Anantam IASPost · 18 April 2026

हिंदी समास: तत्पुरुष, द्वंद्व, बहुव्रीहि, कर्मधारय, द्विगु, अव्ययीभाव

Study Notes · Hindi - Compulsory

समास के छह भेदों की स्पष्ट पहचान, समास-विग्रह के अनेक उदाहरण, कर्मधारय बनाम बहुव्रीहि का अंतर और अभ्यास — उत्तर सहित।

समास हिंदी शब्द-रचना की वह प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक पदों को परस्पर मिलाकर एक नया, संक्षिप्त और सार्थक शब्द बनाया जाता है। ‘राजा का पुत्र’ को जब हम ‘राजपुत्र’ कहते हैं, तो बीच की विभक्ति ‘का’ लुप्त हो जाती है और दोनों पद घुलकर एक हो जाते हैं — यही समास है। संस्कृत से आई इस प्रक्रिया ने हिंदी को असंख्य सघन और प्रभावशाली शब्द दिए हैं, जैसे देशभक्ति, चौराहा, यथाशक्ति, नीलकंठ और माता-पिता।

अनिवार्य हिंदी की परीक्षा-दृष्टि से समास अत्यंत उपयोगी अध्याय है। इसमें प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं — किसी समस्त पद का समास-विग्रह कीजिए, किसी पद में प्रयुक्त समास का नाम बताइए, अथवा एक ही शब्द में दो समास की संभावना (जैसे ‘पीतांबर’) को पहचान कर अर्थ-भेद स्पष्ट कीजिए। इसलिए केवल भेदों के नाम रट लेना पर्याप्त नहीं; पहचान का तर्क और विग्रह का अभ्यास दोनों आवश्यक हैं।

समास, समस्त पद और समास-विग्रह — आधार समझिए

जिन पदों को मिलाकर समास बनता है, उनमें पहले पद को पूर्वपद और बाद वाले को उत्तरपद कहते हैं। मेल से बने एक पद को समस्त पद या सामासिक पद कहते हैं, और उसे फिर से अलग-अलग करके उनके बीच के संबंध को प्रकट करने की क्रिया को समास-विग्रह कहते हैं।

किस पद का अर्थ प्रधान है, इसी आधार पर समास के मुख्य भेद तय होते हैं। यदि उत्तरपद प्रधान हो तो तत्पुरुष (और उसके सहयोगी कर्मधारय, द्विगु); यदि पूर्वपद (अव्यय) प्रधान हो तो अव्ययीभाव; यदि दोनों पद प्रधान हों तो द्वंद्व; और यदि कोई भी पद नहीं, बल्कि कोई तीसरा अर्थ प्रधान हो तो बहुव्रीहि। यही एक सूत्र अधिकांश पहचान का आधार है।

समास के छह भेद — एक दृष्टि में

हिंदी में समास मुख्यतः छह प्रकार के माने जाते हैं। नीचे प्रत्येक भेद, उसका प्रधान पद और एक-दो प्रतिनिधि उदाहरण तालिका में दिए गए हैं।

समासप्रधान पदपहचान का सारउदाहरण
अव्ययीभावपूर्वपद (अव्यय)समस्त पद क्रिया-विशेषण/अव्यय का काम करेप्रतिदिन, यथाशक्ति, आजीवन
तत्पुरुषउत्तरपदपूर्वपद की विभक्ति लुप्तराजपुत्र, देशभक्ति, ग्रामगत
कर्मधारयउत्तरपदपूर्वपद = विशेषण/उपमान, उत्तरपद = विशेष्य/उपमेयनीलकमल, महात्मा, चंद्रमुख
द्विगुउत्तरपदपूर्वपद संख्यावाची; समूह का बोधनवरत्न, त्रिलोक, चौमासा
द्वंद्वदोनों पदबीच में ‘और/या/अथवा’ का भावमाता-पिता, राम-लक्ष्मण, दिन-रात
बहुव्रीहिअन्य (तीसरा) पदसमस्त पद किसी और का विशेषण-सूचकदशानन, पीतांबर, लंबोदर

