खोए बिना उसका दाम बदलना मुश्किल हो जाता है। इसलिए दाम की जगह मात्रा बदल दी जाती है। कुछ अर्थशास्त्री इसे कीमत को लेकर संवेदनशील खरीदारों तक लागत पहुँचाने का एक समझदारी भरा तरीका मानते हैं। उपभोक्ता संगठन इसे ऐसी मूल्य वृद्धि मानते हैं, जिसे नजर से बचाने के लिए भेस बदलकर पेश किया गया है। दोनों नजरिये एक ही काम का वर्णन करते हैं। फर्क बस इतना है कि खरीदार को बताया गया या नहीं।
श्रिंकफ्लेशन बनाम स्किम्पफ्लेशन
दोनों शब्द एक ही दबाव को अलग-अलग रास्तों से बताते हैं। श्रिंकफ्लेशन मात्रा घटाता है, और स्किम्पफ्लेशन गुणवत्ता। NPR के प्लैनेट मनी ने 26 अक्टूबर 2021 के एक न्यूजलेटर में स्किम्पफ्लेशन शब्द सुझाया। यह न्यूजलेटर ग्रेग रोसाल्स्की ने लिखा था। शब्द उन मामलों के लिए था, जहाँ कंपनियाँ दाम बढ़ाने के बजाय अपने सामान और सेवाओं में कंजूसी करने लगती हैं। सेंट लुइस फेड के उदाहरणों में ये शामिल हैं:
- नुस्खे में सस्ती सामग्री डाल देना;
- होटलों में कमरों की सफाई कम बार होना;
- कर्मचारियों वाले काउंटर की जगह सेल्फ-चेकआउट आ जाना।
मापने के काम में यह फर्क बहुत मायने रखता है। छोटे पैक के लेबल पर एक संख्या बची रहती है, जिससे सांख्यिकीविद भाग दे सकता है। पतला तौलिया या धीमी सेवा ऐसी कोई संख्या नहीं छोड़ती। इसीलिए स्किम्पफ्लेशन को गिनना श्रिंकफ्लेशन से कहीं ज्यादा मुश्किल है।
सांख्यिकी एजेंसियाँ श्रिंकफ्लेशन को कैसे मापती हैं
सांख्यिकी एजेंसियाँ एक ही मात्रा की कीमतों की तुलना करके श्रिंकफ्लेशन मापती हैं। इसलिए बिना बदले दाम वाला छोटा पैक कीमत बढ़ने के रूप में दिखता है। तरीका हर देश में अलग है। यह भी अलग है कि कौन-सी एजेंसी इसे कितना खुलकर बताती है।
अमेरिका और ब्रिटेन
BLS हर दर्ज की गई कीमत को प्रति मानक इकाई प्रभावी कीमत में बदलता है, जो आम तौर पर प्रति औंस कीमत होती है। फरवरी 2023 के उसके व्याख्या-लेख के मुताबिक, प्रति औंस प्रभावी कीमत दर्ज कीमत को आकार से भाग देकर निकलती है। उसी का उदाहरण लीजिए। 64 औंस की आइसक्रीम 5.99 डॉलर में मिलती थी, फिर 5.99 डॉलर में 60 औंस मिलने लगी। सूचकांक में यह 6.7% की मूल्य वृद्धि के रूप में दर्ज होती है। सेंट लुइस फेड इसे एक वाक्य में कहता है: BLS श्रिंकफ्लेशन को कीमत में बढ़ोतरी मानता है।
ब्रिटेन का राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (Office for National Statistics, ONS) भी मिलता-जुलता रास्ता अपनाता है। जब उसके मूल्य विश्लेषक वजन में बदलाव के लिए गुणवत्ता समायोजन करते हैं, तो वे एक नई आधार कीमत तय (impute) करते हैं। इसके लिए वे कीमत जुटाने वालों की रिपोर्ट का सहारा लेते हैं। ONS ने जनवरी 2012 से जून 2017 की अवधि पर जुलाई 2017 के अपने अध्ययन में इसका असर मापा, और फिर जनवरी 2019 के एक अपडेट में भी:
- समायोजित और बिना समायोजन वाले CPIH के बीच का फर्क करीब 0.03 प्रतिशत अंक था;
