Anantam IASHindi Note · 3 September 2026

हिल्टन-यंग आयोग 1926: भारत की मुद्रा का लंगर और रिज़र्व बैंक की सिफ़ारिश

भारतीय मुद्रा और वित्त पर हिल्टन-यंग शाही आयोग (1926) ने रुपये-स्टर्लिंग दर 1s 6d पर तय की, गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड सुझाया और उस केंद्रीय बैंक का प्रस्ताव रखा जो आगे चलकर भारतीय रिज़र्व बैंक बना।

हिल्टन-यंग आयोग (1926) — औपचारिक नाम भारतीय मुद्रा और वित्त पर शाही आयोग (Royal Commission on Indian Currency and Finance) — सबसे ज़्यादा इसी बात के लिए जाना जाता है कि इसकी रिपोर्ट ने पहली बार भारत के लिए एक केंद्रीय बैंक की सिफ़ारिश की, और उसी सिफ़ारिश से 1935 में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) खड़ा हुआ। एडवर्ड हिल्टन-यंग की अध्यक्षता वाला यह आयोग अगस्त 1925 में बना और जुलाई 1926 में रिपोर्ट सौंपी। इसी ने रुपये-स्टर्लिंग की विनिमय दर 1s 6d (₹15 = £1) पर तय की और गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड का सुझाव दिया।

एडवर्ड हिल्टन-यंग की अध्यक्षता वाला भारतीय मुद्रा और वित्त पर शाही आयोग, जिसे हिल्टन-यंग आयोग कहा जाता है, अगस्त 1925 में बना और जुलाई 1926 में उसने रिपोर्ट दी। इसके काम के दायरे में भारत की मुद्रा का टिकाऊपन, रुपये और पाउंड स्टर्लिंग के बीच सही विनिमय अनुपात, भारत में केंद्रीय बैंक का सवाल, और शाही ख़ज़ाने (Imperial Treasury) तथा भारतीय राजकोषीय मामलों के आपसी रिश्ते — सब शामिल थे। 1926 में इसने जो फ़ैसले लिए, ख़ासकर रुपये-स्टर्लिंग दर को बनावटी तरीक़े से तय करना और गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड की सिफ़ारिश, उन्होंने बाक़ी पूरे औपनिवेशिक दौर और भारत के शुरुआती केंद्रीय बैंकिंग अनुभव में मौद्रिक व्यवस्था की चाल तय की।

आयोग के सामने मुद्रा का सवाल

भारत ने 1920 के दशक में ऐसी मुद्रा व्यवस्था के साथ क़दम रखा जो दस साल की उथल-पुथल से पहले ही चरमरा चुकी थी। पहले विश्वयुद्ध ने चाँदी की सोने में क़ीमत तेज़ी से बढ़ा दी थी, और 1898 की फ़ाउलर समिति ने रुपये को जिस 1 शिलिंग 4 पेंस (1s 4d) पर बाँधा था, वह 1919-20 में बुरी तरह ऊपर-नीचे होता रहा। 1919 की बैबिंगटन स्मिथ समिति ने दर बढ़ाकर 2 शिलिंग (2s) करने की सिफ़ारिश की थी; भारत सरकार ने फ़रवरी 1920 में यह दर मान ली और लगभग तुरंत ही उसे बचा पाने में नाकाम रही। 1921 तक रुपया लुढ़ककर क़रीब 1s 3d पर आ गया। 1920 के दशक का पहला आधा हिस्सा 1s 4d से 1s 6d के बीच डोलते रहने में बीता।

हिल्टन-यंग आयोग इसी उलझन को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए बनाया गया। आयोग के ग्यारह सदस्यों में लियोनेल रॉबिंस, सर रेजिनाल्ड मैंट और कुछ भारतीय प्रतिनिधि थे — इनमें सबसे अहम सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, जिन्होंने आगे चलकर मशहूर असहमति नोट दर्ज किया।

विनिमय दर का फ़ैसला

आयोग ने रुपये-स्टर्लिंग दर 1 शिलिंग 6 पेंस सोना (1s 6d) पर तय करने की सिफ़ारिश की — यानी ₹15 = £1 स्टर्लिंग।

यह दो मायनों में *बनावटी तौर पर तय की गई* दर थी। पहला, यह पिछले दस साल में बाज़ार में चल रही दर से ज़्यादातर वक़्त ऊँची थी। दूसरा, भारत सरकार ने केंद्रीय बैंक की बाज़ार कार्रवाइयों से इसे बचाए रखने का वादा किया, चाहे भुगतान संतुलन का दबाव कुछ भी हो।

आयोग ने 1s 6d की दर को कई आधारों पर सही ठहराया। उसके बताए मुख्य कारण ये थे:

असहमति — ठाकुरदास का नोट और भारतीय कारोबारियों के इसी तरह के तर्क — यह कहती थी कि 1s 6d बहुत ऊँची है; यह दर भारतीय निर्यातकों (ख़ासकर सूती कपड़ा और जूट) को चोट पहुँचाती है, दुनिया के बाज़ार में भारतीय माल को मुक़ाबले से बाहर कर देती है, और भारतीय किसानों को गिरती घरेलू क़ीमतों के माहौल में बेचने को मजबूर करती है। भारतीय वाणिज्य मंडलों ने 1s 4d की दर के लिए अभियान चलाया, जिसे वे बाज़ार का सहज स्तर मानते थे। फिर भी सरकार ने आयोग की ही सिफ़ारिश मानी।

इस दर से क्या हासिल हुआ — और किसे

मार्च 1927 में औपचारिक रूप से लागू हुई 1s 6d की दर तीन तबक़ों के काम आई:

1. ब्रिटिश लेनदार और पेंशन पाने वाले — जिनके लिए पेंशन, लाभांश और होम चार्जेज के रूप में भेजा गया पैसा स्टर्लिंग में ज़्यादा बैठता था।

2. भारत सरकार का क़र्ज़ प्रबंधन — जिसे स्थानीय मुद्रा में क़र्ज़ की अदायगी कम करनी पड़ी।

3. भारत में चल रहे ब्रिटिश एक्सचेंज बैंक — जिन्हें पैसे के बढ़े हुए आवागमन और तय दर बनाए रखने के काम पर कमीशन मिलता था।

घाटे में रहे भारतीय निर्यातक (जिनका माल स्टर्लिंग बाज़ारों में महँगा हो गया), भारतीय किसान (जिन्हें निर्यात पर रुपये में कम क़ीमत मिली), और पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था (जिसने 1929 के बाद की वैश्विक मंदी के दौरान इस टिकी हुई दर का मंदी वाला दबाव झेला)।

आयोग की कुछ चर्चाओं में आने वाला विकल्प (d) — “रुपये को सोने के मुक़ाबले गिरने से रोकना” — दर के फ़ैसले का *नतीजा* था, उसका असली आधार नहीं। असली आधार साख बनाए रखना और पैसे की आवाजाही आसान करना ही थे।

गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड

आयोग ने गोल्ड स्टैंडर्ड (सोने के सिक्कों का खुला चलन) और गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड (स्टर्लिंग में रखे भंडार के ज़रिए जुड़ाव) — दोनों को ठुकरा दिया। उसने *गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड* की सिफ़ारिश की: रुपया तय दर पर सोने की सिल्लियों में बदला जा सकेगा, लेकिन सिर्फ़ बड़ी न्यूनतम मात्रा में (शुरू में 1065 तोला, यानी क़रीब £1,200 का सोना), और सोने के सिक्के देश के भीतर नहीं चलेंगे। रुपये के पीछे का भंडार कुछ सोने में और कुछ मंज़ूर विदेशी प्रतिभूतियों में रखा जाएगा।

इस योजना वाला गोल्ड स्टैंडर्ड एंड रिज़र्व बैंक बिल 1927 में भारतीय विधानमंडल से पारित हो गया, फिर भी गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड कभी अमल में नहीं चला — महामंदी के चलते ब्रिटेन के सोना छोड़ने के कुछ ही घंटों के भीतर 1931 में भारत को भी इसे छोड़ना पड़ा।

रिज़र्व बैंक की सिफ़ारिश

संस्थाओं के स्तर पर आयोग की सबसे दूरगामी सिफ़ारिश भारत के लिए एक केंद्रीय बैंक बनाने की थी। 1858 से भारत सरकार ही मुद्रा नियंत्रक (Controller of the Currency) और तीन प्रेसीडेंसी बैंकों (बंगाल, बंबई, मद्रास — जो 1921 में मिलकर इंपीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया बने) के ज़रिए असल मौद्रिक प्राधिकरण की तरह काम कर रही थी। आयोग ने इस बंदोबस्त को नाकाफ़ी पाया। उसने एक अकेले, अर्ध-निजी केंद्रीय बैंक की सिफ़ारिश की, जिसके पास ये अधिकार हों:

1927 के गोल्ड स्टैंडर्ड एंड रिज़र्व बैंक बिल ने इस केंद्रीय बैंक को क़ानूनी शक्ल देने की कोशिश की, पर बैंक के मालिकाना ढाँचे (शेयरधारक बनाम सरकार) और इंपीरियल बैंक से उसके रिश्ते पर मतभेद के चलते वह अटक गया। यह प्रस्ताव तब तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा, जब तक दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भारतीय वित्तीय स्वायत्तता पर दोबारा बात होने के बाद 1933-34 में नई कोशिश नहीं हुई। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 6 मार्च 1934 को पारित हुआ और RBI ने 1 अप्रैल 1935 को काम शुरू किया — हिल्टन-यंग आयोग की रिपोर्ट में पहली बार यह सुझाव आने के आठ साल बाद।

