हिंदी संक्षेपण (Precis) लेखन: नियम और उदाहरण
संक्षेपण के नियम, चरण-दर-चरण विधि, एक पूरा हल किया हुआ उदाहरण और अभ्यास हेतु तीन गद्यांश — एक का आदर्श उत्तर सहित।
संक्षेपण (Precis) किसी विस्तृत गद्यांश के मूल भाव को, उसके सार को बिना नष्ट किए, लगभग एक-तिहाई शब्दों में अपनी भाषा में समेटकर प्रस्तुत करने की कला है। इसे प्रायः ‘गागर में सागर’ भरना कहा जाता है — कम शब्दों में अधिक से अधिक भाव। संक्षेपण न तो मूल का अनुवाद है, न उसका कोई अंश काट-छाँटकर जोड़ देना; यह मूल को पूरा पढ़कर, समझकर, फिर उसे नए शब्दों में संक्षिप्त रूप देने की मानसिक प्रक्रिया है।
अनिवार्य हिंदी प्रश्नपत्र में संक्षेपण एक निश्चित अंक देने वाला खंड है, क्योंकि इसमें कल्पना नहीं, अनुशासन परखा जाता है — क्या परीक्षार्थी किसी विचार के केंद्रक को पहचान सकता है, गौण बातें छोड़ सकता है, और सीमित शब्दों में बात पूरी कर सकता है। यही कौशल आगे प्रशासनिक जीवन में टिप्पणी-लेखन, सारांश तैयार करने तथा फाइल-नोटिंग में काम आता है। इसलिए संक्षेपण को केवल परीक्षा का प्रश्न नहीं, एक स्थायी कार्यकौशल मानकर अभ्यास करना चाहिए।
संक्षेपण: परिभाषा और उद्देश्य
संक्षेपण वह लेखन-प्रक्रिया है जिसमें किसी दीर्घ गद्यांश के मूल भाव को उसकी लगभग एक-तिहाई मात्रा में, अपनी भाषा में, एक सुसंबद्ध अनुच्छेद के रूप में, उपयुक्त शीर्षक देकर प्रस्तुत किया जाता है। इसमें मूल की कोई महत्त्वपूर्ण बात छूटनी नहीं चाहिए और कोई बाहरी बात जुड़नी नहीं चाहिए।
इसका उद्देश्य तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला — पाठ-बोध की परीक्षा, अर्थात् परीक्षार्थी ने गद्यांश को सही समझा या नहीं। दूसरा — विवेक की परीक्षा, अर्थात् वह आवश्यक और अनावश्यक में भेद कर पाता है या नहीं। तीसरा — अभिव्यक्ति की परीक्षा, अर्थात् वह सीमित शब्दों में सुगठित, शुद्ध और प्रवाहमयी भाषा लिख पाता है या नहीं। एक अच्छा संक्षेपण पढ़ने पर ऐसा लगना चाहिए कि वह स्वयं में पूर्ण है — पाठक को मूल गद्यांश पढ़ने की आवश्यकता ही न पड़े।
यहाँ एक सूक्ष्म भेद समझ लेना उपयोगी है। सार-लेखन (Summary) में प्रायः मूल के क्रम और भाषा की कुछ छूट रहती है तथा शब्द-सीमा कठोर नहीं होती; जबकि संक्षेपण (Precis) में शब्द-सीमा (लगभग एक-तिहाई), अपनी भाषा, अप्रत्यक्ष कथन और शीर्षक — ये नियम अनिवार्य रूप से पालन करने होते हैं। परीक्षा में सामान्यतः ‘संक्षेपण’ ही माँगा जाता है, इसलिए इन नियमों की पकड़ ज़रूरी है।
संक्षेपण के प्रमुख नियम
संक्षेपण की सफलता उसके नियमों के पालन पर टिकी है। नीचे प्रत्येक नियम संक्षेप में स्पष्ट किया गया है, ताकि याद रखना और लागू करना दोनों सरल हो।
| नियम | आशय |
|---|---|
| एक-तिहाई का नियम | मूल गद्यांश के शब्दों का लगभग एक-तिहाई। 300 शब्दों का संक्षेपण लगभग 100 शब्दों में। |
| अपनी भाषा | मूल से पंक्तियाँ ज्यों-की-त्यों न उठाएँ; भाव अपने शब्दों में व्यक्त करें। |
| अप्रत्यक्ष कथन | प्रथम/मध्यम पुरुष के कथनों को अन्य पुरुष (तृतीय पुरुष) में बदलें — ‘मैं मानता हूँ’ → ‘लेखक मानते हैं’। |
| उपयुक्त काल | संक्षेपण प्रायः भूतकाल अथवा वर्तमानकाल में, मूल की प्रकृति के अनुसार; पूरे संक्षेपण में एक ही काल बना रहे। |
| एक अनुच्छेद | संपूर्ण संक्षेपण एक ही सुसंबद्ध अनुच्छेद में हो, बिंदुवार नहीं। |
| उपयुक्त शीर्षक | 3-7 शब्दों का सटीक, आकर्षक शीर्षक दें जो मूल भाव को इंगित करे। |
