भारत में असममित संघवाद — अनुच्छेद 371, विशेष प्रावधान एवं UPSC नोट्स
भारत में असममित संघवाद (Asymmetric Federalism) पर UPSC गाइड: अनुच्छेद 371-371J, पाँचवीं एवं छठी अनुसूची, संघ राज्य क्षेत्र, राजकोषीय असमता, कारण तथा 2024-26 के J&K एवं लद्दाख संदर्भ।
भारत के संघ को प्रायः “संग-संग बँधा हुआ” (holding together) संघ कहा जाता है, परंतु यह विशिष्ट रूप से असममित (asymmetric) भी है। विभिन्न राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्र (Union Territories) स्वायत्तता, विधायी शक्तियों एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अलग-अलग स्तरों का उपभोग करते हैं। 2019 तक का जम्मू-कश्मीर, समूचा पूर्वोत्तर, जनजातीय क्षेत्र, विधायिका-सहित एवं विधायिका-रहित संघ राज्य क्षेत्र, तथा अनुच्छेद 371 के संरक्षण वाले राज्य — ये सब एक ऐसी सायास संवैधानिक अभिकल्पना का प्रतिनिधित्व करते हैं जो संघीय ढाँचे को तोड़े बिना विविधता को समेटती है।
यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए असममित संघवाद अनिवार्य GS-II सामग्री है — प्रारंभिक परीक्षा में अनुच्छेद 371-371J पर सीधे प्रश्न तथा मुख्य परीक्षा में असममित व्यवस्थाओं के औचित्य एवं उपयोगिता पर निबंधात्मक प्रश्न आते रहे हैं। 2024-26 का परिप्रेक्ष्य इस विषय को और प्रासंगिक बनाता है: सर्वोच्च न्यायालय का अनुच्छेद 370 निरसन निर्णय, लद्दाख की छठी अनुसूची माँग, GNCTD संशोधन अधिनियम 2023, तथा 16वें वित्त आयोग की समीक्षा।
संक्षेप में, यह विषय मात्र शब्दावली का खेल नहीं है — यह भारत की संघीय आत्मा का जीवंत आख्यान है। एक नागालैंड का पारंपरिक विधि-संरक्षण, एक दिल्ली का “दो-शासन” प्रयोग, एक स्वायत्त ज़िला परिषद का जनजातीय आत्मनिर्णय — सब मिलकर वह “भारत-मॉडल” बनाते हैं जिसकी तुलनीय मिसाल विश्व में बहुत कम है।
असममित संघवाद क्या है?
संघीय व्यवस्था में घटक इकाइयों की पहचान क्षेत्र, भाषा, संस्कृति या नृजातीयता के आधार पर की जाती है तथा उन्हें स्वायत्तता या प्रशासनिक/विधायी शक्तियों के विविध स्वरूप दिए जाते हैं। असममित संघवाद का तात्पर्य ऐसे संघवाद से है जो संघ-निर्माणकारी इकाइयों के बीच असमान शक्तियों एवं संबंधों — राजनीतिक, प्रशासनिक एवं राजकोषीय — पर आधारित हो।
- सममित संघवाद (Symmetric Federalism): सभी घटक इकाइयों को एक-समान शक्तियाँ (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया)।
- असममित संघवाद: इकाइयों को स्वायत्तता की भिन्न मात्रा एवं प्रकार (जैसे भारत, कनाडा, स्पेन)।
राजनीतिक सिद्धांतकार चार्ल्स टार्लटन (Charles Tarlton) ने 1965 में “सममित-असममित” विभेद को औपचारिक नाम दिया था। उनके अनुसार किसी भी संघ की वास्तविक प्रकृति इस बात से तय होती है कि उसकी इकाइयाँ केंद्र से एक-सी दूरी रखती हैं या भिन्न-भिन्न दूरी। भारत स्पष्ट रूप से दूसरी श्रेणी में आता है।
भारत में असमता के चार स्वरूप
1. विशिष्ट राज्यों के लिए विशेष प्रावधान — अनुच्छेद 371 से 371J
ये प्रावधान राज्यपालों को विशेष उत्तरदायित्व सौंपते हैं अथवा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या विकास-संबंधी चिंताओं को समायोजित करने हेतु विशिष्ट विधिक व्यवस्थाएँ लागू करते हैं।
| अनुच्छेद | राज्य | विशेष प्रावधान |
|---|---|---|
| 371 | महाराष्ट्र, गुजरात | विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, कच्छ के विकास हेतु राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व |
| 371A | नागालैंड | नागाओं की धार्मिक/सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत विधि, भूमि-स्वामित्व या नागा परिषद की भूमि से संबंधित कोई संसदीय कानून तब तक लागू नहीं होगा जब तक राज्य विधानमंडल संकल्प न ले |
