समास हिंदी शब्द-रचना की वह प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक पदों को परस्पर मिलाकर एक नया, संक्षिप्त और सार्थक शब्द बनाया जाता है। ‘राजा का पुत्र’ को जब हम ‘राजपुत्र’ कहते हैं, तो बीच की विभक्ति ‘का’ लुप्त हो जाती है और दोनों पद घुलकर एक हो जाते हैं — यही समास है। संस्कृत से आई इस प्रक्रिया ने हिंदी को असंख्य सघन और प्रभावशाली शब्द दिए हैं, जैसे देशभक्ति, चौराहा, यथाशक्ति, नीलकंठ और माता-पिता।
अनिवार्य हिंदी की परीक्षा-दृष्टि से समास अत्यंत उपयोगी अध्याय है। इसमें प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं — किसी समस्त पद का समास-विग्रह कीजिए, किसी पद में प्रयुक्त समास का नाम बताइए, अथवा एक ही शब्द में दो समास की संभावना (जैसे ‘पीतांबर’) को पहचान कर अर्थ-भेद स्पष्ट कीजिए। इसलिए केवल भेदों के नाम रट लेना पर्याप्त नहीं; पहचान का तर्क और विग्रह का अभ्यास दोनों आवश्यक हैं।
समास, समस्त पद और समास-विग्रह — आधार समझिए
जिन पदों को मिलाकर समास बनता है, उनमें पहले पद को पूर्वपद और बाद वाले को उत्तरपद कहते हैं। मेल से बने एक पद को समस्त पद या सामासिक पद कहते हैं, और उसे फिर से अलग-अलग करके उनके बीच के संबंध को प्रकट करने की क्रिया को समास-विग्रह कहते हैं।
- समस्त पद — राजपुत्र; विग्रह — राजा का पुत्र।
- समस्त पद — रसोईघर; विग्रह — रसोई के लिए घर।
- समस्त पद — माता-पिता; विग्रह — माता और पिता।
किस पद का अर्थ प्रधान है, इसी आधार पर समास के मुख्य भेद तय होते हैं। यदि उत्तरपद प्रधान हो तो तत्पुरुष (और उसके सहयोगी कर्मधारय, द्विगु); यदि पूर्वपद (अव्यय) प्रधान हो तो अव्ययीभाव; यदि दोनों पद प्रधान हों तो द्वंद्व; और यदि कोई भी पद नहीं, बल्कि कोई तीसरा अर्थ प्रधान हो तो बहुव्रीहि। यही एक सूत्र अधिकांश पहचान का आधार है।
समास के छह भेद — एक दृष्टि में
हिंदी में समास मुख्यतः छह प्रकार के माने जाते हैं। नीचे प्रत्येक भेद, उसका प्रधान पद और एक-दो प्रतिनिधि उदाहरण तालिका में दिए गए हैं।
| समास | प्रधान पद | पहचान का सार | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अव्ययीभाव | पूर्वपद (अव्यय) | समस्त पद क्रिया-विशेषण/अव्यय का काम करे | प्रतिदिन, यथाशक्ति, आजीवन |
| तत्पुरुष | उत्तरपद | पूर्वपद की विभक्ति लुप्त | राजपुत्र, देशभक्ति, ग्रामगत |
| कर्मधारय | उत्तरपद | पूर्वपद = विशेषण/उपमान, उत्तरपद = विशेष्य/उपमेय | नीलकमल, महात्मा, चंद्रमुख |
| द्विगु | उत्तरपद | पूर्वपद संख्यावाची; समूह का बोध | नवरत्न, त्रिलोक, चौमासा |
| द्वंद्व | दोनों पद | बीच में ‘और/या/अथवा’ का भाव | माता-पिता, राम-लक्ष्मण, दिन-रात |
| बहुव्रीहि | अन्य (तीसरा) पद | समस्त पद किसी और का विशेषण-सूचक | दशानन, पीतांबर, लंबोदर |
1. अव्ययीभाव समास
जिस समास का पूर्वपद अव्यय हो और पूरा समस्त पद भी अव्यय (मुख्यतः क्रिया-विशेषण) का काम करे, वह अव्ययीभाव समास कहलाता है। इसमें प्रायः पूर्वपद ही अर्थ की दृष्टि से प्रधान रहता है। पहचान का संकेत — पद के आरंभ में प्रति, यथा, आ, भर, बे, हर, अनु, उप, अधि जैसे अव्यय आते हैं और पद रूप में नहीं बदलता।
- प्रतिदिन = प्रत्येक दिन
- यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
- आजीवन = जीवन भर
- यथासंभव = जहाँ तक संभव हो
- भरपेट = पेट भर के
- हररोज़ = हर रोज़
2. तत्पुरुष समास
जिसमें उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद तथा उत्तरपद के बीच की विभक्ति (कारक-चिह्न) का लोप हो गया हो, वह तत्पुरुष समास है। ‘देशभक्ति’ का विग्रह है ‘देश के लिए भक्ति’ — यहाँ ‘के लिए’ लुप्त है और ‘भक्ति’ (उत्तरपद) प्रधान है। लुप्त विभक्ति किस कारक की है, इसी आधार पर तत्पुरुष के छह उपभेद होते हैं।