| केवल मूल भाव | उदाहरण, उद्धरण, अलंकार, दुहराव और विस्तार छोड़ दें; निष्कर्ष अवश्य रखें। |
| अपनी ओर से कुछ न जोड़ना | अपनी टिप्पणी, मत, आलोचना या नया उदाहरण न डालें — जो मूल में नहीं, वह संक्षेपण में नहीं। |
| क्रमबद्धता | मूल विचारों का तार्किक क्रम बना रहे; उलट-फेर न हो। |
| शब्द-गणना | अंत में कोष्ठक में शब्द-संख्या अवश्य लिखें — (लगभग 100 शब्द)। |
इन नियमों में सबसे अधिक भूल ‘अपनी भाषा’, ‘अप्रत्यक्ष कथन’ और ‘अपनी ओर से कुछ न जोड़ना’ में होती है। मूल पंक्तियाँ उठा लेना संक्षेपण की मूल भावना के विरुद्ध है; प्रत्यक्ष कथन छोड़ देना उसे संवाद जैसा बना देता है; और अपनी राय जोड़ देना उसे निबंध बना देता है। तीनों से सतर्क रहना चाहिए।
संक्षेपण की चरण-विधि
संक्षेपण को अनुमान या जल्दबाज़ी से नहीं, एक निश्चित विधि से करना चाहिए। नीचे सात चरणों में पूरी प्रक्रिया दी गई है।
- दो बार पढ़ें — पहली बार समग्र भाव समझने के लिए, दूसरी बार बारीकी से। पढ़े बिना लिखना सबसे बड़ी भूल है।
- केंद्रीय भाव पकड़ें — गद्यांश ‘किस एक बात’ के बारे में है, इसे एक वाक्य में मन-ही-मन तय करें। यही शीर्षक का आधार बनेगा।
- मुख्य बिंदु रेखांकित करें — प्रत्येक अनुच्छेद के मुख्य भाव, उप-भाव और निष्कर्ष को पेंसिल से रेखांकित करें।
- गौण सामग्री छाँटें — उदाहरण, उद्धरण, दुहराव, अलंकार और अतिरिक्त विस्तार को अलग चिह्नित कर दें; ये संक्षेपण में नहीं जाएँगे।
- कच्चा प्रारूप लिखें — रेखांकित बिंदुओं को अपनी भाषा में, अप्रत्यक्ष कथन और एक ही काल में जोड़कर पहला मसौदा बनाएँ। अभी शब्द-सीमा की चिंता न करें।
- काट-छाँट करें — कच्चे प्रारूप के शब्द गिनें; एक-तिहाई से अधिक हों तो दुहराव और विशेषण हटाकर कसें; बहुत कम हों तो छूटा मुख्य भाव जोड़ें।
- अंतिम रूप दें — स्वच्छ, सुसंबद्ध अनुच्छेद के रूप में लिखें, उपयुक्त शीर्षक दें, वर्तनी जाँचें और अंत में कोष्ठक में शब्द-संख्या अंकित करें।
संक्षेपण: हल किया हुआ उदाहरण
नीचे एक मूल गद्यांश और उसका आदर्श संक्षेपण दोनों दिए गए हैं, ताकि नियमों का व्यावहारिक रूप स्पष्ट हो।
मूल गद्यांश (लगभग 300 शब्द)
शिक्षा मानव-जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधार है। यह केवल अक्षर-ज्ञान अथवा पुस्तकीय विद्या तक सीमित नहीं है, अपितु यह व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करती है। प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य था — व्यक्ति को आत्मज्ञानी, चरित्रवान तथा समाज-हितैषी बनाना। गुरुकुल पद्धति में छात्र गुरु के साथ रहकर जीवन-कला सीखते थे। महात्मा गांधी का भी यही मत था कि शिक्षा का उद्देश्य है — बालक के शरीर, मन तथा आत्मा का सर्वांगीण विकास।
आज के युग में शिक्षा का स्वरूप बदल गया है। अब यह प्रायः केवल आजीविका का साधन बनकर रह गई है। बहुत-से छात्र परीक्षा पास करने तथा डिग्री प्राप्त करने को ही शिक्षा का लक्ष्य मान बैठे हैं। नैतिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं तथा देशभक्ति की शिक्षा प्रायः उपेक्षित है। यही कारण है कि उच्च-शिक्षित लोग भी कभी-कभी भ्रष्टाचार, अनैतिकता तथा स्वार्थ में लिप्त दिखाई देते हैं। वस्तुतः जो शिक्षा चरित्र-निर्माण न कर सके, वह सच्चे अर्थों में शिक्षा है ही नहीं।
