Anantam IASHindi Note · 18 April 2026

भारत में क्षेत्रवाद — कारण, रूप, प्रभाव और छोटे राज्यों की बहस (यूपीएससी भारतीय समाज)

भारत में क्षेत्रवाद के कारण, विभिन्न रूप, राष्ट्रीय एकता पर प्रभाव और छोटे राज्यों की माँग का यूपीएससी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण।

क्षेत्रवाद (Regionalism) भारत की राजनीति और समाज की एक प्रमुख विशेषता है। यह भावना है कि किसी क्षेत्र विशेष के लोगों के हित, पहचान और संस्कृति राष्ट्रीय हितों से अलग हैं — और इन्हें विशेष सुरक्षा या स्वायत्तता मिलनी चाहिए। यूपीएससी में यह विषय समाज, राजव्यवस्था और राष्ट्रीय एकता तीनों संदर्भों में महत्त्वपूर्ण है।

क्षेत्रवाद के कारण

क्षेत्रवाद के रूप

भाषायी क्षेत्रवाद

तमिलनाडु में हिंदी विरोध, महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता, असम में बांग्लाभाषियों का विरोध।

जनजातीय क्षेत्रवाद

पूर्वोत्तर भारत में अनेक जनजातियों की पृथक् राज्य की माँग। नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम में अलगाववादी आंदोलन।

पुत्र-भूमि भावना (Son of the Soil)

स्थानीय लोगों को रोज़गार और संसाधन में प्राथमिकता की माँग। मुंबई में शिव सेना का आंदोलन इसका उदाहरण है।

आर्थिक क्षेत्रवाद

पिछड़े क्षेत्रों की विकास में उचित हिस्सेदारी की माँग। विदर्भ, सौराष्ट्र, तेलंगाना पहले पृथक् राज्य की माँग करते थे।

क्षेत्रवाद का प्रभाव

नकारात्मक प्रभाव

सकारात्मक पहलू

छोटे राज्यों की बहस

2000 में छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड और 2014 में तेलंगाना का निर्माण इस बहस का परिणाम है। छोटे राज्यों के समर्थक तर्क देते हैं कि वे प्रशासनिक दृष्टि से अधिक कुशल और जवाबदेह होते हैं। विरोधी तर्क है कि राजनीतिक अस्थिरता, संसाधनों का विभाजन और केंद्र पर निर्भरता बढ़ती है।

राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC, 1953)

फज़ल अली के नेतृत्व में गठित SRC ने 1956 में भाषावार राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की। इससे 14 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश बने। यह पुनर्गठन क्षेत्रवाद को शांत करने का एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

यूपीएससी के लिए महत्त्वपूर्ण बिंदु

सामान्य प्रश्न

भारत में क्षेत्रवाद के मुख्य कारण क्या हैं?

भाषाई पहचान, आर्थिक असमानता, सांस्कृतिक विशिष्टता, बाहरी प्रवासन का डर और राजनीतिक उपेक्षा की भावना भारत में क्षेत्रवाद के प्रमुख कारण हैं।

राज्य पुनर्गठन आयोग क्या था?

1953 में गठित SRC (फज़ल अली की अध्यक्षता में) ने भाषावार राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की जो 1956 में लागू हुई — इससे 14 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश बने।