रियासतों का एकीकरण: विलय पत्र, पूर्ण विलय और तीन मुश्किल मामले
रियासतों का एकीकरण: पटेल और वी. पी. मेनन 1947 के विलय पत्र से पूर्ण विलय तक कैसे पहुँचे, भाग B राज्य क्या थे और प्रिवी पर्स कैसे खत्म हुए।
रियासतों का एकीकरण वह प्रक्रिया थी जिसके जरिए 1947 से 1950 के बीच 550 से ज्यादा रजवाड़े भारतीय संघ का हिस्सा बने। इन रजवाड़ों पर अंग्रेज सीधे नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से राज करते थे। यह पूरा काम रियासत विभाग (स्टेट्स डिपार्टमेंट) के जरिए हुआ, जो जुलाई 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल के तहत बना और वी. पी. मेनन इसके सचिव थे। यह विषय इसलिए अहम है क्योंकि ये रियासतें ब्रिटिश भारत के लगभग एक-तिहाई भूभाग पर फैली थीं और हर चार में से एक भारतीय इन्हीं में रहता था। इनके बिना नया देश ऐसा नक्शा होता जिसमें जगह-जगह छेद हों।
ज्यादातर लोगों के मन में इसकी एक ही तस्वीर है: अगस्त 1947 में राजाओं ने एक कागज पर दस्तखत किए और काम पूरा हो गया। असल में वह दस्तखत सिर्फ पहला आधा हिस्सा था। विलय पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) ने केवल तीन विषय सौंपे थे। रियासतों को पूरी तरह मिलाने, निजी शासन खत्म करने और राजाओं के भत्ते तय करने का ज्यादा मुश्किल काम 1950 तक चला, और उसका संवैधानिक सिरा 1971 तक पहुँचा। यह नोट दोनों चरणों को अलग-अलग करके समझाता है, मुश्किल मामलों को एक-एक करके देखता है और बताता है कि स्रोत असल में किन बातों पर सहमत हैं।
रियासतों का एकीकरण क्या था?
यह दो चरणों वाला समझौता था। पहले चरण में शासक भारत में शामिल हुए, यानी उन्होंने केंद्र को तीन विषय सौंपे। इसे एक्सेशन यानी शामिल होना कहते हैं। दूसरे चरण में उनकी रियासतों को प्रांतों में मिलाया गया, समूहों में जोड़ा गया या केंद्र ने सीधे अपने हाथ में ले लिया। इसे मर्जर यानी पूर्ण विलय कहते हैं। आखिर में 550 से ज्यादा इकाइयों वाला पुराना नक्शा घटकर 14 प्रशासनिक इकाइयों पर आ गया और संविधान के ढाँचे में बैठ गया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| रियासतों की संख्या | 565 (NCERT); 562 (नेहरू, मेनन के हवाले से); 554 (मेनन की अपनी कामकाजी गिनती) |
| ब्रिटिश भारत में हिस्सा | लगभग एक-तिहाई भूभाग और हर चार में से एक भारतीय (NCERT) |
| कानूनी आधार | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की धारा 7: रियासतों पर क्राउन का प्रभुत्व 15 अगस्त 1947 को खत्म हो गया |
| तंत्र | रियासत विभाग; मेनन ने 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के तहत कार्यभार संभाला |
| चरण 1: शामिल होना | विलय पत्र (रक्षा, विदेश मामले, संचार) और साथ में यथास्थिति समझौता, ज्यादातर पर 15 अगस्त 1947 तक दस्तखत हो गए |
| चरण 2: पूर्ण विलय | 216 रियासतें प्रांतों में मिलीं, 310 को छह संघों में जोड़ा गया, 26 को केंद्र ने चलाया (मेनन) |
| मुश्किल मामले | जूनागढ़, हैदराबाद, जम्मू और कश्मीर, और बाद में मणिपुर |
| संवैधानिक पड़ाव | 1950 में आठ भाग B राज्य, जिनके प्रमुख राजप्रमुख थे; यह श्रेणी 1956 में खत्म हुई |
| प्रिवी पर्स | कुल 580 लाख रुपये सालाना, मेनन के उद्धृत श्वेत पत्र के अनुसार; 26वें संशोधन, 1971 से खत्म |
1947 में रियासतों के पास विकल्प क्यों था?
