लोदी वंश: बहलोल, सिकंदर, इब्राहीम लोदी और पानीपत की हार (1451-1526)
लोदी वंश (1451-1526) दिल्ली सल्तनत का आख़िरी और अकेला अफ़ग़ान वंश था। बहलोल, सिकंदर लोदी का आगरा बसाना, इब्राहीम लोदी की पानीपत 1526 में हार और लोदी प्रशासन पर UPSC नोट्स।
लोदी वंश ने दिल्ली सल्तनत पर 1451 से 1526 तक राज किया। यह दिल्ली सल्तनत का पाँचवाँ और आख़िरी वंश था, और अकेला ऐसा वंश जो तुर्क नहीं, अफ़ग़ान मूल का था। लोदी वंश ने सैयद वंश की जगह ली, जिसे तैमूर के नियुक्त किए ख़िज़्र ख़ाँ ने 1414 में शुरू किया था। लोदी शासन के ये पचहत्तर साल दिल्ली सल्तनत की ढलती शाम हैं। साम्राज्य कभी तुग़लक़ों के चरम वाले फैलाव तक दोबारा नहीं पहुँचा। लोदी सुल्तानों का इलाक़ा दिल्ली और आगरा के इर्द-गिर्द कहीं छोटा था, जिसमें पंजाब और बिहार पर पकड़ ढीली ही रही।
लोदी वंश ने तीन सुल्तान दिए। बहलोल लोदी, वंश का संस्थापक, एक बड़ा अफ़ग़ान सरदार था जिसने अपने ही क़बीले वालों से गठजोड़ करके सत्ता जमाई। उसका बेटा सिकंदर लोदी सबसे क़ाबिल लोदी शासक था — उसने सल्तनत को पूरब की तरफ़ बढ़ाया, 1504 में दूसरी राजधानी के तौर पर आगरा बसाया, और लगान की व्यवस्था सुधारी। तीसरा और आख़िरी सुल्तान इब्राहीम लोदी अपने मनमाने तौर-तरीक़ों से अफ़ग़ान सरदारों को नाराज़ कर बैठा, और 20 या 21 अप्रैल 1526 को पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर के हाथों हारकर मारा गया। इस हार ने लोदी वंश और पूरी दिल्ली सल्तनत, दोनों को ख़त्म कर दिया और मुग़ल दौर का दरवाज़ा खोल दिया।
यह लेख तीनों लोदी शासकों से गुज़रता है, अफ़ग़ान और तुर्क सरदारों का वह फ़र्क़ सामने रखता है जिसने लोदी राजनीति की शक्ल तय की, और बताता है कि इब्राहीम लोदी पानीपत में क्यों हारा।
ज़रूरी बातें
- संस्थापक: बहलोल लोदी, 1451
- सबसे क़ाबिल शासक: सिकंदर लोदी, 1489-1517
- आख़िरी शासक: इब्राहीम लोदी, 1526 में पानीपत में मारा गया
- मूल: अफ़ग़ान, मुल्तान के आसपास बसे ग़िलज़ई-लोदी क़बीले से
- राजधानियाँ: दिल्ली; आगरा, जिसे सिकंदर लोदी ने 1504 में दूसरी राजधानी के तौर पर बसाया
- मुख्य टकराव: अफ़ग़ानों का बराबरी वाला क़बीलाई मिज़ाज बनाम तुर्कों की केंद्रीकृत सल्तनत की परंपरा
- प्रशासन में नई चीज़: सिकंदर लोदी के समय नाप के लिए गज़-ए-सिकंदरी नाम का तय गज़
- अंत: 20 या 21 अप्रैल 1526, पानीपत की पहली लड़ाई — देखिए पानीपत की लड़ाइयाँ पर हमारे नोट्स
पृष्ठभूमि: सैयद से लोदी तक
तुग़लक़ वंश 1414 में ख़त्म हुआ। उसके बाद आया सैयद वंश, जिसे ख़िज़्र ख़ाँ ने शुरू किया था — वही ख़िज़्र ख़ाँ, जो तैमूर का नियुक्त किया मुल्तान का सूबेदार रह चुका था। सैयदों ने 1414 से 1451 तक नाम भर के लिए दिल्ली पर राज किया, पर राजधानी के आसपास के छोटे से इलाक़े से आगे उनकी कभी नहीं चली। जौनपुर, दोआब और पंजाब के अफ़ग़ान सूबेदार असल में आज़ाद थे।
