UPSC 2025: क्रिटिकल मिनरल, Majorana 1 क्वांटम चिप, दुर्लभ मृदा तत्व और आधुनिक सैन्य विस्फोटक — पूरे नोट्स
UPSC प्रीलिम्स 2025 के चार सवाल एक साथ: भारत के 30 क्रिटिकल मिनरल, Minerals Security Partnership, दुर्लभ मृदा तत्व और डिस्प्ले फ़ॉस्फ़र, Majorana 1 क्यूबिट, AI की सीढ़ी, और CL-20, HMX, LLM-105 विस्फोटक।
UPSC प्रीलिम्स 2025 के GS पेपर-I में चार सवाल ऐसे थे जो मिलकर भारत की संसाधन सुरक्षा, डीप-टेक की महत्वाकांक्षा और रक्षा आधुनिकीकरण की अगली कतार को छूते हैं — Q6 विस्फोटक CL-20, HMX और LLM-105 पर, Q7 Majorana 1 क्वांटम चिप और AI की सीढ़ी पर, Q36 Minerals Security Partnership पर, और Q61 डिस्प्ले में लगने वाले दुर्लभ मृदा तत्वों पर। ये अलग-अलग पड़ी जानकारी नहीं हैं। ये सीधे भारत के National Critical Minerals Mission, National Quantum Mission, Semicon India कार्यक्रम और DRDO के हाई-एनर्जी मटीरियल रोडमैप से जुड़ते हैं। इस नोट में इन चारों को एक ही सिलेबस ब्लॉक की तरह पढ़ा गया है।
भाग 1: क्रिटिकल मिनरल और Minerals Security Partnership
क्रिटिकल मिनरल (critical mineral) वह खनिज है जिसकी सप्लाई रुक जाने से आयात करने वाले देश की अर्थव्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ा नुक़सान हो। इसलिए यह लेबल तकनीकी भी है और राजनीतिक भी — बिजली की तरफ़ बढ़ती ग्रिड के लिए ताँबा ज़रूरी है, स्टोरेज के लिए लिथियम, स्टील की मिश्रधातु के लिए नायोबियम, और सेमीकंडक्टर के लिए गैलियम। हर बड़ी अर्थव्यवस्था अब अपनी अलग सूची रखती है। United States Geological Survey 50 क्रिटिकल मिनरल गिनाता है (2022 का संशोधन)। यूरोपीय संघ अपने Critical Raw Materials Act, 2024 के तहत 34 क्रिटिकल और 17 स्ट्रैटेजिक कच्चे माल गिनाता है। जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन भी वैसी ही सूचियाँ रखते हैं। भारत इस बहस में औपचारिक रूप से 2023 में आया।
भारत के 30 क्रिटिकल मिनरल — वीना कुमारी डरमल की सूची
खान मंत्रालय ने नवंबर 2022 में संयुक्त सचिव वीना कुमारी डरमल की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति बनाई। समिति ने यूरोपीय संघ, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्रिटेन और कनाडा के तरीक़ों से अपनी तुलना की, और फिर भारत के हिसाब से आर्थिक महत्व और सप्लाई के जोखिम पर दो चरणों वाली छँटनी लगाई। 28 जून 2023 को आई इसकी रिपोर्ट ने 30 खनिजों को भारत के लिए क्रिटिकल बताया।
| # | खनिज | मुख्य इस्तेमाल | भारत की स्थिति |
|---|---|---|---|
| 1 | एंटीमनी | आग रोकने वाले पदार्थ, लेड-एसिड बैटरी, गोला-बारूद | ~90% आयात |
| 2 | बेरिलियम | एयरोस्पेस मिश्रधातु, न्यूक्लियर रिएक्टर, X-रे विंडो | देश में सीमित |
| 3 | बिस्मथ | दवाइयाँ, कम तापमान पर पिघलने वाली मिश्रधातु, कॉस्मेटिक | पूरा आयात |
| 4 | कोबाल्ट | EV बैटरी (कैथोड), सुपरअलॉय, कैटेलिस्ट | 100% आयात |
| 5 | ताँबा | बिजली की वायरिंग, EV मोटर, ग्रिड का बुनियादी ढाँचा | ~93% आयात (कंसंट्रेट) |
| 6 | गैलियम | GaN पावर सेमीकंडक्टर, LED, 5G बेस स्टेशन | पूरा आयात |
| 7 | जर्मेनियम | फ़ाइबर ऑप्टिक्स, इन्फ़्रा-रेड ऑप्टिक्स, सोलर सेल | पूरा आयात |
| 8 | ग्रेफ़ाइट (प्राकृतिक) | लिथियम-आयन बैटरी के एनोड, रिफ़्रैक्टरी, लुब्रिकेंट | ~60% आयात |
| 9 | हैफ़्नियम | न्यूक्लियर कंट्रोल रॉड, प्लाज़्मा कटिंग, सुपर अलॉय | पूरा आयात |
| 10 | इंडियम | ITO टचस्क्रीन, सोलर PV, LCD डिस्प्ले | पूरा आयात |
| 11 | लिथियम | EV बैटरी, ग्रिड स्टोरेज, सेरामिक | 100% आयात (J&K में 5.9 MT अनुमानित) |
| 12 | मॉलिब्डेनम | स्टील मिश्रधातु, कैटेलिस्ट, लुब्रिकेंट | बड़े हिस्से में आयात |
| 13 | नायोबियम | HSLA स्टील, सुपरकंडक्टर, कैपेसिटर | ~100% आयात (ब्राज़ील) |
| 14 | निकल | स्टेनलेस स्टील, EV बैटरी कैथोड | 100% आयात |
| 15 | PGE (Pt, Pd, Rh, Ir, Os, Ru) | कैटेलिटिक कन्वर्टर, हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइज़र | पूरा आयात |
| 16 | फ़ॉस्फ़ोरस | खाद, लिथियम-आयरन-फ़ॉस्फ़ेट बैटरी | ~90% आयात (रॉक फ़ॉस्फ़ेट) |
| 17 | पोटाश | खाद | 100% आयात |
| 18 | REE (17 तत्व) | मैग्नेट, फ़ॉस्फ़र, लेज़र, रक्षा | भंडार ~7%, उत्पादन ~1% |
| 19 | रीनियम | जेट-इंजन सुपरअलॉय, कैटेलिस्ट | पूरा आयात |
| 20 | सिलिकॉन (उच्च शुद्धता वाला) | सेमीकंडक्टर, सोलर PV | बड़े हिस्से में आयात |
| 21 | स्ट्रॉन्शियम | फ़ेराइट मैग्नेट, आतिशबाज़ी, सेरामिक | पूरा आयात |
| 22 | टैंटलम | इलेक्ट्रॉनिक्स के कैपेसिटर, सर्जिकल इम्प्लांट | पूरा आयात |
| 23 | टेल्यूरियम | CdTe थिन-फ़िल्म सोलर, थर्मो-इलेक्ट्रिक | पूरा आयात |
| 24 | टिन | सोल्डर, टिन-प्लेट, रसायन | ज़्यादातर आयात |
| 25 | टाइटेनियम | एयरोस्पेस मिश्रधातु, रंगद्रव्य, इम्प्लांट | खनिज भरपूर (इल्मेनाइट), धातु बनाने की क्षमता कम |
| 26 | टंगस्टन | कटिंग टूल, गोला-बारूद, फ़िलामेंट | ~100% आयात (सेलम-ईरोड के भंडार बिना छुए पड़े हैं) |
| 27 | वैनेडियम | स्टील मिश्रधातु, रेडॉक्स-फ़्लो बैटरी | बड़े हिस्से में आयात |
| 28 | ज़र्कोनियम | न्यूक्लियर क्लैडिंग, सेरामिक, फ़ाउंड्री | समुद्रतटीय रेत में संसाधन, रिफ़ाइनिंग सीमित |
| 29 | सेलेनियम | काँच, सोलर सेल, पशु आहार | पूरा आयात |
| 30 | कैडमियम | NiCd बैटरी, CdTe सोलर, रंगद्रव्य | ज़िंक स्मेल्टिंग का उपोत्पाद |