- एक वर्ग में असर साफ दिखा, यानी चीनी, जैम, सिरप, चॉकलेट और कन्फेक्शनरी वाले वर्ग में;
- यह वर्ग टोकरी का सिर्फ करीब 1% है, इसलिए कुल आंकड़ा लगभग नहीं हिला;
- 2019 के अपडेट के नमूने में 206 उत्पाद छोटे हुए और 79 बड़े हुए।
भारत और MoSPI का तरीका
भारत का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) MoSPI के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) तैयार करता है। सूचकांक बनाने पर उसका तकनीकी नोट पैक के आकार का अलग से जिक्र नहीं करता। वह वस्तु के विनिर्देश (specification) में बदलाव को आधार कीमत में संशोधन करके संभालता है। इसका सूत्र यह है: नए विनिर्देश की पिछले महीने की कीमत को पुराने विनिर्देश की पिछले महीने की कीमत से भाग दीजिए, फिर उसे पुरानी आधार कीमत से गुणा कीजिए। जो संख्या आती है, वही नई आधार कीमत है।
इस सूत्र को लिंकिंग (linking) कहते हैं। इस पर एक पल रुकना जरूरी है, क्योंकि यहाँ लगभग हर कोई उलझ जाता है। लिंकिंग पुराने और नए संस्करण के बीच के फर्क को वस्तु का फर्क मानती है, उसकी कीमत का बदलाव नहीं। तो छोटा पैक मुद्रास्फीति में दिखेगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि कीमत जुटाने वाला उसे कैसे दर्ज करता है: नई मात्रा वाली उसी वस्तु के रूप में, या एक नए विनिर्देश के रूप में। NSO का नोट यह साफ नहीं करता कि छोटे किए गए पैक पर कौन-सा तरीका लागू होता है। इसलिए अगर कोई दावा करे कि भारत का सूचकांक हर छोटे हुए बिस्कुट पैक को ठीक-ठीक कैसे गिनता है, तो वह दावा प्रकाशित तरीके की कही बात से आगे चला जाता है। 2024 की सीरीज में यह भी जोड़ा गया है कि तुलना बनी रहे, इसके लिए वस्तुओं के साफ विनिर्देश और कीमत जुटाने के तय प्रोटोकॉल अपनाए जाते हैं। इस समस्या को ठीक इसी सुरक्षा की जरूरत है।
भारत के नियम जो श्रिंकफ्लेशन को दिखने लायक बनाते हैं
भारत छोटे पैक पर पाबंदी नहीं लगाता। वह बस यह माँगता है कि पैक बताए कि अंदर क्या है और उसकी प्रति इकाई कीमत कितनी है। इससे खरीदार वह भाग खुद लगा सकता है, जिसके छूट जाने की उम्मीद कंपनी करती है। ये नियम विधिक माप विज्ञान अधिनियम, 2009 और विधिक माप विज्ञान (पैकबंद वस्तुएँ) नियम, 2011 के तहत आते हैं। इन्हें उपभोक्ता मामले विभाग लागू करता है।
पहले से पैक हर खुदरा सामान पर कुछ घोषणाएँ छपी होनी चाहिए, जैसे:
- वजन, माप या गिनती की मानक इकाइयों में शुद्ध मात्रा;
- भारतीय मुद्रा में, सभी करों समेत, खुदरा बिक्री मूल्य;
- बनने का महीना और साल;
- 1 अप्रैल 2022 से, इकाई बिक्री मूल्य, यानी माप की प्रति इकाई कीमत।
श्रिंकफ्लेशन के लिहाज से सबसे अहम बदलाव एक संशोधन से आया। इसकी घोषणा PIB ने 8 नवंबर 2021 को की, और यह 1 अप्रैल 2022 से लागू हुआ। इसने एक साथ दो काम किए:
- पहले से पैक, खुदरा बिक्री वाले सभी सामानों पर इकाई बिक्री मूल्य लागू किया, ताकि खरीदार खरीदते समय कीमतों की आसानी से तुलना कर सकें;