आज आवश्यकता है कि शिक्षा-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन किया जाए। बालकों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ जीवन-मूल्यों की शिक्षा भी दी जाए। व्यावसायिक शिक्षा तथा कौशल-विकास पर बल हो। शिक्षा यथासंभव मातृभाषा में दी जाए ताकि मौलिक चिंतन विकसित हो। शिक्षकों को भी अपने दायित्व का बोध हो — वे केवल वेतनभोगी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता हैं। यदि शिक्षा सही दिशा में हो, तो राष्ट्र स्वतः उन्नत होगा, समाज में शांति होगी तथा मानवता की सच्ची सेवा सम्भव होगी।
संक्षेपण (लगभग 100 शब्द)
शीर्षक: शिक्षा का सच्चा स्वरूप
शिक्षा मानव-जीवन का मूल आधार है, जो व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करती है। प्राचीन भारत तथा गांधी-विचार में इसका उद्देश्य आत्मज्ञान, चरित्र-निर्माण एवं समाज-हित था। किंतु आज यह प्रायः मात्र आजीविका का साधन बनकर रह गई है। नैतिक मूल्य एवं संवेदनाएँ उपेक्षित होने से उच्च-शिक्षित लोग भी भ्रष्टाचार में लिप्त दिखते हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षा-व्यवस्था में आमूल सुधार आवश्यक है — जीवन-मूल्यों की शिक्षा, मातृभाषा में अध्यापन, व्यावसायिक कौशल तथा शिक्षकों में राष्ट्र-निर्माता का बोध जगाना। ऐसी ही शिक्षा से राष्ट्रोन्नति, सामाजिक शांति एवं मानवता की सच्ची सेवा सम्भव है। (लगभग 100 शब्द)
ध्यान दें कि संक्षेपण में मूल के तीनों अनुच्छेदों का सार आ गया है, क्रम बना रहा, गुरुकुल का उदाहरण-विस्तार छोड़ दिया गया, कोई बाहरी मत नहीं जोड़ा गया, और अंत में शब्द-संख्या अंकित है।
सूचक शब्द और सामान्य त्रुटियाँ
संक्षेपण करते समय कुछ सूचक शब्द (Signal Words) बताते हैं कि किसी अंश को रखना है या छोड़ना। इन्हें पहचानने से छँटाई आसान हो जाती है।
| संकेत-शब्द | प्रयोग |
|---|---|
| ‘अर्थात्’, ‘आशय यह कि’ | परिभाषा/मूल भाव — अवश्य रखें। |
| ‘उदाहरणार्थ’, ‘जैसे’, ‘मसलन’ | उदाहरण — प्रायः छोड़ें। |
| ‘अतः’, ‘इसलिए’, ‘परिणामतः’ | निष्कर्ष — अवश्य रखें। |
| ‘पुनश्च’, ‘इसी प्रकार’, ‘फिर’ | दुहराव — छोड़ें। |
| ‘किंतु’, ‘परंतु’, ‘यद्यपि’ | विरोधी/मोड़ का विचार — रखें, क्योंकि तर्क यहीं मुड़ता है। |
अब सामान्य त्रुटियाँ, जो अंक काटती हैं —
- मूल गद्यांश से वाक्य ज्यों-के-त्यों उठा लेना (अपनी भाषा का नियम भंग)।
- अपनी टिप्पणी, राय या नया उदाहरण जोड़ देना।
- एक-तिहाई से बहुत अधिक या बहुत कम लिखना।
- प्रत्यक्ष कथन को अप्रत्यक्ष में न बदलना (‘मैंने कहा’ बना रहना)।
- काल का घालमेल — कहीं भूत, कहीं वर्तमान।
- शीर्षक न देना अथवा शब्द-संख्या लिखना भूल जाना।
- संक्षेपण को बिंदुओं में लिखना, जबकि वह एक अनुच्छेद होना चाहिए।
अभ्यास प्रश्न
नीचे संक्षेपण के लिए तीन गद्यांश दिए गए हैं। पहले गद्यांश का आदर्श उत्तर साथ में दिया गया है; शेष दो आप स्वयं हल करें और शब्द-संख्या अवश्य अंकित करें।
गद्यांश 1 (लगभग 150 शब्द) — आदर्श उत्तर सहित
समय संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु है, फिर भी मनुष्य इसी का सबसे अधिक अपव्यय करता है। बीता हुआ समय किसी भी मूल्य पर लौटाया नहीं जा सकता; न धन से, न शक्ति से, न प्रार्थना से। जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है, समय भी उसका सम्मान करता है। इतिहास साक्षी है कि संसार के सभी महान व्यक्ति समय के पाबंद रहे हैं। उन्होंने एक-एक क्षण को सोद्देश्य कार्य में लगाया और इसी कारण असाधारण सफलता पाई। इसके विपरीत, जो लोग ‘कल करेंगे’ कहकर काम टालते रहते हैं, वे जीवन भर पछताते हैं, क्योंकि वह ‘कल’ कभी नहीं आता। आलस्य समय का सबसे बड़ा शत्रु है। अतः जो काम आज किया जा सकता है, उसे कल पर कभी न टालें। समय का सदुपयोग ही उन्नति, समृद्धि और आत्म-संतोष का मूल मंत्र है।