उनके पास विकल्प इसलिए था क्योंकि सर्वोच्चता (पैरामाउंटसी), यानी रियासतों पर ब्रिटिश क्राउन का सबसे ऊपर वाला अधिकार, भारत को सौंपी ही नहीं गई। वह बस खत्म हो गई। रियासतें कंपनी की सहायक संधि व्यवस्था के समय से चली आ रही संधियों के जरिए ब्रिटेन से बँधी थीं। 1858 के बाद क्राउन ने उन्हें अपने राज्य में मिलाना बंद कर दिया था। इसीलिए व्यपगत का सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) 1857 से पहले की कहानी है, इस कहानी का हिस्सा नहीं।
1946 के कैबिनेट मिशन ने पहले ही कह दिया था कि सर्वोच्चता किसी उत्तराधिकारी सरकार को नहीं मिलेगी। जून 1947 की योजना ने इस बात की पुष्टि की, जिसकी चर्चा माउंटबेटन योजना वाले नोट में है। फिर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की धारा 7 ने इसे कानून बना दिया। तय दिन पर रियासतों पर क्राउन का प्रभुत्व खत्म हो जाना था, और उसके साथ सारी संधियाँ भी।
सिद्धांत में अब हर शासक भारत में शामिल हो सकता था, पाकिस्तान में जा सकता था या स्वतंत्र रह सकता था। लेकिन व्यवहार में भूगोल ने इनमें से ज्यादातर रास्ते बंद कर दिए। NCERT दर्ज करता है कि हैदराबाद ने स्वतंत्र रहने का ऐलान किया और भोपाल के नवाब संविधान सभा में शामिल होने के खिलाफ थे। 1956 में पीछे मुड़कर देखते हुए मेनन ने एक ऐसी बात कही जो ज्यादातर पाठकों को चौंकाती है। उनके मुताबिक सर्वोच्चता खत्म होने से भारत को फायदा हुआ, क्योंकि इससे नई सरकार हर ब्रिटिश संधि की जिम्मेदारी विरासत में लेने के बजाय “साफ स्लेट पर लिख” सकी।
विलय पत्र कैसे काम करता था?
विलय पत्र एक छोटा कानूनी दस्तावेज था। इसके जरिए शासक तीन विषय भारत डोमिनियन को सौंपता था: रक्षा, विदेश मामले और संचार। बाकी सब कुछ, जिसमें अंदरूनी प्रशासन और टैक्स भी शामिल थे, शासक के पास ही रहा।
इसे ऐसे समझिए: मकान मालिक ने घर के तीन कमरे किराये पर दे दिए और बाकी घर अपने पास रखा। 1947 के लिए यह उपमा ठीक बैठती है, लेकिन जल्द ही टूट जाती है। दो साल के भीतर लगभग हर मालिक ने पूरा घर ही बेच दिया था।
दो दस्तावेज साथ-साथ चले:
- विलय पत्र ने भारत को तीन विषयों पर कानूनी अधिकार दिया। मेनन दर्ज करते हैं कि जिन शासकों ने इसमें शर्तें जोड़ीं, उनसे कहा गया कि यह बिना शर्त ही होगा, और उन्होंने बात मान ली।
- यथास्थिति समझौता (स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट) सीमा शुल्क, रेलवे, डाक और ऐसी ही बाकी व्यवस्थाओं को बिना बदलाव चालू रखता था, जब तक ब्योरे तय हो रहे थे।
- आखिरी तारीख 15 अगस्त 1947 थी। क्राउन प्रतिनिधि के तौर पर माउंटबेटन ने 25 जुलाई 1947 को शासकों को संबोधित किया और उन पर इससे पहले फैसला करने का दबाव डाला।
यह पेशकश जानबूझकर छोटी रखी गई थी। अंग्रेजों के दौर में शासक के हाथ में जो असल में था, उसमें से वह बहुत कम छोड़ रहा था, क्योंकि रक्षा और विदेश संबंध हमेशा सर्वोच्च सत्ता के पास ही रहे थे। रियासतों पर IGNOU की इकाई भी यही बात कहती है: ये वे क्षेत्र थे जिन पर रियासतों का नियंत्रण बहुत पहले खत्म हो चुका था।
तरकीब काम कर गई। मेनन दर्ज करते हैं कि 15 अगस्त तक भारत से भौगोलिक रूप से सटी हर रियासत ने दोनों दस्तावेजों पर दस्तखत कर दिए थे। तीन अपवाद थे: जूनागढ़ और मुस्लिम शासकों वाली काठियावाड़ की दो छोटी रियासतें। हैदराबाद को बातचीत के लिए दो महीने और दिए गए। और कश्मीर से, मेनन के मुताबिक, रियासत मंत्रालय ने संपर्क ही नहीं किया था।
शामिल होने से पूर्ण विलय तक: दूसरा चरण