| 371B | असम | जनजातीय क्षेत्रों के लिए विधानसभा समिति |
| 371C | मणिपुर | पर्वतीय क्षेत्रों के लिए समिति; राष्ट्रपति को राज्यपाल का प्रतिवेदन |
| 371D, 371E | आंध्र प्रदेश, तेलंगाना | लोक-नियोजन एवं शिक्षा में समान अवसर; AP केंद्रीय विश्वविद्यालय |
| 371F | सिक्किम | 1975 में विलय के समय विशेष प्रावधान |
| 371G | मिज़ोरम | मिज़ोओं की धार्मिक/सामाजिक प्रथाएँ; प्रथागत विधि; भूमि-स्वामित्व |
| 371H | अरुणाचल प्रदेश | विधि एवं व्यवस्था हेतु राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व |
| 371I | गोवा | विधानसभा में न्यूनतम 30 सदस्य |
| 371J | कर्नाटक | हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र हेतु विशेष दर्जा (2012 में जोड़ा गया) |
ध्यान देने योग्य बिंदु: ये अनुच्छेद राज्य-विशिष्ट हैं, सामान्य नहीं। प्रत्येक का अपना ऐतिहासिक संदर्भ है — नागालैंड के लिए 16-सूत्रीय समझौता (1960), सिक्किम का विलय (1975), तेलंगाना का गठन (2014) के बाद आंध्र-पुनर्गठन।
2. संघ राज्य क्षेत्र (Union Territories)
तीन श्रेणियाँ हैं:
- विधायिका-रहित संघ राज्य क्षेत्र: केंद्र द्वारा उप-राज्यपाल/प्रशासक के माध्यम से सीधे प्रशासित (जैसे अंडमान-निकोबार, चंडीगढ़, दादरा-नगर हवेली एवं दमन-दीव, लक्षद्वीप, लद्दाख)।
- विधायिका-सहित संघ राज्य क्षेत्र: निर्वाचित विधानसभा एवं मंत्रिपरिषद वाले (जैसे दिल्ली, पुदुचेरी, 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर)।
- दूसरी श्रेणी के भीतर भी, अनुच्छेद 239AA के अंतर्गत दिल्ली का अनूठा (sui generis) दर्जा और भी असमता उत्पन्न करता है।
3. पाँचवीं एवं छठी अनुसूची क्षेत्र
- पाँचवीं अनुसूची [अनुच्छेद 244(1)]: असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के अतिरिक्त राज्यों के जनजातीय क्षेत्र। वर्तमान में 10 राज्यों में लागू — आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान एवं तेलंगाना।
- छठी अनुसूची [अनुच्छेद 244(2)]: असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्र, जहाँ स्वायत्त ज़िला परिषदें (Autonomous District Councils, ADCs) व्यापक विधायी, कार्यपालक, न्यायिक एवं वित्तीय शक्तियाँ रखती हैं।
दोनों अनुसूचियाँ जनजातीय स्वायत्तता, भूमि-संरक्षण, रीति-रिवाजों, भाषा एवं सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण को सक्षम बनाती हैं — जिससे जनजातीय क्षेत्रों के साथ व्यवहार में भारतीय संघ असममित हो जाता है। उल्लेखनीय है कि छठी अनुसूची क्षेत्रों की ADCs को राज्य की विधि से ऊपर रखी गई कुछ शक्तियाँ प्राप्त हैं — विशेषकर भूमि, वन एवं प्रथागत न्याय के मामलों में।
4. राजकोषीय असमता (Fiscal Asymmetry)
- वित्त आयोग (Finance Commission) अनुदान विभिन्न राज्यों के लिए सूत्र-आधारित विचलन के अनुसार बदलते हैं — आय-दूरी, क्षेत्रफल, जनसंख्या, जनसांख्यिकीय निष्पादन, वन-आवरण एवं कर-प्रयास के भार के साथ।
- स्थानीय निकायों को निधि वित्त आयोग के अंतरण के माध्यम से।
- राज्य आपदा राहत निधि केंद्रीय अंशदान सहित।
- GST व्यवस्था के अंतर्गत क्षतिपूर्ति तंत्र (अधिकांश राज्यों के लिए जून 2022 तक)।
- विशेष श्रेणी का दर्जा (पूर्ववर्ती) ने पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड सहित 11 राज्यों को केंद्र-प्रायोजित योजनाओं हेतु 90:10 केंद्र-राज्य वित्तपोषण दिया था — 14वें वित्त आयोग के बाद औपचारिक रूप से समाप्त।
राजकोषीय असमता का व्यावहारिक उदाहरण: 15वें वित्त आयोग (2021-26) ने मिज़ोरम जैसे छोटे राज्य को प्रति-व्यक्ति अंतरण के मामले में लाभ दिया, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य कुल मात्रा में आगे रहे — यानी “बराबरी” का प्रश्न संख्या से अधिक भार-गुणांक का है।
भारत में असममित संघवाद क्यों है?
