Anantam IASHindi Note · 4 May 2026

नालसा (NALSA): राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, अनुच्छेद 39A और यूपीएससी नोट्स

नालसा (NALSA) पर यूपीएससी मार्गदर्शिका: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987, अनुच्छेद 39A, निःशुल्क विधिक सहायता, लोक अदालत, नालसा बनाम भारत संघ (2014) निर्णय, चुनौतियाँ एवं सुधार।

न्याय तक पहुँच एक संवैधानिक वादा है, जिसे एक सक्षम विधिक सहायता ढाँचे के बिना पूरा नहीं किया जा सकता। भारत में यह ढाँचा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा / NALSA) पर टिका है — यह शीर्ष निकाय है जिसका गठन विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987) के अंतर्गत किया गया। यूपीएससी की सामान्य अध्ययन-2 (GS II) में नालसा सबसे अधिक पूछे जाने वाले संस्थानों में से एक है — दोनों ही दृष्टि से, चाहे वह अनुच्छेद 39A को क्रियान्वित करने में इसकी भूमिका हो, या ऐतिहासिक नालसा बनाम भारत संघ (2014) निर्णय जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता दी गई।

संविधान सभा में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि “केवल राजनीतिक लोकतंत्र पर्याप्त नहीं है — सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र भी अनिवार्य है।” नालसा इसी सामाजिक लोकतंत्र की संस्थागत अभिव्यक्ति है। एक गरीब व्यक्ति जो वकील का खर्च नहीं उठा सकता, उसके लिए संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन एवं स्वतंत्रता का अधिकार) तभी सार्थक हो पाता है जब राज्य निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करे।

संवैधानिक आधार

प्रावधानक्षेत्र
अनुच्छेद 39Aनीति-निदेशक तत्व: राज्य समान न्याय सुनिश्चित करेगा और निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करेगा ताकि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय से वंचित न रहना पड़े
अनुच्छेद 14विधि के समक्ष समानता
अनुच्छेद 22(1)गिरफ्तार/निरुद्ध व्यक्ति का अपनी पसंद के वकील से परामर्श एवं बचाव का अधिकार
अनुच्छेद 21जीवन एवं वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें न्याय तक पहुँच एवं निष्पक्ष विचारण शामिल है

हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) और खत्री बनाम बिहार राज्य (1981) ने स्पष्ट रूप से स्थापित किया कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निष्पक्ष विचारण का अनिवार्य अंग निःशुल्क विधिक सहायता है। उच्चतम न्यायालय ने माना कि बिना वकील के लंबे समय तक विचाराधीन कैदियों को बंद रखना अनुच्छेद 21 का घोर उल्लंघन है।

इसके अतिरिक्त, एम.एच. होस्कोट बनाम महाराष्ट्र राज्य (1978) में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने प्रसिद्ध रूप से कहा था कि “विधिक सहायता न्यायिक न्याय का अनिवार्य घटक है।” यही न्यायिक दर्शन आगे चलकर अनुच्छेद 39A के क्रियान्वयन की रीढ़ बना।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वर्षमील का पत्थर
1960केंद्र सरकार ने विधिक सहायता योजनाओं हेतु पहले दिशा-निर्देश जारी किए
197642वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 39A जोड़ा गया
1980न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती की अध्यक्षता में विधिक सहायता योजना क्रियान्वयन समिति (CILAS) गठित
1987विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम पारित
1995नालसा अस्तित्व में आया
1998स्थायी एवं सतत लोक अदालतों की स्थापना
2002विधिक सेवा प्राधिकरण (संशोधन) अधिनियम ने स्थायी लोक अदालतों को संस्थागत रूप दिया

यह कालक्रम बताता है कि नालसा कोई एक रात में बना संस्थान नहीं है — यह तीन दशकों के न्यायिक सक्रियता, कार्यकारी पहल और विधायी प्रक्रिया का संयुक्त परिणाम है। 42वाँ संशोधन आपातकाल के दौरान पारित हुआ, परंतु अनुच्छेद 39A का प्रावधान आपातकाल के बाद के लोकतांत्रिक पुनर्जागरण में संस्थागत रूप ले सका।

नालसा की संरचना

नालसा संघीय न्यायिक पदानुक्रम की तर्ज़ पर एक स्तरबद्ध संरचना के माध्यम से कार्य करता है:

यह बहुस्तरीय ढाँचा भारत के संघवाद के अनुरूप है — केंद्र, राज्य, जिला और तालुक स्तर पर समान संस्थागत उपस्थिति। यह सुनिश्चित करता है कि सबसे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों तक भी विधिक सहायता का अधिकार पहुँचे। फ़रवरी 2026 तक, देश भर में लगभग 700 जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और 2,200 से अधिक तालुक विधिक सेवा समितियाँ सक्रिय हैं।

नालसा के कार्य

विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि नालसा का कार्यक्षेत्र केवल अदालती प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। यह “रोकथाम-केंद्रित” मॉडल पर भी कार्य करता है — विधिक साक्षरता शिविरों के माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, ताकि उत्पीड़न और शोषण को प्रारंभ में ही रोका जा सके।