विलय पत्र रियासतों को भारत के भीतर ले आया, लेकिन पूर्ण विलय ने उनमें से ज्यादातर का अलग वजूद ही खत्म कर दिया। 1947 के आखिर से 1950 के बीच रियासत मंत्रालय ने सैकड़ों छोटे रजवाड़ों की जगह प्रांत, नए संघ और केंद्र के सीधे शासन वाले क्षेत्र बना दिए। शासकों ने विलय समझौतों या अनुबंधों (कॉवेनेंट) पर दस्तखत किए। इनमें उन्होंने शासन की अपनी ताकत छोड़ दी, और बदले में उन्हें प्रिवी पर्स और अपनी निजी उपाधियाँ मिलीं।
आँकड़े बताते हैं कि यह क्यों जरूरी था। मेनन लिखते हैं कि 554 रियासतों में से 450 से ज्यादा की सालाना आमदनी 15 लाख रुपये से कम थी। इतनी आमदनी में अपने दम पर आधुनिक प्रशासन चलाना मुमकिन नहीं था। NCERT इस बिखराव की झलक देता है: आज के ओडिशा में 26 छोटी रियासतें थीं, और सौराष्ट्र इलाके में 14 बड़ी रियासतें, 119 छोटी रियासतें और कई दूसरी इकाइयाँ भी थीं।
प्रशासनिक एकीकरण वाले अपने अध्याय में मेनन की अंतिम गिनती इस तरह है:
- 216 रियासतें उन प्रांतों में मिला दी गईं जिनके भीतर वे थीं या जिनसे उनकी सीमा लगती थी। जैसे उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की रियासतें, और दक्कन और गुजरात की वे रियासतें जो बंबई में गईं।
- 310 रियासतों को छह संघों में जोड़ा गया: सौराष्ट्र, मध्य भारत, PEPSU (पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ), राजस्थान, त्रावणकोर-कोचीन और विंध्य प्रदेश। विंध्य प्रदेश को बाद में केंद्र प्रशासित क्षेत्र बना दिया गया।
- 26 रियासतें केंद्र ने अपने हाथ में लीं: 5 अलग-अलग मुख्य आयुक्त के प्रांतों के रूप में, और 21 पंजाब हिल स्टेट्स, जो मिलकर हिमाचल प्रदेश बनीं।
- 2 रियासतें, हैदराबाद और मैसूर, भौगोलिक रूप से जस की तस छोड़ दी गईं।
नतीजा यह हुआ कि 554 रियासतों की जगह 14 प्रशासनिक इकाइयाँ बन गईं। मेनन सावधानी से इसे केवल भौतिक एकीकरण कहते हैं। उनके शब्दों में, ज्यादातर रियासतों का प्रशासन निजी और पिछड़ा हुआ था। असली मुश्किल काम उनकी पुलिस, राजस्व, अदालतों और सेवाओं को एक साँचे में ढालना था।
राजप्रमुख और भाग B राज्य
संघों को एक मुखिया चाहिए था, और जवाब निकला राजप्रमुख। राजप्रमुख एक वरिष्ठ शासक होता था जिसे संघ का संवैधानिक प्रमुख चुना जाता था, लगभग गवर्नर जैसा। उसके सहायक के तौर पर एक उपराजप्रमुख होता था। ग्वालियर के महाराजा मध्य भारत के राजप्रमुख बने, और पटियाला के महाराजा PEPSU के।
1950 के संविधान ने इस व्यवस्था को कानूनी जगह दी। उसने राज्यों को भाग A (पुराने प्रांत), भाग B और भाग C में बाँटा। मेनन आठ भाग B राज्यों की सूची देते हैं:
- तीन बड़ी रियासतें: हैदराबाद, जम्मू और कश्मीर, और मैसूर;
- पाँच संघ: मध्य भारत, PEPSU, राजस्थान, सौराष्ट्र और त्रावणकोर-कोचीन।
भोपाल, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर, त्रिपुरा और विंध्य प्रदेश भाग C में गए, जिन्हें केंद्र चलाता था। अनुच्छेद 371 ने कुछ समय के लिए भाग B की सरकारों को राष्ट्रपति के सामान्य नियंत्रण में रखा, क्योंकि उनमें से ज्यादातर के पास अभी स्थिर प्रशासन नहीं था।
तीन स्तरों वाला यह नक्शा छह साल चला। राज्य पुनर्गठन योजना के साथ पास हुए संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 ने भाग A, भाग B और भाग C की श्रेणियाँ खत्म कर दीं, और उनके साथ राजप्रमुख का पद भी चला गया। यह कहानी अनुच्छेद 3 और राज्यों के पुनर्गठन वाले नोट में आगे बढ़ती है।
मुश्किल मामले: जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर
चार रियासतें इस ढर्रे पर नहीं चलीं, और हर एक का निपटारा अलग तरीके से हुआ। इन्हें पढ़ने की पूरी वजह यही फर्क है। एक मामले में भारत ने जनता की इच्छा का तर्क दिया, दूसरे में भूगोल और कानून-व्यवस्था का, और तीसरे में शासक के दस्तखत का।
जूनागढ़
काठियावाड़ में बसे जूनागढ़ का शासक मुसलमान था, आबादी में हिंदुओं का भारी बहुमत था, और पाकिस्तान से इसकी कोई जमीनी सीमा नहीं लगती थी। इसके नवाब ने 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में शामिल होने का ऐलान किया, और पाकिस्तान ने 13 सितंबर को इसे मंजूर कर लिया। भारतीय सेना ने रियासत के भीतर घुसे बिना उसे घेर लिया। नवाब कराची चला गया, और 9 नवंबर 1947 को उसके दीवान के अनुरोध पर भारत ने प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।
इसके बाद 20 फरवरी 1948 को जनमत संग्रह हुआ। मेनन दर्ज करते हैं कि कुल 1,90,870 वोट पड़े और सिर्फ 91 पाकिस्तान के पक्ष में गए। मांगरोल और बाबरियावाड़ जैसी छोटी रियासतों समेत पूरा घटनाक्रम जूनागढ़ के विलय वाले नोट में है।
हैदराबाद
हैदराबाद सबसे बड़ी रियासत थी। यह चारों तरफ से भारतीय इलाके से घिरी थी, इसका शासक निजाम मुसलमान था और आबादी ज्यादातर हिंदू थी। निजाम आजादी चाहता था। लंबी बातचीत के बाद उसने 29 नवंबर 1947 को यथास्थिति समझौते पर दस्तखत किए। NCERT के मुताबिक यह समझौता एक साल के लिए था, ताकि इस बीच बातचीत चलती रहे। इसने भारत में शामिल हुए बिना रक्षा, विदेश मामलों और संचार की पुरानी व्यवस्थाएँ चालू रखीं।
बातचीत नाकाम रही और रियासत के भीतर हालात बिगड़ते गए। NCERT तेलंगाना में निजाम के शासन के खिलाफ किसान विद्रोह का जिक्र करता है। वह एक अर्धसैनिक बल, रजाकारों, का भी जिक्र करता है, जिसका नेता कासिम रजवी था और जिसकी हिंसा खास तौर पर गैर-मुसलमानों पर केंद्रित थी। हैदराबाद का एक प्रतिनिधिमंडल अपना मामला UN सुरक्षा परिषद में ले गया।
13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना हैदराबाद में दाखिल हुई। सरकार ने इसे पुलिस कार्रवाई कहा, और PIB इसका नाम ऑपरेशन पोलो दर्ज करता है। मेनन घटनाक्रम इस तरह बताते हैं:
- 17 सितंबर की शाम हैदराबाद की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया;
- 18 सितंबर को भारतीय सेना हैदराबाद शहर में दाखिल हुई;
- पूरा अभियान लगभग 108 घंटे चला;
- 23 सितंबर को निजाम ने सुरक्षा परिषद से अपना मामला वापस ले लिया।
नागरिक सरकार लौटने तक एक सैन्य गवर्नर ने रियासत चलाई। 23 नवंबर 1949 को निजाम ने एक फरमान जारी करके भारत का संविधान स्वीकार किया, और हैदराबाद भाग B राज्य के रूप में गणराज्य में शामिल हुआ।
जम्मू और कश्मीर
जम्मू और कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह हिंदू थे, आबादी मुस्लिम बहुल थी, और इसकी सीमा दोनों डोमिनियनों से लगती थी। महाराजा ने 15 अगस्त से पहले किसी भी डोमिनियन के विलय पत्र पर दस्तखत नहीं किए। अक्टूबर 1947 में हथियारबंद कबायली हमलावर रियासत में घुस आए और श्रीनगर की ओर बढ़े। 24 अक्टूबर को महाराजा ने भारत से सैन्य मदद की अपील की।
मेनन दर्ज करते हैं कि भारत की रक्षा समिति की बैठक के बाद वे 26 अक्टूबर को विमान से जम्मू गए, और महाराजा तुरंत भारत में शामिल होने को तैयार थे। गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र स्वीकार किया, और उसी सुबह भारतीय सैनिकों को हवाई रास्ते से श्रीनगर पहुँचाया गया।