1. अव्ययीभाव समास

जिस समास का पूर्वपद अव्यय हो और पूरा समस्त पद भी अव्यय (मुख्यतः क्रिया-विशेषण) का काम करे, वह अव्ययीभाव समास कहलाता है। इसमें प्रायः पूर्वपद ही अर्थ की दृष्टि से प्रधान रहता है। पहचान का संकेत — पद के आरंभ में प्रति, यथा, आ, भर, बे, हर, अनु, उप, अधि जैसे अव्यय आते हैं और पद रूप में नहीं बदलता।

2. तत्पुरुष समास

जिसमें उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद तथा उत्तरपद के बीच की विभक्ति (कारक-चिह्न) का लोप हो गया हो, वह तत्पुरुष समास है। ‘देशभक्ति’ का विग्रह है ‘देश के लिए भक्ति’ — यहाँ ‘के लिए’ लुप्त है और ‘भक्ति’ (उत्तरपद) प्रधान है। लुप्त विभक्ति किस कारक की है, इसी आधार पर तत्पुरुष के छह उपभेद होते हैं।

उपभेदलुप्त विभक्तिउदाहरण (विग्रह सहित)
कर्म तत्पुरुषकोग्रामगत = ग्राम को गत; स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
करण तत्पुरुषसे / के द्वारातुलसीकृत = तुलसी द्वारा रचित; मनचाहा = मन से चाहा
संप्रदान तत्पुरुषके लिएरसोईघर = रसोई के लिए घर; देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
अपादान तत्पुरुषसे (अलग होना)पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट; धनहीन = धन से हीन
संबंध तत्पुरुषका / के / कीराजपुत्र = राजा का पुत्र; गंगाजल = गंगा का जल
अधिकरण तत्पुरुषमें / परआपबीती = अपने पर बीती; गृहप्रवेश = गृह में प्रवेश

उपभेद पहचानने का व्यावहारिक तरीका — पहले समस्त पद का विग्रह कीजिए, फिर देखिए कि विग्रह में कौन-सी विभक्ति आ रही है: ‘को’ हो तो कर्म, ‘से/द्वारा’ हो तो करण, ‘के लिए’ हो तो संप्रदान, ‘से (अलगाव)’ हो तो अपादान, ‘का/के/की’ हो तो संबंध और ‘में/पर’ हो तो अधिकरण तत्पुरुष।

विशेष — जिस तत्पुरुष में पूर्वपद नञ् (न/अ/अन्) हो, उसे नञ् तत्पुरुष कहते हैं, जैसे असत्य = न सत्य, अधर्म = न धर्म, अनादि = न आदि।

3. कर्मधारय समास

यह तत्पुरुष का ही एक विशेष रूप है। इसमें भी उत्तरपद प्रधान होता है, परंतु एक पद विशेषण और दूसरा विशेष्य होता है, अथवा एक उपमान और दूसरा उपमेय होता है। इसमें कोई विभक्ति लुप्त नहीं होती; दोनों पद एक ही वस्तु/व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः ‘है जो’, ‘के समान’, ‘रूपी’ जैसे शब्द आते हैं।

4. द्विगु समास

जिस समास का पूर्वपद संख्यावाची विशेषण हो और जो किसी समूह या समाहार का बोध कराए, वह द्विगु समास है। यह भी कर्मधारय का ही उपभेद माना जाता है, अंतर केवल इतना कि यहाँ पूर्वपद कोई गिनती का शब्द होता है। पहचान — पद के आरंभ में एक, दो, त्रि, चतुर्, चौ, पंच, सप्त, नव आदि संख्याएँ।

5. द्वंद्व समास

जिस समास में दोनों पद प्रधान हों और उनके बीच ‘और’, ‘या’, ‘अथवा’, ‘एवं’ जैसा योजक भाव छिपा हो, वह द्वंद्व समास है। विग्रह करते समय बीच में ‘और/या’ लगाना पड़ता है। ऐसे पद प्रायः योजक-चिह्न (हाइफ़न) के साथ लिखे जाते हैं।

6. बहुव्रीहि समास

जिस समास में न पूर्वपद प्रधान हो, न उत्तरपद, बल्कि दोनों मिलकर किसी तीसरे (अन्य) अर्थ की ओर संकेत करें — और वह समस्त पद उस तीसरे का विशेषण बन जाए — वह बहुव्रीहि समास है। विग्रह में प्रायः ‘जिसका/जिसके/जिसमें … वह’ आता है, और अंत में ‘अर्थात्’ लगाकर असली अर्थ बताया जाता है।