निःशुल्क विधिक सहायता हेतु पात्रता

अधिनियम की धारा 12 निम्नलिखित श्रेणियों को निःशुल्क विधिक सहायता हेतु पात्र बनाती है:

अद्यतन सीमाएँ (2026): अधिकांश राज्यों में आय-सीमा 1 लाख से 3 लाख रुपये वार्षिक के बीच निर्धारित है, जबकि उच्चतम न्यायालय में यह सीमा वर्तमान में 9 लाख रुपये है। यह विसंगति “एक संविधान, असमान सहायता” की समस्या को जन्म देती है, जिसका समाधान विधि आयोग एवं नीति आयोग दोनों ने सुझाया है।

लोक अदालत — नालसा का विशिष्ट वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR)

लोक अदालत भारत के सबसे विशिष्ट विधिक सहायता नवाचारों में से एक है:

2024 में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालतों ने एक ही दिन में लगभग 1.4 करोड़ मामलों का निपटारा किया — यह आँकड़ा वैश्विक स्तर पर अद्वितीय है। चेक बाउंस के मामले, मोटर दुर्घटना दावे, वैवाहिक विवाद, बिजली-पानी के बिल विवाद — ये लोक अदालतों की प्रमुख श्रेणियाँ हैं।

प्रमुख कार्यक्रम एवं पहल

कार्यक्रमकेंद्रबिंदु
DISHA (न्याय तक समग्र पहुँच हेतु नवाचारी समाधान डिज़ाइन)लाभार्थियों को जोड़ता है; विधि छात्रों एवं अधिवक्ताओं में प्रो-बोनो संस्कृति को प्रोत्साहित करता है
न्याय बंधुप्रो-बोनो अधिवक्ताओं को पंजीकृत लाभार्थियों से जोड़ने का मंच
टेली-लॉ सेवासैकड़ों जिलों की ग्राम पंचायतों में टेली/वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से विधिक परामर्श
विधिक सहायता बचाव परामर्शदाता प्रणाली (LADCS)676 जिलों में आपराधिक विधिक सहायता हेतु पूर्णकालिक वेतनभोगी अधिवक्ता
न्याय मित्र कार्यक्रमजिला स्तर पर 15 वर्ष पुराने लंबित मामलों के निपटारे की सुविधा

विशेष रूप से LADCS मॉडल ने आपराधिक विधिक सहायता के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। पहले, पैनल अधिवक्ता प्रति-मामला शुल्क पर कार्य करते थे, जिसके परिणामस्वरूप जल्दी-जल्दी निपटारा या अनदेखी होती थी। LADCS में पूर्णकालिक वेतनभोगी वकील हैं — जैसे सरकारी अभियोजक — जो विचाराधीन कैदियों को व्यवस्थित प्रतिनिधित्व प्रदान करते हैं।

नालसा बनाम भारत संघ (2014) — ऐतिहासिक मामला

उच्चतम न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया:

इस निर्णय के परिणामस्वरूप ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 पारित हुआ — हालाँकि कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह अधिनियम नालसा निर्णय की पूरी भावना को नहीं समेटता। विशेष रूप से, स्व-पहचान के अधिकार के बजाय अधिनियम ज़िला मजिस्ट्रेट से प्रमाणपत्र अनिवार्य करता है।

यह मामला संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है — जहाँ बहुसंख्यक सामाजिक मूल्यों के बजाय संविधान के मूल मूल्यों — समानता, गरिमा, स्वतंत्रता — को प्राथमिकता दी गई। यूपीएससी की दृष्टि से यह निर्णय नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) और पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के साथ जुड़ता है।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: नालसा बनाम वैश्विक मॉडल

देशविधिक सहायता मॉडलविशेषता
भारत (NALSA)संवैधानिक-वैधानिक हाइब्रिडनिःशुल्क सहायता + लोक अदालत + पैरा-लीगल स्वयंसेवक
यूनाइटेड किंगडमविधिक सहायता एजेंसीसरकारी अनुदान आधारित, आय-परीक्षण कठोर
अमेरिकालीगल सर्विसेज़ कॉर्पोरेशन (LSC)संघीय अनुदान + निजी पैनल वकील
दक्षिण अफ़्रीकालीगल एड दक्षिण अफ़्रीकासंवैधानिक रूप से प्रदत्त, मानव-अधिकार केंद्रित

तुलनात्मक रूप से, भारत का मॉडल अनूठा है क्योंकि यह वैकल्पिक विवाद समाधान (लोक अदालत) को मुख्यधारा की विधिक सहायता संरचना का हिस्सा बनाता है। हालाँकि, प्रति-व्यक्ति बजट आवंटन की दृष्टि से भारत अन्य लोकतंत्रों से बहुत पीछे है।

नालसा के समक्ष चुनौतियाँ

संसाधन की बाधाएँ

जागरूकता एवं पहुँच

विधिक सहायता की गुणवत्ता

लोक अदालतों का अल्प-उपयोग

डिजिटल विभाजन

सिफ़ारिशें एवं सुधार-मार्ग

हालिया विकास (2024–26)

