एनीमिया मुक्त भारत: 6×6×6 रणनीति UPSC के लिए आसान भाषा में
एनीमिया मुक्त भारत बच्चों, किशोरों और महिलाओं में ख़ून की कमी घटाने की राष्ट्रीय रणनीति है — छह उपाय, छह समूह, छह तंत्र। NFHS-5 के आँकड़े, IFA, टेस्ट–ट्रीट–टॉक और राज्यों का डैशबोर्ड।
एनीमिया मुक्त भारत पूरे जीवन-चक्र में ख़ून की कमी (anaemia) घटाने की भारत की राष्ट्रीय रणनीति है, जिसे 2018 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने शुरू किया। यह 6×6×6 ढाँचे पर खड़ी है — छह उपाय, छह लक्षित समूह और संस्थाओं के स्तर पर छह तंत्र (institutional mechanisms)। एनीमिया मुक्त भारत गर्भवती महिलाओं, दूध पिलाने वाली माताओं, किशोरों और बच्चों को आयरन–फ़ोलिक एसिड (IFA) की गोलियाँ, पेट के कीड़े मारने की दवा, व्यवहार बदलने वाले संदेश और गंभीर एनीमिया का इलाज देती है। यह मिशन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के लगातार दौरों के शर्मिंदा करने वाले आँकड़ों से निकला — NFHS-5 (2019–21) तक 15–49 साल की 57 प्रतिशत महिलाएँ, 59.1 प्रतिशत किशोरियाँ और 6–59 महीने के चौंका देने वाले 67.1 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार थे। एनीमिया मुक्त भारत बड़े पोषण अभियान का ज़मीनी हिस्सा है और केंद्र के स्वास्थ्य डैशबोर्ड पर सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले सूचकों में से एक है।
UPSC के लिहाज़ से एनीमिया मुक्त भारत GS-II की महिला और बाल कल्याण योजनाओं, GS-III की खाद्य सुरक्षा और जन-स्वास्थ्य, और समाज कल्याण वैकल्पिक — तीनों जगह बैठता है। NFHS-4 से NFHS-5 के बीच एनीमिया बढ़ गया, और यही बात इसे इस सवाल पर निबंध और इंटरव्यू का पसंदीदा विषय बना देती है कि बड़े पैमाने की गोली बाँटने वाली योजनाएँ नतीजे क्यों नहीं दे पातीं।
पृष्ठभूमि: भारत में एनीमिया का बोझ

एनीमिया वह हालत है जिसमें ख़ून में हीमोग्लोबिन का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय किए उम्र और लिंग के हिसाब वाले पैमाने से नीचे चला जाए — पाँच साल से छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं में 11 g/dl से कम, ग़ैर-गर्भवती महिलाओं में 12 g/dl से कम। भारत में इसकी सबसे आम वजह आयरन की कमी है, पर फ़ोलेट और विटामिन B12 की कमी, हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियाँ (थैलेसीमिया, सिकल सेल) और पुरानी बीमारियाँ भी इसमें जुड़ती हैं। गर्भावस्था में एनीमिया माँ की मौत का ख़तरा, कम वज़न का बच्चा और शिशु मृत्यु बढ़ाता है; बच्चों में यह दिमाग़ी विकास पर असर डालता है; किशोरों में काम की क्षमता और स्कूल का प्रदर्शन गिरा देता है।
भारत के एनीमिया कार्यक्रम का इतिहास 1970 के राष्ट्रीय पोषण एनीमिया रोकथाम कार्यक्रम, किशोर एनीमिया नियंत्रण कार्यक्रम और 2013 की राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल (NIPI) तक जाता है। ये पुराने कार्यक्रम कम समूहों तक पहुँचते थे, इनकी सप्लाई चेन कमज़ोर थी और नापने का कोई ढाँचा ही नहीं था। एनीमिया मुक्त भारत इन सबको एक ढाँचे में लाता है और साथ में एक सार्वजनिक डैशबोर्ड देता है।
एनीमिया मुक्त भारत की ज़रूरत क्यों पड़ी
NFHS-4 (2015–16) के आँकड़ों ने दिखाया कि हर उम्र वर्ग में एनीमिया या तो वहीं ठहरा हुआ था या और बिगड़ चुका था। चल रहे कार्यक्रम लाभार्थियों तक पहुँच ही नहीं रहे थे — IFA की गोलियाँ स्टॉक में नहीं रहती थीं, कीड़े मारने की दवा एक साथ नहीं दी जाती थी, और किशोरों तक पहुँच अधूरी थी। एनीमिया मुक्त भारत को विज्ञान बदलने के लिए नहीं, पहुँचाने की गड़बड़ी सुधारने के लिए बनाया गया।
6×6×6 रणनीति