कर्मधारय बनाम बहुव्रीहि — अंतर स्पष्ट कीजिए

विद्यार्थी सबसे अधिक भ्रम इन्हीं दो भेदों में करते हैं, क्योंकि एक ही शब्द दोनों समास का हो सकता है। अंतर का एकमात्र आधार अर्थ है — समस्त पद किसकी ओर संकेत कर रहा है। यदि वह स्वयं अपने (उत्तरपद के) अर्थ की ही बात कर रहा हो तो कर्मधारय; और यदि किसी तीसरे व्यक्ति/वस्तु की ओर संकेत कर रहा हो तो बहुव्रीहि।

शब्दकर्मधारय अर्थबहुव्रीहि अर्थ
नीलकंठनीला कंठ (एक रंग का कंठ)जिसका कंठ नीला है — अर्थात् शिव
पीतांबरपीला वस्त्रजिसका वस्त्र पीला है — अर्थात् कृष्ण
चंद्रमुखचंद्रमा-सा सुंदर मुखजिसका मुख चंद्रमा-सा है — अर्थात् वैसा व्यक्ति
महावीरमहान वीरजिसमें महान वीरता हो — अर्थात् हनुमान

सरल सूत्र — विग्रह में यदि ‘है जो / के समान’ आकर बात उसी पद पर रुक जाए, तो कर्मधारय; यदि विग्रह में ‘जिसका/जिसके … वह, अर्थात् (कोई तीसरा)’ आए, तो बहुव्रीहि।

सामान्य अशुद्धियाँ और परीक्षा-दृष्टि

अभ्यास प्रश्न

नीचे दो प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं — पहले में समास-विग्रह कीजिए, दूसरे में समास का नाम (और जहाँ आवश्यक हो, उपभेद) बताइए। उत्तर हर भाग के अंत में दिए गए हैं।

(क) निम्नलिखित का समास-विग्रह कीजिए तथा समास का नाम लिखिए —

  1. राजपुत्र
  2. चौराहा
  3. यथाशक्ति
  4. माता-पिता
  5. दशानन
  6. नीलकमल
  7. गंगाजल
  8. त्रिभुवन

(ख) निम्नलिखित में समास का नाम (और उपभेद, यदि लागू हो) बताइए —

  1. पथभ्रष्ट
  2. आजीवन
  3. रसोईघर
  4. लंबोदर
  5. भाई-बहन
  6. चंद्रमुख
  7. अधर्म

उत्तर

(क)

  1. राजपुत्र = राजा का पुत्र — तत्पुरुष (संबंध) समास।
  2. चौराहा = चार राहों का समूह — द्विगु समास।
  3. यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार — अव्ययीभाव समास।
  4. माता-पिता = माता और पिता — द्वंद्व समास।
  5. दशानन = दश हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण — बहुव्रीहि समास।
  6. नीलकमल = नीला है जो कमल — कर्मधारय समास।
  7. गंगाजल = गंगा का जल — तत्पुरुष (संबंध) समास।
  8. त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह — द्विगु समास।

(ख)

  1. पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट — तत्पुरुष (अपादान) समास।
  2. आजीवन = जीवन भर — अव्ययीभाव समास।
  3. रसोईघर = रसोई के लिए घर — तत्पुरुष (संप्रदान) समास।
  4. लंबोदर = लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश — बहुव्रीहि समास।
  5. भाई-बहन = भाई और बहन — द्वंद्व समास।
  6. चंद्रमुख = चंद्रमा के समान मुख — कर्मधारय समास।
  7. अधर्म = न धर्म — तत्पुरुष (नञ्) समास।

निष्कर्ष

समास हिंदी शब्द-रचना की रीढ़ है। इसके छह भेदों — अव्ययीभाव, तत्पुरुष (अपने छह उपभेदों सहित), कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व और बहुव्रीहि — की पहचान का आधार यही है कि किस पद का अर्थ प्रधान है। विग्रह करने की आदत डाल लें, क्योंकि सही विग्रह ही सही भेद बताता है। विशेष रूप से कर्मधारय और बहुव्रीहि का अंतर अर्थ के स्तर पर समझें — जहाँ बात किसी तीसरे की हो, वहाँ बहुव्रीहि। नियमित अभ्यास से यह अध्याय अनिवार्य हिंदी में सुनिश्चित अंक देने वाला बन जाता है।