UPSC के क्रिटिकल मिनरल टॉपिक के लिए यही एक टेबल सबसे ज़रूरी है। आयात पर निर्भरता वाला कॉलम ध्यान से देखिए — यही बताता है कि Q36 का कथन II (“भारत सभी 30 क्रिटिकल मिनरल में संसाधन-संपन्न है”) साफ़ तौर पर ग़लत क्यों है। ज़्यादातर खनिजों के लिए भारत आयात पर टिका है, और सिद्ध संसाधन गिने-चुने में ही हैं — टाइटेनियम के लिए इल्मेनाइट और रूटाइल, समुद्रतटीय रेत का ज़र्कोन, और जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले के सलाल-हैमाना में हाल में अनुमानित लिथियम ब्लॉक, जिसे Geological Survey of India ने फ़रवरी 2023 में 59 लाख टन आँका था।
Minerals Security Partnership
Minerals Security Partnership की घोषणा 14 जून 2022 को अमेरिकी विदेश विभाग के Bureau of Energy Resources ने की थी। शुरुआती ग्यारह सदस्य थे — अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ़िनलैंड, फ़्रांस, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया, स्वीडन, ब्रिटेन और यूरोपीय आयोग। बाद में इटली और नॉर्वे जुड़े, फिर एस्टोनिया। भारत 22 जून 2023 को प्रधानमंत्री मोदी की वाशिंगटन राजकीय यात्रा के दौरान सदस्य बना, और यूरोपीय संघ को गिनते हुए गिनती पंद्रह हो गई। चेक गणराज्य उसके बाद जुड़ा। MSP अमेरिकी विदेश विभाग के ज़रिए चलता है और इसका कोई स्थायी सचिवालय नहीं है — यह तालमेल बिठाने वाला मंच है, कोई संगठन नहीं।
इसका काम तीन खंभों पर टिका है: ज़िम्मेदार क्रिटिकल-मिनरल सप्लाई चेन में सरकारी और निजी निवेश खींचना; ऑफ़टेक, भूवैज्ञानिक मैपिंग और ESG मानकों पर जानकारी साझा करना; और खनिज-संपन्न उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बातचीत करना। साझेदारी ने कुछ ख़ास परियोजनाएँ चुनी हैं — तंज़ानिया में एक ग्रेफ़ाइट खदान, एस्टोनिया में दुर्लभ मृदा प्रोसेसिंग प्लांट, ब्राज़ील में निकल-कोबाल्ट का काम — जिनके लिए MSP Forum के तहत मिलकर पैसा जुटाया जाएगा। यह फ़ोरम फ़रवरी 2024 में केप टाउन की Indaba माइनिंग कॉन्फ़्रेंस में शुरू हुआ।
भारत का घरेलू ढाँचा
भारत क्रिटिकल मिनरल के मामले में सिर्फ़ MSP के सहारे नहीं चल रहा। 2022 के बाद घर के अंदर चार परतों वाला ढाँचा खड़ा हुआ है।
| परत | औज़ार | काम |
|---|---|---|
| क़ानून | MMDR संशोधन अधिनियम 2023 | 24 खनिजों की “क्रिटिकल और स्ट्रैटेजिक मिनरल” श्रेणी बनाई, जिनकी नीलामी केंद्र सरकार के पास रखी गई। परमाणु खनिजों की निजी खोज की छूट दी। |
| मिशन | National Critical Mineral Mission (जनवरी 2025, 16,300 करोड़ रुपये) | घरेलू खोज, रीसाइक्लिंग, विदेश में खदान लेना, R&D और व्यापार — सबको एक साथ जोड़ने वाला पूरी सरकार का ढाँचा। |
| विदेश | KABIL (NALCO + HCL + MECL) | विदेशी खनिज संपत्तियाँ ख़रीदता है। जनवरी 2024 में अर्जेंटीना की CAMYEN के साथ कैटामार्का लिथियम ब्लॉक का सौदा किया। |
| नीलामी | खान मंत्रालय, नवंबर 2023 से चरण | 2025 के मध्य तक चार चरणों में लिथियम, REE, ग्रेफ़ाइट, निकल, ताँबा और वैनेडियम के ब्लॉक नीलाम हुए। |
नवंबर 2023 की पहली नीलामी को ठंडा जवाब मिला — बीस ब्लॉक में से गिने-चुने ही बिके। एक वजह यह थी कि खोज का डेटा G4 यानी शुरुआती टोह के स्तर का था, गंभीर व्यापारिक निवेश के लिए बहुत जल्दी। आगे के चरणों में भूवैज्ञानिक पक्का-पन बढ़ाया गया और शुरुआती उत्पादकों को रॉयल्टी में 50% छूट दी गई। सलाल-हैमाना लिथियम ब्लॉक को पहला दौर फेल होने के बाद दो बार दोबारा नीलाम करना पड़ा।
29 जनवरी 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंज़ूर हुआ National Critical Mineral Mission इससे ज़्यादा धार रखता है। इसके सात साल के 16,300 करोड़ रुपये के आवंटन के ऊपर सार्वजनिक क्षेत्र से 18,000 करोड़ रुपये के निवेश की उम्मीद है। मिशन में गिनती वाले लक्ष्य रखे गए हैं: Geological Survey of India और Mineral Exploration Corporation Limited 2031 तक 1,200 खोज परियोजनाएँ शुरू करेंगे, बीस क्रिटिकल-मिनरल ब्लॉक चालू होंगे, प्रोसेसिंग तकनीक के लिए चार सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस बनेंगे, देश में ऐसी रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री खड़ी होगी जो साल में 4 लाख टन सेकंडरी कच्चा माल सँभाल सके, और एक Critical Mineral Stockpile बनेगा जिसमें लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा ऑक्साइड का छह महीने का बफ़र रखा जाएगा। डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की लागत घटाने के लिए केंद्रीय बजट 2024-25 में पच्चीस क्रिटिकल मिनरल पर कस्टम ड्यूटी ख़त्म कर दी गई।
Offshore Areas Mineral (Development and Regulation) Amendment Act, 2023 ने समुद्र तल की खोज का रास्ता खोला। अपतटीय ब्लॉक का पहला चरण — मैंगनीज़, कोबाल्ट, ताँबा और निकल वाले पॉलीमेटैलिक नोड्यूल और क्रस्ट — नवंबर 2024 में भारत के पश्चिमी महाद्वीपीय शेल्फ़ पर अधिसूचित हुआ। भारत के पास International Seabed Authority के साथ दो अनुबंध भी हैं — मध्य हिंद महासागर बेसिन में पॉलीमेटैलिक नोड्यूल और मध्य हिंद महासागर कटक में पॉलीमेटैलिक सल्फ़ाइड की खोज के लिए। इससे गहरे समुद्र के खनिजों की बहस में भारत की पुरानी जगह बनी हुई है।
चीन का पहलू और उसके ख़िलाफ़ बना वैश्विक ढाँचा
| देश/समूह | नीति का औज़ार | साल | ख़ास बात |
|---|---|---|---|
