Anantam IASHindi Note · 4 May 2026

भारत में असममित संघवाद — अनुच्छेद 371, विशेष प्रावधान एवं UPSC नोट्स

भारत में असममित संघवाद (Asymmetric Federalism) पर UPSC गाइड: अनुच्छेद 371-371J, पाँचवीं एवं छठी अनुसूची, संघ राज्य क्षेत्र, राजकोषीय असमता, कारण तथा 2024-26 के J&K एवं लद्दाख संदर्भ।

भारत के संघ को प्रायः “संग-संग बँधा हुआ” (holding together) संघ कहा जाता है, परंतु यह विशिष्ट रूप से असममित (asymmetric) भी है। विभिन्न राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्र (Union Territories) स्वायत्तता, विधायी शक्तियों एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अलग-अलग स्तरों का उपभोग करते हैं। 2019 तक का जम्मू-कश्मीर, समूचा पूर्वोत्तर, जनजातीय क्षेत्र, विधायिका-सहित एवं विधायिका-रहित संघ राज्य क्षेत्र, तथा अनुच्छेद 371 के संरक्षण वाले राज्य — ये सब एक ऐसी सायास संवैधानिक अभिकल्पना का प्रतिनिधित्व करते हैं जो संघीय ढाँचे को तोड़े बिना विविधता को समेटती है

यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए असममित संघवाद अनिवार्य GS-II सामग्री है — प्रारंभिक परीक्षा में अनुच्छेद 371-371J पर सीधे प्रश्न तथा मुख्य परीक्षा में असममित व्यवस्थाओं के औचित्य एवं उपयोगिता पर निबंधात्मक प्रश्न आते रहे हैं। 2024-26 का परिप्रेक्ष्य इस विषय को और प्रासंगिक बनाता है: सर्वोच्च न्यायालय का अनुच्छेद 370 निरसन निर्णय, लद्दाख की छठी अनुसूची माँग, GNCTD संशोधन अधिनियम 2023, तथा 16वें वित्त आयोग की समीक्षा।

संक्षेप में, यह विषय मात्र शब्दावली का खेल नहीं है — यह भारत की संघीय आत्मा का जीवंत आख्यान है। एक नागालैंड का पारंपरिक विधि-संरक्षण, एक दिल्ली का “दो-शासन” प्रयोग, एक स्वायत्त ज़िला परिषद का जनजातीय आत्मनिर्णय — सब मिलकर वह “भारत-मॉडल” बनाते हैं जिसकी तुलनीय मिसाल विश्व में बहुत कम है।

असममित संघवाद क्या है?

संघीय व्यवस्था में घटक इकाइयों की पहचान क्षेत्र, भाषा, संस्कृति या नृजातीयता के आधार पर की जाती है तथा उन्हें स्वायत्तता या प्रशासनिक/विधायी शक्तियों के विविध स्वरूप दिए जाते हैं। असममित संघवाद का तात्पर्य ऐसे संघवाद से है जो संघ-निर्माणकारी इकाइयों के बीच असमान शक्तियों एवं संबंधों — राजनीतिक, प्रशासनिक एवं राजकोषीय — पर आधारित हो।

राजनीतिक सिद्धांतकार चार्ल्स टार्लटन (Charles Tarlton) ने 1965 में “सममित-असममित” विभेद को औपचारिक नाम दिया था। उनके अनुसार किसी भी संघ की वास्तविक प्रकृति इस बात से तय होती है कि उसकी इकाइयाँ केंद्र से एक-सी दूरी रखती हैं या भिन्न-भिन्न दूरी। भारत स्पष्ट रूप से दूसरी श्रेणी में आता है।

भारत में असमता के चार स्वरूप

1. विशिष्ट राज्यों के लिए विशेष प्रावधान — अनुच्छेद 371 से 371J

ये प्रावधान राज्यपालों को विशेष उत्तरदायित्व सौंपते हैं अथवा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या विकास-संबंधी चिंताओं को समायोजित करने हेतु विशिष्ट विधिक व्यवस्थाएँ लागू करते हैं।

अनुच्छेदराज्यविशेष प्रावधान
371महाराष्ट्र, गुजरातविदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, कच्छ के विकास हेतु राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व
371Aनागालैंडनागाओं की धार्मिक/सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत विधि, भूमि-स्वामित्व या नागा परिषद की भूमि से संबंधित कोई संसदीय कानून तब तक लागू नहीं होगा जब तक राज्य विधानमंडल संकल्प न ले
371Bअसमजनजातीय क्षेत्रों के लिए विधानसभा समिति
371Cमणिपुरपर्वतीय क्षेत्रों के लिए समिति; राष्ट्रपति को राज्यपाल का प्रतिवेदन
371D, 371Eआंध्र प्रदेश, तेलंगानालोक-नियोजन एवं शिक्षा में समान अवसर; AP केंद्रीय विश्वविद्यालय
371Fसिक्किम1975 में विलय के समय विशेष प्रावधान
371Gमिज़ोरममिज़ोओं की धार्मिक/सामाजिक प्रथाएँ; प्रथागत विधि; भूमि-स्वामित्व
371Hअरुणाचल प्रदेशविधि एवं व्यवस्था हेतु राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व
371Iगोवाविधानसभा में न्यूनतम 30 सदस्य
371Jकर्नाटकहैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र हेतु विशेष दर्जा (2012 में जोड़ा गया)