आर्थिक कारण
- संसाधन-दृष्टि से कमज़ोर राज्यों के लिए आर्थिक अवसरों का विस्तार।
- बड़ी, अधिक शक्तिशाली इकाइयों द्वारा शोषण से मुक्ति।
- ऐतिहासिक रूप से विशेष श्रेणी का दर्जा इसी कार्य की पूर्ति करता था।
राजनीतिक एवं अस्मिता-संरक्षक
- पाँचवीं एवं छठी अनुसूचियाँ अनुसूचित जनजातियों एवं जनजातीय क्षेत्रों को विशेष शासन प्रदान करती हैं, जो भूमि, अर्थव्यवस्था एवं समुदाय की रक्षा करती हैं।
- विशिष्ट समुदायों पर समरूपीकरण के दबावों को रोकती हैं।
सांस्कृतिक कारक
- अनुच्छेद 371 से 371J में ऐसे उपबंध हैं जो प्रथागत विधियों, धार्मिक एवं सामाजिक प्रथाओं का सम्मान करते हैं तथा प्रवासन को सीमित करते हैं।
- उदाहरण: अनुच्छेद 371G मिज़ोरम में मिज़ोओं की धार्मिक एवं सामाजिक प्रथाओं तथा उनकी प्रथागत विधि की रक्षा करता है।
ऐतिहासिक
- ब्रिटिशों ने जिस ढंग से भारत को एकीकृत किया तथा उसके बाद रियासतों के विलय की प्रक्रिया से आकार पाया।
- उदाहरण: जम्मू-कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 (अगस्त 2019 में निरस्त)।
प्रशासनिक
- संघ राज्य क्षेत्रों का गठन उन क्षेत्रों के लिए हुआ जो स्वतंत्र राज्य बनने हेतु अत्यंत छोटे थे अथवा पड़ोसी क्षेत्रों के साथ अ-संरेखित विशिष्ट सांस्कृतिक भिन्नता वाले थे।
व्यवहार में असममित व्यवस्थाएँ
| व्यवस्था | प्रतिनिधि उदाहरण |
|---|---|
| सशक्त राज्य स्वायत्तता | नागालैंड (371A), मिज़ोरम (371G) |
| जनजातीय परिषद स्वायत्तता | बोडोलैंड TAD, खासी हिल्स, कार्बी आंगलोंग |
| पूर्ण विधानसभा वाला UT | पुदुचेरी |
| अनूठा (sui generis) UT | दिल्ली |
| विधानसभा-रहित UT | लद्दाख |
| विशेष क्षेत्रीय विकास | हैदराबाद-कर्नाटक (371J) |
| राजकोषीय कटौती | पूर्ववर्ती विशेष श्रेणी दर्जा वाले राज्य |
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम कनाडा बनाम स्पेन
असममित संघवाद केवल भारत की विशेषता नहीं — विश्व के अन्य संघों ने भी अपने ढंग से इसे अपनाया है। नीचे तीन प्रमुख प्रजातियों की तुलना है।
| आयाम | भारत | कनाडा | स्पेन |
|---|---|---|---|
| संवैधानिक स्रोत | अनुच्छेद 371-371J, अनुसूची 5/6, 239AA | संविधान अधिनियम 1867, क्यूबेक के लिए सिविल लॉ अपवाद | 1978 का संविधान, स्वायत्त समुदायों के विधान |
| मुख्य लाभार्थी इकाइयाँ | पूर्वोत्तर, जनजातीय क्षेत्र, J&K (पूर्व), दिल्ली | क्यूबेक | कैटेलोनिया, बास्क प्रांत |
| मुख्य आयाम | सांस्कृतिक, जनजातीय, ऐतिहासिक, राजकोषीय | भाषाई, विधिक | भाषाई, राजकोषीय (बास्क-नवारा) |
| अलगाववाद का दबाव | मध्यम (पूर्वोत्तर) | उच्च (क्यूबेक जनमत संग्रह 1980, 1995) | उच्च (कैटेलोनिया 2017) |
| केंद्रीय शक्ति की प्रबलता | अपेक्षाकृत प्रबल | मध्यम | मध्यम |
हालिया विकास (2024-26)
- अनुच्छेद 370 का निरसन (2019) ने जम्मू-कश्मीर के दर्जे को रूपांतरित किया; सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2023 में निरसन को सही ठहराया परंतु “यथाशीघ्र” राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश दिया।