| अमेरिका | Inflation Reduction Act (IRA), Defense Production Act Title III | 2022 | साफ़ ऊर्जा के लिए 369 अरब डॉलर, EV टैक्स क्रेडिट इस शर्त पर कि खनिज गैर-FEOC स्रोत से आए |
| यूरोपीय संघ | Critical Raw Materials Act | 2024 | 2030 के मानक: 10% घरेलू खनन, 40% प्रोसेसिंग, 25% रीसाइक्लिंग, एक तीसरे देश से ज़्यादा से ज़्यादा 65% |
| ऑस्ट्रेलिया | Critical Minerals Strategy 2023-30 | 2023 | परियोजनाओं के लिए 4 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की Critical Minerals Facility |
| जापान | JOGMEC का ऑफ़टेक सहारा | चालू | विदेशी खनिज हिस्सेदारी ख़रीदने वाली जापानी कंपनियों को इक्विटी और लोन गारंटी |
| भारत | National Critical Mineral Mission | 2025 | सात साल में 16,300 करोड़ रुपये, 1,200 खोज परियोजनाएँ |
| चीन | REE निर्यात नियंत्रण, गैलियम-जर्मेनियम कोटा | 2023 से | डाउनस्ट्रीम दबदबे को हथियार बनाना — खनन में 60%, प्रोसेसिंग में 87% |
अगस्त 2023 में चीन ने गैलियम और जर्मेनियम पर निर्यात नियंत्रण लगाए, दिसंबर 2023 में ग्रेफ़ाइट पर पाबंदी और 2024 में एंटीमनी पर नियंत्रण लगाए — यहीं से MSP को असली राजनीतिक रफ़्तार मिली। भारत का इसमें शामिल होना जितना पूँजी की तलाश थी, उतना ही चीन के ख़िलाफ़ बचाव भी। गलवान की तनातनी और उसके बाद सेमीकंडक्टर की किल्लत से आए सप्लाई-चेन झटकों ने साउथ ब्लॉक को समझा दिया कि क्रिटिकल मिनरल अब खान मंत्रालय की फ़ाइल नहीं हैं।
भारत के कुछ द्विपक्षीय रास्ते भी साथ चल रहे हैं। मार्च 2022 में हुई India-Australia Critical Minerals Investment Partnership में लिथियम, कोबाल्ट, वैनेडियम, निकल और REE परियोजनाओं की साझा जाँच-परख के लिए 58 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तय हुए, और KABIL के पास कई ऑस्ट्रेलियाई कामों में ऑफ़टेक का हक़ है। जनवरी 2023 में शुरू हुई भारत-अमेरिका initiative on Critical and Emerging Technologies (iCET) में क्रिटिकल मिनरल का एक हिस्सा है। 2024 में शुरू हुआ Quad का Critical Minerals Working Group भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया को निवेश की साझा जाँच वाले मंच पर लाता है। जुलाई 2024 में तय हुई भारत-ब्रिटेन Technology Security Initiative में सेमीकंडक्टर और AI के साथ क्रिटिकल मिनरल भी जोड़े गए।
Q36 की गुत्थी
सवाल MSP पर था। कथन I — “भारत शामिल हो गया है” — सही है (जून 2023)। कथन II — “भारत सभी 30 क्रिटिकल मिनरल में संसाधन-संपन्न है” — ग़लत है, जैसा ऊपर की निर्भरता वाली टेबल दिखाती है। सही जवाब है (a) केवल I। UPSC की बनावट उन उम्मीदवारों को नंबर देती है जो कूटनीतिक घटना और उसके पीछे की संसाधन हक़ीक़त, दोनों पर नज़र रखते हैं — सिर्फ़ प्रेस रिलीज़ पर नहीं।
भाग 2: दुर्लभ मृदा तत्व और डिस्प्ले का रिश्ता
दुर्लभ मृदा तत्व (rare earth elements) सत्रह रासायनिक रूप से मिलती-जुलती धातुएँ हैं — पंद्रह लैंथेनाइड (परमाणु संख्या 57 से 71), और उनके साथ स्कैंडियम (21) और यिट्रियम (39)। नाम इतिहास की एक भूल है। भूपर्पटी में ये ख़ास दुर्लभ नहीं हैं — सीरियम ताँबे से ज़्यादा आम है — लेकिन ये लगभग कभी गाढ़े, खोदने लायक़ भंडार में नहीं मिलते। ये एक-दूसरे के साथ मिले हुए मिलते हैं, इसलिए इन्हें अलग करना रसायन के लिहाज़ से मुश्किल और पर्यावरण के लिए गंदा काम है।
REE के दो परिवार
| समूह | तत्व | पहचान वाला गुण | सबसे बड़ा इस्तेमाल |
|---|---|---|---|
| हल्के REE (LREE) | La, Ce, Pr, Nd, Pm, Sm, Eu, Gd | परमाणु संख्या कम, ज़्यादा मिलते हैं, निकालना आसान | कैटेलिस्ट (Ce), NdFeB मैग्नेट (Nd, Pr), लाल फ़ॉस्फ़र (Eu) |
| भारी REE (HREE) | Tb, Dy, Ho, Er, Tm, Yb, Lu, Sc, Y | परमाणु संख्या ज़्यादा, कम मिलते हैं, अलग करना मुश्किल | ऊँचे तापमान वाले मैग्नेट में मिलाने के लिए (Dy, Tb), डिस्प्ले फ़ॉस्फ़र (Y, Tb), फ़ाइबर-ऑप्टिक एम्प्लिफ़ायर (Er) |
HREE की क़ीमत ज़्यादा है और उनका रणनीतिक जोखिम भी ज़्यादा है, क्योंकि भूगर्भ में उनका जमाव थोड़ी ही जगहों पर सिमटा है। डिस्प्रोसियम और टर्बियम — जो EV की ट्रैक्शन मोटर और पवन टर्बाइन में लगने वाले ऊँचे तापमान के नियोडाइमियम मैग्नेट के लिए ज़रूरी हैं — पर दक्षिणी चीन की आयनिक-क्ले जमाओं का दबदबा है।
फ़ॉस्फ़र, डिस्प्ले और Q61 का तर्क
फ़ॉस्फ़र (phosphor) वह पदार्थ है जो बाहर से ऊर्जा मिलने पर दिखने वाली रोशनी छोड़ता है — पराबैंगनी रोशनी, इलेक्ट्रॉन बीम या कोई दूसरा फ़ोटॉन। फ़्लैट-पैनल LCD-LED टीवी में सफ़ेद LED बैकलाइट रंग के फ़िल्टर से गुज़रती है; क्वांटम-डॉट या पुराने CRT डिस्प्ले में फ़ॉस्फ़र ही मिली ऊर्जा को सीधे लाल, हरी और नीली रोशनी में बदलते हैं। REE इस काम के लिए ख़ास तौर पर मुफ़ीद हैं, क्योंकि लैंथेनाइड के 4f इलेक्ट्रॉन आस-पास की क्रिस्टल जाली से बचे रहते हैं और इससे तेज़, बहुत सँकरी पट्टी वाली उत्सर्जन रेखाएँ बनती हैं — रंग के मामले में सटीक डिस्प्ले को ठीक यही चाहिए।
| रंग | फ़ॉस्फ़र | सक्रिय REE | इस्तेमाल |
|---|---|---|---|
| लाल | Y2O3:Eu3+, Y2O2S:Eu3+ | यूरोपियम (डोपैंट), यिट्रियम (होस्ट) | CRT, LED, फ़्लोरेसेंट लैंप |
| हरा | LaPO4:Tb3+, GdMgB5O10:Tb3+ | टर्बियम | तीन रंग वाली फ़्लोरेसेंट ट्यूब, LED |
| नीला | BaMgAl10O17:Eu2+, (Sr,Ce)PO4 | यूरोपियम (II), सीरियम | कॉम्पैक्ट फ़्लोरेसेंट लैंप, LED |
