तिब्बत का पठार: विश्व की छत — भूगोल और भू-राजनीति (यूपीएससी)
तिब्बत के पठार पर यूपीएससी मार्गदर्शिका — ऊँचाई, नदियाँ (सिंधु, ब्रह्मपुत्र, यांग्त्ज़ी, मेकांग), जलवायु, एशिया का जल मीनार तथा भारत-चीन रणनीतिक महत्व।
तिब्बत का पठार, जिसे क्विंघई-तिब्बत पठार या विश्व की छत (Roof of the World) भी कहा जाता है, पृथ्वी का सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा पठार है। लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और लगभग 4,500 मीटर (14,800 फीट) की औसत ऊँचाई वाला यह पठार दक्षिण में हिमालय, उत्तर में कुनलुन पर्वत, पश्चिम में काराकोरम और पूर्व में हेंगडुआन पर्वत से घिरा है।
आर्कटिक और अंटार्कटिक के बाहर सर्वाधिक जमे हुए मीठे पानी का भंडार होने के कारण इसे प्राय: तीसरा ध्रुव (Third Pole) कहा जाता है। यह पठार एशिया की दस प्रमुख नदियों का स्रोत है जो लगभग दो अरब लोगों का जीवन निर्वाह करती हैं। इसकी ऊँचाई, जलवायु और जल-विज्ञान इसे एशिया के पर्यावरण की धुरी — और भारत की रणनीतिक गणनाओं का केंद्रबिंदु — बनाते हैं।
यूपीएससी की दृष्टि से तिब्बत का पठार एक बहु-आयामी विषय है — यह जीएस-I में भौतिक भूगोल और मानसून तंत्र, जीएस-II में भारत-चीन सीमा विवाद एवं जल-कूटनीति, तथा जीएस-III में जलवायु परिवर्तन एवं हिमनद विमुद्रण से जुड़ता है। 1962 के युद्ध से लेकर 2020 के गलवान संघर्ष और 2023 की मेदोग बाँध परियोजना तक, इस पठार ने भारत की सुरक्षा एवं जल-सुरक्षा को निरंतर प्रभावित किया है।
भौतिक भूगोल

| विशेषता | मान |
|---|---|
| क्षेत्रफल | ~25 लाख वर्ग किमी |
| औसत ऊँचाई | ~4,500 मीटर (14,800 फीट) |
| लंबाई (पूर्व-पश्चिम) | ~2,500 किमी |
| चौड़ाई (उत्तर-दक्षिण) | ~1,000 किमी |
| सीमा पर सर्वोच्च शिखर | माउंट एवरेस्ट (क़ोमोलंगमा) — 8,849 मीटर |
| निम्नतम बिंदु | ~2,800 मीटर (भारतीय सीमा के निकट घाटी) |
| सबसे बड़ी झील | क्विंघई झील (त्सो न्गोनपो) — चीन की सबसे बड़ी खारे पानी की झील |
| महाद्वीपीय प्लेटें | भारतीय प्लेट का यूरेशियाई प्लेट से टकराव (~5 करोड़ वर्ष पूर्व) |
| राजनीतिक स्थिति | तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र + क्विंघई + शिनजियांग, गांसु, सिचुआन, युन्नान के भाग (चीन); लद्दाख (भारत); नेपाल, भूटान, पाकिस्तान के छोटे भाग |
पठार का उत्थान लगभग 5 करोड़ वर्ष पहले भारतीय प्लेट के यूरेशियाई प्लेट से टकराव के साथ आरंभ हुआ। यह आज भी प्रति वर्ष लगभग 5 मिमी की दर से ऊपर उठ रहा है तथा भूकंपीय रूप से सक्रिय है — इस क्षेत्र में बड़े भूकंप सामान्य हैं।
2025 में तिब्बती क्षेत्र में आए 6.8 तीव्रता के भूकंप ने इस अस्थिरता को पुनः रेखांकित किया। पठार के नीचे भारतीय प्लेट का खिसकना नियमित अंतराल पर भूकंपीय ऊर्जा का विमोचन करता है, जिसका प्रभाव हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे भारतीय राज्यों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि पठार और हिमालय श्रृंखला को विश्व के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में गिना जाता है।