यह विलय शुरू से ही विवाद में रहा। मेनन दर्ज करते हैं कि जिन्ना ने तर्क दिया कि यह हिंसा के जरिए कराया गया, जबकि माउंटबेटन ने जवाब दिया कि हिंसा तो हमलावरों की ओर से आई थी। नवंबर की शुरुआत में नेहरू ने ऐलान किया कि शांति और कानून का राज बहाल होने के बाद भारत संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय देखरेख में जनमत संग्रह कराने को तैयार है। बाद के संवैधानिक रिश्ते की चर्चा अनुच्छेद 370 वाले नोट में है।
मणिपुर
मणिपुर दिखाता है कि विलय पत्र से हमेशा सवाल हल नहीं हुआ। NCERT दर्ज करता है कि महाराजा बोधचंद्र सिंह ने आजादी से कुछ दिन पहले विलय पत्र पर दस्तखत किए। उन्हें भरोसा दिया गया था कि मणिपुर की अंदरूनी स्वायत्तता बनी रहेगी, और उन्होंने जून 1948 में चुनाव भी कराए। नई विधानसभा पूर्ण विलय के सवाल पर बँटी हुई थी, और भारत सरकार ने महाराजा को सितंबर 1949 में विलय समझौते पर दस्तखत करने के लिए राजी कर लिया। मेनन इसकी तारीख 21 सितंबर बताते हैं। इसके बाद मणिपुर एक भाग C राज्य बन गया, जिसे मुख्य आयुक्त चलाता था।
इतिहासकार पटेल और मेनन की भूमिका को कैसे आँकते हैं
आम फैसला यह है कि राजनीतिक ताकत पटेल की थी, जबकि योजना बनाने और भागदौड़ का काम मेनन का था। तीसरी चीज थी राजाओं के बीच माउंटबेटन की साख। अलग-अलग विवरणों में फर्क इस बात पर है कि इस उपलब्धि में कितना हिस्सा समझाने-बुझाने का था और कितना दबाव का।
NCERT कहता है कि शासकों से बातचीत में पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। वह सरकार के तरीके को कुशल समझाइश और स्वायत्तता के सवाल पर लचीलेपन का मेल बताता है। PIB उन्हें ऐसी शख्सियत मानता है जिसने 560 से ज्यादा रियासतों को एक किया, और इसीलिए सरदार पटेल और रियासतों का एकीकरण एक साथ याद किए जाते हैं। साइट पर सरदार पटेल की प्रोफाइल उनके पूरे करियर को समझाती है।
मेनन का अपना विवरण 1956 में लिखा गया था। यह एक भागीदार का लिखा इतिहास है और इसे उसी तरह पढ़ना चाहिए। विलय पत्र का मसौदा उन्होंने ही बनाया था और ज्यादातर पूर्ण विलयों की बातचीत भी खुद की थी। वे पटेल और माउंटबेटन के प्रति उदार हैं। साथ ही वे साफ मानते हैं कि 1950 में काम अधूरा था। उन्होंने लिखा कि असली एकीकरण “लोगों के मन में होना था”।
IGNOU की इकाई कम जश्न वाला नजरिया रखती है। वह कहती है कि सर्वोच्चता के जाने से जो जगह खाली हुई, उसमें केंद्र उतर आया और रियासतों के अंदरूनी मामलों में बार-बार दखल दिया। इसमें क्षेत्रीय आयुक्त भेजना, एक शासक को हिरासत में लेना, सुरक्षा के आधार पर कच्छ, त्रिपुरा और मणिपुर को सीधे अपने नियंत्रण में लेना और जूनागढ़ की नाकेबंदी करना शामिल था। उसका यह भी तर्क है कि रजवाड़ों की व्यवस्था जितनी भारतीय दबाव से गिरी, उतनी ही इस वजह से भी कि अंग्रेजों ने अपने साथियों को बीच रास्ते छोड़ दिया।
ये नजरिये एक-दूसरे को काटते नहीं। समझदारी यही है कि एकीकरण को ऐसा समझाना-बुझाना मानिए जिसके पीछे ताकत के इस्तेमाल की भरोसेमंद धमकी खड़ी थी। और रियासत मंत्रालय को इस बात का श्रेय दीजिए कि उस ताकत का इस्तेमाल कितनी कम बार हुआ।
प्रिवी पर्स: एकीकरण की कीमत और उसका अंत
प्रिवी पर्स पूर्व शासक को उसके निजी और पारिवारिक खर्च के लिए मिलने वाली सालाना, टैक्स-मुक्त रकम थी। रियासत छोड़ने के बदले यह रकम हर विलय समझौते में तय की गई थी। काफी हद तक शांतिपूर्ण एकीकरण के लिए भारत ने जो कीमत चुकाई, उसका मुख्य हिस्सा यही था।