1451 में आख़िरी सैयद शासक आलम शाह गद्दी छोड़कर बदायूँ चला गया। पंजाब में सरहिंद के अफ़ग़ान सूबेदार बहलोल लोदी ने बिना किसी बड़े मुक़ाबले के दिल्ली ले ली। वह पहले से ही सबसे ताक़तवर सूबेदार और उत्तर भारत का सबसे बड़ा अफ़ग़ान सरदार था। इससे पहले के दौर के लिए तुग़लक़ वंश पर हमारे नोट्स देखिए।
बहलोल लोदी (1451-1489)
बहलोल लोदी ग़िलज़ई अफ़ग़ानों के लोदी क़बीले का मुखिया था। लोदी क़बीला तेरहवीं सदी में मुल्तान में आकर बसा था और बाद के तुग़लक़ों और सैयदों के दौर में दिल्ली की नौकरी में ऊपर चढ़ा। बहलोल का पिता घोड़ों का सौदागर था, जो तरक़्क़ी करते-करते सरहिंद का सूबेदार बना। दिल्ली लेने से पहले बहलोल को वही सूबेदारी विरासत में मिली थी।
बहलोल लोदी की राजनीति का मूल तरीक़ा क़बीलाई एकजुटता था। उसने अपने क़बीले वालों और सिंधु पार के दूसरे अफ़ग़ानों को बड़ी तादाद में भारत आकर बसने का न्योता दिया, उन्हें इक़्ता दिए। फ़ौज और प्रशासन, दोनों की रीढ़ भी वही बने। यह मिज़ाज तुर्क सल्तनत से अलग था। अफ़ग़ान परंपरा में सुल्तान बराबरी वालों में सबसे आगे था, बलबन के सिद्धांत वाला ज़िल्ल-ए-इलाही नहीं। बड़े अफ़ग़ान सरदार तख़्त के नीचे नहीं, सुल्तान के साथ एक ही क़ालीन पर बैठते थे। बहलोल ने जान-बूझकर यह अंदाज़ अपनाया।
बाहर की तरफ़ उसकी मुख्य मुहिम जौनपुर की शर्क़ी सल्तनत से लंबी लड़ाई थी, जो तुग़लक़ों के बाद बनी रियासतों में सबसे ताक़तवर थी। कई बेनतीजा लड़ाइयों के बाद उसने आख़िरकार 1479 में जौनपुर मिला लिया। अड़तीस साल राज करने के बाद बहलोल की 1489 में मौत हुई।
सिकंदर लोदी (1489-1517)
सिकंदर लोदी बहलोल का बेटा था और तीनों लोदी सुल्तानों में सबसे क़ाबिल। उसका असली नाम निज़ाम ख़ाँ था। उसकी माँ हिंदू थीं — सरहिंद के एक हिंदू सुनार की बेटी — जिससे शुरू में पूरे अफ़ग़ान ख़ून वाले दावेदारों के सामने उसका दावा कमज़ोर पड़ा। उसने राजनीतिक सूझ और फ़ौजी फुर्ती से यह होड़ जीत ली।
आगरा बसाना
सिकंदर लोदी ने 1504 में यमुना के दाहिने किनारे पर, दिल्ली से क़रीब 200 किलोमीटर दक्षिण में आगरा शहर बसाया। वजहें फ़ौजी भी थीं और प्रशासनिक भी। आगरा दोआब के बीचोबीच पड़ता था, पूर्वी भारत और राजस्थान की मुहिमों के लिए बेहतर ठिकाना था, और दिल्ली के सरदारों की सबसे ख़राब गुटबाज़ी से दूर था। आगे चलकर अकबर और शाहजहाँ के समय आगरा ही मुग़लों की मुख्य राजधानी बना। दिल्ली के लोधी गार्डन में बना ख़ुद सिकंदर लोदी का मक़बरा मुग़लों से पहले के भारत के सबसे बेहतरीन मक़बरों में गिना जाता है।
गज़-ए-सिकंदरी
सिकंदर लोदी ने गज़-ए-सिकंदरी के ज़रिए ज़मीन की नाप एक जैसी की — क़रीब 32 इंच का यह तय गज़ उसके राज में लगान आँकने के लिए इस्तेमाल होता था। इसी नाप को शेरशाह सूरी और मुग़लों की मनसबदारी व्यवस्था ने आगे बढ़ाया और और बेहतर किया। सिकंदर लोदी ने खेती को बढ़ावा देने के लिए अनाज पर लगने वाले कुछ कर — अनाज पर लगने वाला जज़िया — भी घटाए।
धार्मिक नीति