एशिया का जल मीनार: यहाँ से निकलने वाली नदियाँ
तिब्बत का पठार एशिया की दस सबसे लंबी नदियों के लिए शीर्ष-जल क्षेत्र (headwaters region) है, और इसी कारण इसे एशिया का जल मीनार (Asian Water Tower) कहा जाता है।
| नदी | पठार पर स्रोत | प्रवाह | निर्भर देश |
|---|---|---|---|
| सिंधु (सेंगगे ज़ांगबो) | कैलाश पर्वत के पास | अरब सागर | भारत, पाकिस्तान, चीन |
| ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो) | एंग्सी हिमनद, कैलाश पर्वत के पास | बंगाल की खाड़ी | चीन, भारत, बांग्लादेश |
| सतलुज (लांगचेन ज़ांगबो) | राक्षसताल झील | सिंधु तंत्र | भारत, पाकिस्तान |
| गंगा (सहायक नदियाँ) | दक्षिणी ढलान | बंगाल की खाड़ी | भारत, बांग्लादेश |
| यांग्त्ज़ी (चांग जियांग) | गेलादैनडोंग हिमनद | पूर्वी चीन सागर | चीन |
| पीली नदी (हुआंग हे) | बायन हार पर्वत | बोहाई सागर | चीन |
| मेकांग (लांगकांग) | मध्य पठार | दक्षिण चीन सागर | चीन, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम |
| सालवीन (नू जियांग) | मध्य पठार | अंडमान सागर | चीन, म्यांमार, थाईलैंड |
| इरावदी (सहायक नदियाँ) | दक्षिण-पूर्व पठार | अंडमान सागर | म्यांमार |
| अमु दरिया (सहायक नदियाँ) | पामीर किनारा | अरल सागर बेसिन | ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान |
मुख्य बिंदु: चीन दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की लगभग प्रत्येक प्रमुख नदी के ऊर्ध्व-प्रवाह (upstream) को नियंत्रित करता है। ब्रह्मपुत्र और मेकांग पर बाँध निर्माण निरंतर भू-राजनीतिक चिंता का विषय है।
इस ऊर्ध्व-प्रवाह नियंत्रण के कार्यनीतिक निहितार्थ अत्यंत गंभीर हैं। चीन ने यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) पर ज़ांगमु, डागू, जियाचा एवं जिएक्सू जैसी कई पनबिजली परियोजनाएँ संचालित की हैं, और दिसंबर 2024 में मेदोग के ‘महान मोड़’ पर 60 गीगावाट क्षमता वाली विश्व की सबसे बड़ी बाँध परियोजना को मंजूरी दी। ऐसी परियोजनाएँ भारत के पूर्वोत्तर — विशेषकर अरुणाचल प्रदेश एवं असम — में जल-प्रवाह, अवसाद वितरण तथा बाढ़-सूखे चक्र को बदल सकती हैं। बांग्लादेश की डेल्टा-कृषि भी इन परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील है।
जलवायु और मौसम

- अल्पाइन शुष्क से अर्ध-शुष्क। हिमालय की वर्षा-छाया के कारण पठार के अधिकांश भाग में 500 मिमी से कम वर्षा होती है; उत्तर-पश्चिमी भागों में 100 मिमी से भी कम।
- तापमान सीमा: वार्षिक औसत 0 °C से −5 °C; ल्हासा में ग्रीष्मकालीन उच्च 15-20 °C; उत्तर में शीतकालीन निम्न −40 °C से नीचे।
- विरल वायुमंडल: वायुदाब समुद्र-तल का लगभग 60%; उच्च सौर विकिरण और पराबैंगनी (UV)।
