Anantam IASHindi Note · 4 September 2026

भारत की अहम संधियाँ: साल, पक्ष और मुख्य प्रावधानों की पूरी सूची

UPSC के लिए भारत की अहम संधियाँ — सिंधु जल संधि 1960, ताशकंद 1966, शिमला 1972, महाकाली 1996, BBIN 2015, LBA 2015 और बाक़ी, साल, पक्ष और मुख्य प्रावधानों के साथ।

भारत की अहम संधियाँ यह लगातार चलता हुआ रिकॉर्ड बनाती हैं कि 1947 के बाद गणराज्य ने अपनी सीमाएँ, अपनी नदियाँ, अपनी सुरक्षा और अपना आर्थिक खुलापन कैसे सँभाला। 1960 में पाकिस्तान के साथ हुई सिंधु जल संधि से लेकर 2015 में बांग्लादेश के साथ मंज़ूर हुए भूमि सीमा समझौते तक — ये दस्तावेज़ वे दबाव भी दिखाते हैं और वे चुनाव भी, जिन्होंने भारत के बाहरी रिश्तों की शक्ल तय की।

यह सूची बड़े नामों से आगे जाती है। बीसवीं सदी के आख़िरी दौर की दो सबसे असरदार संधियों पर भारत ने दस्तख़त नहीं किए: परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT)। ये इनकार भी अपने आप में संधि जैसे ही फ़ैसले हैं, और इन्हें उन समझौतों के साथ रखकर ही समझा जा सकता है जिन पर भारत ने दस्तख़त किए। नतीजा है द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय वादों का ऐसा गुच्छा, जो UPSC GS-II के द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूहों वाले पाठ्यक्रम पर सीधा बैठता है।

यह लेख भारत की अहम संधियों को मोटे तौर पर समय के क्रम में देखता है — साल, पक्ष, मुख्य प्रावधान और आज की स्थिति। इसके बाद उन बड़ी संधियों की बात है जिन पर भारत ने दस्तख़त नहीं किए, इन फ़ैसलों को गढ़ने में भारत की विदेश नीति की भूमिका, और वे पहलू जो UPSC प्रीलिम्स और मेन्स में पसंद किए जाते हैं।

भारत के संधि-रिकॉर्ड पर एक नज़र

भारत की बड़ी संधियों की समयरेखा, 1947 से 2025 तक

बुनियादी संधियाँ: 1947 से 1960

आज़ादी के बाद के पहले दशक में भारत ने कई ऐसे दस्तावेज़ों पर दस्तख़त किए, जो आज भी उसकी पड़ोस नीति की शक्ल तय करते हैं।

भूटान के साथ शांति एवं मैत्री संधि, 1949 (2007 में संशोधित)

1949 की संधि ने भूटान के बाहरी रिश्तों को भारत के मार्गदर्शन में रखा और भूटान को भारतीय ज़मीन से मुफ़्त व्यापार और आवाजाही दी। यह नाज़ुक इंतज़ाम था, क्योंकि इसने विदेश नीति में भूटान की संप्रभुता सीमित कर दी थी।

फ़रवरी 2007 में इस संधि में बड़ा बदलाव हुआ। नए रूप में वह शर्त हटा दी गई जिसके तहत भूटान को विदेश नीति पर भारत से “मार्गदर्शन लेना” था। 2007 के संशोधन ने भूटान को अपने बाहरी मामलों में पूरी तरह संप्रभु राज्य माना, हथियारों का आयात भारत के रास्ते ही करने की शर्त हटाई, और रिश्ते को साझेदारी की बुनियाद पर खड़ा किया। मुफ़्त व्यापार और आवाजाही वाले प्रावधान बने रहे।

भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि, 1950

1950 की संधि ने भारत और नेपाल के बीच ख़ास रिश्ता बनाया। खुली सीमा के इंतज़ाम के तहत यह नेपाली नागरिकों को भारत में रहने और काम करने की और भारतीयों को नेपाल में वही करने की इजाज़त देती है। संधि की समीक्षा बार-बार हुई, मगर औपचारिक रूप से इसे कभी दोबारा नहीं लिखा गया, जबकि नेपाल में इसे बदलने की माँग 1990 के दशक से चली आ रही है।

