Anantam IASHindi Note · 14 September 2026

रामप्पा मंदिर: 1213 का शिलालेख, तैरती ईंटें और डोलेराइट की मदनिकाएं

रामप्पा मंदिर को समझिए: 1213 में इसे किसने बनवाया, इस पर एक मूर्तिकार का नाम क्यों है, तैरती ईंटें असल में क्या हैं और UNESCO की 2021 की सूची में क्या शामिल है।

रामप्पा मंदिर, जिसका आधिकारिक नाम रुद्रेश्वर मंदिर है, तेलंगाना के मुलुगु जिले के पालमपेट गांव में काकतीय दौर का एक शिव मंदिर है। यह हैदराबाद से करीब 200 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। इसका काम 1213 ईस्वी में शुरू हुआ, और इसकी देखरेख काकतीय राजा गणपतिदेव के सेनापति रेचर्ला रुद्र के हाथ में थी। UNESCO ने जुलाई 2021 में इसे काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर के नाम से विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। उस सूची में यह अकेला काकतीय स्मारक है। और इसे यह जगह जितनी अपनी कला की वजह से मिली, उतनी ही अपनी इंजीनियरिंग की वजह से भी: हल्की ईंटों से बने शिखर से लेकर कठोर, गहरे रंग के डोलेराइट में तराशी गई नाचती आकृतियों तक।

इस मंदिर के बारे में जो बातें चलती हैं, उनमें से ज्यादातर आधी ही सही हैं। परंपरा के मुताबिक रामप्पा नाम इसके मुख्य मूर्तिकार का है, लेकिन 1213 का शिलालेख उनका जिक्र तक नहीं करता। शिलालेख देवता का नाम रुद्रेश्वर बताता है, और यह नाम उस सेनापति के नाम पर है जिसने मंदिर का खर्च उठाया। मार्को पोलो ने काकतीय राज्य के बारे में लिखा जरूर, लेकिन इस मंदिर के बारे में नहीं। और तैरती ईंटें सच में हैं, लेकिन UNESCO का रिकॉर्ड वजन की बात करता है, पानी पर तैरने की नहीं। यह नोट इन तीनों बातों को शिलालेख और UNESCO की फाइल के आधार पर एक-एक करके साफ करता है।

रामप्पा मंदिर क्या है और कहां है

रामप्पा मंदिर पालमपेट में एक चारदीवारी वाले परिसर के भीतर का मुख्य शिव मंदिर है। यह खेतों के बीच, जंगल वाले इलाके की तलहटी में बना है। पास ही रामप्पा चेरुवु नाम का एक जलाशय है, जिसे UNESCO काकतीयों का बनवाया हुआ बताता है। UNESCO काकतीय काल को 1123-1323 ईस्वी का मानता है, और कहता है कि यहां काम शायद करीब 40 साल तक चलता रहा। सबसे पहले ये तथ्य पक्के कर लीजिए।

तथ्यविवरण
UNESCO में आधिकारिक नामकाकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर, तेलंगाना
दूसरे नामरुद्रेश्वर (अंग्रेजी में Rudreswara या Rudreshwara); मुख्य देवता की पूजा रामलिंगेश्वर स्वामी के रूप में होती है
स्थानतेलंगाना के मुलुगु जिले का पालमपेट गांव; हैदराबाद से करीब 200 किलोमीटर उत्तर-पूर्व
निर्माण1213 ईस्वी में शुरू; शिलालेख में दर्ज दान की तारीख रविवार, 31 मार्च 1213 बैठती है
बनवाने वालेरेचर्ला रुद्र (UNESCO की वर्तनी में Recharla), काकतीय राजा गणपतिदेव के सेनापति
सामग्रीबलुआ पत्थर का मंदिर, जिसके स्तंभ, शहतीर और मूर्तियां ग्रेनाइट और डोलेराइट की हैं; हल्की “तैरती ईंटों” से बना विमान
UNESCO दर्जा25 जुलाई 2021 को विस्तारित 44वें सत्र में मानदंड (i) और (iii) के तहत शामिल; भारत का 39वां विश्व धरोहर स्थल
संरक्षण1914 से संरक्षित स्मारक; AMASR अधिनियम, 1958 के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के हैदराबाद मंडल की देखरेख में
क्षेत्रफल2025 में सीमा बदलने के बाद, 66.27 हेक्टेयर के बफर जोन के भीतर 7.84 हेक्टेयर की मुख्य संपत्ति