- प्रबल मौसमी पवन तंत्र भारतीय ग्रीष्म मानसून को संचालित करते हैं — पठार का गर्म होना एक तापीय निम्न दाब क्षेत्र बनाता है जो हिंद महासागर से नमी-युक्त वायु को आकर्षित करता है।
- स्थायी हिम (Permafrost) पठार के लगभग आधे भाग को ढकता है; यह जलवायु परिवर्तन के कारण पतला हो रहा है।
पठार के तापीय व्यवहार और भारतीय मानसून के बीच का यह संबंध ‘मानसून पंप तंत्र’ कहलाता है। ग्रीष्मकाल में पठार की सतह तेजी से गर्म होती है, जिससे ऊपर की हवा फैलकर ऊपर उठती है और निचले स्तर पर निम्न दाब क्षेत्र बनता है। यही निम्न दाब हिंद महासागर से नमी खींचकर भारत के मानसून को सक्रिय करता है। इसलिए पठार की सतह के तापमान में जलवायु परिवर्तन से होने वाले परिवर्तन सीधे भारतीय कृषि को प्रभावित करते हैं।
हिमनद और तीसरा ध्रुव
पठार, साथ-साथ हिमालय और काराकोरम के साथ, 46,000 से अधिक हिमनद और ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर जमे हुए मीठे पानी का सबसे बड़ा भंडार रखता है। इसी कारण 2000 के दशक से तीसरा ध्रुव (Third Pole) शब्द प्रचलित हुआ।
- हिमनद पीछे हटना: ICIMOD और चीनी विज्ञान अकादमी के अध्ययनों के अनुसार 1970 के दशक से हिमनद 15-20% तक सिकुड़े हैं।
- दक्षिण एशियाई और पूर्वी एशियाई उत्सर्जनों से काला कार्बन (Black Carbon) का निक्षेपण पिघलाव को तेज करता है।
- हिमनद द्रव्यमान की हानि सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के शुष्क-ऋतु प्रवाह को संकट में डालती है।
पारिस्थितिकी और जैव विविधता

- वनस्पति: उच्च-ऊँचाई के घास के मैदान (चांगतांग), अल्पाइन घास के मैदान, ठंडे मरुस्थल, गद्दी पौधे (cushion plants)।
- जीव-जंतु: तिब्बती हिरण (चिरू), जंगली याक, तिब्बती भेड़िया, हिम तेंदुआ, क्यांग (तिब्बती जंगली गधा), काली गर्दन वाला सारस (एकमात्र उच्च-ऊँचाई का सारस)।
- संरक्षित क्षेत्र: चांगतांग प्रकृति आरक्षित (चीन), चांग चेनमो और हानले (भारत, लद्दाख), सानजियांगयुआन राष्ट्रीय उद्यान (यांग्त्ज़ी-पीली-मेकांग का शीर्ष-जल)।
मानव भूगोल
- जनसंख्या: पठार पर ~70 लाख, जिसमें ल्हासा (ऊँचाई 3,656 मीटर) तिब्बत की ऐतिहासिक राजधानी है।
- जातीय समूह: तिब्बती (सबसे बड़े), मोनपा, ल्होबा, हान चीनी (1950 के बाद का प्रवास), क़ियांग।
- अर्थव्यवस्था: चरवाही पशुपालन (याक, भेड़), घाटियों में जौ की खेती, खनिज निष्कर्षण (लिथियम, क्रोमाइट, ताँबा, सोना), पर्यटन और पनबिजली।
- धर्म: मुख्यतः तिब्बती बौद्ध धर्म जो पोताला महल, जोखांग मठ और ताशी ल्हुनपो जैसी संस्थाओं पर केंद्रित है।
भू-राजनीतिक महत्व
भारत-चीन आयाम
- पठार का दक्षिणी किनारा मैकमोहन रेखा (1914) है — भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा का आधार, जिसका चीन विरोध करता है।
- अक्साई चिन, उत्तर-पश्चिमी विस्तार, 1950 के दशक से चीनी नियंत्रण में है; भारत इसे लद्दाख का हिस्सा मानता है।
- 1962 का भारत-चीन युद्ध इसी पठार पर और इसके निकट लड़ा गया।