यूपीएससी प्रासंगिकता

प्रीलिम्स बिंदु

मुख्य परीक्षा (Mains GS-II) अभ्यास प्रश्न

नालसा सीधे तौर पर निम्नलिखित विषयों से जुड़ा है:

नमूना मुख्य परीक्षा प्रश्न: “विधिक सहायता न्यायिक न्याय का अनिवार्य अंग है।” इस कथन के प्रकाश में नालसा की भूमिका, उसकी उपलब्धियाँ एवं सीमाओं की समीक्षा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्कृष्ट उत्तर नालसा को अनुच्छेद 21 के विस्तार (मेनका गांधी, हुसैनारा खातून), नीति-निदेशक तत्वों (DPSP), एवं मध्यस्थता अधिनियम 2023 से जोड़ते हैं। निबंधों में, नालसा यह दर्शाता है कि किस प्रकार संस्थागत डिज़ाइन संवैधानिक वादों को मूर्त रूप दे सकता है — यह विषय अंबेडकर के उस दृष्टिकोण से जुड़ा है जिसमें सामाजिक लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र की नींव माना गया है।

सामान्य प्रश्न

नालसा (NALSA) क्या है?

नालसा यानी राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत गठित एक वैधानिक निकाय है। यह समाज के कमज़ोर वर्गों को निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करने एवं विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान हेतु लोक अदालतों के आयोजन के लिए उत्तरदायी है। यह 1995 में कार्यशील हुआ।

अनुच्छेद 39A का क्या महत्व है?

अनुच्छेद 39A राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जिसे 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया। यह राज्य को निर्देश देता है कि वह समान न्याय सुनिश्चित करे और निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करे, ताकि कोई भी नागरिक आर्थिक या अन्य अक्षमता के कारण न्याय से वंचित न रहे।

नालसा का संरक्षक-प्रमुख कौन होता है?

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) नालसा के संरक्षक-प्रमुख होते हैं। उच्चतम न्यायालय के एक वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में दैनिक संचालन का नेतृत्व करते हैं।

लोक अदालत क्या होती है?

लोक अदालत एक वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) मंच है, जो विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत आयोजित होती है। इसके निर्णयों को दीवानी न्यायालय की डिक्री का बल प्राप्त है और ये अपील-योग्य नहीं हैं। यह पूर्व-वादन एवं लंबित दोनों प्रकार के मामलों को कवर करती है।

नालसा बनाम भारत संघ (2014) निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है?

उच्चतम न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशों की पीठ ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता दी, उन्हें अनुच्छेद 14, 15, 16, 19 एवं 21 के तहत मौलिक अधिकार प्रदान किए, और शिक्षा एवं रोज़गार में आरक्षण का निर्देश दिया। इसने लिंग की स्व-पहचान के अधिकार को भी मान्यता दी।

निःशुल्क विधिक सहायता हेतु कौन पात्र है?

अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य, मानव तस्करी एवं बंधुआ मज़दूरी के पीड़ित, महिलाएँ, बच्चे, दिव्यांगजन, आपदा-पीड़ित, औद्योगिक श्रमिक, अभिरक्षा में बंद व्यक्ति, और अधिसूचित आय-सीमा से नीचे के व्यक्ति पात्र हैं।

LADCS क्या है?

विधिक सहायता बचाव परामर्शदाता प्रणाली (Legal Aid Defence Counsel System) नालसा का एक नवाचार है जिसमें पूर्णकालिक वेतनभोगी अधिवक्ता आपराधिक मामलों में विधिक सहायता प्रदान करते हैं। यह 676 जिलों में लागू है और प्रति-मामला शुल्क मॉडल की कमज़ोरियों को दूर करता है।

नालसा के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

संसाधनों की कमी (प्रति-व्यक्ति 0.75 पैसे वार्षिक व्यय), अनुभवी वकीलों का अभाव, ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, सेवा गुणवत्ता की कमज़ोर निगरानी, स्थायी लोक अदालतों का सीमित क्षेत्राधिकार, और डिजिटल विभाजन प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

टेली-लॉ सेवा क्या है?

टेली-लॉ सेवा नालसा एवं विधि एवं न्याय मंत्रालय की संयुक्त पहल है, जो ग्राम पंचायतों में स्थापित कॉमन सर्विस सेंटर्स (CSC) के माध्यम से वीडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग द्वारा निःशुल्क विधिक परामर्श प्रदान करती है। यह 2024-25 तक 766 जिलों की 3 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों तक विस्तारित हो चुकी है।

अनुच्छेद 39A और अनुच्छेद 21 का संबंध क्या है?

हुसैनारा खातून (1979), खत्री (1981) एवं एम.एच. होस्कोट (1978) मामलों में उच्चतम न्यायालय ने स्थापित किया कि निःशुल्क विधिक सहायता अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निष्पक्ष विचारण का अनिवार्य अंग है। इस प्रकार अनुच्छेद 39A (DPSP) को अनुच्छेद 21 (मौलिक अधिकार) के माध्यम से न्यायोचित बनाया गया।