यानी 1935 का RBI हिल्टन-यंग वाले ढाँचे से ही जन्मी संस्था थी, भले ही शेयरधारकों वाला ख़ास ढाँचा (निजी चंदा, जिसका 1949 में राष्ट्रीयकरण हुआ) अलग से तय किया गया हो।

लंबी छाया

हिल्टन-यंग आयोग के तीन बुनियादी फ़ैसलों — बनावटी 1s 6d दर, गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड और केंद्रीय बैंक — ने 1927 से आज़ादी तक भारत की मौद्रिक नीति की शक्ल तय की:

भारतीय व्यापार जगत की असहमति — ख़ासकर ठाकुरदास की — इतिहास में आर्थिक राष्ट्रवाद की एक शुरुआती आवाज़ के रूप में भी दर्ज हुई: कि रुपये की क़ीमत भारतीय उत्पादकों के हित में तय हो, ब्रिटिश लेनदारों के हित में नहीं। यही तर्क 1947 में ब्रेटन वुड्स समता की बहसों में और 1949 (8.6%) तथा 1966 (36.5%) के अवमूल्यन के मौक़ों पर फिर उभरा।

सामान्य प्रश्न

हिल्टन-यंग आयोग क्या था और कब बना?

भारतीय मुद्रा और वित्त पर एक शाही आयोग, जो अगस्त 1925 में बना, जिसके अध्यक्ष एडवर्ड हिल्टन-यंग थे और जिसमें ग्यारह सदस्य थे। इसने जुलाई 1926 में अपनी रिपोर्ट सौंपी।

इसने रुपये-स्टर्लिंग की कौन सी दर सुझाई?

1 शिलिंग 6 पेंस सोना (1s 6d), यानी ₹15 प्रति £1 स्टर्लिंग। यह बनावटी तौर पर तय की गई दर थी, जो 1920 के दशक की शुरुआत के बाज़ार औसत से ऊँची थी।

1s 6d की दर क्यों अपनाई गई?

ताकि भारत से ब्रिटेन जाने वाला पैसा (पेंशन, होम चार्जेज, ब्रिटिश कंपनियों के लाभांश) आसानी से जा सके और लंदन के मुद्रा बाज़ार में भारत की साख बनी रहे — दोनों ही ऊँची क़ीमत वाले रुपये के हक़ में थे। भारतीय व्यापारिक राय कहती थी कि दर कम (1s 4d) होनी चाहिए, ताकि भारतीय निर्यातकों को सहारा मिले।

गोल्ड बुलियन स्टैंडर्ड क्या था?

यह गोल्ड स्टैंडर्ड का बदला हुआ रूप था, जिसमें रुपया तय दर पर सोने की सिल्लियों में बदला जा सकता था, पर सिर्फ़ बड़ी न्यूनतम मात्रा में, और देश के भीतर सोने के सिक्के नहीं चलते थे। भारत 1927 से सितंबर 1931 तक इसी के तहत चला, जब महामंदी ने भारत को सोना छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

क्या आयोग ने भारत के लिए केंद्रीय बैंक की सिफ़ारिश की थी?

हाँ। उसने एक ऐसे केंद्रीय बैंक की सिफ़ारिश की जिसके पास नोट जारी करने, भंडार सँभालने, क़र्ज़ प्रबंधन और विनिमय दर बचाने के काम हों। इस विचार वाला 1927 का गोल्ड स्टैंडर्ड एंड रिज़र्व बैंक बिल नाकाम रहा; यह सिफ़ारिश आख़िरकार 1935 में भारतीय रिज़र्व बैंक के रूप में साकार हुई।

आयोग की सिफ़ारिशों से असहमति किसने जताई?

मुख्य भारतीय सदस्य सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास ने असहमति नोट दर्ज कराया, जिसमें उन्होंने कहा कि 1s 6d बहुत ऊँची दर है और इससे भारतीय निर्यातकों को नुक़सान होता है। साथ-साथ भारतीय वाणिज्य मंडलों ने 1s 4d की दर के लिए अभियान चलाया।

इस दर पर कार्ल मार्क्स की क्या राय थी? (आम भ्रम)

मार्क्स ने 1856 में अवध के बारे में लिखा था, 1926 के मुद्रा फ़ैसले के बारे में नहीं — उनका देहांत 1883 में हो चुका था। 1s 6d की दर की आर्थिक आलोचना 1920 और 1930 के दशक की भारतीय व्यापारिक राय से आई थी, मार्क्स से नहीं।

1s 6d की दर कितने समय चली?

मार्च 1927 से सितंबर 1939 में युद्धकालीन विनिमय नियंत्रण लागू होने तक। 1947 में आज़ादी के वक़्त ब्रेटन वुड्स में रुपये की समता इसी पर टिकी थी, और इसमें पहला बदलाव सितंबर 1949 के अवमूल्यन से हुआ।