एनीमिया मुक्त भारत की सबसे बड़ी पहचान इसका 6×6×6 ढाँचा है। UPSC में AMB पर सवाल लगभग हमेशा इसी को टटोलते हैं।
छह लाभार्थी समूह
- 6–59 महीने के बच्चे
- 5–9 साल के बच्चे
- 10–19 साल की किशोरियाँ और किशोर
- प्रजनन उम्र (20–49 साल) की महिलाएँ
- गर्भवती महिलाएँ
- दूध पिलाने वाली माताएँ
छह उपाय
- बचाव के तौर पर आयरन और फ़ोलिक एसिड की गोलियाँ देना
- एल्बेंडाज़ोल से पेट के कीड़े मारना
- साल भर चलने वाला तेज़ व्यवहार-बदलाव संदेश, जिसमें टेस्ट–ट्रीट–टॉक तरीक़ा शामिल है
- डिजिटल इनवेसिव हीमोग्लोबिनोमीटर से एनीमिया की जाँच, फिर कम गंभीर और गंभीर — दोनों तरह के एनीमिया का इलाज
- सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में आयरन-फ़ोलिक एसिड से फ़ोर्टिफ़ाइड खाना देना ज़रूरी करना
- जिन इलाक़ों में एनीमिया की ग़ैर-पोषण वजहें ज़्यादा हैं, वहाँ उन पर जागरूकता, जाँच और इलाज बढ़ाना — मलेरिया, हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियाँ और फ़्लोरोसिस
संस्थाओं के स्तर पर छह तंत्र
- मंत्रालय के भीतर तालमेल
- दूसरे मंत्रालयों के साथ मेल
- सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स मज़बूत करना
- एनीमिया मुक्त भारत डैशबोर्ड के ज़रिए रिपोर्टिंग मज़बूत करना
- WCD, शिक्षा और पंचायती राज के साथ अंतर-क्षेत्रीय मेल
- NITI आयोग और बाहरी एजेंसियों से पक्की निगरानी और मूल्यांकन
आयरन और फ़ोलिक एसिड की गोलियाँ
एनीमिया मुक्त भारत की रीढ़ उम्र के हिसाब से दी जाने वाली आयरन और फ़ोलिक एसिड की ख़ुराक है। 6–59 महीने के बच्चों को आँगनवाड़ी केंद्रों से हफ़्ते में दो बार 1 ml IFA सिरप मिलता है। स्कूल जाने वाले 5–9 साल के बच्चों को हफ़्ते में एक गुलाबी IFA गोली मिलती है। 10–19 साल के किशोरों को स्कूलों और आँगनवाड़ियों के ज़रिए चलने वाले साप्ताहिक आयरन और फ़ोलिक एसिड कार्यक्रम (WIFS) के तहत हफ़्ते में एक नीली गोली मिलती है। गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाओं को गर्भावस्था के चौथे महीने से 180 दिन तक हर दिन लाल IFA गोली दी जाती है, और प्रसव के बाद भी 180 दिन तक।
कवरेज पर नज़र स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (HMIS) और anemiamuktbharat.info पर बने AMB डैशबोर्ड से रखी जाती है।
टेस्ट, ट्रीट और टॉक
टेस्ट–ट्रीट–टॉक इलाज वाला खंभा है। हर गर्भवती महिला का हीमोग्लोबिन उसकी पहली प्रसव-पूर्व जाँच पर उप-केंद्र में डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर से नापा जाता है। एनीमिया को हल्का (10–10.9 g/dl), मध्यम (7–9.9 g/dl) या गंभीर (7 से कम) में बाँटा जाता है। हल्के और मध्यम मामलों में मुँह से ली जाने वाली IFA और काउंसलिंग मिलती है; गंभीर मामलों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर नस के रास्ते आयरन सुक्रोज़ चढ़ता है या ज़िला अस्पताल भेजा जाता है। किशोरियों की जाँच स्कूलों में होती है। पाँच साल से छोटे बच्चों की जाँच आँगनवाड़ी केंद्रों और ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस पर होती है।
टॉक वाला हिस्सा हर मिलने की जगह पर तय ढंग की काउंसलिंग है — प्रसव-पूर्व क्लिनिक, स्कूल, आँगनवाड़ी — जिसमें खाने में विविधता, IFA नियमित लेने, साइड इफ़ेक्ट (क़ब्ज़, काला मल) और पूरा कोर्स ख़त्म करने की अहमियत पर बात होती है।
AMB डैशबोर्ड
