Anantam IASHindi Note · 14 September 2026

रानी की वाव: पाटन की बावड़ी, रानी उदयमती और गाद में दबी सात सदियां

रानी की वाव: पाटन में चालुक्य दौर की 11वीं सदी की बावड़ी, जिसका श्रेय पुराना ग्रंथ रानी उदयमती को देता है। यह पानी तक कैसे पहुंचती थी और गाद ने इसे कैसे बचाया।

रानी की वाव का सीधा अर्थ है रानी की बावड़ी। यह उत्तर गुजरात के पाटन में 11वीं सदी में बनी बावड़ी है, जिसे सरस्वती नदी के पास जमीन में करीब 30 मीटर गहराई तक खोदा गया था। तब पाटन चालुक्य (सोलंकी) राजाओं की राजधानी था। पुराना लिखित स्रोत इसका श्रेय रानी उदयमती को देता है, जो भीम प्रथम की पत्नी थीं। इसे एक उल्टे मंदिर की तरह बनाया गया है: नक्काशीदार पत्थर की सात मंजिलें, जो ऊपर किसी देवस्थान तक नहीं, बल्कि नीचे पानी तक ले जाती हैं। UNESCO ने इसे 2014 में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया, और 2018 से यह लैवेंडर रंग के 100 रुपये के नोट के पीछे छपी तस्वीर है।

ज्यादातर लोग यहां से एक ही सीधी-सी बात याद करके लौटते हैं: 1063 में एक दुखी विधवा ने पति की याद में इसे बनवाया। 1304 का एक ग्रंथ रानी का नाम जरूर लेता है। लेकिन 1063 का साल बाद में लगाया गया हिसाब है, और इसे स्मारक मानना विद्वानों की अपनी व्याख्या है। दूसरी आम धारणा यह है कि नदी ने बावड़ी को बर्बाद कर दिया। असल बात इसकी उल्टी है: 13वीं सदी की बाढ़ से आई गाद ने रानी की वाव को ढक दिया और करीब सात सदियों तक इसकी मूर्तियों को सुरक्षित रखा। यह नोट ग्रंथ में लिखी बात और बाद की व्याख्या को अलग-अलग रखता है, और सरल शब्दों में समझाता है कि बावड़ी अपना पानी कैसे संभाले रखती थी।

रानी की वाव क्या है और कहां है

रानी की वाव एक बावड़ी है, यानी ऐसा कुआं जिसके पानी तक लोग ऊपर से बाल्टी खींचकर नहीं, बल्कि सीढ़ियों वाले एक लंबे गलियारे से नीचे उतरकर पहुंचते थे। रानी की वाव कहां है, इसका जवाब सीधा है: यह पाटन में है, जो चालुक्यों की पुरानी राजधानी थी और अहमदाबाद से करीब 125 किलोमीटर उत्तर में है। सबसे पहले ये तथ्य पक्के कर लीजिए।

तथ्यब्योरा
यह क्या हैएक बावड़ी (गुजराती में वाव), जिसे मारू-गुर्जर शैली में उल्टे मंदिर की तरह डिजाइन किया गया
स्थानउत्तर गुजरात का पाटन, सरस्वती नदी के किनारे; चालुक्यों की राजधानी, अहमदाबाद से करीब 125 किलोमीटर उत्तर
समय11वीं सदी ईस्वी (UNESCO); 1063 पारंपरिक साल है, स्मारक पर खुदा हुआ साल नहीं
बनवाने वालीरानी उदयमती, भीम प्रथम की पत्नी और कर्ण की मां, जिनका नाम मेरुतुंग के 1304 के ग्रंथ प्रबंध चिंतामणि में दर्ज है
योजनापूर्व से पश्चिम: सीढ़ीदार गलियारा, चार मंडप, कुंड और कुआं; सात मंजिलें, लंबाई करीब 65 मीटर
गहराई9.5 × 9.4 मीटर का कुंड, जमीन से 23 मीटर नीचे; कुएं का शाफ्ट 10 मीटर चौड़ा और 30 मीटर गहरा
मूर्तियां500 से ज्यादा मुख्य और 1,000 से ज्यादा छोटी मूर्तियां (UNESCO); विष्णु की मूर्तियां बाकी देवताओं से ज्यादा
दर्जा22 जून 2014 से UNESCO का विश्व धरोहर स्थल, मानदंड (i) और (iv); ASI के संरक्षण में
मुद्रा परRBI ने 19 जुलाई 2018 को जिस लैवेंडर 100 रुपये के नोट की घोषणा की, उसके पीछे की ओर