रकम एक फॉर्मूले से तय होती थी। मेनन “पूर्वी रियासतों वाले फॉर्मूले” (ईस्टर्न स्टेट्स फॉर्मूला) का जिक्र करते हैं। यह हर रियासत की आमदनी से जुड़ा एक घटता-बढ़ता पैमाना था, जिसे बड़े शासकों ने मोलभाव करके ऊपर करवाया। मिसाल के तौर पर मध्य भारत में भारत ने मौजूदा महाराजाओं के लिए ज्यादा प्रिवी पर्स मान लिए, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों को सालाना 10 लाख रुपये से ज्यादा की गारंटी देने से मना कर दिया। कुल रकम के लिए वे श्वेत पत्र का हवाला देते हैं: 580 लाख रुपये सालाना। IGNOU की इकाई 1949 के लिए 4.66 करोड़ रुपये का कम आँकड़ा देती है। यानी कुल रकम इस पर निर्भर है कि आप कौन-सा साल और कौन-सा स्रोत ले रहे हैं।
संविधान ने अनुच्छेद 291 में इन भुगतानों की गारंटी दी। अनुच्छेद 362 में शासकों के निजी अधिकारों और विशेषाधिकारों की रक्षा की, और अनुच्छेद 366(22) में बताया कि शासक किसे माना जाएगा। इनका अंत तीन कदमों में हुआ:
- 6 सितंबर 1970 को राष्ट्रपति ने सभी शासकों की मान्यता खत्म करने के आदेश जारी किए, जिससे प्रिवी पर्स रुक गए।
- 15 दिसंबर 1970 को सुप्रीम कोर्ट की ग्यारह जजों की पीठ ने बहुमत से माधव राव सिंधिया बनाम भारत संघ मामले में इन आदेशों को अधिकार-क्षेत्र से बाहर (अल्ट्रा वायर्स) बताकर रद्द कर दिया।
- फिर संसद ने संविधान (26वां संशोधन) अधिनियम, 1971 पास किया, जो 28 दिसंबर 1971 से लागू हुआ। इसने अनुच्छेद 291 और 362 हटा दिए और अनुच्छेद 363A जोड़ा, जिसने शासकों की मान्यता खत्म की और प्रिवी पर्स समाप्त कर दिए।
इस संशोधन के उद्देश्यों और कारणों के कथन में कहा गया था कि प्रिवी पर्स वाली राजशाही एक समतावादी सामाजिक व्यवस्था से मेल नहीं खाती। 4 फरवरी 1993 को रघुनाथराव गणपतराव बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को पूरी तरह वैध ठहराया।
आज रियासतों का एकीकरण
कानूनी तौर पर यह सवाल बंद हो चुका है। अनुच्छेद 363A ने शासकों की मान्यता खत्म कर दी, भाग B की श्रेणी अब नहीं है, और हर पूर्व रियासत आज संघ का एक सामान्य राज्य या केंद्र शासित प्रदेश है। जो बचा है, वह है याद करने के आयोजन, और उनका ज्यादातर हिस्सा हाल का है।
- राष्ट्रीय एकता दिवस। सरकार ने 22 अक्टूबर 2014 को तय किया कि पटेल की जयंती, 31 अक्टूबर, को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। 30 अक्टूबर 2025 के PIB बैकग्राउंडर ने उनकी 150वीं जयंती दर्ज की, जिसकी चर्चा साइट के पटेल की 150वीं जयंती वाले नोट में है।
- स्टैच्यू ऑफ यूनिटी। गुजरात के एकता नगर में पटेल की प्रतिमा वह जगह है जहाँ प्रधानमंत्री 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय समारोह से पहले श्रद्धांजलि देते हैं। इसका ब्योरा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी वाले नोट में है।
- हैदराबाद मुक्ति दिवस। गृह मंत्रालय (MHA) ने मार्च 2024 में अधिसूचना जारी की कि 17 सितंबर, यानी 1948 में जिस दिन हैदराबाद की सेना ने आत्मसमर्पण किया था, हर साल हैदराबाद मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
याद करने के ये आयोजन पटेल के बारे में हैं। लेकिन परीक्षा, जैसा अगला हिस्सा दिखाता है, प्रक्रिया के बारे में है।
परीक्षा के लिए रियासतों का एकीकरण कैसे पढ़ें
यह विषय GS पेपर I में आजादी के बाद देश को जोड़ने और पुनर्गठन वाले हिस्से में आता है। संघवाद, अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 291 और 363A के संवैधानिक इतिहास के जरिए यह GS पेपर II तक भी पहुँचता है। प्रीलिम्स में यह आधुनिक इतिहास के तहत आता है, और Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 184 आधुनिक इतिहास के हैं।