- लद्दाख की माँगें: लद्दाख का नागरिक समाज सतत आंदोलन (2023-24) के माध्यम से छठी अनुसूची में सम्मिलन एवं राज्य का दर्जा माँग रहा है। केंद्र सरकार ने एक समिति का गठन किया है, परंतु अभी तक औपचारिक सम्मिलन नहीं हुआ। पर्यावरण-कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में चलाए गए “पश्मीना मार्च” तथा भूख-हड़ताल ने इस माँग को राष्ट्रीय बहस में ला दिया।
- GNCTD (संशोधन) अधिनियम 2023: दिल्ली के असममित दर्जे को और गहरा किया (देखें दिल्ली राज्य-दर्जा गाइड)।
- अद्यतन संदर्भ: 16वाँ वित्त आयोग (2026-2031) राज्य-विशिष्ट शर्तों की समीक्षा कर रहा है, जो आपदा-प्रवण एवं संसाधन-न्यून राज्यों हेतु विशेष व्यवहार के पहलुओं को — विशेष श्रेणी दर्जे की औपचारिक बहाली के बिना — पुनः ला सकता है।
- मणिपुर संकट (2023-25): कूकी-मैतेई संघर्ष ने अनुच्छेद 371C एवं पर्वतीय क्षेत्रों की समिति-व्यवस्था की प्रासंगिकता को पुनः प्रकाश में लाया है। केंद्रीय शासन का विस्तार असममित संघवाद की एक नई पद्धति को रेखांकित करता है।
असममित संघवाद की समीक्षा
सकारात्मक पक्ष
- विविधता को समायोजन — भाषाई, सांस्कृतिक, नृजातीय, धार्मिक।
- सुविचारित स्वायत्तता प्रदान करके अलगाववादी दबाव की रोकथाम।
- संवेदनशील समुदायों की रक्षा।
- क्षेत्र-अनुकूल शासन को सक्षम बनाना।
नकारात्मक पक्ष
- प्रशासनिक जटिलता — एकाधिक व्यवस्थाएँ केंद्र-राज्य समन्वय को उलझाती हैं।
- गैर-आच्छादित राज्यों में असंतोष — असमानता के रूप में अनुभूति।
- मुक़दमेबाज़ी एवं राजनीतिक प्रतिस्पर्धा — जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, लद्दाख के मामले इसका प्रदर्शन करते हैं।
- केंद्र पर राजकोषीय दबाव।
- पहचान की राजनीति असममित विभाजन-रेखाओं के साथ कठोर हो सकती है।
UPSC प्रासंगिकता
Prelims बिंदु
- अनुच्छेद 371 से 371J — कौन-सा अनुच्छेद किस राज्य पर लागू है, यह कंठस्थ रखें।
- पाँचवीं अनुसूची — अनुसूचित क्षेत्रों वाले 10 राज्य।
- छठी अनुसूची — असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम।
- अनुच्छेद 244 — अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन।
- अनुच्छेद 239AA — NCTD (दिल्ली)।
- अनुच्छेद 371F — सिक्किम, 1975 के 36वें संविधान संशोधन से जुड़ा।
- अनुच्छेद 371J — हैदराबाद-कर्नाटक, 98वाँ संशोधन (2012)।
Mains अभ्यास प्रश्न
- भारत में असममित संघवाद के औचित्य की परीक्षा कीजिए।
- चर्चा कीजिए कि असममित संघवाद किस प्रकार एकता एवं विविधता के बीच संतुलन साधता है।
- क्या अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद भी भारत का संघ असममित बना हुआ है? तर्क सहित विवेचना कीजिए।
- “लद्दाख की छठी अनुसूची माँग भारतीय असममित संघवाद की निरंतरता का परीक्षण है।” मूल्यांकन कीजिए।
निबंध-लेखन में, असममित संघवाद संवैधानिक बहुलवाद, विविधता का समायोजन एवं भारतीय संघ के क्रमिक विकास का सशक्त उदाहरण है। यह आगामी UPSC चक्रों के लिए एक भविष्योन्मुख विषय है — जिसकी प्रत्यक्ष नीतिगत प्रासंगिकता लद्दाख की छठी अनुसूची माँग से लेकर आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की चालू बहस तक फैली है।
सामान्य प्रश्न
असममित संघवाद का सरल अर्थ क्या है?