| सफ़ेद (चौड़ी पट्टी) | YAG:Ce3+ (यिट्रियम एल्युमिनियम गार्नेट) | सीरियम | सफ़ेद LED में बदलाव (Nichia का पेटेंट) |
| निकट-अवरक्त | Er मिला सिलिका | अर्बियम | फ़ाइबर-ऑप्टिक एम्प्लिफ़ायर (EDFA) |
REE फ़ॉस्फ़र में होने वाली स्फुरदीप्ति (phosphorescence) लैंथेनाइड आयन के तय ऊर्जा स्तरों के बीच का क्वांटम-यांत्रिक बदलाव है। प्रतिदीप्ति (fluorescence) नैनोसेकंड में ख़त्म हो जाती है, जबकि स्फुरदीप्ति में एक वर्जित संक्रमण होता है जो ज़्यादा देर टिकता है — इसीलिए कुछ पदार्थ बाद तक चमकते रहते हैं। तो Q61 ने दो सही कथन जाँचे — REE फ़्लैट टीवी और कंप्यूटर मॉनिटर में लगते हैं, और उनमें स्फुरदीप्ति का गुण होता है — जिससे सही जवाब (c) दोनों सही बनता है।
REE के दूसरे रणनीतिक इस्तेमाल
| इस्तेमाल | कौन-सा REE | रणनीतिक क्षेत्र | विकल्प मौजूद है? |
|---|---|---|---|
| NdFeB स्थायी मैग्नेट | Nd, Pr, Dy, Tb | EV, पवन टर्बाइन, MRI, रोबोटिक्स | फ़ेराइट मैग्नेट हैं, पर 5-10 गुना कमज़ोर |
| समैरियम-कोबाल्ट मैग्नेट | Sm | मिसाइल गाइडेंस, जेट-इंजन एक्चुएटर | सीमित; ऊँचे तापमान में काम करने के लिए चुने जाते हैं |
| गाड़ियों के कैटेलिटिक कन्वर्टर | Ce, La | उत्सर्जन पर काबू | आधा-अधूरा — Pt/Pd से बदलना महँगा |
| फ़्लूइड कैटेलिटिक क्रैकिंग | La, Ce | पेट्रोलियम रिफ़ाइनिंग | सीरियम-ज़ीओलाइट के बिना काम नहीं |
| Nd-ग्लास लेज़र | Nd | इनर्शियल कन्फ़ाइनमेंट फ़्यूज़न, मटीरियल प्रोसेसिंग | ऊँची ऊर्जा वाले कामों के लिए कोई नहीं |
| NiMH बैटरी | La, Ce मिशमेटल | हाइब्रिड गाड़ियाँ, स्थिर स्टोरेज | लिथियम-आयन ने ज़्यादातर जगह ले ली है |
| पॉलिशिंग पाउडर | Ce | काँच, सेमीकंडक्टर वेफ़र | बारीक ऑप्टिक्स के लिए सिलिका/एल्युमिना घटिया |
REE में भारत कहाँ खड़ा है
भारत के पास अनुमानित 69 लाख टन REE ऑक्साइड हैं — दुनिया के कुल का क़रीब 7% — और इससे वह चीन (44 MT) और ब्राज़ील (21 MT) के बाद तीसरे नंबर पर है। उत्पादन सिर्फ़ 2,900 टन सालाना है, यानी दुनिया के उत्पादन का 1% से भी कम। यह फ़र्क़ परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1962 के तहत दशकों चली सख़्त लाइसेंसिंग से आया है, क्योंकि भारत का मुख्य REE स्रोत मोनाज़ाइट है — थोरियम वाला समुद्रतटीय रेत का खनिज, जिसे “प्रिस्क्राइब्ड सब्स्टेंस” माना गया और परमाणु ऊर्जा विभाग की इकाइयों के लिए सुरक्षित रखा गया।
| इकाई | संचालक | जगह | उत्पादन |
|---|---|---|---|
| चवारा यूनिट | IREL | केरल | समुद्रतटीय रेत से इल्मेनाइट, रूटाइल, मोनाज़ाइट, ज़र्कोन |
| मणवलकुरिची | IREL | तमिलनाडु | भारी खनिजों को अलग करना, मोनाज़ाइट |
| रेयर अर्थ्स डिवीज़न, आलुवा | IREL | केरल | थोरियम कंसंट्रेट, मिश्रित REE क्लोराइड |
| OSCOM | IREL | ओडिशा | भारत का सबसे बड़ा समुद्रतटीय रेत का काम |
| RED, भोपाल | IREL | मध्य प्रदेश | NdFeB मैग्नेट R&D, तत्वों को अलग करना |
MMDR संशोधन अधिनियम 2023 ने पहली अनुसूची के भाग B से छह परमाणु खनिज हटाकर इसमें कुछ ढील दी, जिससे मोनाज़ाइट के साथ मिलने वाले REE की निजी खोज का रास्ता खुला। निजी REE ब्लॉक की पहली नीलामी 2024 में शुरू हुई। National Critical Mineral Mission ने IREL भोपाल में खदान-से-मैग्नेट तक की जुड़ी हुई सप्लाई चेन और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के साथ मिलकर एक डाउनस्ट्रीम मैग्नेट प्लांट के लिए अलग पैसा तय किया है।
चीन के मुक़ाबले खड़े होने वाले वैश्विक नाम भी हैं — MP Materials, जो कैलिफ़ोर्निया की Mountain Pass खदान चलाती है और टेक्सस में मैग्नेट प्लांट बना रही है, जिसकी ख़रीदार General Motors है; Lynas Corporation, जो पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के Mount Weld में खनन और मलेशिया के क्वांतान में प्रोसेसिंग करती है और अमेरिका में नई इकाइयाँ बना रही है; और एस्टोनिया के सिल्लामे की REE रिफ़ाइनरी, जो यूरोपीय बाज़ार के लिए कच्चा माल तैयार करती है। MSP इस पूरे जाल में निवेश का बहाव तय करता है।
2010 की सेनकाकू-दियाओयू घटना, जब समुद्री विवाद के बीच चीन ने जापान को REE निर्यात कुछ समय के लिए रोक दिया था, दुनिया भर में REE सुरक्षा नीति की शुरुआत थी। जापान ने जवाब में Lynas परियोजना को पैसा दिया और रणनीतिक भंडार बनाए। REE के विकल्प और रीसाइक्लिंग पर शोध में भी पैसा लगाया। आज जापान अपनी REE खपत का क़रीब 30% पुराने मैग्नेट से रीसाइकल कर लेता है, जो दुनिया में सबसे ऊँची दर है। अमेरिका के ऊर्जा विभाग का एक पुराना कार्यक्रम कोयले की राख से लैंथेनाइड निकालने पर काम कर रहा है। भारत का वैसा ही मौक़ा लाल कीचड़ (red mud) में है — बॉक्साइट रिफ़ाइनिंग का कचरा, जिसमें स्कैंडियम और दूसरे REE भरे हैं, और जहाँ NALCO ने निकालने की तकनीक की पायलट कोशिश की है।
भाग 3: Majorana 1, क्वांटम कंप्यूटिंग और AI की सीढ़ी
19 फ़रवरी 2025 को Microsoft ने Nature में एक पेपर छापा और Majorana 1 चिप की घोषणा की — जिसे उसने टोपोलॉजिकल क्यूबिट से चलने वाला दुनिया का पहला क्वांटम प्रोसेसर कहा। आठ क्यूबिट की यह चिप इंडस्ट्री के पैमाने पर छोटी है। इसका महत्व ढाँचे में है, गिनती में नहीं। Microsoft का दाँव यह है कि क्यूबिट का बिल्कुल अलग भौतिक रूप वहाँ बड़ा हो पाएगा जहाँ सुपरकंडक्टिंग और ट्रैप्ड-आयन तरीक़े नहीं हो पाएँगे।
एतोरे मायोराना कौन थे