सिक्किम के साथ शांति एवं मैत्री संधि, 1950

इस संधि के तहत 1950 के बाद सिक्किम एक संरक्षित राज्य था, जिसकी रक्षा, विदेश मामले और संचार भारत के ज़िम्मे थे। जनमत संग्रह के बाद 1975 में सिक्किम 22वें राज्य के रूप में भारत में मिल गया।

सिंधु जल संधि, 1960

सिंधु जल संधि भारत के रिकॉर्ड का सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला द्विपक्षीय दस्तावेज़ है। 19 सितंबर 1960 को कराची में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने इस पर दस्तख़त किए, और विश्व बैंक बिचौलिया और गारंटर रहा। यह संधि सिंधु तंत्र की छह नदियों को भारत और पाकिस्तान के बीच बाँटती है।

मुख्य प्रावधान:

यह संधि भारत-पाक के तीन युद्धों (1965, 1971, 1999) और लगातार तनाव के बावजूद टिकी रही। पहलगाम आतंकी हमले के बाद अप्रैल 2025 में भारत ने औपचारिक रूप से संधि को फ़िलहाल रोक दिया — 1960 के बाद पहली बार नई दिल्ली ने इसका अमल टाला है। इस रोक के क़ानूनी और ज़मीनी नतीजे अभी तय होने बाक़ी हैं।

युद्ध के बाद के समझौते: ताशकंद और शिमला

पाकिस्तान से युद्धों के बाद भारत के कूटनीतिक समझौतों को दो संधियाँ परिभाषित करती हैं।

ताशकंद घोषणा, 1966

ताशकंद घोषणा पर 10 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने दस्तख़त किए, जिसमें सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन मध्यस्थ थे। इसने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को औपचारिक रूप से ख़त्म किया।

मुख्य प्रावधान:

दस्तख़त के कुछ ही घंटों बाद, 11 जनवरी 1966 को शास्त्री की ताशकंद में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। ताशकंद समझौते को भारत में सज़ा देने वाला नहीं, पुरानी हालत लौटाने वाला माना गया, और शास्त्री की आलोचना हुई कि उन्होंने युद्ध में भारतीय सेना के जीते रणनीतिक हाजी पीर दर्रे को लौटा दिया।

शिमला समझौता, 1972

शिमला समझौते पर 2 जुलाई 1972 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने दस्तख़त किए। यह 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में भारत की निर्णायक जीत के बाद हुआ।

मुख्य प्रावधान:

शिमला समझौता इसलिए अहम है कि इसने कश्मीर के सवाल को द्विपक्षीय बना दिया और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का रास्ता बंद कर दिया। भारत के सिंधु जल संधि रोकने के जवाब में पाकिस्तान ने अप्रैल 2025 में समझौते को निलंबित करने का ऐलान किया, मगर उस निलंबन की क़ानूनी हैसियत पर सवाल हैं।

सीमा और सरहद की संधियाँ

भारत-चीन सीमा: मैकमोहन रेखा, 1914

मैकमोहन रेखा 1913 से 1914 के शिमला अभिसमय में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच खींची गई, जिसमें चीन का प्रतिनिधि मौजूद तो था मगर उसने आख़िरी दस्तावेज़ पर दस्तख़त करने से इनकार कर दिया। यह रेखा पूर्वी हिमालय में जल-विभाजक के साथ चलती है और चीन के साथ सीमा के पूर्वी हिस्से पर भारत के दावे का आधार बनती है।

चीन मैकमोहन रेखा को क़ानूनी सीमा नहीं मानता। 1962 का भारत-चीन युद्ध कुछ हद तक इसी विवादित पूर्वी हिस्से को लेकर लड़ा गया, और यह रेखा अरुणाचल प्रदेश में आज भी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) है। भारत और चीन ने LAC पर शांति बनाए रखने के कई समझौते किए हैं (1993, 1996, 2005, 2013), मगर सीमा का औपचारिक निपटारा अब तक नहीं हुआ।

बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौता (LBA), 1974 (2015 में मंज़ूर)

भूमि सीमा समझौते पर 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और शेख़ मुजीबुर रहमान ने दस्तख़त किए थे, ताकि भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा विवाद सुलझें और छिटपुट बस्तियों (एन्क्लेव) की अदला-बदली हो सके। समझौते में क़रीब 6.1 किलोमीटर की बिना सीमांकन वाली ज़मीनी सरहद का सीमांकन और 162 एन्क्लेव की अदला-बदली शामिल थी: बांग्लादेश में 111 भारतीय एन्क्लेव और भारत में 51 बांग्लादेशी एन्क्लेव।