मुख्य परीक्षा तारीखें नहीं, प्रक्रिया परखती है। मुख्य परीक्षा 2021 के GS पेपर I में उम्मीदवारों से पूछा गया: “भारतीय रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में मुख्य प्रशासनिक मुद्दों और सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं का मूल्यांकन कीजिए।” यह प्रश्न ठीक उसी दूसरे चरण पर नंबर देता है जिस पर यह नोट सबसे ज्यादा समय लगाता है: पूर्ण विलय, प्रशासन, राजप्रमुख और प्रिवी पर्स।
इन तथ्यों को तब तक दोहराइए जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:
- सर्वोच्चता भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की धारा 7 के तहत खत्म हुई।
- रियासत विभाग ने जुलाई 1947 में काम शुरू किया; मेनन ने 5 जुलाई को कार्यभार संभाला।
- विलय पत्र में रक्षा, विदेश मामले और संचार शामिल थे।
- मेनन की गिनती: 554 रियासतें 14 इकाइयाँ बनीं; 216 प्रांतों में मिलीं, 310 छह संघों में।
- जूनागढ़ का जनमत संग्रह: 20 फरवरी 1948। हैदराबाद का आत्मसमर्पण: 17 सितंबर 1948। कश्मीर का विलय स्वीकार हुआ: 27 अक्टूबर 1947।
- 1950 में आठ भाग B राज्य थे, जिन्हें सातवें संशोधन, 1956 ने खत्म किया।
- प्रिवी पर्स: अनुच्छेद 291, जिसे 26वें संशोधन, 1971 ने खत्म किया; 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को सही ठहराया।
चार उलझनें नंबर कटवाती हैं। पहली, शामिल होना और पूर्ण विलय अलग-अलग कदम हैं: पहले ने तीन विषय दिए, दूसरे ने रियासत ही खत्म कर दी। दूसरी, यथास्थिति समझौता विलय पत्र नहीं है; हैदराबाद ने भारत में शामिल हुए बिना इस पर दस्तखत किए थे। तीसरी, रियासतों की संख्या किसी भी पाठ्यपुस्तक में गलत नहीं है, बस अलग ढंग से गिनी गई है, इसलिए स्रोत का नाम लीजिए। और चौथी, भाग B राज्य पूर्व रियासती इकाइयाँ थे, जबकि भाग C राज्य केंद्र प्रशासित थे और उनमें मणिपुर और त्रिपुरा जैसी कुछ रियासतें भी थीं।
| प्रक्रिया | कब | दस्तावेज | क्या तय हुआ |
|---|---|---|---|
| शामिल होना (एक्सेशन) | जुलाई से अगस्त 1947 | विलय पत्र, यथास्थिति समझौता | तीन विषय केंद्र को |
| पूर्ण विलय (मर्जर) | 1948 से 1949 | विलय समझौते और अनुबंध | अलग इकाई के रूप में रियासतों का अंत |
| संविधान में समावेश | 1950 | संविधान, भाग A, B और C | राजप्रमुख और भाग B राज्य |
| पुनर्गठन | 1956 | सातवां संशोधन, राज्य पुनर्गठन योजना | भाग वाली श्रेणियाँ खत्म |
| विशेषाधिकारों का अंत | 1971 | 26वां संशोधन | मान्यता और प्रिवी पर्स का अंत |
यह विषय उन अभ्यर्थियों को उलझा देता है जो इसे तीन केस स्टडी और एक उपनाम की तरह दोहराते हैं। जो उत्तर यह दिखाए कि विलय पत्र आसान आधा हिस्सा था, पूर्ण विलय असली काम था और तीनों मुश्किल मामले तीन अलग तर्क थे, वह उत्तरों के ढेर में अलग दिखेगा। अपना समय इसी ढाँचे पर लगाइए, तारीखें अपने आप इस पर टँग जाएँगी।
सामान्य प्रश्न
रियासतों के एकीकरण का क्या मतलब है?
यह 1947 से 1950 के बीच की वह प्रक्रिया है जिसमें ब्रिटिश सर्वोच्चता के तहत भारतीय राजाओं के शासन वाली रियासतें भारतीय संघ का हिस्सा बनीं। यह दो चरणों में हुआ। पहला चरण था शामिल होना, जिसने केंद्र को रक्षा, विदेश मामले और संचार दिए। दूसरा चरण था पूर्ण विलय, जिसने रियासतों को प्रांतों, संघों या केंद्र के सीधे शासन वाले क्षेत्रों में घोल दिया।
1947 में कितनी रियासतें थीं?