- नियम 5 और अनुसूची II हटा दिए, जो सूचीबद्ध सामानों के मानक पैक आकार तय करते थे।
इन दोनों बदलावों को साथ पढ़िए, तो तर्क साफ हो जाता है। तय पैक आकार हटने से कंपनी 1 किलो की जगह 900 ग्राम बेचने के लिए आजाद है। पैक पर इकाई बिक्री मूल्य छपा होने से खरीदार देख सकता है कि नया पैक प्रति किलो ज्यादा महंगा है। नियमों ने सख्ती छोड़कर पारदर्शिता अपनाई। भारत के तरीके के पीछे यही पूरा विचार है।
उपभोक्ता कानून कहाँ आता है
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 वे अधिकार तय करता है, जिनके लिए ये लेबल काम करते हैं। धारा 2(9) में उपभोक्ता का सूचना पाने का अधिकार दर्ज है, यानी सामान की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, मानक और कीमत के बारे में जानने का हक। सच्चे लेबल वाला छोटा पैक इनमें से किसी का उल्लंघन नहीं करता। रेखा तब पार होती है, जब मात्रा को गलत तरीके से पेश किया जाए, जैसे:
- धारा 2(47) के तहत, ऐसा बयान जो सामान को किसी खास मात्रा का झूठा बताए, अनुचित व्यापार व्यवहार है;
- धारा 2(28) के तहत, ऐसा विज्ञापन जो उत्पाद की मात्रा को लेकर उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकता हो, भ्रामक विज्ञापन है;
- जो पैक 100 ग्राम बताए, लेकिन उसमें कम सामान हो, वह विधिक माप विज्ञान नियमों के तहत कम मात्रा (short quantity) का मामला है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम वाले नोट में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की बात है, जो अनुचित व्यापार व्यवहार और भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई करता है। उसके हाल के आदेश, जैसे रेस्तराँ में डिफॉल्ट सर्विस चार्ज वाला आदेश, दिखाते हैं कि वह छिपी लागत वाले किस तरह के तरीकों पर कार्रवाई करने को तैयार है।
दूसरे देशों ने क्या किया है
दूसरे देश इकाई मूल्य से आगे गए हैं। ज्यादातर ने यह जरूरी किया है कि पैक छोटा होने पर नोटिस दिया जाए। अमेरिका के सरकारी जवाबदेही कार्यालय (Government Accountability Office, GAO) के 2025 के एक अध्ययन ने मुख्य तरीकों को एक जगह जुटाया। ये सब 2024 या उसके बाद के हैं, और इनमें से कोई भी पैक छोटा करने पर सीधी पाबंदी नहीं लगाता:
- फ्रांस: 16 अप्रैल 2024 का एक आदेश, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है, 400 वर्ग मीटर से बड़े बिक्री क्षेत्र वाले स्टोरों से कहता है कि जिस उत्पाद की मात्रा घटी और प्रति इकाई कीमत बढ़ी, उसके पास नोटिस लगाएँ। नोटिस में पुरानी मात्रा, नई मात्रा और बढ़ोतरी लिखी होती है। यह नोटिस दो महीने तक लगा रहता है;
- दक्षिण कोरिया: अगस्त 2024 से, तय किए गए घरेलू सामानों के निर्माताओं को 5% से ज्यादा कटौती होने पर उपभोक्ताओं को बताना होता है;