आदर्श उत्तर —
शीर्षक: समय का मूल्य
समय सबसे मूल्यवान है, फिर भी सर्वाधिक अपव्यय इसी का होता है; बीता समय किसी भी उपाय से नहीं लौटता। संसार के सभी महान व्यक्ति समय के पाबंद रहे और प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करके ही असाधारण सफलता पा सके। इसके विपरीत, काम टालने वाले जीवन भर पछताते हैं, क्योंकि वह ‘कल’ कभी नहीं आता; आलस्य समय का सबसे बड़ा शत्रु है। अतः आज का काम कल पर न टालें — समय का सदुपयोग ही उन्नति, समृद्धि और आत्म-संतोष का मूल आधार है। (लगभग 50 शब्द)
गद्यांश 2 (लगभग 180 शब्द) — स्वयं हल कीजिए
पर्यावरण और मनुष्य का संबंध अटूट है। वायु, जल, वन, मिट्टी और जीव-जंतु मिलकर वह व्यवस्था बनाते हैं जिस पर समस्त जीवन टिका है। दुर्भाग्य से, औद्योगिक विकास और असीमित उपभोग की होड़ में मनुष्य ने इसी व्यवस्था को क्षति पहुँचाई है। कारखानों का धुआँ वायु को विषैला कर रहा है, नदियाँ कचरे और रासायनिक अपशिष्ट से दूषित हो रही हैं, और अंधाधुंध वनों की कटाई से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इसका परिणाम बाढ़, सूखा, अनियमित वर्षा और नई-नई बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है। यह संकट किसी एक देश का नहीं, समूची मानवता का है। समाधान भी सामूहिक प्रयास में ही निहित है — वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा का प्रयोग, जल-संरक्षण और उपभोग में संयम। साथ ही, बच्चों में बचपन से ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगानी होगी। यदि हम आज नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को हम एक रुग्ण और असुरक्षित पृथ्वी सौंपेंगे। प्रकृति की रक्षा वस्तुतः अपने भविष्य की रक्षा है।
गद्यांश 3 (लगभग 200 शब्द) — स्वयं हल कीजिए
परिश्रम ही मनुष्य के भाग्य का सच्चा निर्माता है। बहुत-से लोग अपनी असफलता का दोष भाग्य पर मढ़ देते हैं और हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। परंतु संसार का इतिहास बताता है कि भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है जो परिश्रम करते हैं। खेत में बीज बोए बिना केवल वर्षा की प्रतीक्षा करने वाला किसान कभी फसल नहीं पाता। इसी प्रकार, जो विद्यार्थी केवल सौभाग्य की आशा में पढ़ाई से जी चुराता है, वह परीक्षा में सफल नहीं हो सकता। परिश्रम से न केवल धन और सफलता मिलती है, बल्कि आत्मविश्वास, स्वास्थ्य और आत्म-सम्मान भी प्राप्त होते हैं। परिश्रमी व्यक्ति कठिनाइयों से घबराता नहीं, बल्कि उन्हें चुनौती मानकर आगे बढ़ता है। आलसी व्यक्ति सुविधाओं के बीच रहकर भी असंतुष्ट रहता है, जबकि परिश्रमी अभावों में भी प्रसन्न रहता है, क्योंकि उसे अपने पुरुषार्थ पर भरोसा होता है। हमारे ऋषियों ने भी ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि’ कहकर परिश्रम की महिमा गाई है, अर्थात् कार्य उद्यम से ही सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। अतः हमें भाग्य के भरोसे न बैठकर निरंतर परिश्रम करना चाहिए, क्योंकि परिश्रम ही सफलता की एकमात्र कुंजी है।