भारत ने दशकों तक इसे मंज़ूरी नहीं दी, क्योंकि देश की ज़मीन बदलने को लेकर संवैधानिक सवाल थे। 2015 के 100वें संविधान संशोधन अधिनियम ने आख़िरकार LBA को मंज़ूरी दी। 1 अगस्त 2015 को एन्क्लेव की अदला-बदली हुई, और दुनिया का सबसे बड़ा एन्क्लेव-जाल ख़त्म हो गया। क़रीब 14,000 भारतीय एन्क्लेव निवासियों और 37,000 बांग्लादेशी एन्क्लेव निवासियों को मेज़बान देश की नागरिकता मिली।

2015 की यह मंज़ूरी भारत-बांग्लादेश रिश्तों की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है।

नेपाल के साथ महाकाली संधि, 1996

महाकाली नदी के एकीकृत विकास से जुड़ी नेपाल सरकार और भारत सरकार के बीच की संधि पर 12 फ़रवरी 1996 को दस्तख़त हुए। इसमें शारदा बैराज, टनकपुर बैराज और महाकाली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना आते हैं।

पंचेश्वर परियोजना, जो एक बड़ी पनबिजली और सिंचाई योजना है, संधि के बावजूद तीन दशकों में ज़मीन पर नहीं उतरी। इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट 2017 से नेपाल की मंज़ूरी के इंतज़ार में अटकी है। अमल पिछड़ने के बाद भी संधि एक काम का ढाँचा बनी हुई है।

क्षेत्रीय और संपर्क की संधियाँ

संधियों के विषय: पानी, शांति, व्यापार, परमाणु और संपर्क

बांग्लादेश के साथ गंगा जल बँटवारा संधि, 1996

दिसंबर 1996 में प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा और शेख़ हसीना ने इस पर दस्तख़त किए। 30 साल की यह संधि सूखे मौसम (1 जनवरी से 31 मई) में फ़रक्का बैराज पर गंगा के पानी के बँटवारे को तय करती है। दशकों के विवाद के बाद यह बड़ी कामयाबी थी, और 2026 में इसका नवीकरण होना है।

मेकांग-गंगा सहयोग, 2000

10 नवंबर 2000 को लाओस के वियनतियान में शुरू हुआ मेकांग-गंगा सहयोग (MGC) भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के पाँच देशों — कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम — के बीच एक उप-क्षेत्रीय पहल है। यह गंगा और मेकांग घाटियों के बीच पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा और परिवहन के जुड़ावों पर काम करता है।

MGC, BIMSTEC ढाँचे के साथ-साथ, मुख्यभूमि दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत की एक्ट ईस्ट नीति वाली भागीदारी का ज़रिया है।

BBIN मोटर वाहन समझौता, 2015

बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल मोटर वाहन समझौते (MVA) पर 15 जून 2015 को थिम्पू में दस्तख़त हुए। यह चारों देशों के बीच यात्री, निजी और मालवाहक गाड़ियों की बिना रुकावट आवाजाही की इजाज़त देता है।

भूटान ने पर्यावरण और सामाजिक चिंताओं की वजह से इसे मंज़ूरी नहीं दी है। बाक़ी तीन देशों (भारत, बांग्लादेश, नेपाल) ने इस ढाँचे को त्रिपक्षीय आधार पर चालू कर दिया है। SAARC के ठप पड़ जाने के बाद जो गिने-चुने क्षेत्रीय संपर्क वाले दस्तावेज़ बचे हैं, BBIN उनमें से एक है।

रक्षा और परमाणु संधियाँ

भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता, 2008

123 समझौते पर 10 अक्टूबर 2008 को भारत और अमेरिका के बीच दस्तख़त हुए, जिसने तीन दशकों का परमाणु अलगाव ख़त्म किया। यह समझौता उन बातचीतों का नतीजा था जो 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के साझा बयान से शुरू हुई थीं।

मुख्य प्रावधान:

इस समझौते ने भारत के लिए अमेरिका, फ़्रांस, रूस और दूसरे देशों से परमाणु ईंधन और रिएक्टर मँगाने का रास्ता खोला। अमल धीमा रहा है, क्योंकि परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम 2010 ने आपूर्तिकर्ताओं को दायित्व के डर से पीछे कर दिया। फिर भी 2008 का यह समझौता आधुनिक भारतीय कूटनीति के सबसे असरदार क़दमों में गिना जाता है।

भारत-रूस द्विपक्षीय समझौते

भारत और रूस ने अपने रिश्ते को कई परतों में बुना है — शांति, मैत्री और सहयोग संधि (1971), रणनीतिक साझेदारी पर घोषणा (2000), और 2000 से चला आ रहा सालाना शिखर सम्मेलन। 1971 की संधि पर इंदिरा गांधी और सोवियत नेतृत्व ने बांग्लादेश युद्ध से कुछ ही हफ़्ते पहले दस्तख़त किए थे, और उसमें सुरक्षा ख़तरों पर आपसी विचार-विमर्श की शर्तें थीं, हालाँकि यह औपचारिक रक्षा संधि नहीं थी।

इस रणनीतिक साझेदारी ने रक्षा (Su-30MKI, T-90 टैंक, ब्रह्मोस, S-400), परमाणु ऊर्जा (कुडनकुलम) और अंतरिक्ष (ISRO-रोस्कोस्मोस की साझा परियोजनाएँ) में लंबे सहयोग को थामे रखा है। हाल की परतों में 2014 का द्रुज़्बा-दोस्ती विज़न और 2024 का रणनीतिक साझेदारी दस्तावेज़ आते हैं।

वे संधियाँ जिन पर भारत ने दस्तख़त न करना चुना

भारत के संधि-रिकॉर्ड में कुछ असरदार इनकार भी शामिल हैं। ये उसी कूटनीतिक बही-खाते का हिस्सा हैं।

परमाणु अप्रसार संधि (NPT), 1968

भारत ने NPT पर दस्तख़त करने से इस आधार पर इनकार किया कि इसने परमाणु ताक़त वालों और न रखने वालों की एक ग़ैर-बराबर व्यवस्था खड़ी की। संधि पाँच देशों को परमाणु हथियार संपन्न राज्य मानती है (जिन्होंने 1 जनवरी 1967 से पहले परीक्षण किया): अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन। बाक़ी सभी दस्तख़त करने वालों को परमाणु हथियार हासिल किए बिना अप्रसार का वादा करना था।

भारत का नज़रिया, जिसे बातचीत के दौरान रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने रखा, यह था कि NPT भेदभाव करने वाली संधि है और पाँच मान्यता प्राप्त परमाणु ताक़तों पर निरस्त्रीकरण की कोई गंभीर ज़िम्मेदारी नहीं डालती। 1974 के पहले परमाणु परीक्षण (स्माइलिंग बुद्धा) और 1998 के पोखरण-2 परीक्षणों ने इस रुख़ को और पक्का किया। भारत आज भी इस पर दस्तख़त करने वालों में नहीं है।

व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT), 1996

भारत ने CTBT पर भी दस्तख़त करने से इनकार किया, जो 24 सितंबर 1996 को दस्तख़त के लिए खुली थी। भारत की आपत्ति थी कि यह संधि आगे के परीक्षणों पर रोक तो लगा देगी, मगर पाँच परमाणु हथियार संपन्न राज्यों को समयबद्ध निरस्त्रीकरण से नहीं बाँधेगी — इससे हथियार वाले और बिना हथियार वाले देशों की ग़ैर-बराबरी पक्की हो जाएगी।

1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत ने आगे परीक्षण न करने का एकतरफ़ा फ़ैसला घोषित किया, जिसे वह आज तक निभा रहा है। भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य भी नहीं है, हालाँकि 2008 से उसे NSG की छूट हासिल है।

समुद्री क़ानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS), 1982

UNCLOS पर भारत ने दस्तख़त भी किए और 1995 में उसकी पुष्टि भी की। यह संधि समुद्री क्षेत्रों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल को नियंत्रित करती है। UNCLOS को लेकर भारत की प्रतिबद्धता हिंद महासागर पर उसके रुख़, बांग्लादेश के साथ बंगाल की खाड़ी की समुद्री सीमा (2014 में मध्यस्थता से तय), और दक्षिण चीन सागर के हालिया समुद्री विवादों पर उसके रुख़ को गढ़ती है, जहाँ भारत ने नौवहन की आज़ादी का समर्थन किया है।