एतोरे मायोराना इतालवी सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री थे, जिन्होंने 1937 के एक पेपर में ऐसे फ़र्मिऑन का वर्ग सुझाया था जो ख़ुद ही अपने प्रतिकण होते हैं। अगले ही साल वे पालेर्मो और नेपल्स के बीच एक फ़ेरी पर रहस्यमय तरीक़े से गायब हो गए, और पीछे एक गणितीय विरासत छोड़ गए जो लंबे समय तक पड़ी रही। 2000 के दशक में संघनित-पदार्थ भौतिकशास्त्रियों को समझ आया कि कुछ टोपोलॉजिकल सुपरकंडक्टर के किनारों पर मायोराना मोड को अर्ध-कणों की तरह गढ़ा जा सकता है। यही मायोराना ज़ीरो मोड हैं, जिन्हें Microsoft ने अब एल्युमिनियम की परत चढ़े इंडियम आर्सेनाइड नैनोवायर के सिरों पर पैदा कर लिया है।
क्यूबिट के तरीक़ों की तुलना
| तरीक़ा | मुख्य कंपनियाँ | भौतिक वाहक | चलाने का तापमान | कोहरेंस समय | सबसे बड़ी ताक़त | सबसे बड़ी कमज़ोरी |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सुपरकंडक्टिंग ट्रांसमॉन | Google, IBM, Rigetti | जोसेफ़सन जंक्शन पर कूपर-पेयर आवेश | ~15 मिलिकेल्विन | 100 माइक्रोसेकंड | तेज़ गेट, पकी हुई फ़ैब्रिकेशन | भारी क्रायोजेनिक्स, ग़लती की दर के लिए बहुत बड़ा ओवरहेड |
| ट्रैप्ड आयन | IonQ, Quantinuum | फँसे हुए परमाणु की हाइपरफ़ाइन अवस्थाएँ | कमरे के तापमान का वैक्यूम + लेज़र कूलिंग | सेकंड से मिनट | ऊँची शुद्धता, सबका सबसे जुड़ाव | गेट धीमे चलते हैं, बड़ा करना मुश्किल |
| फ़ोटॉनिक | PsiQuantum, Xanadu | एकल फ़ोटॉन | कमरे का तापमान | व्यवहार में असीमित | नेटवर्क बन सकता है, कमरे के तापमान पर | गेट संभावना पर चलते हैं, फ़ोटॉन खोने की दिक़्क़त |
| न्यूट्रल एटम | QuEra, Atom Computing, Pasqal | ऑप्टिकल ट्वीज़र में रिडबर्ग परमाणु | ~माइक्रोकेल्विन | सेकंड | फिर से जमाए जा सकने वाले, बड़े हो सकने वाले सरणी | गेट की शुद्धता सुधर रही है पर कच्ची है |
| टोपोलॉजिकल | Microsoft | InAs-Al नैनोवायर पर मायोराना ज़ीरो मोड | ~20 मिलिकेल्विन | सिद्धांत में सुरक्षित | ग़लती से भीतरी बचाव | भौतिक रूप में बनने पर विवाद, फ़ैब्रिकेशन कच्ची |
| सिलिकॉन स्पिन | Intel, Quantum Motion, Diraq | क्वांटम डॉट में इलेक्ट्रॉन स्पिन | ~100 मिलिकेल्विन | मिलिसेकंड | मौजूदा CMOS लाइनों पर ही बन जाते हैं | एक क्यूबिट की शुद्धता बहुत मुश्किल |
टोपोलॉजिकल तर्क यह है। सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट में आस-पास का शोर डीकोहरेंस पैदा करता है — क्यूबिट की क्वांटम जानकारी बाहर रिस जाती है और ऐसी ग़लतियाँ बनती हैं जिन्हें ठीक करने के लिए एक लॉजिकल क्यूबिट को सैकड़ों या हज़ारों भौतिक क्यूबिट में लिखना पड़ता है। इसीलिए दिसंबर 2024 में आई Google की 105-क्यूबिट Willow चिप की तारीफ़ किसी अलग गणना के लिए नहीं, बल्कि “थ्रेशोल्ड से नीचे” ग़लती-सुधार दिखाने के लिए हुई। Microsoft का दाँव है कि मायोराना क्यूबिट क्वांटम जानकारी को दो दूर-दूर पड़े ज़ीरो मोड में फैलाकर रखता है, और इससे कुछ ग़लतियाँ टोपोलॉजी के स्तर पर ही नामुमकिन हो जाती हैं। अगर यह सही है, तो ग़लती-सुधार का ओवरहेड दस गुना तक घट जाएगा।
यह दाँव अभी विवाद में है। Microsoft को 2021 में डेटा की व्याख्या पर सवाल उठने के बाद मायोराना पर अपना एक पुराना पेपर वापस लेना पड़ा था। 2025 के Nature पेपर में एक इंटरफ़ेरोमेट्रिक माप दी गई है जिसे कंपनी पक्का सबूत कहती है, लेकिन कई संघनित-पदार्थ भौतिकशास्त्रियों ने खुलकर कहा है कि वे स्वतंत्र दोहराव तक फ़ैसला नहीं देंगे। UPSC ने सवाल सँभालकर बनाया — “क्वांटम कंप्यूटिंग को मुमकिन बनाने की उम्मीद है” — जो तथ्य के लिहाज़ से सही है, चाहे पीयर-रिव्यू की बहस जैसे भी सुलझे।
AWS जवाब क्यों नहीं है
Q7 के कथन II में कहा गया था कि Majorana 1 AWS ने पेश किया। यह ग़लत है। Amazon Web Services के पास Braket है, एक मैनेज्ड क्वांटम-कंप्यूटिंग सेवा जो ग्राहकों को IonQ, Rigetti, IQM और QuEra की मशीनें क्लाउड से इस्तेमाल करने देती है, और कैलटेक में उसका अपना AWS Center for Quantum Computing कैट क्यूबिट पर काम कर रहा है। लेकिन Majorana 1 Microsoft का उपकरण है, जो Microsoft की Station Q प्रयोगशालाओं में बना। इसलिए Q7 का सही जवाब था (c) केवल I और III।
AI–ML–DL की सीढ़ी
| परत | यह क्या है | पहचान वाली तकनीक | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) | कोई भी सिस्टम जो इंसानी सोच की नक़ल करे | नियम, खोज, योजना, सीखना | शतरंज इंजन, एक्सपर्ट सिस्टम |
| मशीन लर्निंग (ML) | AI का उपसमूह — एल्गोरिदम डेटा से पैटर्न सीखते हैं | सांख्यिकीय लर्निंग, रिग्रेशन, डिसीज़न ट्री, SVM | स्पैम फ़िल्टर, सिफ़ारिश करने वाले इंजन |
| डीप लर्निंग (DL) | ML का उपसमूह, जो कई परतों वाले न्यूरल नेटवर्क इस्तेमाल करता है | गहरे ढाँचों (CNN, RNN, ट्रांसफ़ॉर्मर) में बैकप्रोपेगेशन | तस्वीर पहचानना, बोली से लिखाई |
| जेनरेटिव AI | DL का उपसमूह, जो नई सामग्री बनाता है | डिफ़्यूज़न, ऑटोरिग्रेसिव ट्रांसफ़ॉर्मर, GAN | ChatGPT, Stable Diffusion, Gemini, Claude |
इसलिए Q7 का कथन III — डीप लर्निंग मशीन लर्निंग का उपसमूह है — बिना किसी शक़ सही है। कथन I के साथ मिलाकर जवाब (c) बनता है।
भारत का क्वांटम और सेमीकंडक्टर ढाँचा