- अमेरिका: 16 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया में इकाई मूल्य के कानून हैं। GAO के रिकॉर्ड के मुताबिक, धोखे से पैक छोटा करने पर रोक लगाने वाले बिल पेश तो हुए हैं, लेकिन कानून नहीं बने।
भारत से यह तुलना याद रखने लायक है। फ्रांस खरीदार को बताता है कि पैक छोटा हो गया। भारत खरीदार को प्रति इकाई कीमत देता है और तुलना उसी पर छोड़ देता है। इस नोट के लिए जाँचे गए नियमों में भारत में छोटे किए गए पैक के लिए फ्रांस जैसे नोटिस का कोई प्रावधान नहीं है।
मुद्रास्फीति के लिए श्रिंकफ्लेशन क्यों मायने रखता है
श्रिंकफ्लेशन इसलिए मायने रखता है, क्योंकि यह लोगों की महसूस की गई मुद्रास्फीति को सूचकांक में दर्ज मुद्रास्फीति से अलग कर देता है। ऐसा तब भी होता है, जब सूचकांक ठीक काम कर रहा हो। कुल मुद्रास्फीति पर इसका मापा गया असर छोटा है। लेकिन खास वस्तुओं पर और लोगों के भरोसे पर इसका असर छोटा नहीं है।
आंकड़े दोनों पहलू दिखाते हैं। BLS ने पाया कि 2015-2019 के दौरान पैक छोटे होने से उसके सभी वस्तुओं वाले सूचकांक में हर साल करीब 0.01% जुड़ा। GAO ने दिसंबर 2019 से दिसंबर 2024 तक अमेरिका में कीमतों की 34.5% बढ़ोतरी में इसका हिस्सा 0.06 प्रतिशत अंक आंका। छोटी श्रेणियों के भीतर असर बड़ा है। BLS ने बेबी फूड में पाँच साल में +2.81% दर्ज किया, और ONS को कन्फेक्शनरी में साफ असर दिखा। तो कुल मुद्रास्फीति पर लगभग कोई असर नहीं पड़ता, जबकि जिस परिवार की टोकरी इन्हीं चीजों पर टिकी है, उसे असली चुभन महसूस होती है।
यहीं यह विषय आसपास की अवधारणाओं से जुड़ता है:
- मुद्रास्फीति: श्रिंकफ्लेशन प्रति इकाई मापी गई मुद्रास्फीति ही है, कोई अलग घटना नहीं;
- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक: सूचकांक उतना ही अच्छा है, जितनी अच्छी तरह वह वस्तुओं के बदलाव को संभालता है, इसीलिए विनिर्देश के नियम मायने रखते हैं;
- मौद्रिक नीति समिति: MPC का लक्ष्य CPI मुद्रास्फीति है, इसलिए अगर सूचकांक से मात्रा में कटौती छूट जाए, तो समिति जिस दर को साध रही है, वह असल से कम दिखेगी;
- थोक मूल्य सूचकांक: उत्पादकों की लागत में बढ़ोतरी अक्सर पहले यहीं दिखती है, उससे पहले कि कंपनियाँ खुदरा स्तर पर दाम बदलने या पैक का आकार बदलने का फैसला करें।
आलोचना दोनों तरफ जाती है। आलोचक कहते हैं कि श्रिंकफ्लेशन खरीदार की बेध्यानी पर टिका है और भरोसा घटाता है, क्योंकि खरीदार को तभी पता चलता है जब पैक जल्दी खत्म हो जाता है। समर्थक कहते हैं कि यह बढ़ती लागत का कानूनी जवाब है, और लेबल पर छपा इकाई मूल्य सावधान खरीदार से कुछ नहीं छिपाता। सही राय बीच में है। लेबल सच्चा हो तो श्रिंकफ्लेशन धोखाधड़ी नहीं है, लेकिन यह इसी भरोसे पर चलता है कि खरीदार लेबल नहीं पढ़ेगा। इसलिए नियामक सही हैं कि वे इकाई मूल्य को ऐसा बनाएँ कि वह नजर से छूटे नहीं।
आज भारत में श्रिंकफ्लेशन