असममित संघवाद वह संघीय व्यवस्था है जिसमें घटक इकाइयों को असमान शक्तियाँ, स्वायत्तता एवं विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। भारत में अनुच्छेद 371 से 371J, पाँचवीं-छठी अनुसूचियाँ, संघ राज्य क्षेत्रों की भिन्न श्रेणियाँ तथा राजकोषीय अंतरण की भिन्न शर्तें — सब असममितता के उदाहरण हैं।
अनुच्छेद 371 तथा अनुच्छेद 370 में क्या अंतर है?
अनुच्छेद 370 केवल जम्मू-कश्मीर के लिए विशिष्ट था और 2019 में निरसित कर दिया गया। अनुच्छेद 371 से 371J ग्यारह अलग-अलग राज्यों के लिए भिन्न-भिन्न विशेष प्रावधान देते हैं और वर्तमान में पूरी तरह सक्रिय हैं।
छठी अनुसूची कौन-कौन से राज्यों में लागू है?
छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों में लागू है। यहाँ स्वायत्त ज़िला परिषदें (ADCs) विधायी, कार्यपालक, न्यायिक एवं वित्तीय शक्तियाँ रखती हैं।
लद्दाख की छठी अनुसूची माँग का क्या आधार है?
लद्दाख की 97% से अधिक आबादी जनजातीय है। नागरिक समाज को आशंका है कि UT बनने के बाद भूमि, रोज़गार, संस्कृति एवं पर्यावरण-संरक्षण के क्षेत्रीय अधिकार कमज़ोर हो रहे हैं। छठी अनुसूची में सम्मिलन से स्वायत्त ज़िला परिषदें मिलेंगी जो भूमि-कानून एवं प्रथागत व्यवस्था पर निर्णय ले सकेंगी।
दिल्ली का असममित दर्जा क्या है?
दिल्ली अनुच्छेद 239AA के अंतर्गत ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCTD)’ है — विधानसभा-सहित संघ राज्य क्षेत्र होते हुए भी पूर्ण राज्य नहीं। पुलिस, भूमि एवं लोक-व्यवस्था केंद्र के पास हैं। GNCTD संशोधन अधिनियम 2023 ने उप-राज्यपाल की भूमिका को और सशक्त किया है।
क्या विशेष श्रेणी का दर्जा अब भी मौजूद है?
नहीं। 14वें वित्त आयोग (2015) के बाद विशेष श्रेणी दर्जा औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। हालाँकि पूर्वोत्तर, हिमाचल एवं उत्तराखंड को अब भी केंद्र-प्रायोजित योजनाओं में अधिक केंद्रीय अंशदान (90:10) मिलता है।
अनुच्छेद 371A नागालैंड को क्या विशेष देता है?
अनुच्छेद 371A के अंतर्गत संसद का कोई भी कानून — चाहे वह नागाओं की धार्मिक/सामाजिक प्रथा, प्रथागत विधि, सिविल/दंड न्याय, भूमि एवं संसाधनों के स्वामित्व-हस्तांतरण से संबंधित हो — नागालैंड पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक राज्य विधानसभा संकल्प द्वारा उसे स्वीकार न करे।
असममित संघवाद के विरुद्ध मुख्य आलोचनाएँ क्या हैं?
आलोचक कहते हैं कि यह प्रशासनिक जटिलता पैदा करता है, गैर-आच्छादित राज्यों में असंतोष उत्पन्न करता है, मुक़दमेबाज़ी बढ़ाता है, केंद्र पर राजकोषीय दबाव लाता है तथा पहचान-राजनीति को कठोर बनाता है। तथापि, समर्थक तर्क देते हैं कि भारत-जैसे विविध समाज में यही व्यवस्था एकता बनाए रखने का सर्वोत्तम मार्ग है।
16वाँ वित्त आयोग असममित संघवाद को कैसे प्रभावित कर सकता है?
16वाँ वित्त आयोग (कार्यकाल 2026-2031) आपदा-प्रवण एवं संसाधन-न्यून राज्यों हेतु विशेष व्यवहार के पहलुओं की समीक्षा कर रहा है। यह विशेष श्रेणी दर्जे की औपचारिक बहाली के बिना ही असममित राजकोषीय व्यवस्था को नया रूप दे सकता है।
क्या भारत का संघ अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद कम असममित हो गया है?
नहीं। 370 के निरसन से एक प्रमुख असममित प्रावधान समाप्त हुआ, परंतु अनुच्छेद 371-371J, पाँचवीं-छठी अनुसूचियाँ, दिल्ली का sui generis दर्जा, जनजातीय परिषदें तथा राजकोषीय असमता बनी हुई हैं। भारतीय संघ अब भी मूलतः असममित है।