National Quantum Mission 19 अप्रैल 2023 को मंज़ूर हुआ, 2023-31 के लिए 6,003.65 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ। इसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और चार थीमैटिक हब चलाते हैं — क्वांटम कंप्यूटिंग IISc बेंगलुरु में, क्वांटम कम्युनिकेशन IIT मद्रास में, क्वांटम सेंसिंग और मेट्रोलॉजी IIT बॉम्बे में, और क्वांटम मटीरियल-डिवाइस IIT दिल्ली में। IIT मद्रास में Centre for Quantum Information, Communication and Computing यानी CQuICC है, जो क्वांटम कम्युनिकेशन वाला हिस्सा सँभालता है। TIFR मुंबई एक सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट टेस्टबेड चलाता है।
सेमीकंडक्टर का ढाँचा इसके नीचे की ज़रूरी ज़मीन है। Semicon India Programme दिसंबर 2021 में 76,000 करोड़ रुपये के आवंटन से शुरू हुआ। यह फ़ैब, ATMP इकाइयों और डिज़ाइन-लिंक्ड प्रोत्साहन को सहारा देता है। Tata Electronics और ताइवान की Powerchip Semiconductor का साझा उपक्रम गुजरात के धोलेरा में हर महीने 50,000 वेफ़र वाला फ़ैब बना रहा है, जिसमें पहली सिलिकॉन 2026 में निकलनी है। Micron का सानंद ATMP, सानंद में Kaynes Semicon, सानंद में CG Power, और असम के जागीरोड में Tata का ATMP — यह पहली क़तार पूरी करते हैं। तुलना के लिए अमेरिका का CHIPS and Science Act, 2022 (52 अरब डॉलर) और यूरोपीय संघ का Chips Act, 2023 (43 अरब यूरो) देखिए।
क्वांटम कंप्यूटिंग असल में कब काम आएगी
दुनिया भर में हो रहे ख़र्च को जायज़ ठहराने वाले इस्तेमाल चार खानों में आते हैं। सबसे ज़्यादा चर्चा क्रिप्टोग्राफ़ी की है — पीटर शोर का 1994 का एल्गोरिदम, अगर काफ़ी बड़े क्वांटम कंप्यूटर पर चले, तो उन बड़ी संख्याओं के गुणनखंड निकाल देगा जिन पर RSA एन्क्रिप्शन टिका है, और आज की ज़्यादातर पब्लिक-की क्रिप्टोग्राफ़ी टूट जाएगी। इसी वजह से NIST ने पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफ़ी के मानक तय करने शुरू किए, और पहले एल्गोरिदम (ML-KEM, ML-DSA, SLH-DSA) अगस्त 2024 में तय हो गए। भारत के CERT-In ने सलाह जारी की है कि इस दशक के अंत तक PQC पर आ जाइए। दूसरा खाना ऑप्टिमाइज़ेशन है — क्वांटम एनीलर और गेट-मॉडल मशीनें गाड़ियों के रूट, वित्तीय पोर्टफ़ोलियो बनाने और ग्रिड डिस्पैच जैसी दिक़्क़तों में रफ़्तार का वादा करती हैं। तीसरा खाना दवा खोजना और पदार्थों का सिमुलेशन है, जहाँ स्वाभाविक फ़ायदा यह है कि क्वांटम कंप्यूटर क्वांटम सिस्टम का सिमुलेशन अच्छे से कर लेता है। चौथा खाना मशीन लर्निंग है, जहाँ क्वांटम कर्नेल और वेरिएशनल सर्किट अभी शोध की अगली कतार भर हैं और कोई पक्का फ़ायदा साबित नहीं हुआ।
UPSC के लिहाज़ से समय-सीमा मायने रखती है। भरोसेमंद रोडमैप ग़लती-सहने वाले, क्रिप्टोग्राफ़ी के लिहाज़ से मायने रखने वाले क्वांटम कंप्यूटर को 2030 के दशक में, या उससे भी बाद रखते हैं। नज़दीकी दौर के “नॉइज़ी इंटरमीडिएट-स्केल क्वांटम” उपकरण, यानी NISQ दौर, शोध के औज़ार के तौर पर और थोड़े-से ऑप्टिमाइज़ेशन कामों में काम के हैं। Microsoft का टोपोलॉजिकल दाँव, अगर सही निकला, तो यह समय-सीमा छोटी कर सकता है। संदेह करने वाले भी मानते हैं कि रणनीतिक होड़ अब इस सवाल से हट गई है कि क्वांटम कंप्यूटर आएँगे या नहीं, और इस सवाल पर आ गई है कि सप्लाई चेन किसके हाथ में है — क्रायोजेनिक डाइल्यूशन रेफ़्रिजरेटर, कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स, बेहद शुद्ध हीलियम-3, और वे ख़ास पदार्थ जिन पर Majorana 1 का ढाँचा टिका है, जैसे उच्च शुद्धता वाला सिलिकॉन-28, गैलियम आर्सेनाइड और इंडियम फ़ॉस्फ़ाइड। इसलिए क्रिटिकल मिनरल, सेमीकंडक्टर और क्वांटम कंप्यूटिंग — तीनों घूमकर उसी छोटी-सी रणनीतिक सूची पर आ जाते हैं।
भाग 4: CL-20, HMX और LLM-105 — आज की रक्षा में हाई-एनर्जी मटीरियल
Q6 में जिन तीन रसायनों के नाम आए — CL-20, HMX और LLM-105 — वे विस्फोटक हैं। सवाल के बाक़ी विकल्प यह जाँच रहे थे कि उम्मीदवार विस्फोटक को रेफ़्रिजरेंट, ईंधन या प्रणोदक से अलग कर पाता है या नहीं। ये तीनों High Energy Materials यानी HEM नाम के शोध वर्ग में आते हैं, जिस पर रक्षा रसायन की दुनिया 1980 के दशक से TNT, RDX और PETN के उत्तराधिकारी के तौर पर काम कर रही है।
“हाई-एनर्जी मटीरियल” का मतलब क्या है
हाई-एनर्जी मटीरियल में रासायनिक ऊर्जा जमा रहती है, जो विस्फोट, तेज़ जलन या काबू में रखे दहन से फटाफट निकल सकती है। इसे नापने के पैमाने हैं — विस्फोट का वेग (km/s), विस्फोट का दबाव (GPa), घनत्व (g/cc), बनने की ऊष्मा, और सुरक्षा के लिहाज़ से सबसे ज़रूरी — रगड़, चोट, गर्मी और स्थिर बिजली के प्रति संवेदनशीलता। आज डिज़ाइन की चुनौती यही है कि ऊर्जा का घनत्व ऊपर जाए और संवेदनशीलता नीचे रहे। CL-20 ऊर्जा को सबसे ऊपर ले जाता है। LLM-105 संवेदनशीलता को सबसे नीचे रखता है। HMX रोज़ का भरोसेमंद घोड़ा है।
तुलना की टेबल
| विस्फोटक | रासायनिक नाम | घनत्व (g/cc) | विस्फोट वेग (km/s) | संवेदनशीलता | साल/मूल | इस्तेमाल |
|---|---|---|---|---|---|---|
| TNT | 2,4,6-ट्राइनाइट्रोटॉल्यूइन | 1.65 | 6.9 | कम | 1863, जर्मनी | बूस्टर, मेल्ट-कास्ट फ़ॉर्मुलेशन |
| RDX | साइक्लोट्राइमेथिलीन-ट्राइनाइट्रामीन | 1.82 | 8.75 | मध्यम | 1899/द्वितीय विश्वयुद्ध, ब्रिटेन-जर्मनी | C-4, कंपोज़िशन B, वारहेड |
| PETN | पेंटाएरिथ्रिटॉल टेट्रानाइट्रेट | 1.77 | 8.4 | ऊँची | 1894, जर्मनी | डेटोनेटिंग कॉर्ड, ब्लास्टिंग कैप |
| HMX (ऑक्टोजन) | साइक्लोटेट्रामेथिलीन-टेट्रानाइट्रामीन | 1.91 | 9.1 | मध्यम | 1942, अमेरिका | प्लास्टिक-बॉन्डेड विस्फोटक, रॉकेट प्रणोदक, शेप्ड चार्ज |