भारत में श्रिंकफ्लेशन कानूनी है और लेबल के जरिए दिखता है, और 2026 में इसे मापने का तरीका बदला। 12 फरवरी 2026 को MoSPI ने आधार 2024=100 पर पहला CPI जारी किया, जिसके भार घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 से लिए गए हैं। नई सीरीज पहले की 299 के मुकाबले 358 भार वाली वस्तुओं पर नजर रखती है। इसमें 25 लाख से ज्यादा आबादी वाले 12 शहरों से ई-कॉमर्स कीमतें जोड़ी गई हैं। कीमतें जुटाने का काम भी मानक विनिर्देशों के साथ हैंडहेल्ड उपकरणों पर ले जाया गया है। नई CPI सीरीज वाला नोट टोकरी के बदलावों को विस्तार से बताता है।
लेबल की तरफ, पैकबंद वस्तुओं के नियमों में संशोधन होते रहते हैं। PIB के मुताबिक ताजा बदलाव 29 अक्टूबर 2025 को अधिसूचित हुआ। यह चिकित्सा उपकरणों के पैक पर घोषणाओं को चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 के अनुरूप करता है, और इकाई बिक्री मूल्य को नहीं छूता। अमल का तरीका भी जुर्माने से पहले सुधार की ओर बढ़ा है, क्योंकि पहली बार की प्रक्रिया वाली चूकों के लिए अब सुधार नोटिस व्यवस्था है। इस व्यवस्था पर नजर रखनी होगी। सुधार का मौका लेबल में छूटे किसी खाने के लिए ठीक है, उस पैक के लिए नहीं जिसमें घोषित मात्रा से कम सामान हो।
आधिकारिक दस्तावेज मूल स्रोत पर पढ़ने लायक हैं। 8 नवंबर 2021 की PIB विज्ञप्ति इकाई बिक्री मूल्य वाले बदलाव को दर्ज करती है, और 12 फरवरी 2026 की MoSPI विज्ञप्ति नए CPI का तरीका बताती है।
परीक्षा के लिए श्रिंकफ्लेशन कैसे पढ़ें
GS पेपर III में श्रिंकफ्लेशन मुद्रास्फीति और उसके मापन वाले हिस्से में आता है। GS पेपर II में यह उपभोक्ता संरक्षण और नियामक शासन के तहत आता है। इसके नाम से सवाल कम ही पूछा जाता है। इसकी परीक्षा आसपास के विचारों के जरिए होती है: मुद्रास्फीति कैसे मापी जाती है, मापी गई दर महसूस की गई दर से अलग क्यों हो सकती है, और राज्य खरीदारों की रक्षा कैसे करता है।
मुख्य परीक्षा 2019 के GS पेपर III में पूछा गया था, “क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि स्थिर GDP वृद्धि और कम मुद्रास्फीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अच्छी हालत में रखा है? अपने तर्कों के समर्थन में कारण दीजिए।” छिपी मूल्य वृद्धि पर एक पंक्ति, और सूचकांक के तरीके उसे कैसे संभालते हैं इस पर एक पंक्ति, ठीक ऐसे ही उत्तर को मजबूत बनाती है। Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 1,403 प्रश्नों में से 256 भारतीय अर्थव्यवस्था के हैं, और उसके भीतर कीमतों का मापन लगातार आने वाला विषय है।
इन तथ्यों को तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न आ जाएँ:
- उसी दाम पर मात्रा में 10% कटौती का मतलब है प्रति इकाई कीमत में 11.1% बढ़ोतरी;
- 1 अप्रैल 2022 से पहले से पैक खुदरा सामान पर इकाई बिक्री मूल्य अनिवार्य हुआ;