UNESCO सूची के लिए हुए इकोमोस (ICOMOS) मूल्यांकन में एक और गिनती भी मिलती है: शुरू में 800 से ज्यादा नक्काशीदार पैनल थे, जिनमें से करीब 400 बचे हैं। ये दोनों गिनतियां अलग-अलग इकाइयां नापती हैं: एक तरफ एक-एक नक्काशी, दूसरी तरफ बड़े पैनल।

बावड़ी क्या होती है और कैसे काम करती थी

बावड़ी ऐसा कुआं है जिसके बगल में सीढ़ियां बनी होती हैं। लोग पहले जमीन में भूजल तक एक गहरा गोल गड्ढा, यानी शाफ्ट, खोदते थे। फिर सीढ़ियों की एक लंबी कतार बनाते थे, ताकि पानी जिस भी गहराई पर हो, वे पैदल उतरकर उस तक पहुंच सकें। गुजरात में इसे वाव कहते हैं। UNESCO के मुताबिक उपमहाद्वीप में बावड़ियां ईसा पूर्व 3री सहस्राब्दी से बनती आई हैं। गुजरात की पानी की कहानी का हड़प्पा वाला सिरा धोलावीरा वाले नोट में मिलेगा।

इस पूरे ढांचे में जो चीज बदलती रहती थी, वह था पानी। पानी आसपास की जमीन से रिसकर शाफ्ट में आता था। किरीट मांकोडी, जिनकी 1991 की किताब इस स्मारक पर मानक अध्ययन मानी जाती है, बताते हैं कि करीब 500 मीटर उत्तर में बहने वाली सरस्वती इसे पानी देती थी। भूजल स्तर (water table), यानी वह स्तर जिसके नीचे जमीन पानी से तर रहती है, सूखे महीनों में नीचे चला जाता था। तब लोगों को बहुत सारी सीढ़ियां उतरनी पड़ती थीं। मानसून में यह ऊपर आ जाता था, और पानी सबसे ऊपर की सीढ़ियों तक पहुंच सकता था। यानी सीढ़ियों ने घटते-बढ़ते पानी को ऐसा बना दिया कि लोग हर मौसम में पैदल उस तक पहुंच सकें।

इकोमोस के मूल्यांकन के मुताबिक यहां पूरी तरह विकसित बावड़ी के चारों हिस्से मौजूद हैं:

खाई खोदना आधा और आसान काम था। उसकी दीवारों को धंसने से रोकना बाकी आधा और मुश्किल काम था। मांकोडी बताते हैं कि सिर्फ करीब 45 सेंटीमीटर मोटी पत्थर की परत के पीछे ईंटों का एक छिपा हुआ सहारा है। इकोमोस जोड़ता है कि ढांचा ज्यादातर चूने के गारे में जोड़ी गई पकी ईंटों का है, जिस पर स्थानीय ध्रांगध्रा पत्थर की परत चढ़ाई गई है। लंबी दीवारों को सीढ़ीनुमा चबूतरों में पीछे हटाते हुए बनाने से उनकी ऊंचाई घट गई। और बीच-बीच में छोड़े गए टेकों (बट्रेस) ने ही आगे चलकर खंभों वाले मंडपों का रूप लिया।

मंडपों को ऐसे समझिए, जैसे किसी निर्माण स्थल पर गहरी खाई में लगाई गई आड़ी टेकें, जो दो ऊंची दीवारों को एक-दूसरे पर झुकने से रोकती हैं। ढांचे के मामले में यह तुलना सही बैठती है, लेकिन सजावट पर आकर टूट जाती है। वजह यह कि इन टेकों के हर हिस्से पर नक्काशी है और इनमें देवताओं की मूर्तियां बनी हैं।

इस नक्काशी का एक मकसद है। UNESCO रानी की वाव को पानी की पवित्रता को उभारने वाला उल्टा मंदिर कहता है। हिंदू मंदिर अपने गर्भगृह के ऊपर शिखर के रूप में उठता है, जैसा भारत में मंदिर वास्तुकला वाला नोट समझाता है। यह मंदिर उल्टी दिशा में चलता है: नक्काशीदार मंजिलों से होते हुए नीचे पानी तक उतरता है। इकोमोस के अनुसार यहां पानी को मातृ देवी के रूप में पूजा जाता था।