| CL-20 (HNIW) | हेक्सानाइट्रो-हेक्साएज़ा-आइसोवुर्ट्ज़िटेन | 2.04 | 9.4-9.5 | ऊँची | 1987, चाइना लेक NAWC, अमेरिका | आधुनिक प्रणोदक, ऊँची क्षमता वाले वारहेड |
| LLM-105 | 2,6-डाइअमीनो-3,5-डाइनाइट्रोपायराज़ीन-1-ऑक्साइड | 1.92 | 8.7 | बहुत कम (असंवेदनशील) | 1995, लॉरेंस लिवरमोर, अमेरिका | असंवेदनशील गोला-बारूद, पनडुब्बी वारहेड |
| FOX-7 | 1,1-डाइअमीनो-2,2-डाइनाइट्रोएथिलीन | 1.89 | 8.9 | कम | 1998, स्वीडन FOI | असंवेदनशील बूस्टर |
CL-20 को 1987 में चाइना लेक के Naval Air Warfare Center में अर्नोल्ड टी. नीलसन ने बनाया था। इसका पिंजरे जैसा आइसोवुर्ट्ज़िटेन ढाँचा नाइट्रो समूहों को एक तनी हुई तीन-आयामी बनावट में भर देता है, और इससे चालू इस्तेमाल के किसी भी विस्फोटक से ज़्यादा विस्फोट दबाव बनता है — प्रति इकाई आयतन HMX से क़रीब 14% ज़्यादा ऊर्जा। इसकी क़ीमत संवेदनशीलता और लागत के रूप में चुकानी पड़ती है; CL-20 आमतौर पर पॉलिमर-बॉन्डेड मिश्रणों में डाला जाता है जो चोट पर उसकी प्रतिक्रिया को दबा देते हैं।
HMX, जिसे ऑक्टोजन भी कहते हैं, RDX बनाने के दौरान उपोत्पाद के रूप में मिला था और 1950 के दशक से ऊँची क्षमता वाले कामों का मानक बना हुआ है। यह PBX-9404 और PBX-9501 प्लास्टिक-बॉन्डेड विस्फोटकों का ऊर्जा वाला हिस्सा है। टैंक-रोधी शेप्ड-चार्ज वारहेड का मुख्य चार्ज यही है, और कई रॉकेट-मिसाइल प्रणोदकों का बाइंडर भी। पिनाका रॉकेट परिवार और भारत की अस्त्र हवा-से-हवा मिसाइल HMX वाले मिश्रणों पर टिके हैं।
LLM-105 को Lawrence Livermore National Laboratory ने अमेरिका के “असंवेदनशील गोला-बारूद” अभियान के तहत बनाया — ऐसे विस्फोटक जो आग, छर्रे की चोट और हादसे में भी बिना फटे बच जाएँ। पायराज़ीन-N-ऑक्साइड की बनावट HMX जितनी क्षमता देती है, और संवेदनशीलता TNT के बराबर रहती है। पनडुब्बी की टॉरपीडो वारहेड और उन सब जगहों के लिए यही पहली पसंद है जहाँ साथ में कोई और चीज़ फट जाने का जोखिम मंज़ूर नहीं।
भारत का हाई-एनर्जी मटीरियल कार्यक्रम
पुणे के सुतारवाड़ी में 1960 में बनी DRDO की High Energy Materials Research Laboratory (HEMRL) भारत के विस्फोटक R&D की अगुवाई करती है। इसने CL-20, HMX, LLM-105, FOX-7 और उनके देसी रूप बनाए हैं। पिनाका, आकाश, ब्रह्मोस, अस्त्र से लेकर पनडुब्बी से छोड़े जाने वाले हथियारों तक, प्रणोदक और वारहेड भराव यही तैयार करती है। पुणे का Solid Propellant Plant, ख़ड़की की Ammunition Factory और Ordnance Factory भंडारा इस कड़ी का उत्पादन वाला सिरा हैं। Long Range Anti-Tank Guided Missile कार्यक्रम और अपग्रेड किया गया पिनाका रॉकेट मोटर इसके सबसे जाने-पहचाने फ़ायदे हैं।
ये पदार्थ UPSC में क्यों पूछे जा सकते हैं: ये सिलेबस के तीन हिस्सों के जोड़ पर बैठते हैं — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में देसी विकास, रक्षा नीति (मेक इन इंडिया, रक्षा में आत्मनिर्भर भारत), और आंतरिक-बाहरी सुरक्षा। रक्षा मंत्रालय की पॉज़िटिव इंडिजिनाइज़ेशन सूचियाँ, Strategic Partnership मॉडल और DRDO का Technology Development Fund — सब इन मिश्रणों का ज़िक्र करते हैं।
CL-20, HMX और LLM-105 असल में कहाँ जाते हैं
इस्तेमाल मायने रखता है, क्योंकि UPSC के विकल्प जान-बूझकर विस्फोटक को प्रणोदक और ईंधन से गड्ड-मड्ड करने के लिए बनाए जाते हैं। प्रणोदक काबू में रखी तेज़ जलन से जलता है और गोले को धकेलता है; विस्फोटक फटता है और ऊर्जा को ध्वनि से तेज़ शॉक-वेव की रफ़्तार पर छोड़ता है। CL-20 दोनों तरफ़ बैठता है — इसका ज़्यादा इंपल्स इसे वारहेड भराव के अलावा अगली पीढ़ी के रॉकेट प्रणोदक के लिए भी उम्मीदवार बनाता है। नाग और हेलिना टैंक-रोधी मिसाइल परिवारों में लगने वाले शेप्ड-चार्ज वारहेड के लिए बाइंडर के तौर पर HMX पहली पसंद है। पनडुब्बी और विमानवाहक पोत के गोला-बारूद के लिए, जहाँ आग लगने पर हादसे में फट जाना तबाही ले आए, LLM-105 सुरक्षा-पहले वाली पसंद है। इनमें से कोई भी रेफ़्रिजरेंट नहीं है — Q6 का विकल्प (a) किताबी जाल था, जो एयर कंडीशनिंग में लगने वाले बिल्कुल अलग HFC परिवार की तरफ़ इशारा करता था।
दुनिया में इन्हें बनाने वाले बहुत कम हैं। CL-20 का व्यापारिक उत्पादन न्यू साउथ वेल्स की मुलवाला इकाई में Thales Australia करती है। चीन में इसे Nanjing University of Science and Technology और China North Industries Group (Norinco) बनाते हैं। पायलट स्तर पर फ़्रांस में SNPE, और भारत में Defence Research and Development Organisation। HMX का उत्पादन कुछ ज़्यादा फैला है — फ़्रांस में Eurenco, अमेरिका में BAE Systems Holston, और भारत में Premier Explosives जमे हुए उत्पादकों में हैं। LLM-105 अभी बड़े हिस्से में अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के पायलट उत्पादन तक सिमटा है और इसका अंतरराष्ट्रीय हस्तांतरण सीमित है। यह छोटा-सा आधार ख़ुद एक रणनीतिक कमज़ोरी है, और इसीलिए DRDO 2018 से देसी CL-20 प्रक्रिया विकास पर ज़ोर से पैसा लगा रहा है।
अभ्यास MCQ
1. Minerals Security Partnership के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
I. इसे जून 2022 में अमेरिका ने शुरू किया था।
II. भारत इसका एकमात्र दक्षिण एशियाई सदस्य है।
III. चीन इस साझेदारी का संस्थापक सदस्य है।
इनमें से कौन-से सही हैं?
