Anantam IASHindi Note · 4 September 2026

भारत में हरित क्रांति: HYV बीज, बोरलॉग, स्वामीनाथन और गेहूँ-चावल का बदलाव

हरित क्रांति ने अनाज की कमी वाले भारत को अनाज बचाने वाला देश बनाया — HYV बीज, सिंचाई, खाद और IADP-IAAP पैकेज। शुरुआत, दौर, उपलब्धियाँ, आलोचनाएँ और पूर्वी भारत का अधूरा काम।

भारत की हरित क्रांति उस तेज़ बदलाव का नाम है जो 1960 के दशक के बीच में अनाज की खेती में शुरू हुआ और गेहूँ मँगाकर पेट भरने वाले देश को अपने गोदाम ख़ुद भरने वाला देश बना गया। यह एक कसे हुए पैकेज पर टिकी थी: CIMMYT और IRRI में तैयार ज़्यादा उपज देने वाली किस्मों (HYV) के बीज, पक्की सिंचाई, रासायनिक खाद, कीटनाशक, और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पक्की ख़रीद। 1970 के दशक की शुरुआत तक गेहूँ का उत्पादन क़रीब दोगुना हो चुका था, और PL-480 के सालों में दिल्ली को जो अनाज की भीख वाली शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी, वह ख़त्म हो गई।

इसकी राजनीतिक याद भी अहम है। 1965 और 1966 में लगातार दो बार मानसून धोखा दे गया, और भारत अमेरिकी गेहूँ के भरोसे “जहाज़ से सीधे थाली तक” (ship-to-mouth) वाली हालत में आ गया। हरित क्रांति सिर्फ़ खेती का प्रोजेक्ट नहीं थी — यह देश की अपनी संप्रभुता का प्रोजेक्ट थी, ताकि कोई विदेशी सरकार दोबारा भारत के पेट को अपनी शर्तों में न बाँध सके।

शुरुआत: जहाज़ से थाली तक की हालत से आत्मनिर्भरता तक

भारत की हरित क्रांति का बीज असल में मैक्सिको में पड़ा। वहाँ कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग ने गेहूँ की ऐसी बौनी किस्में तैयार की थीं जो खाद डालने पर ख़ूब उपज देती थीं और फिर भी गिरती नहीं थीं। परंपरागत गेहूँ के लंबे डंठल खाद से भारी हुई बालियों का बोझ नहीं सँभाल पाते थे और पौधा बिछ जाता था, जबकि मैक्सिको की छोटी किस्में तनकर खड़ी रहती थीं। बोरलॉग के गेहूँ ने 1944 से 1963 के बीच मैक्सिको की पैदावार दोगुनी कर दी और उन्हें 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार दिलाया।

भारत में कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम और आनुवंशिकी वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने बोरलॉग के बीज मँगाने पर ज़ोर दिया, जबकि कई लोग डर रहे थे कि इससे संस्कृति और पर्यावरण दोनों बिगड़ेंगे। 1963 में स्वामीनाथन ने बोरलॉग को भारत बुलाया। 1965-66 तक मैक्सिको के गेहूँ का 18,000 टन बीज — लेर्मा रोजो और सोनोरा 64 — भारत आ चुका था और पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बाँटा जा चुका था। 1966-67 की पहली फ़सल से गेहूँ इतना ज़्यादा हुआ कि उसे रखने की जगह ही समस्या बन गई।

चावल में यही काम फ़िलीपींस के IRRI ने किया, जहाँ IR-8 नाम की बौनी इंडिका किस्म परंपरागत किस्मों से पाँच गुना पैदावार दे रही थी। भारत ने भी जया और पद्मा जैसी अपनी किस्में निकालीं। हरित क्रांति को कई बार गेहूँ की क्रांति भी कहा जाता है, क्योंकि गेहूँ ने चावल से पहले जवाब दिया — पर पंजाब, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की सिंचित पट्टियों में चावल भी बाद में बराबरी पर आ गया।

पैकेज: IADP, IAAP और तीन ज़रूरी चीज़ें

सरकार ने सिर्फ़ बीज नहीं बाँटे। उसने बीज के इर्द-गिर्द पूरी व्यवस्था खड़ी की।

गहन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP)

1960-61 में फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन की मदद से शुरू हुए IADP ने सात ज़िले चुने — हर राज्य से एक — जहाँ सिंचाई पक्की थी और बाक़ी ढाँचा भी ठीक था। हर ज़िले को एक साथ पूरा पैकेज मिला: कर्ज़, खाद, खेती सिखाने वाले कर्मचारी, मिट्टी की जाँच, और फ़सल की पक्की ख़रीद। सबक़ यह निकला कि थोड़ा-थोड़ा पैसा हर जगह बिखेरने से कुछ नहीं होता, जबकि एक जगह सब कुछ झोंक देने से हालत ही बदल जाती है।

गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP)

1964 में यही पैकेज IAAP के तहत 114 ज़िलों तक बढ़ा दिया गया। इसलिए जब तक HYV बीज पहुँचे, तब तक संस्थाओं की पूरी पाइपलाइन तैयार बैठी थी।

सिंचाई, खाद और कीटनाशक — तीनों साथ

HYV बीज कोई जादू नहीं थे। ज़्यादा उपज वे तभी देते थे जब पानी और खाद वक़्त पर मिलें। इसलिए हरित क्रांति को एक साथ तीन चीज़ें चाहिए थीं:

HYV बीज के चारों ओर ये तीनों चीज़ें लपेट दीजिए, और पैकेज ख़ुद को मज़बूत करते जाने वाला सिस्टम बन जाता है। इनमें से कोई एक भी हटा दीजिए, और पैदावार बैठ जाती है।

भूगोल: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी UP ही क्यों

हरित क्रांति पूरे देश में एक जैसी नहीं रही। यह उत्तर-पश्चिम की एक पतली पट्टी — पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश — में सिमट गई, और इसकी कई वजहें एक साथ काम कर रही थीं।

पहली, अंग्रेज़ों के ज़माने की नहरों की वजह से इन राज्यों को देश का सबसे घना सिंचाई नेटवर्क विरासत में मिला था। दूसरी, आज़ादी के बाद पंजाब में चकबंदी हुई, जिससे खेत एक जगह जुड़ गए और मशीनें लगाना फ़ायदे का सौदा बन गया। तीसरी, यहाँ की जाट और सिख किसानी कारोबारी सोच वाली थी और नए इनपुट पर जोखिम लेने को तैयार थी। चौथी, भारतीय खाद्य निगम और नई ख़रीद व्यवस्था ने अच्छे दाम पर ख़रीदार पक्का कर दिया, यानी बाज़ार का जोखिम ही हट गया।

नतीजा ऐतिहासिक रहा। देश के क्षेत्रफल का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत रखने वाला पंजाब हरित क्रांति के चरम पर केंद्रीय पूल के क़रीब 50 प्रतिशत गेहूँ का इंतज़ाम करने लगा। 1965 से 1985 के बीच पंजाब में प्रति हेक्टेयर गेहूँ की पैदावार तीन गुना हो गई।

उपलब्धियाँ

जिस काम के लिए यह चली थी, उस पैमाने पर हरित क्रांति कामयाब रही।

आलोचनाएँ और क़ीमत

हरित क्रांति ने अपनी बीमारियाँ भी पैदा कीं, और आज खेती की नीति पर बहस ज़्यादातर उन्हीं के इर्द-गिर्द होती है।

इलाक़ों के बीच खाई

पैकेज वहीं चला जहाँ पानी, पूँजी और संस्थाएँ पहले से मौजूद थीं। बारिश के भरोसे चलने वाले मध्य और पूर्वी भारत के सूखे इलाक़े — बुंदेलखंड, विदर्भ, पूर्वी UP, बिहार, ओडिशा — बड़े पैमाने पर छूट गए। 1970 और 1980 के दशक में पंजाब और बिहार के बीच प्रति व्यक्ति कृषि आय का फ़र्क़ तेज़ी से बढ़ा।

पर्यावरण की क़ीमत

पंजाब के बीच वाले ज़िलों में भूजल हर साल एक मीटर से ज़्यादा नीचे चला गया। 60 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन में नमक और क्षार फैल गया। कीटनाशकों के अंश खाने की शृंखला में पहुँच गए — बठिंडा से बीकानेर जाने वाली “कैंसर ट्रेन” इसी क़ीमत की सबसे जानी-पहचानी मिसाल बन चुकी है। इसके साथ चलने वाले असर के लिए भारतीय कृषि का मशीनीकरण पढ़िए।

एक ही इलाक़े के भीतर ग़ैर-बराबरी

HYV बीज उन्हीं के काम आए जो ट्यूबवेल, ट्रैक्टर और खाद का ख़र्च उठा सकते थे। छोटे और सीमांत किसान या तो यह पैकेज अपना ही नहीं पाए, या कर्ज़ लेकर अपनाया और उसी कर्ज़ में धँसते चले गए। फ़ायदा गाँव के ऊपरी तबक़े के पास जमा होता गया।