सिकंदर लोदी अपने पिता से ज़्यादा कट्टर था। उसने मथुरा समेत कुछ जगहों पर हिंदू मंदिर तुड़वाए और कुछ जगहों पर हिंदू तीर्थयात्रा पर रोक लगाई। उसने ब्राह्मण विद्वान बोधन को इस दलील के लिए मौत की सज़ा दी कि हिंदू धर्म और इस्लाम, दोनों बराबर सच हैं। साथ ही उसने लगान के काम में बहुत-से हिंदू अफ़सर रखे और उसकी फ़ौज में राजपूत सहयोगियों की हिंदू टुकड़ियाँ भी थीं।
फैलाव
सिकंदर लोदी ने सल्तनत को पूरब में बिहार तक बढ़ाया, तिरहुत के राजाओं और शर्क़ी सल्तनत के बचे-खुचे हिस्से को हराया, और ग्वालियर तक धावा बोला, हालाँकि क़िला पूरी तरह कभी नहीं जीत पाया। उसके राज के आख़िर तक लोदी सल्तनत पश्चिमी पंजाब से पश्चिमी बिहार तक फैली थी। 1517 में आगरा में उसकी मौत हुई।
इब्राहीम लोदी (1517-1526)
इब्राहीम लोदी सिकंदर का सबसे बड़ा बेटा था। उसके नौ साल के राज को दिल्ली सल्तनत का तबाही वाला आख़िरी अध्याय कहा जा सकता है।
अफ़ग़ान सरदारों से टकराव
इब्राहीम लोदी ने पुरानी तुर्क सल्तनत के तरीक़े पर सारी ताक़त अपने हाथ में लाने की कोशिश की। उसने ज़ोर दिया कि सरदार उसके सामने खड़े रहें, क़ालीन साझा करने से इनकार किया, और इक़्ता बाँटने पर अपना निजी हक़ जताया। बहलोल और सिकंदर के बराबरी वाले क़बीलाई अंदाज़ के आदी अफ़ग़ान सरदारों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। दरार चौड़ी होती गई।
इब्राहीम के छोटे भाई जलाल ख़ाँ ने जौनपुर में बग़ावत की और हार गया। पंजाब के बड़े अफ़ग़ान सरदार, ख़ास तौर पर पंजाब का सूबेदार दौलत ख़ाँ लोदी, नाराज़ हो गए। इब्राहीम लोदी ने बेवफ़ाई के शक में कई बड़े सरदारों को मरवा दिया, जिससे विरोध और सख़्त हो गया।
दौलत ख़ाँ लोदी और बाबर को न्योता
क़रीब 1523-1524 में पंजाब के सूबेदार दौलत ख़ाँ लोदी ने काबुल एक दूत भेजकर बाबर को हमले का न्योता दिया। बाबर काबुल का शासक था — पिता की तरफ़ से तैमूर का और माँ की तरफ़ से चंगेज़ ख़ाँ का वंशज। वह 1519 से 1524 के बीच पंजाब में चार बार टोह लेने वाले हमले कर चुका था। दौलत ख़ाँ के न्योते ने उसे राजनीतिक बहाना दे दिया।
बाबर का मक़सद दौलत ख़ाँ को बहाल करना नहीं, ख़ुद दिल्ली लेना था। दौलत ख़ाँ को यह तब समझ आया जब बाबर पंजाब पर क़ब्ज़ा कर चुका था। तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
पानीपत की पहली लड़ाई (1526)
अप्रैल 1526 में बाबर और इब्राहीम लोदी दिल्ली से क़रीब नब्बे किलोमीटर उत्तर में पानीपत पर आमने-सामने हुए। लड़ाई का पूरा दाँव-पेच पानीपत की लड़ाइयाँ वाले हमारे नोट्स में है, पर बुनियादी बातें ये हैं। इब्राहीम लोदी के पास क़रीब 1,00,000 सैनिक और 1,000 युद्ध हाथी थे। बाबर के पास 12,000 से 25,000 के बीच। कम से कम अनुमान के हिसाब से भी बाबर क़रीब चार गुना कम था।