ध्यान देने योग्य बिंदु: ये अनुच्छेद राज्य-विशिष्ट हैं, सामान्य नहीं। प्रत्येक का अपना ऐतिहासिक संदर्भ है — नागालैंड के लिए 16-सूत्रीय समझौता (1960), सिक्किम का विलय (1975), तेलंगाना का गठन (2014) के बाद आंध्र-पुनर्गठन।

2. संघ राज्य क्षेत्र (Union Territories)

तीन श्रेणियाँ हैं:

3. पाँचवीं एवं छठी अनुसूची क्षेत्र

दोनों अनुसूचियाँ जनजातीय स्वायत्तता, भूमि-संरक्षण, रीति-रिवाजों, भाषा एवं सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण को सक्षम बनाती हैं — जिससे जनजातीय क्षेत्रों के साथ व्यवहार में भारतीय संघ असममित हो जाता है। उल्लेखनीय है कि छठी अनुसूची क्षेत्रों की ADCs को राज्य की विधि से ऊपर रखी गई कुछ शक्तियाँ प्राप्त हैं — विशेषकर भूमि, वन एवं प्रथागत न्याय के मामलों में।

4. राजकोषीय असमता (Fiscal Asymmetry)

राजकोषीय असमता का व्यावहारिक उदाहरण: 15वें वित्त आयोग (2021-26) ने मिज़ोरम जैसे छोटे राज्य को प्रति-व्यक्ति अंतरण के मामले में लाभ दिया, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य कुल मात्रा में आगे रहे — यानी “बराबरी” का प्रश्न संख्या से अधिक भार-गुणांक का है।

भारत में असममित संघवाद क्यों है?

आर्थिक कारण

राजनीतिक एवं अस्मिता-संरक्षक

सांस्कृतिक कारक

ऐतिहासिक

प्रशासनिक

व्यवहार में असममित व्यवस्थाएँ

व्यवस्थाप्रतिनिधि उदाहरण
सशक्त राज्य स्वायत्ततानागालैंड (371A), मिज़ोरम (371G)
जनजातीय परिषद स्वायत्तताबोडोलैंड TAD, खासी हिल्स, कार्बी आंगलोंग
पूर्ण विधानसभा वाला UTपुदुचेरी
अनूठा (sui generis) UTदिल्ली
विधानसभा-रहित UTलद्दाख
विशेष क्षेत्रीय विकासहैदराबाद-कर्नाटक (371J)
राजकोषीय कटौतीपूर्ववर्ती विशेष श्रेणी दर्जा वाले राज्य

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम कनाडा बनाम स्पेन

असममित संघवाद केवल भारत की विशेषता नहीं — विश्व के अन्य संघों ने भी अपने ढंग से इसे अपनाया है। नीचे तीन प्रमुख प्रजातियों की तुलना है।

आयामभारतकनाडास्पेन
संवैधानिक स्रोतअनुच्छेद 371-371J, अनुसूची 5/6, 239AAसंविधान अधिनियम 1867, क्यूबेक के लिए सिविल लॉ अपवाद1978 का संविधान, स्वायत्त समुदायों के विधान
मुख्य लाभार्थी इकाइयाँपूर्वोत्तर, जनजातीय क्षेत्र, J&K (पूर्व), दिल्लीक्यूबेककैटेलोनिया, बास्क प्रांत
मुख्य आयामसांस्कृतिक, जनजातीय, ऐतिहासिक, राजकोषीयभाषाई, विधिकभाषाई, राजकोषीय (बास्क-नवारा)
अलगाववाद का दबावमध्यम (पूर्वोत्तर)उच्च (क्यूबेक जनमत संग्रह 1980, 1995)उच्च (कैटेलोनिया 2017)
केंद्रीय शक्ति की प्रबलताअपेक्षाकृत प्रबलमध्यममध्यम

हालिया विकास (2024-26)

असममित संघवाद की समीक्षा

सकारात्मक पक्ष

नकारात्मक पक्ष

UPSC प्रासंगिकता

Prelims बिंदु

Mains अभ्यास प्रश्न

निबंध-लेखन में, असममित संघवाद संवैधानिक बहुलवाद, विविधता का समायोजन एवं भारतीय संघ के क्रमिक विकास का सशक्त उदाहरण है। यह आगामी UPSC चक्रों के लिए एक भविष्योन्मुख विषय है — जिसकी प्रत्यक्ष नीतिगत प्रासंगिकता लद्दाख की छठी अनुसूची माँग से लेकर आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की चालू बहस तक फैली है।

सामान्य प्रश्न

असममित संघवाद का सरल अर्थ क्या है?