- चीन का अवसंरचना दबाव — क्विंघई-तिब्बत रेलवे (2006), सिचुआन-तिब्बत रेलवे (चरणबद्ध), G219 राजमार्ग, ल्हासा, न्यिंगची, शिगात्से में नए हवाई अड्डे — ने सैन्य रसद को तेज किया है।
- 2020 की गलवान घाटी संघर्ष और चल रहा LAC गतिरोध इसी पठार के दक्षिणी किनारे पर है।
जल कूटनीति
- ब्रह्मपुत्र बाँध: चीन ने यारलुंग त्सांगपो पर कई बाँध बनाए हैं और 2023 में मेदोग के महान मोड़ पर 60 गीगावाट पनबिजली परियोजना की घोषणा की — विश्व का सबसे बड़ा नियोजित बाँध। भारत ने प्रवाह नियमन और असम-बांग्लादेश तक अवसाद वितरण पर चिंता जताई है।
- ब्रह्मपुत्र या सतलुज पर भारत और चीन के बीच कोई औपचारिक जल-बँटवारा संधि नहीं है।
2023 में भारत-चीन ने ब्रह्मपुत्र पर ‘विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र’ की वार्षिक बैठक पुनः आरंभ की, परंतु यह केवल जलविज्ञान-संबंधी आँकड़ों — विशेषकर बाढ़ चेतावनी डेटा — के साझाकरण तक सीमित है। एक संधि की अनुपस्थिति का अर्थ है कि चीन के निर्णयों पर भारत का कोई कानूनी प्रतिकार नहीं है। यही कारण है कि भारत ने अरुणाचल प्रदेश में ‘अपर सियांग बहु-उद्देशीय परियोजना’ (11.2 गीगावाट) की योजना बनाई है, जो प्रथम-उपयोगकर्ता अधिकार के सिद्धांत से चीन के दावों के विरुद्ध भारत की स्थिति मजबूत करेगी।
तिब्बत प्रश्न
- 1950: पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत में प्रवेश किया।
- 1951: सत्रह-सूत्री समझौता।
- 1959: तिब्बती विद्रोह; 14वें दलाई लामा भारत भागे और उन्हें धर्मशाला में शरण मिली।
- निर्वासन में तिब्बती सरकार (केंद्रीय तिब्बती प्रशासन) हिमाचल प्रदेश के मैक्लॉडगंज में स्थित है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- पठार वैश्विक औसत से दोगुनी दर (प्रति दशक 0.3 °C) से गर्म हो रहा है।
- तेज़ स्थायी हिम का पिघलाव मीथेन छोड़ता है और अवसंरचना को अस्थिर करता है।
- पठार के तापन से जुड़ी भारतीय मानसून में बदलाव दक्षिण एशियाई कृषि के लिए निहितार्थ रखते हैं।
- हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs) का बढ़ता खतरा — जैसे 2021 का चमोली घटना और 2023 की सिक्किम तीस्ता-III आपदा।
त्वरित तुलना — तिब्बती बनाम दक्कन पठार
| विशेषता | तिब्बती पठार | दक्कन पठार |
|---|---|---|
| औसत ऊँचाई | ~4,500 मीटर | ~600 मीटर |
| उत्पत्ति | प्लेट टकराव | ज्वालामुखी (क्रिटेशियस बाढ़ बेसाल्ट) |
| जलवायु | अल्पाइन, ठंडी शुष्क | अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय |
| उद्गम नदियाँ | 10+ प्रमुख एशियाई नदियाँ | गोदावरी, कृष्णा, कावेरी |
| क्षेत्रफल | ~25 लाख वर्ग किमी | ~19 लाख वर्ग किमी |
| आयु | ~5 करोड़ वर्ष | ~6.5 करोड़ वर्ष (डेक्कन ट्रैप) |
| जैव विविधता | हिम तेंदुआ, याक, चिरू | बाघ, गौर, हाथी |
यूपीएससी प्रासंगिकता