एक बात ध्यान से समझिए। शिलालेख 1213 में देवता को दिए गए दान को दर्ज करता है, और UNESCO उसी साल को काम की शुरुआत मानता है। मंदिर में देवता की स्थापना हो सकती है और उसे दान भी मिल सकता है, जबकि आसपास नक्काशी का काम चलता रहे। इसलिए इन दोनों बातों में कोई टकराव नहीं है।

रामप्पा मंदिर किसने बनवाया, और कब

रामप्पा मंदिर रेचर्ला रुद्र ने बनवाया था, जो काकतीय राजा गणपतिदेव की सेवा में एक सेनापति थे। इसका सबूत है मंदिर परिसर के एक स्तंभ पर खुदा संस्कृत का एक लंबा शिलालेख।

पालमपेट का स्तंभ शिलालेख

दिसंबर 1916 में पुरातत्वविद गुलाम यजदानी ने पालमपेट के शिलालेखों की स्याही से कागज पर छापें लीं। ब्रिटिश म्यूजियम के एल. डी. बार्नेट ने उनका संपादन किया। फिर निजाम की सरकार ने 1919 में उन्हें हैदराबाद आर्कियोलॉजिकल सीरीज (Hyderabad Archaeological Series) के अंक 3 के रूप में छापा। स्तंभ शिलालेख का बार्नेट वाला सार पढ़ें, तो लगता है जैसे किसी परिवार का इतिहास हो, जिसके साथ निर्माण कामों की पूरी सूची नत्थी हो:

बार्नेट ने इस तिथि का हिसाब रविवार, 31 मार्च 1213 निकाला, और आर. सीवेल ने इस गणना की जांच की। हर जगह जो 1213 आप देखते हैं, उसका स्रोत यही है। 1919 का यह खंड नगर और मंदिर वाले श्लोकों को पुराने पालमपेट से जोड़कर पढ़ता है।

नाम रुद्रेश्वर क्यों, और रामप्पा क्यों

आधिकारिक नाम असल में एक दस्तखत है। बार्नेट की टिप्पणी कहती है कि रुद्रेश्वर नाम खुद रुद्र की याद में रखा गया। इसी रिकॉर्ड में दो और साथी मंदिर उनके पुरखों के सम्मान में हैं। काटेश्वर उनके पिता और परदादा की याद में है, जिन दोनों का नाम काटय था, और कामेश्वर उनके दादा काम की याद में। देवता पर सेनापति का नाम है, ठीक वैसे ही जैसे किसी अस्पताल के एक हिस्से पर दान देने वाले का नाम लिखा होता है।

लोकप्रिय नाम एक परंपरा से आया है। पत्र सूचना कार्यालय (PIB) की 2021 की विज्ञप्ति और भारत का नामांकन, दोनों कहते हैं कि मंदिर का नाम इसके मुख्य मूर्तिकार रामप्पा के नाम पर पड़ा। PIB यह भी जोड़ता है कि उन्होंने इस पर 40 साल काम किया। लेकिन बार्नेट के संपादित शिलालेख में किसी रामप्पा का जिक्र ही नहीं है। तो आधिकारिक नाम संरक्षक को याद करता है, और लोकप्रिय नाम कारीगर को।

भारत का नामांकन काकतीयों को तेलुगु भाषी दक्कन में कल्याणी के चालुक्यों का राजनीतिक उत्तराधिकारी बताता है, और उनकी मंदिर शैली को इसी विरासत से जोड़ता है। काकतीय वंश वाला नोट इसके शासकों का ब्योरा देता है, और चालुक्य वंश वाला नोट कल्याणी शाखा को समझाता है। यह राज्य करीब 1323 में खत्म हुआ, जब दिल्ली सल्तनत की फौजों ने आखिरी काकतीय राजा प्रतापरुद्र को बंदी बना लिया।