बाबर तीन नई चीज़ों के दम पर जीता। पहली थी आग्नेयास्त्र — ऑटोमन शैली की मैचलॉक बंदूक़ें और मैदानी तोपें, जो भारत में पहली बार पूरे युद्धक्षेत्र के पैमाने पर इस्तेमाल हुईं। दूसरी थी तुलुग़मा — मध्य एशिया की वह चाल जिसमें फ़ौज के दोनों सिरे घूमकर दुश्मन को घेर लेते हैं। तीसरी थी बैलगाड़ियों को ज़ंजीर से बाँधकर बनाई गई मोर्चाबंदी, जो बंदूक़ भरते वक़्त उसके बंदूक़चियों को बचाती थी।
इब्राहीम लोदी की फ़ौज पुराने ढंग की लड़ाई के लिए बनी थी। तोपों की गरज सुनकर युद्ध हाथी बिदक गए। घुड़सवार गाड़ियों की क़तार तोड़ नहीं पाए। 20 या 21 अप्रैल 1526 को दोपहर तक इब्राहीम लोदी मैदान में मरा पड़ा था। लोदी फ़ौज बिखर गई। कुछ ही दिनों में बाबर दिल्ली पहुँचा और पादशाह घोषित हुआ। मुग़ल साम्राज्य की औपचारिक शुरुआत इसी जीत से मानी जाती है।
पानीपत की पहली लड़ाई ने दिल्ली सल्तनत ख़त्म कर दी, जो 1206 से 1526 तक — यानी 320 साल — चली थी।
अफ़ग़ान बनाम तुर्क सरदार — ढाँचे वाला टकराव
लोदी वंश को जिस राजनीतिक तनाव ने ख़त्म किया, उसे समझने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि इसे सरदारी के दो अलग नमूनों की टक्कर माना जाए।
तुर्क नमूना, जिसे ग़ुलाम वंश ने खड़ा किया और ख़िलजी वंश और तुग़लक़ वंश ने आगे बढ़ाया, सुल्तान को पूरी ताक़त का केंद्र मानता था। ग़ुलाम वंश का चहलगानी, अलाउद्दीन ख़िलजी का दाग़-चेहरा सुधार, और बलबन का ज़िल्ल-ए-इलाही सिद्धांत — सब ताक़त को एक जगह समेटने वाले थे। सरदार बराबरी वाले नहीं, अफ़सर थे। वे सिजदा में झुकते और पायबोस में सुल्तान का पैर चूमते थे।
अफ़ग़ान नमूना, जिसे बहलोल लोदी लेकर आया, सुल्तान को बराबरी वालों में सबसे आगे मानता था। अफ़ग़ान सरदार सुल्तान के साथ क़ालीन साझा करते थे, अपने इक़्तों में क़बीलाई आज़ादी बनाए रखते थे, और उम्मीद करते थे कि उनसे सलाह ली जाएगी। जब तक सुल्तान इसका लिहाज़ करता, यह व्यवस्था चलती रही। बहलोल और सिकंदर ने लिहाज़ किया। इब्राहीम ने नहीं।
जब इब्राहीम लोदी ने अफ़ग़ान सरदारों पर तुर्कों वाला केंद्रीकृत अंदाज़ थोपना चाहा, तो ढाँचे की इसी बेमेल जोड़ी से वे बग़ावतें उठीं जो बाबर को ले आईं। यही अफ़ग़ान-तुर्क तनाव अगली सदी में फिर लौटा, जब शेरशाह सूरी — जो ख़ुद भी अफ़ग़ान था — ने 1540 से 1555 तक इसी तरह के बराबरी वाले क़बीलाई नमूने पर अफ़ग़ान राज कुछ समय के लिए बहाल किया।
लोदी वंश का प्रशासन
लोदी प्रशासन ने दिल्ली सल्तनत से मिला पुराना ढाँचा जस का तस रखा — केंद्र में चार दीवान (वज़ारत, अर्ज़, इंशा, रसालत), सूबों में इक़्ता और मुक़्ती की व्यवस्था, और गाँव के स्तर पर मुक़द्दम और पटवारी। सिकंदर लोदी के समय गज़-ए-सिकंदरी की तय नाप से लगान की व्यवस्था कसी गई।
फ़ौज अफ़ग़ान क़बीलाई टुकड़ियों और इक़्तादारों की रखी हुई सेनाओं पर टिकी थी। ख़िलजियों जैसी बड़ी स्थायी फ़ौज लोदियों के पास नहीं थी। नाम लेने लायक़ मैदानी तोपख़ाना भी नहीं था। वे घुड़सवारों और हाथियों पर ही पुराने ढंग से टिके रहे। 1526 में बाबर के मुक़ाबले तकनीक का जो फ़ासला दिखा, वह सीधे इसी का नतीजा है।