प्रारंभिक परीक्षा (जीएस पेपर I) — Prelims बिंदु: प्रमुख नदियों की उत्पत्ति (सिंधु — कैलाश के पास, ब्रह्मपुत्र — एंग्सी हिमनद, यांग्त्ज़ी — गेलादैनडोंग), तिब्बती पठार की ऊँचाई (~4,500 मीटर), क्षेत्रफल (~25 लाख वर्ग किमी), एशिया का जल मीनार, तीसरा ध्रुव शब्दावली, अक्साई चिन और ट्रांस-हिमालय का भूगोल, मैकमोहन रेखा (1914), क्विंघई झील (चीन की सबसे बड़ी खारे पानी की झील), क्विंघई-तिब्बत रेलवे (2006)।
मेन्स अभ्यास प्रश्न
मेन्स (जीएस पेपर I — भूगोल):
- “तिब्बत का पठार केवल भौगोलिक विशेषता नहीं बल्कि एशिया की रणनीतिक धुरी है।” चर्चा करें।
- तीसरे ध्रुव पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और भारत के लिए डाउनस्ट्रीम परिणामों की समीक्षा करें।
मेन्स (जीएस पेपर II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध): भारत-चीन सीमा विवाद, ब्रह्मपुत्र बाँध मुद्दा, और जल-बँटवारा कूटनीति सीधे पठार के भूगोल पर आधारित हैं।
मेन्स (जीएस पेपर III — पर्यावरण): हिमनद विमुद्रण, काला-कार्बन निक्षेपण, स्थायी हिम पिघलाव, और हिमालयी जैव विविधता — सभी पठार तंत्र से जुड़े हैं।
निबंध: “एशिया का जल भविष्य,” “साझा नदियाँ, विवादित सीमाएँ,” और “उच्च ऊँचाई पर जलवायु परिवर्तन” जैसे विषय तिब्बती पठार पर सटीक रूप से लागू होते हैं।
तिब्बत के पठार को समझना भारत की जल, सीमा और जलवायु — तीनों चुनौतियों को समझने का आधार है। यह वह ‘मौन शक्ति-केंद्र’ है जो अरबों लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करता है, फिर भी सार्वजनिक चर्चा में अक्सर उपेक्षित रहता है। यूपीएससी अभ्यर्थी के लिए इस पठार की भौतिकी, जलविज्ञान और भू-राजनीति को एकीकृत रूप से समझना अनिवार्य है।
सामान्य प्रश्न
तिब्बत का पठार कहाँ स्थित है और यह कितना बड़ा है?
तिब्बत का पठार मध्य एशिया में स्थित है, जिसका अधिकांश भाग चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र, क्विंघई और शिनजियांग, गांसु, सिचुआन, युन्नान के भागों में आता है। भारत का लद्दाख इसके पश्चिमी विस्तार में है। इसका क्षेत्रफल लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर है — पृथ्वी का सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा पठार।
तिब्बत के पठार को ‘विश्व की छत’ और ‘तीसरा ध्रुव’ क्यों कहा जाता है?
‘विश्व की छत’ इसकी असाधारण ऊँचाई के कारण — औसत 4,500 मीटर। ‘तीसरा ध्रुव’ इसलिए क्योंकि आर्कटिक और अंटार्कटिक के बाहर जमे हुए मीठे पानी का सबसे बड़ा भंडार यहीं है — पठार के साथ-साथ हिमालय और काराकोरम मिलकर 46,000 से अधिक हिमनद धारण करते हैं।
एशिया की कौन-कौन सी प्रमुख नदियाँ तिब्बत के पठार से निकलती हैं?
दस प्रमुख एशियाई नदियाँ यहाँ से निकलती हैं — सिंधु, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, गंगा (सहायक), यांग्त्ज़ी, पीली नदी (हुआंग हे), मेकांग, सालवीन, इरावदी (सहायक) और अमु दरिया (सहायक)। ये नदियाँ लगभग दो अरब लोगों का जीवन निर्वाह करती हैं, जिसके कारण इस पठार को ‘एशिया का जल मीनार’ कहा जाता है।
ब्रह्मपुत्र पर चीन की मेदोग बाँध परियोजना क्या है?