रामप्पा में काकतीय वास्तुकला, झील से विमान तक

रामप्पा में काकतीय वास्तुकला चालुक्यों से मिली दक्कनी मंदिर योजना को अपनाती है। फिर उसे सोच-समझकर चुनी गई स्थानीय सामग्री से बनाती है, और एक ऐसे जलाशय के किनारे खड़ा करती है जो खेतों को पानी देता था। इसे समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि आप इसे उसी क्रम में देखिए, जिस क्रम में एक यात्री इसे देखता है।

परिवेश: तालाब, बस्ती और मंदिर

शुरुआत पानी से कीजिए। UNESCO कहता है कि रामप्पा चेरुवु के पास और जंगल वाली पहाड़ियों की तलहटी में जगह का चुनाव उन धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक हुआ, जो चाहते हैं कि मंदिर अपने प्राकृतिक परिवेश का हिस्सा बने। अक्टूबर 2024 और अक्टूबर 2025 में पालमपेट में UNESCO विश्व धरोहर स्वयंसेवक (World Heritage Volunteers) शिविर लगे। ये शिविर यही विचार “तालाब, बस्ती और मंदिर” (Tank, Township and Temple) के नाम से सिखाते हैं: एक जलाशय जो बस्ती के खेतों को पानी देता है, और उसके बीच में मंदिर।

शिलालेख भी इससे मेल खाता है। उसका कवि रुद्र के तालाब पर कई श्लोक लिखता है। वह तालाब “सागर की तरह खड़ा है” और नगर के लिए दर्पण का काम करता है। अगर 1919 में इन श्लोकों को पालमपेट से जोड़कर पढ़ना सही है, तो बहुत मुमकिन है कि वही तालाब आज का रामप्पा चेरुवु हो। यह एक अनुमान है, शिलालेख में लिखी बात नहीं। लेकिन इससे समझ आता है कि UNESCO बार-बार क्यों कहता है कि मंदिर के साथ झील और उसकी नहरों को भी बचाया जाए।

चबूतरा और मंडप

चारदीवारी के भीतर मंदिर एक तारे के आकार के, करीब 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है, जैसा PIB बताता है। भारत का नामांकन कहता है कि यह तारानुमा योजना (stellate plan) काकतीयों को चालुक्य वास्तुकारों से मिली। चबूतरे पर सांचे में ढला आधार, यानी अधिष्ठान, करीब 10 फुट चौड़ा है। यही प्रदक्षिणापथ का काम करता है, यानी गर्भगृह के चारों ओर घड़ी की सुई की दिशा में घूमने का रास्ता।

पहला कक्ष सभा मंडप है, यानी बीच का ढका हुआ हॉल। UNESCO का 2021 का फैसला इसके ये उपयोग गिनाता है:

हॉल के किनारे-किनारे एक कक्षासन चलता है। यह पत्थर की बेंच है, जिसकी पीठ ढलान वाली है, और UNESCO खास तौर पर इसकी नक्काशी का जिक्र करता है। मशहूर ब्रैकेट आकृतियां इसी हॉल के बाहरी हिस्से पर लगी हैं।

गर्भगृह और ईंटों का विमान

हॉल से आप अर्ध मंडप, यानी एक छोटे आधे हॉल से होकर गर्भगृह में पहुंचते हैं। यही रामलिंगेश्वर का “गर्भ कक्ष” है। इसके ऊपर विमान, यानी शिखर, उठता है, जो पिरामिड जैसा है और आड़ी परतों में सीढ़ीदार है। नामांकन कहता है कि इसका वेसर रूप, यानी उत्तरी और दक्षिणी शिखर शैलियों का दक्कनी मेल, चालुक्यों से आया। भारत में मंदिर वास्तुकला का परिचय इन शब्दों को समझाता है, और द्रविड़ मंदिर वास्तुकला वाला नोट वह दक्षिणी सीढ़ीदार शिखर दिखाता है, जिससे वेसर शैली उधार लेती है।