| उपभेद | लुप्त विभक्ति | उदाहरण (विग्रह सहित) |
|---|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | को | ग्रामगत = ग्राम को गत; स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त |
| करण तत्पुरुष | से / के द्वारा | तुलसीकृत = तुलसी द्वारा रचित; मनचाहा = मन से चाहा |
| संप्रदान तत्पुरुष | के लिए | रसोईघर = रसोई के लिए घर; देशभक्ति = देश के लिए भक्ति |
| अपादान तत्पुरुष | से (अलग होना) | पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट; धनहीन = धन से हीन |
| संबंध तत्पुरुष | का / के / की | राजपुत्र = राजा का पुत्र; गंगाजल = गंगा का जल |
| अधिकरण तत्पुरुष | में / पर | आपबीती = अपने पर बीती; गृहप्रवेश = गृह में प्रवेश |
उपभेद पहचानने का व्यावहारिक तरीका — पहले समस्त पद का विग्रह कीजिए, फिर देखिए कि विग्रह में कौन-सी विभक्ति आ रही है: ‘को’ हो तो कर्म, ‘से/द्वारा’ हो तो करण, ‘के लिए’ हो तो संप्रदान, ‘से (अलगाव)’ हो तो अपादान, ‘का/के/की’ हो तो संबंध और ‘में/पर’ हो तो अधिकरण तत्पुरुष।
विशेष — जिस तत्पुरुष में पूर्वपद नञ् (न/अ/अन्) हो, उसे नञ् तत्पुरुष कहते हैं, जैसे असत्य = न सत्य, अधर्म = न धर्म, अनादि = न आदि।
3. कर्मधारय समास
यह तत्पुरुष का ही एक विशेष रूप है। इसमें भी उत्तरपद प्रधान होता है, परंतु एक पद विशेषण और दूसरा विशेष्य होता है, अथवा एक उपमान और दूसरा उपमेय होता है। इसमें कोई विभक्ति लुप्त नहीं होती; दोनों पद एक ही वस्तु/व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः ‘है जो’, ‘के समान’, ‘रूपी’ जैसे शब्द आते हैं।
4. द्विगु समास
जिस समास का पूर्वपद संख्यावाची विशेषण हो और जो किसी समूह या समाहार का बोध कराए, वह द्विगु समास है। यह भी कर्मधारय का ही उपभेद माना जाता है, अंतर केवल इतना कि यहाँ पूर्वपद कोई गिनती का शब्द होता है। पहचान — पद के आरंभ में एक, दो, त्रि, चतुर्, चौ, पंच, सप्त, नव आदि संख्याएँ।
- नवरत्न = नौ रत्नों का समूह
- त्रिलोक = तीन लोकों का समूह
- सप्ताह = सात (दिनों) का समूह
- चौमासा = चार मासों का समूह
- पंचवटी = पाँच वटों का समूह
- दोपहर = दो पहरों का समाहार
5. द्वंद्व समास
जिस समास में दोनों पद प्रधान हों और उनके बीच ‘और’, ‘या’, ‘अथवा’, ‘एवं’ जैसा योजक भाव छिपा हो, वह द्वंद्व समास है। विग्रह करते समय बीच में ‘और/या’ लगाना पड़ता है। ऐसे पद प्रायः योजक-चिह्न (हाइफ़न) के साथ लिखे जाते हैं।
- माता-पिता = माता और पिता
- राम-लक्ष्मण = राम और लक्ष्मण
- दिन-रात = दिन और रात
- भाई-बहन = भाई और बहन
- सुख-दुख = सुख और दुख
- ऊँच-नीच = ऊँच या नीच
6. बहुव्रीहि समास
जिस समास में न पूर्वपद प्रधान हो, न उत्तरपद, बल्कि दोनों मिलकर किसी तीसरे (अन्य) अर्थ की ओर संकेत करें — और वह समस्त पद उस तीसरे का विशेषण बन जाए — वह बहुव्रीहि समास है। विग्रह में प्रायः ‘जिसका/जिसके/जिसमें … वह’ आता है, और अंत में ‘अर्थात्’ लगाकर असली अर्थ बताया जाता है।
- दशानन = दश हैं आनन (मुख) जिसके, वह — अर्थात् रावण
- पीतांबर = पीत है अंबर (वस्त्र) जिसका, वह — अर्थात् श्रीकृष्ण/विष्णु
- लंबोदर = लंबा है उदर जिसका, वह — अर्थात् गणेश
- चक्रपाणि = चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके, वह — अर्थात् विष्णु
- नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका, वह — अर्थात् शिव
- चतुर्भुज = चार हैं भुजाएँ जिसकी, वह — अर्थात् विष्णु
कर्मधारय बनाम बहुव्रीहि — अंतर स्पष्ट कीजिए
विद्यार्थी सबसे अधिक भ्रम इन्हीं दो भेदों में करते हैं, क्योंकि एक ही शब्द दोनों समास का हो सकता है। अंतर का एकमात्र आधार अर्थ है — समस्त पद किसकी ओर संकेत कर रहा है। यदि वह स्वयं अपने (उत्तरपद के) अर्थ की ही बात कर रहा हो तो कर्मधारय; और यदि किसी तीसरे व्यक्ति/वस्तु की ओर संकेत कर रहा हो तो बहुव्रीहि।