- उसी संशोधन ने नियम 5 और अनुसूची II, यानी मानक पैक आकार, हटा दिए;
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(9) में मात्रा के बारे में सूचना पाने का अधिकार दर्ज है;
- BLS दर्ज कीमत को आकार से भाग देकर प्रति औंस कीमत निकालता है;
- फ्रांस का शेल्फ नोटिस नियम 1 जुलाई 2024 से लागू है;
- भारत का CPI फरवरी 2026 से आधार 2024=100 पर आ गया।
तीन भ्रम नंबर कटवाते हैं। पहला, श्रिंकफ्लेशन को गैरकानूनी मानना। अगर लेबल सच्चा है, तो यह गैरकानूनी नहीं है। दूसरा, स्किम्पफ्लेशन को इसका पर्यायवाची मानना। मात्रा और गुणवत्ता अलग-अलग रास्ते हैं, और सिर्फ मात्रा को आसानी से मापा जा सकता है। तीसरा, यह कहना कि सरकारी मुद्रास्फीति श्रिंकफ्लेशन को पूरी तरह छोड़ देती है। एजेंसियाँ इसके लिए समायोजन करती हैं, और कुल स्तर पर मापा गया असर छोटा है।
| शब्द | क्या बदलता है | लेबल पर कीमत | मापना आसान? |
|---|---|---|---|
| मुद्रास्फीति | सामान्य मूल्य स्तर बढ़ता है | बढ़ती है | हाँ, मूल्य सूचकांकों के जरिए |
| श्रिंकफ्लेशन | मात्रा घटती है | वही या ज्यादा | हाँ, प्रति इकाई कीमत के जरिए |
| स्किम्पफ्लेशन | गुणवत्ता या सेवा घटती है | वही या ज्यादा | मुश्किल, भाग देने के लिए कोई संख्या नहीं होती |
| स्टैगफ्लेशन | कमजोर वृद्धि और कम रोजगार के साथ ऊँची मुद्रास्फीति | बढ़ती है | हाँ, पूरी अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के जरिए |
आपकी तैयारी के लिए श्रिंकफ्लेशन एक छोटा विषय है, जो दिखाता है कि आप एक बड़े विषय को कितनी अच्छी तरह समझते हैं। जो उत्तर प्रति इकाई का गणित कर सके, 2022 के इकाई बिक्री मूल्य नियम का हवाला दे सके, और समझा सके कि कुल मुद्रास्फीति लगभग क्यों नहीं हिलती, वह सच्ची समझ वाला उत्तर लगेगा। इसे अलग तथ्य की तरह रटने के बजाय मुद्रास्फीति और उपभोक्ता अधिकारों वाले उत्तरों में उदाहरण की तरह इस्तेमाल कीजिए।
सामान्य प्रश्न
आसान शब्दों में श्रिंकफ्लेशन क्या है?
श्रिंकफ्लेशन तब होता है, जब कोई सामान छोटा हो जाता है, लेकिन उसका दाम वही रहता है या बढ़ जाता है। आप उतने ही पैसे में कम ग्राम, कम मिलीलीटर या कम टुकड़े पाते हैं, इसलिए प्रति इकाई कीमत बढ़ जाती है। यह ऐसी मूल्य वृद्धि है, जो कीमत के टैग पर नहीं दिखती।
श्रिंकफ्लेशन शब्द किसने गढ़ा?
ब्रिटिश अर्थशास्त्री पिप्पा माल्मग्रेन को अक्सर आज के अर्थ में श्रिंकफ्लेशन शब्द गढ़ने का श्रेय दिया जाता है। मेरियम-वेबस्टर बताता है कि इतिहासकार ब्रायन डोमिट्रोविच ने इससे पहले, अपनी 2009 की किताब इकोनोक्लास्ट्स में, यह शब्द इस्तेमाल किया था। उन्होंने इसे ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए लिखा था, जो सिकुड़ रही थी और जिसमें कीमतें बढ़ रही थीं। आज पैक के आकार वाला जो अर्थ चलन में है, वह माल्मग्रेन से जुड़ा है।
श्रिंकफ्लेशन और स्किम्पफ्लेशन में क्या अंतर है?