UNESCO का रिकॉर्ड पांच स्थानीय सामग्रियां गिनाता है, और हर एक को अलग काम सौंपा गया है:

यहां काकतीय वास्तुकला का असली सबक काम का यही बंटवारा है। जहां भार उठाना है और बारीक नक्काशी करनी है, वहां कठोर पत्थर लगा। और जहां ऊंचाई बढ़ाने से वजन भी बढ़ जाता, वहां हल्की ईंट लगी।

तैरती ईंटें और सैंडबॉक्स नींव: रिकॉर्ड क्या कहता है

UNESCO का बयान दो दावे करता है। पहला, विमान हल्की, छिद्रों वाली ईंटों से बना है, “जिन्हें तैरती ईंटें कहा जाता है”, और इनसे छत के ढांचों का वजन कम हुआ। दूसरा, मंदिर एक सैंडबॉक्स नींव (sandbox foundation) पर टिका है, यानी रेत से भरी नींव पर। उसका मानदंड (i) इन दोनों को, सामग्री के सोचे-समझे चुनाव के साथ, भार घटाने और मंदिर को भूकंप-रोधी बनाने का श्रेय देता है।

हल्का विमान क्यों मायने रखता है? हल्की ईंटें वैसे ही काम करती हैं, जैसे उन्हीं कंधों पर एक हल्का स्कूल बैग। नीचे के ढांचे को कम वजन उठाना पड़ता है, और यह हर दिन, 800 साल से चल रहा है। लेकिन यह तुलना वजन पर ही रुक जाती है। बैग को जमीन का हिलना नहीं झेलना पड़ता, और नामांकन यही काम नीचे की रेत को सौंपता है।

तो रिकॉर्ड को बाद में जोड़ी गई बातों से अलग कीजिए। UNESCO विमान में हल्की, छिद्रों वाली ईंटों की और नींव में रेत की पुष्टि करता है। भूकंप झेलने की क्षमता नामांकन का इंजीनियरिंग दावा है, जिसे UNESCO का बयान बिना कोई परीक्षण छापे अपना लेता है। बाल्टी भर पानी में तैरती ईंटें और रेत के मिश्रण के सटीक नुस्खे UNESCO के बयान में हैं ही नहीं। इसलिए समझदारी यही है कि आप “तैरती कही जाने वाली ईंटें” और “रेत भरी नींव” लिखिए, और वहीं रुक जाइए।

संरक्षण के काम ने इन दोनों खूबियों को छुआ है। UNESCO दर्ज करता है कि कुछ गायब तैरती ईंटें एक विस्तृत अध्ययन के बाद दोबारा बनाई गईं, और इसके लिए काकतीय कारीगरों की अपनी 13वीं सदी की तकनीकें अपनाई गईं। नामांकन यह भी बताता है कि करीब एक सदी पहले कार्निस, यानी बाहर निकले छज्जे, को गिरने से रोकने के लिए सहारे वाले स्तंभ लगाए गए। यह बाद की मरम्मत है, काकतीय काम नहीं।

मदनिकाएं और नाचता पत्थर

मंदिर की सबसे ज्यादा सराही गई मूर्तियां इसकी ब्रैकेट आकृतियां हैं। इनमें सबसे आगे हैं मदनिकाएं, यानी हॉल की बाहरी दीवार पर ब्रैकेट के रूप में लगी सुंदर स्त्री आकृतियां। UNESCO का 2021 का फैसला छह फुट की करीब 40 ब्रैकेट आकृतियां गिनता है, जिनमें मदनिकाएं और गज-व्याल दोनों शामिल हैं। साथ ही करीब छह इंच ऊंची लगभग 600 उभरी हुई मूर्तियां भी गिनाता है। गज-व्याल में व्याल, यानी पिछले पैरों पर खड़ा एक पौराणिक जानवर, गज, यानी हाथी, के साथ दिखाया जाता है।