एनीमिया मुक्त भारत डैशबोर्ड राज्यों और ज़िलों का लगातार अपडेट होने वाला स्कोरकार्ड छापता है, जिसमें छह लाभार्थी समूहों तक IFA की पहुँच, कीड़े मारने की दवा की पहुँच और व्यवहार-बदलाव की गतिविधियों से बना इंडेक्स होता है। इस डैशबोर्ड से राज्यों में होड़ पैदा होती है — मध्य प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश बारी-बारी से ऊपर रहे हैं, जबकि झारखंड, असम और त्रिपुरा जूझते रहे हैं। यह इंडेक्स हर तिमाही आता है और NITI आयोग के आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम में इस पर बारीक नज़र रहती है।
NFHS-5: आँकड़े क्या कहते हैं
NFHS-5 (2019–21) AMB शुरू होने के बाद का पहला राष्ट्रीय सर्वेक्षण था। नतीजा निराश करने वाला रहा — हर उम्र वर्ग में एनीमिया बढ़ गया।
- 6–59 महीने के बच्चे: एनीमिया 58.6 प्रतिशत (NFHS-4) से बढ़कर 67.1 प्रतिशत
- 15–49 साल की महिलाएँ: 53.1 से बढ़कर 57 प्रतिशत
- 15–49 साल की गर्भवती महिलाएँ: 50.4 से बढ़कर 52.2 प्रतिशत
- 15–49 साल के पुरुष: 23.2 से बढ़कर 25 प्रतिशत
बच्चों में गंभीर एनीमिया भी बढ़ा। ज़मीनी अध्ययन बताते हैं कि इस बिगड़ने के पीछे महामारी के दौर में आँगनवाड़ी सेवाओं का टूटना, नापने का तरीक़ा नस से लिए ख़ून से बदलकर उँगली के ख़ून पर आना और खाने की आदतों में बदलाव हैं — पर ये चेतावनी के संकेत हैं, इन्हें सफ़ाई नहीं माना जा सकता।
दूसरी योजनाओं के साथ मेल
एनीमिया मुक्त भारत दूसरे जन-स्वास्थ्य और पोषण मिशनों से गहरा जुड़ा है। PDS, ICDS और मध्याह्न भोजन में आयरन से फ़ोर्टिफ़ाइड चावल भारत में खाद्य फ़ोर्टिफ़िकेशन की उसी मुहिम का हिस्सा है। आँगनवाड़ी से IFA सिरप बाँटने का काम पोषण अभियान के ढाँचे पर ही चलता है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के हेल्थ अकाउंट से जोड़ना अगला तय क़दम है, ताकि जगह बदलने पर भी किशोरों का IFA लेना ट्रैक हो सके।
एनीमिया मुक्त भारत के सामने चुनौतियाँ
- मुश्किल भूगोल वाले ज़िलों के उप-केंद्रों पर IFA गोलियाँ ख़त्म हो जाना
- नियमित लेना: सिर्फ़ 30–40 प्रतिशत गर्भवती महिलाएँ बताती हैं कि उन्होंने पूरा 180 दिन का कोर्स लिया
- साइड इफ़ेक्ट (जी मिचलाना, क़ब्ज़) की वजह से लोग बीच में छोड़ देते हैं
- निजी और बिना सहायता वाले स्कूलों के किशोर WIFS के दायरे से बाहर रह जाते हैं
- ग़ैर-पोषण वजहों — मलेरिया, हुकवर्म, हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियाँ — पर काम असमान है
- डिजिटल और नस से लिए ख़ून वाले हीमोग्लोबिनोमीटर के नतीजों में फ़र्क़
- उप-केंद्र के स्तर पर आँकड़ों की थकान — कई रजिस्टर, जाँच का कमज़ोर तरीक़ा
आगे का रास्ता
- हर जगह (स्कूल, आँगनवाड़ी, प्रसव-पूर्व क्लिनिक) सही कैलिब्रेट की गई मशीनों से सबकी जाँच
- मध्यम एनीमिया के लिए PHC पर ही नस के रास्ते आयरन सुक्रोज़ देना शुरू करना
- सभी आकांक्षी ज़िलों में PDS के तहत फ़ोर्टिफ़ाइड चावल का दायरा बढ़ाना
- व्यवहार बदलने के संदेश को स्थानीय खान-पान और मोटे अनाज को बढ़ावा देने से जोड़ना
- राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत आदिवासी ब्लॉकों में सिकल सेल जाँच के साथ जोड़ना
- हर किशोर का IFA लेना अलग-अलग ट्रैक करने के लिए ABDM हेल्थ अकाउंट से जोड़ना
- पोषण 2.0 के तहत AMB की निगरानी मज़बूत करना
निष्कर्ष
एनीमिया मुक्त भारत किसी भी बड़े देश का शुरू किया सबसे महत्वाकांक्षी एनीमिया कार्यक्रम है। 6×6×6 का डिज़ाइन तकनीकी तौर पर ठीक है और डैशबोर्ड जवाबदेही बनाता है, फिर भी NFHS-5 दिखाता है कि व्यवस्था अब तक गोली नियमित लेने और सप्लाई चेन की गुत्थी नहीं सुलझा पाई। UPSC के लिए एनीमिया मुक्त भारत उस अच्छे बने जन-स्वास्थ्य मिशन का सबसे साफ़ उदाहरण है जिसकी असली अड़चन अमल में है, और यह याद दिलाता है कि पोषण के नतीजों के लिए सप्लाई जितनी ही ज़रूरी लोगों की आदत बदलना भी है।
सामान्य प्रश्न
एनीमिया मुक्त भारत क्या है?