असममित संघवाद वह संघीय व्यवस्था है जिसमें घटक इकाइयों को असमान शक्तियाँ, स्वायत्तता एवं विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। भारत में अनुच्छेद 371 से 371J, पाँचवीं-छठी अनुसूचियाँ, संघ राज्य क्षेत्रों की भिन्न श्रेणियाँ तथा राजकोषीय अंतरण की भिन्न शर्तें — सब असममितता के उदाहरण हैं।

अनुच्छेद 371 तथा अनुच्छेद 370 में क्या अंतर है?

अनुच्छेद 370 केवल जम्मू-कश्मीर के लिए विशिष्ट था और 2019 में निरसित कर दिया गया। अनुच्छेद 371 से 371J ग्यारह अलग-अलग राज्यों के लिए भिन्न-भिन्न विशेष प्रावधान देते हैं और वर्तमान में पूरी तरह सक्रिय हैं।

छठी अनुसूची कौन-कौन से राज्यों में लागू है?

छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों में लागू है। यहाँ स्वायत्त ज़िला परिषदें (ADCs) विधायी, कार्यपालक, न्यायिक एवं वित्तीय शक्तियाँ रखती हैं।

लद्दाख की छठी अनुसूची माँग का क्या आधार है?

लद्दाख की 97% से अधिक आबादी जनजातीय है। नागरिक समाज को आशंका है कि UT बनने के बाद भूमि, रोज़गार, संस्कृति एवं पर्यावरण-संरक्षण के क्षेत्रीय अधिकार कमज़ोर हो रहे हैं। छठी अनुसूची में सम्मिलन से स्वायत्त ज़िला परिषदें मिलेंगी जो भूमि-कानून एवं प्रथागत व्यवस्था पर निर्णय ले सकेंगी।

दिल्ली का असममित दर्जा क्या है?

दिल्ली अनुच्छेद 239AA के अंतर्गत ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCTD)’ है — विधानसभा-सहित संघ राज्य क्षेत्र होते हुए भी पूर्ण राज्य नहीं। पुलिस, भूमि एवं लोक-व्यवस्था केंद्र के पास हैं। GNCTD संशोधन अधिनियम 2023 ने उप-राज्यपाल की भूमिका को और सशक्त किया है।

क्या विशेष श्रेणी का दर्जा अब भी मौजूद है?

नहीं। 14वें वित्त आयोग (2015) के बाद विशेष श्रेणी दर्जा औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। हालाँकि पूर्वोत्तर, हिमाचल एवं उत्तराखंड को अब भी केंद्र-प्रायोजित योजनाओं में अधिक केंद्रीय अंशदान (90:10) मिलता है।

अनुच्छेद 371A नागालैंड को क्या विशेष देता है?

अनुच्छेद 371A के अंतर्गत संसद का कोई भी कानून — चाहे वह नागाओं की धार्मिक/सामाजिक प्रथा, प्रथागत विधि, सिविल/दंड न्याय, भूमि एवं संसाधनों के स्वामित्व-हस्तांतरण से संबंधित हो — नागालैंड पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक राज्य विधानसभा संकल्प द्वारा उसे स्वीकार न करे।

असममित संघवाद के विरुद्ध मुख्य आलोचनाएँ क्या हैं?

आलोचक कहते हैं कि यह प्रशासनिक जटिलता पैदा करता है, गैर-आच्छादित राज्यों में असंतोष उत्पन्न करता है, मुक़दमेबाज़ी बढ़ाता है, केंद्र पर राजकोषीय दबाव लाता है तथा पहचान-राजनीति को कठोर बनाता है। तथापि, समर्थक तर्क देते हैं कि भारत-जैसे विविध समाज में यही व्यवस्था एकता बनाए रखने का सर्वोत्तम मार्ग है।

16वाँ वित्त आयोग असममित संघवाद को कैसे प्रभावित कर सकता है?

16वाँ वित्त आयोग (कार्यकाल 2026-2031) आपदा-प्रवण एवं संसाधन-न्यून राज्यों हेतु विशेष व्यवहार के पहलुओं की समीक्षा कर रहा है। यह विशेष श्रेणी दर्जे की औपचारिक बहाली के बिना ही असममित राजकोषीय व्यवस्था को नया रूप दे सकता है।

क्या भारत का संघ अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद कम असममित हो गया है?

नहीं। 370 के निरसन से एक प्रमुख असममित प्रावधान समाप्त हुआ, परंतु अनुच्छेद 371-371J, पाँचवीं-छठी अनुसूचियाँ, दिल्ली का sui generis दर्जा, जनजातीय परिषदें तथा राजकोषीय असमता बनी हुई हैं। भारतीय संघ अब भी मूलतः असममित है।