2023 में चीन ने यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र का तिब्बती नाम) पर मेदोग के ‘महान मोड़’ पर 60 गीगावाट क्षमता वाली पनबिजली परियोजना की घोषणा की — विश्व का सबसे बड़ा नियोजित बाँध। यह भारत के पूर्वोत्तर में जल-प्रवाह, अवसाद वितरण और बाढ़-सूखे चक्र को प्रभावित कर सकता है। भारत और चीन के बीच इस नदी पर कोई औपचारिक जल-बँटवारा संधि नहीं है।
तिब्बत के पठार और भारतीय मानसून का क्या संबंध है?
ग्रीष्मकाल में पठार की सतह तेज़ी से गर्म होती है, जिससे ऊपर एक तापीय निम्न दाब क्षेत्र बनता है। यह निम्न दाब हिंद महासागर से नमी-युक्त वायु को आकर्षित करता है — यही भारतीय ग्रीष्म मानसून का मूल तंत्र है। इसलिए पठार की सतह के तापमान में जलवायु परिवर्तन से होने वाले परिवर्तन सीधे भारतीय मानसून और कृषि को प्रभावित करते हैं।
मैकमोहन रेखा क्या है और इसका तिब्बत से क्या संबंध है?
मैकमोहन रेखा 1914 के शिमला सम्मेलन में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच खींची गई सीमा रेखा है, जो अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा का आधार है। चीन इस रेखा को मान्यता नहीं देता और अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिण तिब्बत’ (झांगनान) के रूप में दावा करता है — यह भारत-चीन सीमा विवाद का केंद्रीय बिंदु है।
तिब्बत में कौन-से जीव-जंतु पाए जाते हैं?
तिब्बती हिरण (चिरू), जंगली याक, हिम तेंदुआ, तिब्बती भेड़िया, क्यांग (तिब्बती जंगली गधा), और काली गर्दन वाला सारस (विश्व का एकमात्र उच्च-ऊँचाई का सारस) यहाँ की विशिष्ट प्रजातियाँ हैं। चांगतांग प्रकृति आरक्षित (चीन) और सानजियांगयुआन राष्ट्रीय उद्यान इन प्रजातियों का प्रमुख संरक्षण क्षेत्र हैं।
दलाई लामा भारत कब और क्यों आए?
14वें दलाई लामा 1959 के तिब्बती विद्रोह के पश्चात तिब्बत से भागकर भारत आए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण दी और हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला (मैक्लॉडगंज) में बसाया। यहीं से ‘निर्वासन में तिब्बती सरकार’ (केंद्रीय तिब्बती प्रशासन) संचालित होती है। यह भारत-चीन संबंधों का एक संवेदनशील पहलू है।
तिब्बत के पठार पर जलवायु परिवर्तन के क्या प्रभाव हैं?
पठार वैश्विक औसत से दोगुनी दर (प्रति दशक 0.3 °C) से गर्म हो रहा है। हिमनद 1970 के दशक से 15-20% सिकुड़े हैं, स्थायी हिम पिघल रहा है (मीथेन छोड़ता है), और हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs) का खतरा बढ़ा है — जैसे 2021 का चमोली और 2023 का सिक्किम तीस्ता-III आपदा। ये परिवर्तन सिंधु और ब्रह्मपुत्र के शुष्क-ऋतु प्रवाह को संकट में डालते हैं।
तिब्बती और दक्कन पठार में क्या अंतर है?
तिब्बती पठार ~4,500 मीटर ऊँचा, प्लेट टकराव से बना, अल्पाइन-ठंडी शुष्क जलवायु वाला है। दक्कन पठार ~600 मीटर ऊँचा, ज्वालामुखी (क्रिटेशियस बाढ़ बेसाल्ट) से बना, अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला है। तिब्बत से 10+ एशियाई नदियाँ निकलती हैं; दक्कन से गोदावरी, कृष्णा, कावेरी निकलती हैं। दक्कन पुराना (~6.5 करोड़ वर्ष), तिब्बती अपेक्षाकृत नया (~5 करोड़ वर्ष) है।