एनीमिया मुक्त भारत भारत सरकार की वह राष्ट्रीय रणनीति है, जो 2018 में शुरू हुई और पूरे जीवन-चक्र में ख़ून की कमी घटाने के लिए 6×6×6 ढाँचा अपनाती है — छह उपाय, छह लाभार्थी समूह और संस्थाओं के स्तर पर छह तंत्र।
एनीमिया मुक्त भारत की 6×6×6 रणनीति क्या है?
इसका मतलब है छह लक्षित लाभार्थी समूह (6–59 महीने के बच्चे, 5–9 साल के बच्चे, किशोर, महिलाएँ, गर्भवती महिलाएँ, दूध पिलाने वाली माताएँ), छह उपाय (IFA, कीड़े मारने की दवा, BCC, टेस्ट–ट्रीट–टॉक, फ़ोर्टिफ़ाइड खाना, ग़ैर-पोषण वजहें) और संस्थाओं के स्तर पर छह तंत्र (तालमेल, सप्लाई चेन, डैशबोर्ड, दूसरे विभागों से मेल, निगरानी, संदेश)।
NFHS-5 भारत में एनीमिया के बारे में क्या कहता है?
NFHS-5 के मुताबिक़ 6–59 महीने के बच्चों में 67.1 प्रतिशत, 15–49 साल की महिलाओं में 57 प्रतिशत और गर्भवती महिलाओं में 52.2 प्रतिशत एनीमिया है — यानी हर वर्ग में NFHS-4 से ज़्यादा।
एनीमिया मुक्त भारत में टेस्ट, ट्रीट और टॉक क्या है?
यह इलाज वाला खंभा है, जिसमें हर मुलाक़ात पर हीमोग्लोबिन की जाँच, गंभीरता के हिसाब से मुँह से या नस के रास्ते आयरन देना, और खान-पान और गोली नियमित लेने पर तय ढंग की काउंसलिंग शामिल है।
WIFS कार्यक्रम क्या है?
साप्ताहिक आयरन और फ़ोलिक एसिड कार्यक्रम 10–19 साल के किशोरों को स्कूलों और आँगनवाड़ी केंद्रों के ज़रिए हफ़्ते में एक IFA गोली देता है।
एनीमिया मुक्त भारत कौन-सा मंत्रालय चलाता है?
एनीमिया मुक्त भारत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय चलाता है, और ICDS और आँगनवाड़ी से जुड़े कामों के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के साथ मिलकर काम करता है।
एनीमिया मुक्त भारत के बावजूद एनीमिया क्यों बढ़ा?
महामारी में आँगनवाड़ियों का काम टूटना, IFA गोलियों का स्टॉक ख़त्म होना, गोली लगातार लेने में थकान, नापने के तरीक़े का बदलना और ग़ैर-पोषण वजहें (मलेरिया, हुकवर्म, हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियाँ) — ये सब इसकी वजहें हैं।
AMB डैशबोर्ड क्या है?
anemiamuktbharat.info पर बना एनीमिया मुक्त भारत डैशबोर्ड हर तिमाही एक इंडेक्स छापता है, जो राज्यों और ज़िलों को IFA की पहुँच, कीड़े मारने की दवा और व्यवहार-बदलाव की गतिविधियों पर रैंक करता है और इस तरह राज्यों में होड़ पैदा करता है।