UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

भारत में क्षेत्रवाद — कारण, रूप, प्रभाव और छोटे राज्यों की बहस (यूपीएससी भारतीय समाज)

भारत में क्षेत्रवाद के कारण, विभिन्न रूप, राष्ट्रीय एकता पर प्रभाव और छोटे राज्यों की माँग का यूपीएससी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण।

Regionalism in India — Causes, Forms, Impact and the Smaller States Debate (UPSC Indian Society) — UPSC featured image

क्षेत्रवाद (Regionalism) भारत की राजनीति और समाज की एक प्रमुख विशेषता है। यह भावना है कि किसी क्षेत्र विशेष के लोगों के हित, पहचान और संस्कृति राष्ट्रीय हितों से अलग हैं — और इन्हें विशेष सुरक्षा या स्वायत्तता मिलनी चाहिए। यूपीएससी में यह विषय समाज, राजव्यवस्था और राष्ट्रीय एकता तीनों संदर्भों में महत्त्वपूर्ण है।

क्षेत्रवाद के कारण

  • भाषाई पहचान: भाषावार राज्यों के पुनर्गठन के बावजूद भाषाई टकराव।
  • आर्थिक असमानता: विकसित और पिछड़े क्षेत्रों के बीच अंतर।
  • सांस्कृतिक विशिष्टता: विशेष रीति-रिवाज, परंपराएँ और पहचान।
  • प्रवासन और जनसंख्या दबाव: बाहरी लोगों के आगमन से स्थानीय लोगों में असुरक्षा।
  • राजनीतिक उपेक्षा: केंद्र सरकार का भेदभाव या अनदेखी की भावना।
  • ऐतिहासिक कारण: औपनिवेशिक काल में अलग प्रशासन।

क्षेत्रवाद के रूप

भाषायी क्षेत्रवाद

तमिलनाडु में हिंदी विरोध, महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता, असम में बांग्लाभाषियों का विरोध।

जनजातीय क्षेत्रवाद

पूर्वोत्तर भारत में अनेक जनजातियों की पृथक् राज्य की माँग। नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम में अलगाववादी आंदोलन।

पुत्र-भूमि भावना (Son of the Soil)

स्थानीय लोगों को रोज़गार और संसाधन में प्राथमिकता की माँग। मुंबई में शिव सेना का आंदोलन इसका उदाहरण है।

आर्थिक क्षेत्रवाद

पिछड़े क्षेत्रों की विकास में उचित हिस्सेदारी की माँग। विदर्भ, सौराष्ट्र, तेलंगाना पहले पृथक् राज्य की माँग करते थे।

क्षेत्रवाद का प्रभाव

नकारात्मक प्रभाव

  • राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा।
  • सांप्रदायिक तनाव और हिंसा।
  • आर्थिक विकास में बाधा।
  • बाहरी शक्तियों द्वारा शोषण का अवसर।

सकारात्मक पहलू

  • स्थानीय पहचान और संस्कृति की रक्षा।
  • जनभागीदारी और विकेंद्रीकरण को बढ़ावा।
  • छोटे राज्यों में बेहतर प्रशासन।

छोटे राज्यों की बहस

2000 में छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड और 2014 में तेलंगाना का निर्माण इस बहस का परिणाम है। छोटे राज्यों के समर्थक तर्क देते हैं कि वे प्रशासनिक दृष्टि से अधिक कुशल और जवाबदेह होते हैं। विरोधी तर्क है कि राजनीतिक अस्थिरता, संसाधनों का विभाजन और केंद्र पर निर्भरता बढ़ती है।

राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC, 1953)

फज़ल अली के नेतृत्व में गठित SRC ने 1956 में भाषावार राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की। इससे 14 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश बने। यह पुनर्गठन क्षेत्रवाद को शांत करने का एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

यूपीएससी के लिए महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • क्षेत्रवाद के कारण: भाषा, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, प्रवासन।
  • रूप: भाषायी, जनजातीय, पुत्र-भूमि, आर्थिक।
  • SRC 1953: भाषावार पुनर्गठन।
  • छोटे राज्य: तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड।
  • संतुलन: क्षेत्रीय पहचान बनाम राष्ट्रीय एकता।

सामान्य प्रश्न

भारत में क्षेत्रवाद के मुख्य कारण क्या हैं?

भाषाई पहचान, आर्थिक असमानता, सांस्कृतिक विशिष्टता, बाहरी प्रवासन का डर और राजनीतिक उपेक्षा की भावना भारत में क्षेत्रवाद के प्रमुख कारण हैं।

राज्य पुनर्गठन आयोग क्या था?

1953 में गठित SRC (फज़ल अली की अध्यक्षता में) ने भाषावार राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की जो 1956 में लागू हुई — इससे 14 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश बने।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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