फ़सलों में झुकाव

हरित क्रांति का सारा ध्यान गेहूँ और चावल पर रहा। दालें, तिलहन, मोटे अनाज और ज्वार-बाजरा — यानी ग़रीब की और सूखी ज़मीन वाले किसान की थाली — पीछे छूट गए। भारत आज भी हर साल 20 अरब USD से ज़्यादा का खाने का तेल बाहर से मँगाता है, और यह उसी अनदेखी की देन है।

ख़रीद व्यवस्था से पैदा हुई गड़बड़ी

MSP और FCI वाली व्यवस्था ने गेहूँ और धान की ख़रीद पक्की कर दी, जिससे पंजाब और हरियाणा धान-गेहूँ के उसी चक्र में फँस गए जो वहाँ की ज़मीन और पानी के लिहाज़ से ठीक नहीं है। फ़सल बदलने की कोशिश बार-बार हुई और बार-बार नाकाम रही, क्योंकि ख़रीद का ढाँचा उसका साथ नहीं देता। आज की बहस के लिए MSP का वैधानिकीकरण और उसकी चुनौतियाँ देखिए।

दूसरी हरित क्रांति: पूर्वी भारत

1990 के दशक तक साफ़ हो गया था कि पंजाब-हरियाणा में पैदावार और बढ़ाना महँगा भी पड़ेगा और पर्यावरण को और नुक़सान भी पहुँचाएगा। दूसरी तरफ़ पूर्वी पट्टी — बिहार, पूर्वी UP, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम — में भूजल, उपजाऊ मिट्टी और मज़दूर, तीनों भरपूर थे, पर पहली लहर वहाँ पहुँची ही नहीं थी।

पूर्वी भारत में हरित क्रांति लाने वाला कार्यक्रम (BGREI) 2010-11 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत शुरू हुआ। इसका ज़ोर धान की पैदावार बढ़ाने, पानी सँभालने के ढाँचे खड़े करने, जगह के हिसाब से पोषक तत्व देने और खेती में मशीनें लाने पर है। कार्यक्रम शुरू होने के बाद से बिहार में चावल का उत्पादन क़रीब दोगुना हुआ है, और पश्चिम बंगाल आज भी देश के सबसे बड़े चावल उत्पादकों में है।

यह दूसरी लहर हरित क्रांति का अधूरा काम है। पूर्वी भारत को ऊपर उठाते हुए पहली लहर वाली पर्यावरण की ग़लतियाँ दोहराई न जाएँ — इस दशक में खेती की नीति का सबसे बड़ा सवाल यही है।

सदाबहार क्रांति: स्वामीनाथन का नज़रिया

अपने बाद के कामों में स्वामीनाथन ने सदाबहार क्रांति (Evergreen Revolution) की बात रखी — यानी ऐसी पैदावार जो “हमेशा के लिए बढ़े, और पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाए बिना बढ़े”। इसके औज़ार अलग हैं: सटीक खेती, कीट नियंत्रण का मिला-जुला तरीक़ा, जहाँ फ़बे वहाँ जैविक और प्राकृतिक खेती, जलवायु झेल सकने वाली किस्में, सूक्ष्म सिंचाई, और दालों, तिलहन, बाग़वानी, डेयरी और मछली पालन में फैलाव।

दूध की कहानी का अपना सिलसिला है — देखिए भारत में श्वेत क्रांति और उससे जुड़ी भारत में पशुपालन और डेयरी की राह। मछली पालन की कहानी भारत में नीली क्रांति और भारत में मत्स्य पालन में है। ये तीनों क्रांतियाँ पहली वाली के उसी तरीक़े से निकली हैं, जिसमें संस्थाएँ पहले खड़ी की जाती हैं।

UPSC के लिहाज़ से: क्या याद रखें

मेन्स GS-III में हरित क्रांति खाद्य सुरक्षा, तकनीक, पर्यावरण और बराबरी — इन चारों के जोड़ पर बैठती है। जवाब की जमी-जमाई लाइन यह है कि अनाज के आयात वाली आपात हालत में यह टाली नहीं जा सकती थी, अनाज का ढेर लगाने के अपने सीमित मक़सद में यह शानदार तरीक़े से कामयाब रही, इलाक़ों की खाई और पर्यावरण के नुक़सान के रूप में इसकी क़ीमत अब भारतीय कृषि के सामने सबसे आगे खड़ी है, और अगला दौर सदाबहार, पूर्व की तरफ़ झुका हुआ और कई फ़सलों वाला होना चाहिए।

इस पूरी कहानी का जीवन-सूत्र एम.एस. स्वामीनाथन से होकर गुज़रता है — वही वैज्ञानिक जिसने इस प्रोजेक्ट का भारतीय सिरा थामा और बाद में इसका सबसे साफ़ बोलने वाला आलोचक और सुधारक बना। बोरलॉग ने गेहूँ दिया; स्वामीनाथन ने संस्थाओं का ढाँचा और राजनीतिक इच्छाशक्ति दी।

सामान्य प्रश्न

भारत की हरित क्रांति क्या है?