श्रिंकफ्लेशन उसी कीमत पर सामान की मात्रा घटाता है, जबकि स्किम्पफ्लेशन उसकी गुणवत्ता या उसके साथ मिलने वाली सेवा घटाता है। छोटा बिस्कुट पैक श्रिंकफ्लेशन है। सस्ती सामग्री या होटल के कमरे की कम सफाई स्किम्पफ्लेशन है। श्रिंकफ्लेशन को मापना आसान है, क्योंकि लेबल नई मात्रा बता देता है।
क्या भारत में श्रिंकफ्लेशन गैरकानूनी है?
नहीं, जब तक पैक अपनी शुद्ध मात्रा और कीमत सच-सच बताता है, भारत में श्रिंकफ्लेशन गैरकानूनी नहीं है। विधिक माप विज्ञान (पैकबंद वस्तुएँ) नियम, 2011 पहले से पैक सामान पर शुद्ध मात्रा, खुदरा बिक्री मूल्य और इकाई बिक्री मूल्य छापना जरूरी करते हैं। लेकिन मात्रा का झूठा दावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार हो सकता है।
पैकेट पर इकाई बिक्री मूल्य क्या होता है?
इकाई बिक्री मूल्य माप की प्रति इकाई कीमत है, जैसे प्रति ग्राम, प्रति किलो, प्रति मिलीलीटर या प्रति टुकड़ा। भारत में 1 अप्रैल 2022 से यह पहले से पैक खुदरा सामान पर अनिवार्य है। इससे खरीदार अलग-अलग आकार के दो पैक की तुलना कर सकता है, और श्रिंकफ्लेशन पकड़ने का यही सबसे आसान तरीका है।
क्या श्रिंकफ्लेशन का असर मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर पड़ता है?
हाँ, सांख्यिकी एजेंसियाँ उसी दाम वाले छोटे पैक को कीमत बढ़ने के रूप में गिनने की कोशिश करती हैं। अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो कीमत को आकार से भाग देकर प्रति इकाई कीमत निकालता है। ब्रिटेन का राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय वजन के बदलाव के लिए आधार कीमत को समायोजित करता है। दोनों के अध्ययनों में कुल मुद्रास्फीति पर असर बहुत छोटा निकला, हालाँकि खाने-पीने की कुछ श्रेणियों में यह बड़ा था।
उपभोक्ता श्रिंकफ्लेशन को कैसे पहचानें?
उपभोक्ता पैक की कीमत के बजाय शुद्ध मात्रा और इकाई बिक्री मूल्य देखकर श्रिंकफ्लेशन पहचान सकता है। अगर उसी दाम वाले उसी सामान पर अब कम शुद्ध मात्रा लिखी है, तो प्रति इकाई कीमत बढ़ चुकी है। अलग-अलग ब्रांड और पैक आकारों में इकाई बिक्री मूल्य की तुलना करने से पता चलता है कि कौन-सा विकल्प सस्ता है।
फ्रांस ने श्रिंकफ्लेशन पर क्या किया है?