रानी की वाव किसने बनवाई, और हमें यह कैसे पता है

लिखित स्रोत में बनवाने वाली के रूप में जो नाम दर्ज है, वह है रानी उदयमती, जिन्हें अंग्रेजी स्रोतों में अक्सर Rani Udayamati लिखा जाता है। वे चालुक्य राजा भीम प्रथम की पत्नी और उनके उत्तराधिकारी कर्ण की मां थीं। चालुक्य, जिन्हें सोलंकी भी कहा जाता है, अनहिलपुर पाटन से गुजरात पर राज करते थे। भीम प्रथम ने चार दशक से ज्यादा राज किया, और 1064 में अपनी मृत्यु तक गद्दी पर रहे। मांकोडी मोढेरा के सूर्य मंदिर का श्रेय उन्हीं को देते हैं। इस वंश के मंदिर सोमनाथ में भी बचे हैं, जिसके बाद के इतिहास को सोमनाथ मंदिर वाला नोट आगे बढ़ाता है।

यह नाम सिर्फ एक स्रोत पर टिका है।

मेरुतुंग का ग्रंथ क्या कहता है

जैन आचार्य मेरुतुंग ने प्रबंध चिंतामणि, यानी ‘कथाओं का चिंतामणि रत्न’, 1304 में पूरा किया। यह भीम की मृत्यु के करीब 240 साल बाद की बात है। सी. एच. टॉनी के 1901 के अनुवाद में यह अंश भीम के शासन का वर्णन खत्म करता है। भीम ने “1077 वि.सं. में राज करना शुरू किया और बयालीस वर्ष, दस महीने और नौ दिन राज किया। उसकी रानी, जिसका नाम उदयमती था, ने पट्टन में एक नया जलाशय बनवाया, जो सहस्रलिंग सरोवर से भी बढ़कर था।” इसके ठीक अगले वाक्य में 1120 वि.सं. में कर्ण का राज्याभिषेक होता है।

इसे ध्यान से पढ़िए, कि यह क्या कहता है और क्या नहीं:

1063 का साल कहां से आया

यह लोकप्रिय तारीख असल में एक छोटा-सा हिसाब है। विक्रम संवत (वि.सं.) के साल ईस्वी सन से करीब 57 साल आगे चलते हैं। इस हिसाब से 1077 वि.सं. का मतलब है भीम के गद्दी पर बैठने के लिए करीब 1020 ईस्वी, और 1120 वि.सं. का मतलब है कर्ण के राज्याभिषेक के लिए करीब 1063 ईस्वी। बहुत मुमकिन है कि 1063 इसी दूसरे आंकड़े से आया हो: भीम के शासन का अंत, जिसे उनकी विधवा के स्मारक की शुरुआत मान लिया गया। पर्यटन मंत्रालय का इनक्रेडिबल इंडिया पेज 1063 को वह साल बताता है जब रानी ने बावड़ी बनवाने का काम सौंपा। दूसरी ओर मांकोडी शैली के आधार पर इसे 11वीं सदी का मानते हैं, और न वे, न इकोमोस, नींव के किसी शिलालेख का हवाला देते हैं। इसलिए समझदारी यही है कि आप “11वीं सदी, परंपरा के अनुसार 1063” लिखिए और वहीं रुक जाइए।

कोई रानी स्मारक के रूप में कुआं क्यों बनवाती

क्योंकि सार्वजनिक कुआं बनवाने से पुण्य मिलता था, और यह पुण्य मृतकों के लिए भी माना जाता था। मांकोडी धर्मशास्त्र की जोड़ी इष्ट-पूर्त की ओर ध्यान दिलाते हैं: इष्ट यानी वैदिक यज्ञ, और पूर्त यानी जनता के लिए किया गया काम, जैसे कुआं। सिरोही जिले के वसंतगढ़ का 1042 ईस्वी का एक शिलालेख बताता है कि एक विधवा रानी ने पति की मृत्यु के बाद एक बावड़ी की मरम्मत करवाई थी। इसलिए उदयमती एक जानी-पहचानी परंपरा पर ही चल रही होंगी।

स्मारक वाली व्याख्या के पक्ष में मांकोडी शैव देवियों की करीब 15 मूर्तियों का हवाला देते हैं। इनमें से कई में पार्वती की पंचाग्नि तपस्या दिखाई गई है। मांकोडी इसे ऐसे पढ़ते हैं कि विधवा रानी खुद को पार्वती के रूप में दिखा रही हैं, जो शिव से फिर मिलने के लिए तप कर रही हैं। यह उनकी व्याख्या है, और इसका हवाला उन्हीं के नाम से दिया जाना चाहिए।