इन्हें खास बनाता है इनका पत्थर। ये डोलेराइट में तराशी गई हैं, जिसे UNESCO सबसे कठोर चट्टानों में से एक बताता है। इन्हें घिसकर धातु जैसी चमक दी गई है, और वह चमक आज भी बनी हुई है। कर्नाटक के होयसल कारीगर ज्यादातर क्लोराइटिक शिस्ट में काम करते थे। यह एक तरह का सोपस्टोन है, जो खदान से ताजा निकलने पर नरम होता है, जैसा होयसल मंदिर वाला नोट समझाता है। रामप्पा में वैसी ही बारीकी इससे कहीं ज्यादा कठोर चट्टान से निकाली गई।

ये आकृतियां प्रदर्शन कलाओं का भी रिकॉर्ड हैं। UNESCO कहता है कि ये इलाके की नृत्य परंपराओं को दिखाती हैं। भारत के नामांकन के मुताबिक नृत्त रत्नावली नाम का नृत्य ग्रंथ 1253 का है, उसे सेनानायक जय सेनापति ने लिखा, और उसने यहां तराशी गई नर्तकियों से प्रेरणा ली। यह जुड़ाव नामांकन की अपनी व्याख्या है। शिलालेख दिखाता है कि संरक्षक के लिए भी प्रदर्शन कला मायने रखती थी, क्योंकि रुद्र ने वारंगल के अपने रुद्रेश्वर को “नाट्य प्रदर्शनों” के लिए एक गांव दान किया था, जैसा बार्नेट के अनुवाद में लिखा है।

यही शिलालेख श्लोक 37 और 38 में नए नगर का वर्णन उसकी आवाजों के सहारे करता है:

इन पंक्तियों को पत्थर की नर्तकियों के बगल में रखिए। तब आपके पास एक काकतीय नगर की तारीख वाली लिखित तस्वीर होगी, और उसके ठीक बगल में उसकी तराशी हुई तस्वीर।

क्या मार्को पोलो ने रामप्पा मंदिर की तारीफ की थी?

बचे हुए किसी भी पाठ से यह साबित नहीं होता। मार्को पोलो का अध्याय “मुतफिली राज्य के बारे में” काकतीय राज्य पर है। उनके मानक अंग्रेजी संपादक हेनरी यूल ने इस राज्य की पहचान इसके बंदरगाह मोटुपल्ली के जरिए की। यह अध्याय एक रानी की तारीफ करता है, जिसने पति की मौत के बाद करीब 40 साल अच्छा राज किया। यूल इस रानी को रुद्रमादेवी मानते हैं। बाकी अध्याय राज्य के हीरों के बारे में है, जो उकाबों की एक पुरानी कहानी के सहारे बताए गए हैं, और वहां के महीन कपड़े के बारे में। इसमें किसी मंदिर का जिक्र नहीं है।

आम तौर पर उनके नाम से जोड़ी जाने वाली पंक्ति रामप्पा को “दक्कन के मध्यकालीन मंदिरों की आकाशगंगा का सबसे चमकीला तारा” कहती है। यह पंक्ति PIB की 2021 की विज्ञप्ति में मिलती है, और वहां इसका श्रेय सिर्फ एक अनाम यूरोपीय यात्री को दिया गया है। इसे इस्तेमाल करना हो, तो बाद के एक वर्णन के तौर पर कीजिए, मार्को पोलो के शब्दों के तौर पर कभी नहीं। मार्को पोलो आपके रुद्रमादेवी वाले नोट्स में आते हैं, इस मंदिर वाले नोट्स में नहीं।

रामप्पा मंदिर का UNESCO दर्जा और आज का संरक्षण

रामप्पा मंदिर 25 जुलाई 2021 से विश्व धरोहर स्थल है। उस दिन विश्व धरोहर समिति ने अपने विस्तारित 44वें सत्र में इसे सूची में शामिल किया। PIB बताता है कि महामारी की वजह से 2020 और 2021 के नामांकनों पर ऑनलाइन बैठकों में विचार हुआ, जिनकी अध्यक्षता चीन के पास थी, और रामप्पा भारत का 39वां विश्व धरोहर स्थल बना। UNESCO की सूची दो मानदंडों का नाम लेती है। आसान शब्दों में इनका मतलब है:

पूरी सूची के लिए भारत के UNESCO विश्व धरोहर स्थलों वाला राउंडअप देखिए।

सुरक्षा दो स्तरों पर काम करती है। UNESCO दर्ज करता है कि मंदिर को 1914 में संरक्षित स्मारक घोषित किया गया, और तब से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसका संरक्षण कर रहा है। आज यह काम उसके हैदराबाद मंडल और वारंगल उप-मंडल के जरिए होता है। AMASR अधिनियम, 1958 (Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act), यानी प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों को बचाने वाले कानून के तहत, मंदिर के चारों ओर 100 मीटर का प्रतिबंधित क्षेत्र है, और उसके आगे 200 मीटर का विनियमित क्षेत्र। बड़े इलाके के लिए तेलंगाना ने पालमपेट विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण बनाया है।

सूची में शामिल होने के बाद से बहस इस पर रही है कि परिवेश का कितना हिस्सा बचाया जाए:

इन अधिसूचनाओं से दो पड़ोसी काकतीय मंदिर उसी केंद्रीय कानून के दायरे में आ गए हैं, जिसके तहत रामप्पा है। वे आगे चलकर UNESCO की किसी सीमा में आएंगे या नहीं, यह सवाल अभी खुला है। पांच साल बाद मंदिर सुरक्षित है, और अधूरा सवाल उसके परिवेश का है।

परीक्षा के लिए रामप्पा मंदिर कैसे पढ़ें

रामप्पा मंदिर सिलेबस के तीन हिस्सों में आता है:

मुख्य परीक्षा 2022, GS पेपर I में पूछा गया था: “आप यह कैसे स्पष्ट करेंगे कि मध्यकालीन भारतीय मंदिरों की मूर्तियां उस समय के सामाजिक जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं?” रामप्पा आपको इस उत्तर के दोनों हिस्से देता है: पत्थर में नर्तक और संगीतकार, और उनके आसपास के नगर का वर्णन करने वाला तारीख सहित शिलालेख।

क्षेत्रीय शैलियों पर सीधे सवाल भी आते हैं। इतिहास वैकल्पिक विषय 2026, पेपर I में उम्मीदवारों से इस दावे को उदाहरण देकर समझाने को कहा गया कि “होयसल मंदिर वास्तुकला दक्षिण भारतीय कला और वास्तुकला के विकास में एक विशिष्ट और नवोन्मेषी चरण है”। रामप्पा इसका स्वाभाविक काकतीय जोड़ीदार है। प्रीलिम्स की तरफ देखें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 सवालों में से 94 पर कला और संस्कृति का टैग है।

इन्हें तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएं:

ये गलतफहमियां नंबर कटवाती हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग रखिए:

रामप्पा को दक्कन के दूसरे धरोहर स्थलों के साथ रखकर देखना भी मदद करता है:

स्थलवंश और कालक्या याद रखेंUNESCO दर्जा
रामप्पा (रुद्रेश्वर) मंदिर, तेलंगानाकाकतीय; 1213 में शुरूईंटों का विमान, सैंडबॉक्स नींव, डोलेराइट मदनिकाएंविश्व धरोहर, 2021; मानदंड (i) और (iii)
होयसलों के पवित्र मंदिर समूह, कर्नाटकहोयसल; 12वीं से 13वीं सदीऊंचे चबूतरों पर तारानुमा योजनाएं, सोपस्टोन की नक्काशीविश्व धरोहर, 2023; मानदंड (i), (ii) और (iv)
पट्टदकल, कर्नाटकबादामी चालुक्य; 8वीं सदीनागर और द्रविड़ शैली के मंदिर एक साथविश्व धरोहर, 1987
गोलकोंडा किला, तेलंगानाकाकतीय दौर का मिट्टी का किला, जिसे कुतुबशाहियों ने दोबारा बनवायाचारदीवारी वाले नगर के ऊपर ग्रेनाइट का गढ़सिर्फ अस्थायी सूची (Tentative List) में