फ्रांस बड़े स्टोरों से कहता है कि वे छोटे किए गए उत्पादों के बारे में खरीदारों को आगाह करें। 16 अप्रैल 2024 के एक आदेश के तहत, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है, 400 वर्ग मीटर से बड़े स्टोरों को ऐसे उत्पाद के पास दो महीने तक नोटिस लगाना होता है। नोटिस में पुरानी मात्रा, नई मात्रा और प्रति इकाई कीमत में हुई बढ़ोतरी लिखी होती है।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. श्रिंकफ्लेशन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह किसी उत्पाद की गुणवत्ता में गिरावट को कहते हैं, जबकि उसकी कीमत वही रहती है। 2. पैक की कीमत न बदलने पर भी यह उत्पाद की प्रति इकाई कीमत बढ़ा देता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b) उसी कीमत पर गुणवत्ता में गिरावट स्किम्पफ्लेशन है। श्रिंकफ्लेशन मात्रा घटाता है, जिससे प्रति इकाई कीमत बढ़ती है।
2. 1 अप्रैल 2022 से प्रभावी संशोधन के बाद विधिक माप विज्ञान (पैकबंद वस्तुएँ) नियम, 2011 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. खुदरा बिक्री के लिए पहले से पैक वस्तुओं पर इकाई बिक्री मूल्य घोषित करना होगा। 2. सूचीबद्ध वस्तुओं के मानक पैक आकार तय करने वाली अनुसूची II हटा दी गई। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) 8 नवंबर 2021 को घोषित संशोधन ने इकाई बिक्री मूल्य लागू किया। साथ ही उसने नियम 5 और अनुसूची II हटा दिए। दोनों बदलाव 1 अप्रैल 2022 से लागू हुए।
3. डिटर्जेंट का एक पैक 1 किलो के 100 रुपये में बिकता है। उसे उसी दाम पर घटाकर 800 ग्राम कर दिया जाता है। प्रति किलो कीमत कितने प्रतिशत बढ़ी है?
- (a) 20%
- (b) 25%
- (c) 80%
- (d) 12.5%
उत्तर: (b) नई कीमत 0.8 किलो के 100 रुपये है, यानी 125 रुपये प्रति किलो। यह 100 रुपये प्रति किलो से 25% ज्यादा है।
4. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत, सामान की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, मानक और कीमत के बारे में सूचना पाने का उपभोक्ता का अधिकार किस प्रावधान में दर्ज है?
- (a) धारा 2(9)
- (b) धारा 2(28)
- (c) धारा 2(47)
- (d) धारा 10
उत्तर: (a) धारा 2(9) उपभोक्ता अधिकारों को परिभाषित करती है, जिनमें सूचना पाने का अधिकार शामिल है। धारा 2(28) भ्रामक विज्ञापन को परिभाषित करती है, और 2(47) अनुचित व्यापार व्यवहार को।
5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक फरवरी 2026 में अपनी पहली रिलीज के साथ आधार वर्ष 2024=100 पर आ गया। 2. नई CPI सीरीज केवल भौतिक बाजारों से कीमतें जुटाती है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) आधार 2024=100 पर पहला CPI 12 फरवरी 2026 को जारी हुआ, और इसमें 12 बड़े शहरों की ई-कॉमर्स कीमतें जोड़ी गई हैं।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- श्रिंकफ्लेशन क्या है? समझाइए कि यह मापी गई मुद्रास्फीति और परिवारों की महसूस की गई मुद्रास्फीति के बीच की खाई को क्यों चौड़ा कर सकता है। (10 अंक, 150 शब्द)
- श्रिंकफ्लेशन और स्किम्पफ्लेशन में अंतर स्पष्ट कीजिए। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में दूसरे को पकड़ना सांख्यिकी एजेंसियों के लिए ज्यादा मुश्किल क्यों है? (10 अंक, 150 शब्द)
- 2022 में मानक पैक आकार हटाकर और इकाई बिक्री मूल्य लागू करके भारत के पैकेजिंग नियमों ने सख्ती छोड़कर पारदर्शिता अपनाई। उपभोक्ता संरक्षण के इस तरीके का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- भारत की इकाई बिक्री मूल्य पर निर्भरता की तुलना छोटे किए गए उत्पादों पर फ्रांस के शेल्फ-नोटिस नियम से कीजिए। कौन-सा तरीका उपभोक्ताओं की बेहतर रक्षा करता है, और क्यों? (15 अंक, 250 शब्द)
- पैकबंद सामान में छिपी मूल्य वृद्धि से निपटने में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 और विधिक माप विज्ञान ढाँचे की भूमिका की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)