(a) केवल I और II (b) केवल II और III (c) केवल I और III (d) I, II और III
उत्तर: (a)। चीन सदस्य नहीं है — MSP साफ़ तौर पर चीन के खनिज दबदबे का जवाब देने के लिए बना है।
2. हाल में ख़बरों में रहा “सलाल-हैमाना” लिथियम ब्लॉक कहाँ है?
(a) कर्नाटक (b) जम्मू और कश्मीर (c) झारखंड (d) राजस्थान
उत्तर: (b)। Geological Survey of India ने फ़रवरी 2023 में J&K के रियासी ज़िले में 59 लाख टन अनुमानित लिथियम संसाधन आँके थे।
3. दुर्लभ मृदा तत्वों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
I. यिट्रियम और स्कैंडियम लैंथेनाइड न होने पर भी दुर्लभ मृदा में गिने जाते हैं।
II. भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े दुर्लभ मृदा भंडार हैं।
III. कई डिस्प्ले स्क्रीन में लाल फ़ॉस्फ़र का सक्रिय तत्व यूरोपियम है।
इनमें से कितने सही हैं?
(a) केवल एक (b) केवल दो (c) तीनों (d) कोई नहीं
उत्तर: (b)। I और III सही हैं; भंडार में भारत तीसरे नंबर पर है, पहले नहीं।
4. “टोपोलॉजिकल क्यूबिट” का सबसे सही वर्णन कौन-सा है?
(a) माइक्रोकेल्विन तापमान तक ठंडे किए गए ट्रैप्ड आयन पर आधारित क्यूबिट
(b) ऐसा क्यूबिट जो जानकारी को मायोराना ज़ीरो मोड में फैलाकर रखता है
(c) सिलिकॉन CMOS क्वांटम डॉट पर बना क्यूबिट
(d) ऑप्टिकल फ़ाइबर से एकल फ़ोटॉन की तरह भेजा गया क्यूबिट
उत्तर: (b)।
5. National Quantum Mission के संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
I. यह अप्रैल 2023 में क़रीब 6,003 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ मंज़ूर हुआ।
II. इसके चार वर्टिकल हैं — कंप्यूटिंग, कम्युनिकेशन, सेंसिंग और मटीरियल।
III. यह इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत चलता है।
इनमें कितने सही हैं?
(a) केवल एक (b) केवल दो (c) तीनों (d) कोई नहीं
उत्तर: (b)। कथन I और II सही हैं; मिशन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत है।
6. CL-20 पहली बार किस संस्थान में बनाया गया था?
(a) Lawrence Livermore National Laboratory
(b) China Lake Naval Air Warfare Center
(c) High Energy Materials Research Laboratory, पुणे
(d) Royal Ordnance, ब्रिटेन
उत्तर: (b)। 1987 में चाइना लेक NAWC में अर्नोल्ड नीलसन ने बनाया।
7. LLM-105 की कौन-सी विशेषता/विशेषताएँ हैं?
I. HMX के मुक़ाबले चोट और रगड़ के प्रति असंवेदनशील।
II. Lawrence Livermore National Laboratory में विकसित।
III. मुख्य रूप से रेफ़्रिजरेंट गैस के रूप में इस्तेमाल।
(a) केवल I (b) केवल I और II (c) केवल II और III (d) I, II और III
उत्तर: (b)।
8. AI की सीढ़ी पर विचार कीजिए:
I. मशीन लर्निंग आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का उपसमूह है।
II. डीप लर्निंग मशीन लर्निंग का उपसमूह है।
III. जेनरेटिव AI डीप लर्निंग का अधिसमूह है।
कितने कथन सही हैं?
(a) केवल एक (b) केवल दो (c) तीनों (d) कोई नहीं
उत्तर: (b)। कथन I और II सही हैं; जेनरेटिव AI डीप लर्निंग का उपसमूह है, अधिसमूह नहीं।
यह पूरा ब्लॉक मुख्य परीक्षा के लिए क्यों मायने रखता है
प्रीलिम्स के ये चार सवाल मुख्य परीक्षा के GS-III के कम से कम तीन विषयों से जुड़ते हैं: मेक इन इंडिया के साथ तकनीक का देसीकरण; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास और उसका इस्तेमाल; और विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता के सुरक्षा नतीजे। इन सबकी एक ही धुरी क्रिटिकल मिनरल की कहानी है। सामने का सवाल EV की तरफ़ बढ़ने पर हो, सेमीकंडक्टर फ़ैब की होड़ पर, दुर्लभ मृदा मैग्नेट की अड़चन पर, टोपोलॉजिकल क्यूबिट के दाँव पर या असंवेदनशील विस्फोटक की अगली कतार पर — नीचे का जवाब एक ही है। 2030 के दशक में औद्योगिक संप्रभुता यह तय करेगी कि खनिज, पदार्थ और उनके ऊपर की रसायन-विद्या किसके हाथ में है। भारत ने माहौल पढ़ लिया है। MSP की सदस्यता, National Critical Mineral Mission, National Quantum Mission, Semicon कार्यक्रम और HEMRL पुणे — यह जवाब संस्थाओं की शक्ल में सामने दिखता है। MMDR संशोधन, KABIL का कैटामार्का सौदा, IREL में दी गई ढील और Tata-PSMC फ़ैब इसके शुरुआती नतीजे हैं। अगले पाँच साल बताएँगे कि इरादा क्षमता में बदलता है या नहीं।