रामप्पा मंदिर उस अभ्यर्थी को फायदा देता है, जो इसके नाम आपस में उलझने नहीं देता। गणपतिदेव राजा थे, रुद्र वह सेनापति थे जिन्होंने इसका खर्च उठाया, और रामप्पा वह मूर्तिकार हैं जिनका नाम चल पड़ा। इसमें UNESCO के अपने सधे हुए शब्दों में तैरती ईंटें जोड़ दीजिए। फिर यह एक मंदिर काकतीय कला और इंजीनियरिंग पर एक कसा हुआ उत्तर बन जाता है। साथ ही यह भी बताता है कि सूची में शामिल होने के बाद विश्व धरोहर का दर्जा किसी देश से क्या मांगता है।

सामान्य प्रश्न

रामप्पा मंदिर किसने बनवाया?

रामप्पा मंदिर काकतीय राजा गणपतिदेव के सेनापति रेचर्ला रुद्र ने बनवाया था। मंदिर परिसर में एक स्तंभ पर खुदा शिलालेख उनके बनवाए निर्माणों को दर्ज करता है। यह देवता रुद्रेश्वर को दिए गए एक दान की तारीख शक संवत 1135 बताता है, जो 31 मार्च 1213 बैठती है। UNESCO 1213 को ही निर्माण शुरू होने का साल मानता है।

इसे रामप्पा मंदिर क्यों कहते हैं?

परंपरा के मुताबिक मंदिर का नाम इसके मुख्य मूर्तिकार रामप्पा के नाम पर है, और PIB और भारत का UNESCO नामांकन, दोनों यही बात दोहराते हैं। लेकिन 1213 का शिलालेख उनका नाम नहीं लेता। इसका आधिकारिक नाम रुद्रेश्वर देवता से आता है, और देवता का यह नाम संरक्षक रुद्र की याद में रखा गया है।

रामप्पा मंदिर UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब बना?

इसे 25 जुलाई 2021 को विश्व धरोहर समिति के विस्तारित 44वें सत्र में, मानदंड (i) और (iii) के तहत सूची में शामिल किया गया। यह भारत का 39वां विश्व धरोहर स्थल बना। UNESCO इसे काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर, तेलंगाना के नाम से दर्ज करता है।

रामप्पा मंदिर की तैरती ईंटें क्या हैं?

ये हल्की, छिद्रों वाली ईंटें हैं, जिनसे मंदिर का पिरामिड जैसा विमान बना है, और इनसे नीचे के ढांचे पर पड़ने वाला वजन कम हुआ। UNESCO इन्हें "तैरती कही जाने वाली ईंटें" कहता है, और रेत भरी नींव के साथ इन्हें मंदिर को भूकंप-रोधी बनाने में मददगार मानता है। यह आम दावा कि ये पानी पर तैरती हैं, UNESCO के बयान का हिस्सा नहीं है।

रामप्पा मंदिर कहां है?

रामप्पा मंदिर तेलंगाना के मुलुगु जिले के पालमपेट गांव में है, जो हैदराबाद से करीब 200 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। यह खेतों के बीच रामप्पा चेरुवु के पास है, जिसे UNESCO काकतीयों का बनवाया जलाशय बताता है। भारत की नामांकन फाइल समेत पुराने दस्तावेज पालमपेट को जयशंकर भूपालपल्ली जिले में बताते हैं।

रामप्पा मंदिर की मदनिकाएं क्या हैं?

मदनिकाएं सुंदर स्त्री आकृतियां हैं, जो मंदिर के हॉल के बाहरी हिस्से पर ब्रैकेट के रूप में तराशी गई हैं। रामप्पा में ये कठोर डोलेराइट में काटी गई हैं और घिसकर धातु जैसी चमक तक लाई गई हैं, और इनमें से कई नृत्य मुद्राओं में हैं। UNESCO इन्हें उन नक्काशियों में गिनता है, जो उसके मानदंड (iii) पर खरी उतरती हैं।

क्या मार्को पोलो रामप्पा मंदिर आए थे?