भारत की हरित क्रांति उस पैकेज का नाम है जिसमें ज़्यादा उपज देने वाली किस्मों (HYV) के बीज, सिंचाई, खाद, कीटनाशक और ख़रीद की गारंटी शामिल थी। 1960 के दशक के बीच से इसी पैकेज ने खाद्यान्न उत्पादन तेज़ी से बढ़ाया और भारत की अनाज आयात पर निर्भरता ख़त्म कर दी। इसका केंद्र पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूँ और चावल रहे।

भारत में हरित क्रांति कब शुरू हुई?

संस्थाओं की तैयारी 1960-61 के गहन कृषि जिला कार्यक्रम से शुरू हुई थी, लेकिन असली मोड़ 1966-67 की फ़सल थी, जब नॉर्मन बोरलॉग की तैयार की हुई मैक्सिकन HYV गेहूँ किस्में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी UP में बोई गईं।

भारत में हरित क्रांति का जनक किसे कहा जाता है?

एम.एस. स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है। उन्होंने नॉर्मन बोरलॉग के साथ मिलकर मैक्सिको की बौनी गेहूँ किस्में मँगवाईं और यहाँ के हालात के हिसाब से ढालीं, उनके इर्द-गिर्द संस्थाओं का पूरा ढाँचा खड़ा किया, और शुरुआती उड़ान के सालों में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की अगुवाई की।

हरित क्रांति में कौन-से मुख्य HYV बीज इस्तेमाल हुए?

गेहूँ में मुख्य HYV किस्में मैक्सिको से आईं लेर्मा रोजो और सोनोरा 64 थीं, और उनके बाद भारत में तैयार कल्याण सोना और सोनालिका आईं। चावल में बुनियादी किस्म फ़िलीपींस के IRRI की IR-8 रही, और भारत में जया और पद्मा विकसित हुईं।

भारत की हरित क्रांति की आलोचनाएँ क्या रही हैं?

बड़ी आलोचनाएँ ये हैं: इलाक़ों के बीच खाई (फ़ायदा उत्तर-पश्चिम में सिमटा), पर्यावरण को नुक़सान (भूजल नीचे जाना, ज़मीन में नमक, कीटनाशकों के अंश), एक ही इलाक़े के भीतर ग़ैर-बराबरी (बड़े किसानों को छोटे किसानों से ज़्यादा फ़ायदा), फ़सलों में झुकाव (दालों और मोटे अनाजों के मुक़ाबले गेहूँ-चावल को तरजीह), और MSP की ख़रीद के ज़रिए धान-गेहूँ के चक्र में फँस जाना।

दूसरी हरित क्रांति क्या है?

दूसरी हरित क्रांति का मतलब है गहन खेती को पूर्वी भारत — बिहार, पूर्वी UP, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम — तक ले जाना, जिसके लिए 2010-11 में पूर्वी भारत में हरित क्रांति लाने वाला कार्यक्रम (BGREI) शुरू किया गया। मक़सद यह है कि पूर्व के पानी और मिट्टी का इस्तेमाल हो, पर पहली लहर वाला पर्यावरणीय नुक़सान न दोहराया जाए।

सदाबहार क्रांति क्या है?

सदाबहार क्रांति एम.एस. स्वामीनाथन का बाद का नज़रिया है, जिसमें पैदावार बढ़े पर पर्यावरण को नुक़सान न पहुँचे। इसमें सटीक खेती, कीट नियंत्रण का मिला-जुला तरीक़ा, जलवायु झेल सकने वाले बीज, सूक्ष्म सिंचाई, और दालों, तिलहन, बाग़वानी, डेयरी और मछली पालन में फैलाव शामिल हैं।

हरित क्रांति ने भारत की खाद्य सुरक्षा पर क्या असर डाला?

हरित क्रांति ने 1971 तक PL-480 के गेहूँ आयात पर निर्भरता ख़त्म कर दी, वे बफ़र स्टॉक खड़े किए जिन पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली चलती है, और 2013 के भोजन के अधिकार क़ानून को पैसे के लिहाज़ से मुमकिन बनाया। 1943 के बंगाल जैसे औपनिवेशिक ढर्रे का अकाल फिर नहीं लौटा।