यहां संगमरमर की एक छोटी प्रतिमा है, जिस पर ‘महाराज्ञी श्री उदयमती’ खुदा है। इसे अक्सर सबूत के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन मांकोडी नक्काशी और अक्षर, दोनों को 13वीं सदी का मानते हैं, और कहते हैं कि किसी अज्ञात दानदाता ने इसे बाद में लगवाया। यह प्रतिमा दिखाती है कि दो सदी बाद पाटन ने उन्हें कैसे याद किया। यह रानी के अपने दस्तखत नहीं है।

बनने के बाद रानी की वाव के साथ क्या हुआ

रानी की वाव इसलिए बची, क्योंकि वह गायब हो गई थी। 13वीं सदी में बाढ़ आई और सरस्वती नदी का तल बदल गया। इसके बाद गाद ने बावड़ी को भर दिया और करीब सात सदियों तक छिपाए रखा। इसी तरह दबे रहने की वजह से इसकी मूर्तियां आज भी इतनी साफ और तीखी हैं

चरणकबक्या हुआ
निर्माण11वीं सदीपाटन में बावड़ी बनी, जिसका श्रेय रानी उदयमती को दिया जाता है
दबना13वीं सदीबाढ़ और सरस्वती के तल में बदलाव से कुएं के रूप में इसका जीवन खत्म हुआ; गाद ने इसे भर दिया
उखाड़ना19वीं सदी की शुरुआतबाहर दिख रहे खंभे और ऊपरी हिस्से पाटन में बारोट वाव बनाने के लिए ढोकर ले जाए गए
सफाई1937 से 20081937 से मरम्मत; गाद कई चरणों में हटाई गई, ज्यादातर 1980 के दशक में
मान्यता1998 से 20181998 में संभावित सूची (Tentative List), 2014 में विश्व धरोहर सूची, 2018 में 100 रुपये का नोट

UNESCO इस दबने को भू-विवर्तनिक बदलावों (geotectonic changes) से जोड़ता है, यानी धरती के भीतर की ऐसी हलचल जिसने नदी का तल खिसका दिया। UNESCO यह भी मानता है कि बाढ़ की गाद ने ही बावड़ी को बचाए रखा। गाद ने वैसे ही काम किया जैसे किसी पार्सल के डिब्बे में भरी पैकिंग करती है: उसने हर खाली जगह भर दी, इसलिए सतह के नीचे का कुछ भी न टूट सका, न कोई उसे उठाकर ले जा सका। लेकिन पैकिंग के उलट, गाद उस हिस्से को नहीं बचा सकी जो उसके ऊपर निकला हुआ था। मांकोडी दर्ज करते हैं कि बार-बार आई बाढ़ ने ऊपरी हिस्सों को गिरा दिया।

बाहर निकले यही हिस्से सबसे पहले गए। मांकोडी बताते हैं कि 19वीं सदी की शुरुआत में जमीन के मालिक ने गिरे हुए खंभे और ऊपरी मंजिलों के टुकड़े गाड़ियों में लदवाकर उठवा लिए। फिर उन्हें पाटन की एक नई बावड़ी, बारोट वाव, में लगा दिया गया। पर्यटन मंत्रालय के मुताबिक 19वीं सदी के आखिर में जब हेनरी कजिन्स और जेम्स बर्जेस यहां आए, तो उन्हें सिर्फ कुछ खंभे और कुएं का शाफ्ट दिखाई दिया।

सफाई में 20वीं सदी का ज्यादातर हिस्सा लग गया, और इसकी शुरुआत की तारीख अलग-अलग स्रोत अलग बताते हैं। इकोमोस के मूल्यांकन में पहली मरम्मत 1937 में और उसके बाद चरणों में सफाई दर्ज है। वहीं पर्यटन मंत्रालय 1940 के दशक में इसकी दोबारा खोज की बात करता है। सबसे अहम दौर पर दोनों सहमत हैं। ज्यादातर गाद 1980 के दशक में निकली, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने स्मारक से गाद हटाई और मूर्तियों को फिर से उनकी जगह लगाया। इस काम पर सात साल लगाने वाले पुरातत्वविद् नारायण व्यास ने 2018 में हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि जीर्णोद्धार 1981 से 1987 तक चला। इकोमोस के अनुसार संरक्षण का काम 2008 में पूरा हुआ, और तब से हर साल रखरखाव होता है।