इसका कोई सबूत नहीं है। मुतफिली राज्य पर उनका अध्याय, जिसे उनके संपादक हेनरी यूल ने काकतीय राज्य माना, उसकी रानी की तारीफ करता है और उसके हीरों और कपड़े का वर्णन करता है, लेकिन किसी मंदिर का जिक्र नहीं करता। रामप्पा को दक्कन के मंदिरों में सबसे चमकीला तारा कहने वाली पंक्ति का श्रेय PIB सिर्फ एक अनाम यात्री को देता है।

क्या हजार स्तंभ मंदिर UNESCO स्थल का हिस्सा है?

नहीं। भारत के नामांकन ने हनमकोंडा के हजार स्तंभ मंदिर और वारंगल के तोरण द्वारों की काकतीय उत्कृष्ट कृतियों के रूप में तारीफ की थी, लेकिन सूची में सिर्फ रामप्पा मंदिर शामिल हुआ। बाकी काकतीय स्मारक विश्व धरोहर स्थल नहीं हैं।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. रामप्पा मंदिर के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका स्तंभ शिलालेख शक संवत 1135 के एक दान को दर्ज करता है, जो 1213 ईस्वी बैठता है।
2. इसे काकतीय राजा रुद्रदेव ने बनवाया था।
3. इसे मानदंड (i) और (iii) के तहत विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (b) मंदिर बनवाने वाले रेचर्ला रुद्र थे, जो काकतीय राजा गणपतिदेव के सेनापति थे, खुद राजा नहीं।

2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रामप्पा मंदिर की हल्की तैरती ईंटें इसके विमान में लगाई गई थीं।
2. रामप्पा मंदिर की ब्रैकेट आकृतियां क्लोराइटिक शिस्ट में तराशी गई हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (a) ब्रैकेट डोलेराइट में तराशे गए हैं; क्लोराइटिक शिस्ट होयसल कारीगरों का पत्थर है।

3. पालमपेट के रुद्रेश्वर मंदिर के लिए आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला नाम ‘रामप्पा’ किसकी ओर इशारा करता है?

उत्तर: (c) लोकप्रिय नाम मूर्तिकार को दर्ज करता है, जबकि आधिकारिक नाम रुद्रेश्वर संरक्षक रुद्र की याद में है।

4. निम्नलिखित में से कौन-सा काकतीय स्मारक UNESCO विश्व धरोहर स्थल है?

उत्तर: (c) सूची में 2021 में सिर्फ रामप्पा मंदिर शामिल हुआ, हालांकि नामांकन ने बाकी दोनों की भी तारीफ की थी।

5. मुतफिली राज्य के बारे में मार्को पोलो के विवरण से जुड़े निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हेनरी यूल ने मुतफिली की पहचान काकतीय राज्य से की।
2. यह विवरण एक रानी की तारीफ करता है, जिसने पति की मौत के बाद राज किया।
3. यह विवरण रामप्पा मंदिर को दक्कन के मंदिरों में सबसे चमकीला तारा बताता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (a) अध्याय में रानी, हीरों और कपड़े का जिक्र है, लेकिन किसी मंदिर का नहीं।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. भारतीय कला विरासत की रक्षा करना इस समय की आवश्यकता है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।
  2. रामप्पा मंदिर को जितनी मान्यता उसकी कला के लिए मिली, उतनी ही उसकी इंजीनियरिंग के लिए भी। इसकी नींव, सामग्री और विमान के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  3. रामप्पा मंदिर का शिलालेख और इसकी मूर्तियां काकतीय समाज की तस्वीर दोबारा खड़ी करने में इतिहासकारों की कैसे मदद करती हैं? (15 अंक, 250 शब्द)
  4. विश्व धरोहर का दर्जा सुरक्षा भी लाता है और पर्यटन का दबाव भी। रामप्पा मंदिर और उसके परिवेश के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  5. रामप्पा मंदिर की ब्रैकेट आकृतियों की तुलना होयसल मंदिरों की ब्रैकेट आकृतियों से सामग्री, तकनीक और विषय के आधार पर कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)