वास्तुकला
लोदी वास्तुकला सादी है और मक़बरों पर केंद्रित। दिल्ली के लोधी गार्डन के लोदी मक़बरे — सिकंदर लोदी का मक़बरा, शीश गुंबद, बड़ा गुंबद — लोदी शैली का दोहरा गुंबद, पेंडेंटिव की जगह स्क्विंच का इस्तेमाल, और चमकीली टाइलों की सजावट की शुरुआत दिखाते हैं। लोदी मक़बरों की शैली ही हुमायूँ और अकबर के शुरुआती मुग़ल मक़बरों की सीधी पूर्वज है।
प्रीलिम्स पॉइंटर्स
- लोदी वंश का काल: 1451-1526।
- आख़िरी सैयद शासक आलम शाह के गद्दी छोड़ने के बाद बहलोल लोदी ने 1451 में वंश की नींव रखी।
- दिल्ली सल्तनत का अकेला अफ़ग़ान वंश लोदी वंश ही था।
- बहलोल लोदी ने 1479 में जौनपुर की शर्क़ी सल्तनत मिला ली।
- सिकंदर लोदी (1489-1517) ने 1504 में आगरा बसाया।
- सिकंदर लोदी ने गज़-ए-सिकंदरी (क़रीब 32 इंच) से ज़मीन की नाप एक जैसी की।
- सिकंदर लोदी ने हिंदू-मुस्लिम बराबरी की दलील देने पर ब्राह्मण बोधन को मौत की सज़ा दी।
- इब्राहीम लोदी (1517-1526) ने मनमाने तौर-तरीक़ों से अफ़ग़ान सरदारों को नाराज़ किया।
- पंजाब के सूबेदार दौलत ख़ाँ लोदी ने बाबर को हमले का न्योता दिया।
- पानीपत की पहली लड़ाई 20 या 21 अप्रैल 1526 को लड़ी गई।
- बाबर ने ऑटोमन मैचलॉक, मैदानी तोपों और तुलुग़मा चाल से इब्राहीम लोदी को हराया।
- बाबर के ऑटोमन तोपचियों की कमान उस्ताद अली क़ुली और मुस्तफ़ा रूमी के हाथ थी।
- दिल्ली सल्तनत 320 साल बाद 1526 में ख़त्म हुई।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- “लोदी वंश दिल्ली सल्तनत की ढलती शाम था।” अफ़ग़ान और तुर्क सरदारी के नमूनों के बीच ढाँचागत टकराव के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (GS पेपर I, 15 अंक)
- सिकंदर लोदी के सुधारों की जाँच कीजिए और बताइए कि वे बाद की सूर और मुग़ल प्रशासनिक व्यवस्थाओं से किस हद तक जुड़ते हैं। (GS पेपर I, 10 अंक)
- इब्राहीम लोदी पानीपत की पहली लड़ाई क्यों हारा? फ़ौजी तकनीक, राजनीतिक नाराज़गी और सरदारों की बग़ावत के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (GS पेपर I, 15 अंक)
विरासत और आगे का रास्ता
लोदी वंश दिल्ली सल्तनत का अंत करता है, पर मुग़ल दौर की शुरुआत भी करता है। गज़-ए-सिकंदरी की नाप शेरशाह सूरी और अकबर की लगान व्यवस्थाओं में आगे चली। लोदी मक़बरों की शैली हुमायूँ के मक़बरे की सीधी पूर्वज थी। इब्राहीम लोदी को ले डूबा अफ़ग़ान-तुर्क सरदारी का टकराव 1540 और 1550 के दशकों में शेरशाह सूरी के समय फिर उभरा, और आख़िरकार तभी सुलझा जब अकबर ने केंद्रीकृत तुर्क नमूने पर, बड़ी ग़ैर-अफ़ग़ान हिस्सेदारी के साथ, मनसबदारी व्यवस्था खड़ी की।
लोदी वंश को ग़ुलाम वंश, ख़िलजी वंश, तुग़लक़ वंश और पानीपत की लड़ाइयों के साथ पढ़िए, तो दिल्ली सल्तनत के आख़िरी दौर की पूरी कहानी बन जाती है। 1526 में पानीपत से शुरू हुए अगले अध्याय के लिए अकबर के नवरत्न पर हमारे नोट्स भी देखिए।
सामान्य प्रश्न
लोदी वंश की नींव किसने रखी?