| शब्द | कर्मधारय अर्थ | बहुव्रीहि अर्थ |
|---|---|---|
| नीलकंठ | नीला कंठ (एक रंग का कंठ) | जिसका कंठ नीला है — अर्थात् शिव |
| पीतांबर | पीला वस्त्र | जिसका वस्त्र पीला है — अर्थात् कृष्ण |
| चंद्रमुख | चंद्रमा-सा सुंदर मुख | जिसका मुख चंद्रमा-सा है — अर्थात् वैसा व्यक्ति |
| महावीर | महान वीर | जिसमें महान वीरता हो — अर्थात् हनुमान |
सरल सूत्र — विग्रह में यदि ‘है जो / के समान’ आकर बात उसी पद पर रुक जाए, तो कर्मधारय; यदि विग्रह में ‘जिसका/जिसके … वह, अर्थात् (कोई तीसरा)’ आए, तो बहुव्रीहि।
सामान्य अशुद्धियाँ और परीक्षा-दृष्टि
- तत्पुरुष के उपभेद में भूल — विग्रह करके यह अवश्य देखें कि कौन-सी विभक्ति लुप्त है; तभी कर्म/करण/संप्रदान/अपादान/संबंध/अधिकरण तय होगा।
- कर्मधारय और बहुव्रीहि में भ्रम — यदि समस्त पद किसी तीसरे (व्यक्ति/देवता) की ओर संकेत करे, तो वह बहुव्रीहि है, चाहे शब्द देखने में कर्मधारय जैसा लगे।
- द्विगु को कर्मधारय समझ लेना — द्विगु में पूर्वपद अनिवार्यतः संख्यावाची और समूहबोधक होता है; सामान्य विशेषण होने पर वह कर्मधारय रहेगा।
- द्वंद्व में ‘और’ की जगह विभक्ति लगाना — द्वंद्व के विग्रह में सदा ‘और/या’ आता है, ‘का/के’ नहीं; अन्यथा वह तत्पुरुष बन जाएगा।
- अव्ययीभाव को न पहचान पाना — पद के आरंभ में प्रति/यथा/आ/भर/बे/हर जैसे अव्यय देखकर इसे आसानी से पहचाना जा सकता है।
अभ्यास प्रश्न
नीचे दो प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं — पहले में समास-विग्रह कीजिए, दूसरे में समास का नाम (और जहाँ आवश्यक हो, उपभेद) बताइए। उत्तर हर भाग के अंत में दिए गए हैं।
(क) निम्नलिखित का समास-विग्रह कीजिए तथा समास का नाम लिखिए —
- राजपुत्र
- चौराहा
- यथाशक्ति
- माता-पिता
- दशानन
- नीलकमल
- गंगाजल
- त्रिभुवन
(ख) निम्नलिखित में समास का नाम (और उपभेद, यदि लागू हो) बताइए —
- पथभ्रष्ट
- आजीवन
- रसोईघर
- लंबोदर
- भाई-बहन
- चंद्रमुख
- अधर्म
उत्तर
(क)
- राजपुत्र = राजा का पुत्र — तत्पुरुष (संबंध) समास।
- चौराहा = चार राहों का समूह — द्विगु समास।
- यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार — अव्ययीभाव समास।
- माता-पिता = माता और पिता — द्वंद्व समास।
- दशानन = दश हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण — बहुव्रीहि समास।
- नीलकमल = नीला है जो कमल — कर्मधारय समास।
- गंगाजल = गंगा का जल — तत्पुरुष (संबंध) समास।
- त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह — द्विगु समास।
(ख)
- पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट — तत्पुरुष (अपादान) समास।
- आजीवन = जीवन भर — अव्ययीभाव समास।
- रसोईघर = रसोई के लिए घर — तत्पुरुष (संप्रदान) समास।
- लंबोदर = लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश — बहुव्रीहि समास।
- भाई-बहन = भाई और बहन — द्वंद्व समास।
- चंद्रमुख = चंद्रमा के समान मुख — कर्मधारय समास।
- अधर्म = न धर्म — तत्पुरुष (नञ्) समास।
निष्कर्ष
समास हिंदी शब्द-रचना की रीढ़ है। इसके छह भेदों — अव्ययीभाव, तत्पुरुष (अपने छह उपभेदों सहित), कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व और बहुव्रीहि — की पहचान का आधार यही है कि किस पद का अर्थ प्रधान है। विग्रह करने की आदत डाल लें, क्योंकि सही विग्रह ही सही भेद बताता है। विशेष रूप से कर्मधारय और बहुव्रीहि का अंतर अर्थ के स्तर पर समझें — जहाँ बात किसी तीसरे की हो, वहाँ बहुव्रीहि। नियमित अभ्यास से यह अध्याय अनिवार्य हिंदी में सुनिश्चित अंक देने वाला बन जाता है।
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