रानी की वाव में एक सैर, पूर्व से पश्चिम तक

सैलानी पूर्व की ओर से जमीन के स्तर पर अंदर आता है। फिर चार मंडपों से होते हुए पश्चिम की ओर नीचे उतरता है और कुंड और कुएं तक पहुंचता है। मांकोडी समझाते हैं कि हर मंडप का ऊपरी सिरा जमीन के स्तर पर है, इसलिए मंडप जितना गहरा होगा, उसे उतनी ही ज्यादा मंजिलों की जरूरत होगी। यही वजह है कि प्रवेश द्वार उथला दिखता है, जबकि दूर का छोर नक्काशीदार मंजिलों की एक पूरी दीवार जैसा लगता है।

इसकी शैली मारू-गुर्जर है। यह 11वीं से 13वीं सदी की पश्चिमी भारत की मंदिर शैली है, जिसे सोलंकी शैली भी कहते हैं। इसके नाम में मारू (राजस्थान का मारवाड़) और गुर्जर (गुजरात) जुड़े हैं। नागर मंदिर वास्तुकला वाला नोट इसे उत्तर भारत की नागर शैली की सोलंकी धारा मानता है। यहां यह शैली चबूतरों वाली उन दीवारों में दिखती है, जहां आगे निकले पैनल और अंदर धंसे आले बारी-बारी से आते हैं।

प्रवेश द्वार और सीढ़ीदार गलियारा

कभी यह सैर एक तोरण के नीचे से शुरू होती थी। तोरण यानी अलग से खड़ा सजावटी द्वार, जो अब नहीं बचा है। चौड़ी और ऊंची सीढ़ियां नीचे ले जाती हैं। बीच-बीच में पिरामिड जैसी छोटी सीढ़ियां हैं, जिनसे उतरना आसान हो जाता है। इकोमोस के अनुसार मूल ढांचे में 292 नक्काशीदार खंभे थे, जिनमें से 226 आज भी अपनी जगह पर हैं।

तीसरा चरण, जहां से मूर्तियां शुरू होती हैं

तीसरा चरण सबसे बड़ा है, और यहीं पहली बार बड़ी संख्या में नक्काशी बची मिलती है। इसका फर्श जमीन से 22 मीटर नीचे तक जाता है। चबूतरे वाली हर दीवार तीन पट्टियों में बंटी है, और बीच की चौड़ी पट्टी बड़ी मूर्तियों के लिए रखी गई है। अंदर धंसे आलों में देवता विराजमान हैं। उनके बीच आगे निकले खंभों पर अप्सराएं और दिशाओं के रक्षक, यानी दिक्पाल, खड़े हैं।

कुंड और सबसे गहरा मंडप

चौथा चरण 9.5 × 9.4 मीटर के एक आयताकार कुंड में खुलता है, जो जमीन से 23 मीटर नीचे है। इसके चारों ओर नक्काशीदार वास्तु की सात मंजिलें हैं, और दो स्तर वाले टेकों के ढांचे इसे सहारा देते हैं। यहां और दूसरी जगहों पर राजमिस्त्रियों के निशान सैकड़ों की संख्या में बचे हैं। मांकोडी समझाते हैं कि इनसे कारीगरों या उनकी श्रेणियों (गिल्ड) की पहचान होती थी, ताकि उनका मेहनताना चुकाया जा सके।

कुआं

कुआं पश्चिमी छोर पर है। यह 10 मीटर चौड़ा और 30 मीटर गहरा एक गोल शाफ्ट है, जो सात स्तरों में बंटा है। इसकी तली में बनी तीन नालियां फालतू पानी को कुंड में भेजती थीं। बावड़ी के लिए यह असामान्य बात है कि शाफ्ट की भीतरी दीवार पर घेरे में मूर्तियां बनी हैं। सबसे निचले घेरे में आठ वसु बैठे हैं। ये छोटे देवता हैं, जिन्हें महाभारत की एक कथा गंगा नदी से जोड़ती है।

दीवारों पर विष्णु और पार्वती ही क्यों छाए हैं

करीब 400 आलों में विष्णु की मूर्तियां बाकी देवताओं से ज्यादा हैं, और देवियों में सबसे ज्यादा मूर्तियां पार्वती की हैं। इकोमोस और मांकोडी इस पर सहमत हैं। और ये दोनों चुनाव इस इमारत के मकसद से ही निकलते हैं।

विष्णु यहां पानी की वजह से हैं। नारायण के रूप में पुराण-कथाएं उन्हें ब्रह्मांड के आदि सागर से जोड़ती हैं, और कुएं और तालाब अक्सर उन्हीं को समर्पित किए जाते थे। यहां जिस रूप को ढूंढना चाहिए, वह है शेषशायी विष्णु, यानी शेषनाग पर लेटे हुए भगवान। पानी के पास बनी इस मूर्ति में कुंड के पानी की असली सतह ही वह सागर बन जाती है, जिस पर वे विश्राम करते हैं।