शरणार्थी अभिसमय, 1951

भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय या उसके 1967 के प्रोटोकॉल पर दस्तख़त करने वालों में नहीं है। इसके बावजूद भारत ने तिब्बत, पूर्वी पाकिस्तान (1971), श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान और म्यांमार से आए लाखों शरणार्थियों को पनाह दी है। घरेलू शरणार्थी क़ानून न होने और शरणार्थी अभिसमय पर दस्तख़त न होने से अलग-अलग शरणार्थी समूहों के साथ बर्ताव भी अलग-अलग रहा है।

भारत की अहम संधियों की समयरेखा

दस्तख़त करने वाले और मुख्य प्रावधान एक नज़र में

छोटी-सी समयरेखा उस साल-और-नाम वाली याददाश्त में मदद करती है, जिसे UPSC प्रीलिम्स अक्सर जाँचता है।

सालसंधिपक्षविषय
1949शांति एवं मैत्री संधिभारत, भूटानद्विपक्षीय ढाँचा
1950शांति एवं मैत्री संधिभारत, नेपालद्विपक्षीय ढाँचा
1950शांति एवं मैत्री संधिभारत, सिक्किमसंरक्षित राज्य
1960सिंधु जल संधिभारत, पाकिस्तानजल बँटवारा
1966ताशकंद घोषणाभारत, पाकिस्तानयुद्ध के बाद का समझौता
1971शांति, मैत्री एवं सहयोग संधिभारत, सोवियत संघरणनीतिक
1972शिमला समझौताभारत, पाकिस्तानयुद्ध के बाद का समझौता
1974भूमि सीमा समझौताभारत, बांग्लादेशसीमा (2015 में मंज़ूर)
1985SAARC चार्टरदक्षिण एशियाई देशक्षेत्रीय सहयोग
1995UNCLOS की पुष्टिबहुपक्षीयसमुद्री क़ानून
1996महाकाली संधिभारत, नेपालजल बँटवारा
1996गंगा जल बँटवाराभारत, बांग्लादेशजल बँटवारा
2000मेकांग-गंगा सहयोगभारत + 5 ASEAN देशसंपर्क
2007संशोधित मैत्री संधिभारत, भूटानसंप्रभुता की नई शुरुआत
2008असैन्य परमाणु समझौताभारत, अमेरिकापरमाणु
2015LBA की मंज़ूरीभारत, बांग्लादेशसीमा
2015BBIN MVAभारत, बांग्लादेश, भूटान, नेपालसंपर्क

भारत संधियों पर बातचीत कैसे करता है

भारत की संधि-प्रक्रिया कुछ तय ढर्रों पर चलती है। बातचीत की अगुवाई आमतौर पर विदेश मंत्रालय करता है, और संबंधित मंत्रालय साथ रहते हैं (नदी संधियों में जल संसाधन, परमाणु और सैन्य संधियों में रक्षा, व्यापार समझौतों में वाणिज्य)। बड़ी संधियों को केंद्रीय मंत्रिमंडल मंज़ूरी देता है। कुछ संधियों में, जैसे देश की ज़मीन बदलने वाली संधियों में, संविधान संशोधन ज़रूरी होता है — जैसा LBA में हुआ।

अमल अक्सर ख़ास संयुक्त तंत्रों से होता है: सिंधु संधि के लिए स्थायी सिंधु आयोग, भारत-बांग्लादेश के लिए संयुक्त नदी आयोग, और LAC के लिए भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय की कार्य व्यवस्था।

भारत संधि क़ानून पर वियना अभिसमय (1969) का दस्तख़तकर्ता सदस्य नहीं है। भारत संधियों की व्याख्या और अमल में प्रथागत अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों पर चलता है।

UPSC के लिए प्रीलिम्स और मेन्स के सूत्र

प्रीलिम्स के लिए:

मेन्स के लिए:

निष्कर्ष

भारत की अहम संधियाँ एक लगातार चलती कूटनीतिक कहानी की तरह पढ़ी जा सकती हैं: 1950 के दशक में भूटान, नेपाल और सिक्किम के साथ बुनियाद रखना; 1960 से 1972 तक पाकिस्तान के साथ युद्ध और पानी के इंतज़ाम; 1974 और 2015 में बांग्लादेश के साथ सीमा का निपटारा; 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु खुलापन; और 2000 के दशक से BBIN, MGC और BIMSTEC के ज़रिए क्षेत्रीय संपर्क। इनकार — NPT और CTBT — दस्तख़तों जितने ही अहम हैं।

UPSC के लिए सबसे काम की आदत यह है कि हर संधि को तीन चीज़ों में याद रखिए: साल, पक्ष, मुख्य प्रावधान। सिंधु जल संधि, शिमला समझौता, ताशकंद घोषणा, महाकाली संधि, गंगा जल बँटवारा, LBA, परमाणु समझौता, BBIN MVA, NPT पर दस्तख़त न करना और CTBT पर दस्तख़त न करना — पिछले एक दशक में प्रीलिम्स और मेन्स ने जो पूछा है, उसका ज़्यादातर हिस्सा इन्हीं में आ जाता है। इस सूची को रीढ़ मानिए और 2025 की सिंधु जल संधि वाली रोक जैसे ताज़ा घटनाक्रमों से इसमें गहराई जोड़िए।

सामान्य प्रश्न

भारत की सबसे अहम संधियाँ कौन-सी हैं?

भारत की सबसे अहम संधियों में पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि 1960, ताशकंद घोषणा 1966, शिमला समझौता 1972, नेपाल के साथ महाकाली संधि 1996, बांग्लादेश के साथ गंगा जल बँटवारा संधि 1996, भूमि सीमा समझौता (2015 में मंज़ूर) और अमेरिका-भारत असैन्य परमाणु समझौता 2008 आते हैं।

भारत ने NPT पर दस्तख़त क्यों नहीं किए?

भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर इस आधार पर दस्तख़त करने से इनकार किया कि यह भेदभाव करने वाली संधि है। यह सिर्फ़ पाँच देशों (अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन) को परमाणु हथियार संपन्न राज्य मानती है और बाक़ी सबको हथियार न रखने से बाँध देती है, जबकि उन पाँच पर समयबद्ध निरस्त्रीकरण की कोई ज़िम्मेदारी नहीं डालती। भारत ने 1974 और 1998 में परीक्षण किए और आज भी NPT से बाहर है।

ताशकंद घोषणा क्या थी?

ताशकंद घोषणा पर 10 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने दस्तख़त किए, जिसमें सोवियत प्रधानमंत्री कोसिगिन मध्यस्थ थे। इसने 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध ख़त्म किया, युद्ध से पहले वाली स्थिति बहाल की, और दोनों पक्षों को विवाद शांति से सुलझाने के वादे से बाँधा। अगले ही दिन शास्त्री की ताशकंद में मृत्यु हो गई।

शिमला समझौता क्या है?

शिमला समझौते पर 2 जुलाई 1972 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद दस्तख़त किए। इसने कश्मीर की युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा में बदला और दोनों देशों को विवाद आपस में सुलझाने के वादे से बाँधा।

सिंधु जल संधि पर दस्तख़त कब हुए?

सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को कराची में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने दस्तख़त किए, जिसमें विश्व बैंक बिचौलिया रहा। इसने सिंधु तंत्र की छह नदियाँ भारत और पाकिस्तान के बीच बाँटीं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने अप्रैल 2025 में इस संधि को फ़िलहाल रोक दिया।

बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौता क्या है?

भूमि सीमा समझौते (LBA) पर 1974 में इंदिरा गांधी और शेख़ मुजीबुर रहमान ने दस्तख़त किए थे, ताकि सीमा विवाद सुलझें और छिटपुट बस्तियों की अदला-बदली हो। भारत ने इसे 2015 में 100वें संविधान संशोधन से मंज़ूरी दी, 162 एन्क्लेव की अदला-बदली की और क़रीब 51,000 निवासियों को नागरिकता दी।

क्या भारत ने CTBT पर दस्तख़त किए हैं?

नहीं। भारत ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर दस्तख़त नहीं किए, जो 1996 में दस्तख़त के लिए खुली थी। भारत 1998 से परमाणु परीक्षण न करने का एकतरफ़ा फ़ैसला निभा रहा है, मगर औपचारिक CTBT व्यवस्था में शामिल नहीं हुआ।