बहलोल लोदी ने 1451 में लोदी वंश की नींव रखी, जब आख़िरी सैयद सुल्तान आलम शाह दिल्ली की गद्दी छोड़कर बदायूँ चला गया। बहलोल उत्तर भारत का सबसे बड़ा अफ़ग़ान सरदार और पंजाब में सरहिंद का सूबेदार था। दिल्ली सल्तनत का अकेला अफ़ग़ान वंश लोदी वंश ही था।
सिकंदर लोदी ने आगरा क्यों बसाया?
सिकंदर लोदी ने 1504 में यमुना के दाहिने किनारे पर आगरा बसाया, और वजह फ़ौजी थी। आगरा दोआब के बीचोबीच पड़ता था, पूर्वी भारत और राजस्थान की मुहिमों का ठिकाना बनता था, और दरबार को दिल्ली की सबसे ख़राब गुटबाज़ी से दूर ले जाता था। आगे चलकर अकबर और शाहजहाँ के समय आगरा ही मुग़लों की मुख्य राजधानी बना।
गज़-ए-सिकंदरी क्या था?
गज़-ए-सिकंदरी क़रीब 32 इंच का वह तय गज़ था, जिसे सिकंदर लोदी ने लगान आँकने के लिए ज़मीन की नाप में शुरू किया। इसी को शेरशाह सूरी और मुग़लों की मनसबदारी व्यवस्था ने आगे बढ़ाया और बेहतर किया।
इब्राहीम लोदी ने अफ़ग़ान सरदारों को क्यों नाराज़ किया?
इब्राहीम लोदी ने अफ़ग़ान सरदारों पर पुरानी तुर्क सल्तनत वाला केंद्रीकृत नमूना थोपने की कोशिश की। उसने ज़ोर दिया कि सरदार उसके सामने खड़े रहें, बहलोल और सिकंदर की तरह क़ालीन साझा करने से इनकार किया, बेवफ़ाई के शक में कई बड़े सरदारों को मरवाया, और इक़्ता बाँटने पर अपना निजी हक़ जताया। अफ़ग़ानों का बराबरी वाला क़बीलाई मिज़ाज इससे मेल नहीं खाता था, इसलिए सरदारों ने बग़ावत कर दी।
बाबर को भारत पर हमले का न्योता किसने दिया?
पंजाब के सूबेदार और नाराज़ चल रहे बड़े अफ़ग़ान सरदार दौलत ख़ाँ लोदी ने क़रीब 1523-1524 में काबुल दूत भेजकर बाबर को हमले का न्योता दिया। बाबर 1519 से 1524 के बीच पंजाब में चार बार टोह लेने वाले हमले कर चुका था। दौलत ख़ाँ को उम्मीद थी कि बाबर इब्राहीम लोदी की जगह उसे बिठा देगा, पर बाबर ने दिल्ली मुग़लों के लिए ले ली।
लोदी वंश का अंत कैसे हुआ?
लोदी वंश 20 या 21 अप्रैल 1526 को पानीपत की पहली लड़ाई में ख़त्म हुआ। बाबर ने ऑटोमन मैचलॉक, मैदानी तोपों और तुलुग़मा वाली घेराबंदी की चाल से इब्राहीम लोदी को हराया। इब्राहीम लोदी मैदान में ही मारा गया। कुछ ही दिनों में बाबर दिल्ली पहुँचा और मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी।
लोदी वास्तुकला की विरासत क्या है?
लोदी वास्तुकला दिल्ली के लोदी मक़बरों में सबसे अच्छी तरह दिखती है — लोधी गार्डन में सिकंदर लोदी का मक़बरा, शीश गुंबद, बड़ा गुंबद और बड़ा गुंबद मस्जिद। लोदी शैली का दोहरा गुंबद, स्क्विंच का इस्तेमाल और चमकीली टाइलों की सजावट इसकी ख़ास पहचान हैं, जिनका असर शुरुआती मुग़ल मक़बरों पर पड़ा।
UPSC के लिए लोदी वंश क्यों अहम है?
लोदी वंश दिल्ली सल्तनत का आख़िरी वंश है और मध्यकालीन सल्तनत दौर और मुग़ल दौर के बीच का पुल है। UPSC के सवाल सिकंदर लोदी के आगरा बसाने और गज़-ए-सिकंदरी, इब्राहीम लोदी का अफ़ग़ान सरदारों से टकराव, और पानीपत की पहली लड़ाई 1526 पर आते हैं, जिसने वंश और सल्तनत, दोनों को ख़त्म किया।