यहां के अवतार दस का वह सुघड़ सेट नहीं बनाते, जिसका अंदाजा दशावतार, यानी दस अवतार, नाम से होता है। मांकोडी सात अवतारों की पहचान करते हैं, जो दक्षिण की ओर मुंह वाली दीवार से सामने वाली दीवार तक इस क्रम में हैं:

नरसिंह का आला खाली है, और उस दौर के गुजरात में मत्स्य और कूर्म की अलग मूर्तियां नहीं बनाई जाती थीं। बुद्ध की मूर्ति अलग-सी दिखती है, क्योंकि गुजरात से बौद्ध धर्म सदियों पहले ही लुप्त हो चुका था। इसलिए मूर्तिकार उनके मानक रूप को भूल चुके थे।

पार्वती यहां स्मृति की वजह से हैं, उन तपस्या वाली मूर्तियों के जरिए जिन्हें मांकोडी रानी के शोक के रूप में पढ़ते हैं। देवताओं के आसपास अप्सराएं खड़ी हैं, और रोजमर्रा की जिंदगी इन्हीं के जरिए अंदर आती है। साइआर्क (CyArk) के दस्तावेजीकरण में ऐसी आकृतियों का वर्णन है जो आईने में देख रही हैं या होंठों पर लाली लगा रही हैं, और उनके पास ही कुछ आकृतियां खोपड़ी के प्याले थामे हैं। तीसरे चरण के आलों में भैंसे वाले असुर को मारती दुर्गा (महिषासुरमर्दिनी) और 20 भुजाओं वाले नाचते भैरव दिखते हैं।

राजमिस्त्रियों के निशानों को छोड़ दें, तो स्रोत पत्थर पर खुदा जो इकलौता शाही नाम बताते हैं, वह 13वीं सदी की उसी प्रतिमा पर है। बनवाने वाली का नाम मेरुतुंग के ग्रंथ पर टिका है, और तारीख शैली पर।

रानी की वाव आज: UNESCO दर्जा, कानूनी सुरक्षा और संरक्षण

रानी की वाव UNESCO का विश्व धरोहर स्थल है। इसे 22 जून 2014 को दोहा में विश्व धरोहर समिति के 38वें सत्र में सूची में दर्ज किया गया (फैसला 38 COM 8B.25)। उससे पहले यह 16 साल तक भारत की संभावित सूची में रही। UNESCO की सूची के मुताबिक यह संपत्ति 4.68 हेक्टेयर की है और 125.44 हेक्टेयर के बफर जोन के भीतर है। इस बफर जोन में सहस्रलिंग तालाब भी आता है, वही तालाब जिसे मेरुतुंग ने तुलना के पैमाने की तरह इस्तेमाल किया था।

दोनों मानदंड सरल शब्दों में:

रानी की वाव राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। यह दर्जा इसे प्राचीन स्मारक, पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम (Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act), 1958 के तहत मिला है, जिसमें 2010 में संशोधन हुआ था। ASI एक अधीक्षण पुरातत्वविद् के जरिए इसकी देखरेख करता है। इसके हर तरफ 100 मीटर का ऐसा दायरा है जहां कोई नया निर्माण नहीं हो सकता, और 2013 से एक प्रबंधन योजना लागू है। लेकिन कानूनी सुरक्षा पाटन की बावड़ी में पानी वापस नहीं ला सकती। UNESCO के मुताबिक सरस्वती के खिसकने के बाद भूजल में जो बदलाव आए, उन्होंने कुएं के रूप में इसका जीवन खत्म कर दिया।

इकोमोस का मूल्यांकन तीन बड़े खतरे गिनाता है:

कुछ तारीखें इस कहानी को पूरा करती हैं:

सूची के बाकी स्थलों के लिए भारत में UNESCO विश्व धरोहर स्थल वाला नोट देखिए।

परीक्षा के लिए रानी की वाव कैसे पढ़ें

रानी की वाव अपने आकार के हिसाब से सिलेबस के कहीं ज्यादा हिस्सों में आती है:

मुख्य परीक्षा 2020 के GS पेपर I में उम्मीदवारों से इस पर चर्चा करने को कहा गया था: “भारतीय दर्शन और परंपरा ने भारत में स्मारकों और उनकी कला की कल्पना करने और उन्हें आकार देने में अहम भूमिका निभाई है। चर्चा कीजिए।” पानी और पति की याद, दोनों के सम्मान में बना एक उल्टा मंदिर इस सवाल का जवाब एक ही उदाहरण में दे देता है। वस्तुनिष्ठ हिस्से की बात करें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 94 कला और संस्कृति के हैं। इसलिए नीचे दिए नाम और तारीखें पक्की कर लीजिए।

इन्हें तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएं:

तीन उलझनें अंक कटवाती हैं:

पानी और स्मृति की इसी परंपरा के पड़ोसियों के साथ रानी की वाव को रखकर देखना भी मदद करता है:

ढांचास्थानसमयप्रकारबनवाने वाले
रानी की वावपाटन, गुजरात11वीं सदीमंडपों, कुंड और कुएं वाली बावड़ीरानी उदयमती, जैसा ग्रंथ में दर्ज है
सहस्रलिंग तालाबपाटन, गुजरातचालुक्य कालकृत्रिम जलाशयचालुक्य शासक
सूर्य मंदिर और कुंडमोढेरा, गुजरातभीम प्रथम का शासनकालसीढ़ीदार तालाब वाला मंदिरभीम प्रथम
रानी की बावड़ीबूंदी, राजस्थान17वीं सदी का आखिरी दौरबावड़ीअनिरुद्ध सिंह की विधवा

रानी की वाव उस पाठक को सबसे ज्यादा देती है जो दो कॉलम बनाकर चलता है: एक में वह जो 1304 का ग्रंथ कहता है, और दूसरे में वह जो बाद के विद्वानों और संस्थाओं ने उस पर खड़ा किया। इन दोनों को अलग रखिए। फिर यह अकेली बावड़ी राजाश्रय वाले उत्तर में उतनी ही आसानी से काम आएगी, जितनी संरक्षण वाले उत्तर में। वजह यह कि इसे पानी और स्मृति, दोनों को थामने के लिए बनाया गया था।

सामान्य प्रश्न

रानी की वाव किसने बनवाई?

रानी की वाव का श्रेय चालुक्य (सोलंकी) वंश की रानी उदयमती को दिया जाता है, जो भीम प्रथम की पत्नी और कर्ण की मां थीं। यह श्रेय जैन विद्वान मेरुतुंग के प्रबंध चिंतामणि से आता है, जो 1304 में लिखा गया था। इस ग्रंथ के मुताबिक रानी ने पाटन में एक नया जलाशय बनवाया। विद्वान और UNESCO इस बावड़ी को एक राजा का स्मारक मानते हैं, और सबसे ज्यादा संभावना यही है कि वह राजा उनके पति थे।

रानी की वाव कब बनी?

यह 11वीं सदी ईस्वी में बनी। आमतौर पर जो साल बताया जाता है, यानी 1063, वह उस तारीख से मेल खाता है जो ग्रंथ भीम प्रथम के शासन के अंत में कर्ण के राज्याभिषेक के लिए देता है। इसलिए इसे पारंपरिक तारीख ही मानिए। न तो UNESCO का मूल्यांकन और न ही इतिहासकार किरीट मांकोडी नींव के किसी ऐसे शिलालेख का हवाला देते हैं जिसमें साल लिखा हो।

रानी की वाव का मतलब क्या है?

रानी की वाव का मतलब है रानी की बावड़ी। वाव गुजराती में बावड़ी को कहते हैं, यानी ऐसा कुआं जिस तक सीढ़ियों की लंबी कतार से पहुंचा जाता है। राजस्थान में ऐसे ही ढांचे को, जैसे बूंदी वाले को, बावड़ी कहा जाता है।

रानी की वाव UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब बनी?

रानी की वाव को 22 जून 2014 को दोहा में विश्व धरोहर समिति के 38वें सत्र में, मानदंड (i) और (iv) के तहत सूची में दर्ज किया गया। यह 1998 से भारत की संभावित सूची में थी। UNESCO ने इसे रचनात्मक प्रतिभा की कृति के रूप में भी माना, और पानी जमा करने की व्यवस्था के तौर पर बावड़ी के असाधारण उदाहरण के रूप में भी।

किस नोट पर रानी की वाव छपी है?

महात्मा गांधी (नई) श्रृंखला के 100 रुपये के नोट के पीछे रानी की वाव का रूपांकन छपा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस लैवेंडर नोट की घोषणा 19 जुलाई 2018 को की थी, और 100 रुपये के पुराने नोट भी वैध मुद्रा बने हुए हैं।

रानी की वाव जैसी बावड़ी काम कैसे करती थी?

भूजल तक एक शाफ्ट खोदा जाता था, और उसके बगल में सीढ़ियों वाला एक लंबा गलियारा बनाया जाता था, ताकि लोग पैदल उतरकर पानी तक पहुंच सकें। मानसून में पानी का स्तर ऊपर आता था और सूखे महीनों में नीचे चला जाता था। सीढ़ियों की वजह से लोग किसी भी स्तर पर पानी तक पहुंच सकते थे। गलियारे के आर-पार बने मंडप गहरी बगल वाली दीवारों को मिट्टी के दबाव के खिलाफ थामे रखते थे।

रानी की वाव सदियों तक दबी क्यों रही?

13वीं सदी में बाढ़ और सरस्वती नदी के तल के खिसकने से बावड़ी गाद से भर गई। इस गाद ने इसे करीब सात सदियों तक छिपाए रखा, लेकिन इसकी मूर्तियों को भी बचाया। इसी वजह से इतना कुछ आज तक बचा है। मरम्मत 1937 में शुरू हुई, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1980 के दशक में ज्यादातर गाद हटाई।

क्या रानी की वाव में आज भी पानी रहता है?

नहीं। UNESCO के मुताबिक सरस्वती का रास्ता बदलने से भूजल का स्तर बदल गया, इसलिए 13वीं सदी के बाद से यह बावड़ी कुएं की तरह काम नहीं कर रही। आज यह राष्ट्रीय महत्व के एक संरक्षित स्मारक के रूप में बची है, जिसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. रानी की वाव के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसे 2014 में मानदंड (i) और (iv) के तहत विश्व धरोहर सूची में दर्ज किया गया। 2. इसका निर्माण बादामी के चालुक्यों के शासनकाल में हुआ था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (a) इसका निर्माण गुजरात के चालुक्यों (सोलंकियों) के शासनकाल में हुआ, जो बादामी के चालुक्यों से अलग वंश है।

2. भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किस नोट के पीछे रानी की वाव का रूपांकन छपा है?

उत्तर: (b) RBI ने रानी की वाव के रूपांकन वाले लैवेंडर 100 रुपये के नोट की घोषणा 19 जुलाई 2018 को की थी।

3. बावड़ी कैसे काम करती थी, इस बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसकी सीढ़ियों से लोग ऐसे पानी तक पहुंच पाते थे, जिसका स्तर मौसम के साथ ऊपर-नीचे होता था। 2. रानी की वाव में कुएं का शाफ्ट ढांचे के पूर्वी, यानी प्रवेश वाले छोर पर है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (a) प्रवेश पूर्व की ओर है और कुएं का शाफ्ट सबसे पश्चिमी छोर पर है।

4. कौन-सा ग्रंथ रानी उदयमती को पाटन में एक नया जलाशय बनवाने वाली के रूप में दर्ज करता है?

उत्तर: (b) 1304 में रचे गए मेरुतुंग के प्रबंध चिंतामणि में पाटन में रानी के काम का जिक्र है।

5. रानी की वाव के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसके आलों के देवताओं में विष्णु की मूर्तियां बाकी सभी से ज्यादा हैं। 2. यहां बनाए गए विष्णु के अवतारों में बुद्ध भी शामिल हैं। 3. इसकी ज्यादातर गाद 1980 के दशक में हटाई गई। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (d) इकोमोस विष्णु की प्रधानता और 1980 के दशक में गाद हटाने का ब्योरा देता है, और मांकोडी बुद्ध अवतार का वर्णन करते हैं।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. भारतीय कला विरासत की रक्षा करना इस समय की जरूरत है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।
  2. आप कैसे समझाएंगे कि मध्यकालीन भारतीय मंदिरों की मूर्तियां उस दौर के सामाजिक जीवन को दर्शाती हैं? (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2022, GS पेपर I।
  3. रानी की वाव को एक उल्टे मंदिर के रूप में डिजाइन किया गया था। समझाइए कि इसकी योजना पानी की आपूर्ति के काम को धार्मिक अर्थ से कैसे जोड़ती है। (15 अंक, 250 शब्द)
  4. बाढ़ की जिस गाद ने कुएं के रूप में रानी की वाव का जीवन खत्म किया, उसी ने इसे बचाया भी। बावड़ी के दबने और संरक्षण के इतिहास के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  5. पश्चिमी भारत की पारंपरिक बावड़ियां आज के भूजल प्रबंधन के लिए सबक देती हैं। उदाहरणों सहित चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)