अलग-अलग स्रोत अलग गिनती देते हैं। NCERT 565 बताता है, नेहरू ने 562 की बात की थी, और वी. पी. मेनन ने एकीकरण के अपने विवरण में 554 का आँकड़ा इस्तेमाल किया। यह फर्क इस बात से आता है कि छोटी जागीरों और ठिकानों को कैसे गिना गया। इसलिए जो आँकड़ा लिखें, उसके स्रोत का नाम हमेशा दीजिए।
विलय पत्र क्या था?
यह वह कानूनी दस्तावेज था जिसके जरिए कोई शासक 1947 में भारत डोमिनियन में शामिल होता था। इसने सिर्फ तीन विषय सौंपे, यानी रक्षा, विदेश मामले और संचार, और बाकी सब शासक के पास छोड़ दिया। ज्यादातर शासकों ने 15 अगस्त 1947 से पहले इसके साथ यथास्थिति समझौते पर भी दस्तखत किए।
रियासतों का भारत में एकीकरण किसने किया?
यह काम रियासत विभाग ने किया, जो जुलाई 1947 में बना। इसके प्रभारी मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल थे और सचिव वी. पी. मेनन। गवर्नर-जनरल के तौर पर लॉर्ड माउंटबेटन ने भी शासकों पर भारत में शामिल होने का दबाव डाला। पटेल को राजनीतिक ताकत के लिए याद किया जाता है, और मेनन को दस्तावेजों का मसौदा बनाने और ज्यादातर पूर्ण विलयों की बातचीत के लिए।
ऑपरेशन पोलो क्या था?
ऑपरेशन पोलो हैदराबाद में भारत की सैन्य कार्रवाई का नाम था, जिसे आधिकारिक तौर पर पुलिस कार्रवाई कहा गया। भारतीय सेना 13 सितंबर 1948 को दाखिल हुई, हैदराबाद की सेना ने 17 सितंबर को आत्मसमर्पण किया, और 18 सितंबर को सेना हैदराबाद शहर में पहुँची। निजाम ने बाद में 23 नवंबर 1949 को जारी एक फरमान के जरिए संविधान स्वीकार किया।
भाग B राज्य क्या थे?
भाग B राज्य वे आठ राज्य थे जो 1950 के संविधान में पूर्व रियासती इलाके से बनाए गए। ये थे हैदराबाद, जम्मू और कश्मीर, मैसूर, मध्य भारत, PEPSU, राजस्थान, सौराष्ट्र और त्रावणकोर-कोचीन। इनमें से जो संघ थे, उनका प्रमुख राजप्रमुख होता था। 1956 के सातवें संशोधन ने यह श्रेणी खत्म कर दी।
प्रिवी पर्स कब खत्म किए गए?
प्रिवी पर्स संविधान (26वां संशोधन) अधिनियम, 1971 से खत्म किए गए, जो 28 दिसंबर 1971 से लागू हुआ। इसने अनुच्छेद 291 और 362 हटाए और अनुच्छेद 363A जोड़ा। इससे पहले 1970 में राष्ट्रपति के आदेश से इन्हें खत्म करने की कोशिश हुई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था।
31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस क्यों मनाया जाता है?
यह सरदार पटेल की जयंती है। रियासतों के एकीकरण में उनकी भूमिका को मान्यता देने के लिए सरकार ने अक्टूबर 2014 में इसे राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। यह पहली बार 2014 में मनाया गया, और 2025 में उनकी 150वीं जयंती थी।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. 1947 में शासकों द्वारा हस्ताक्षरित विलय पत्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसने रक्षा, विदेश मामले और संचार भारत डोमिनियन को सौंप दिए। 2. इसके तहत हर शासक के लिए शामिल होने से पहले जनमत संग्रह कराना जरूरी था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) विलय पत्र ने केवल तीन विषय सौंपे; जनमत संग्रह केवल जूनागढ़ जैसे अपवाद वाले मामलों में हुआ।
2. 20 फरवरी 1948 को किस रियासत में विलय के सवाल पर जनमत संग्रह हुआ था?
- (a) हैदराबाद
- (b) जूनागढ़
- (c) भोपाल
- (d) त्रावणकोर
उत्तर: (b) जूनागढ़ में फरवरी 1948 में मतदान हुआ, और पड़े 1,90,870 वोटों में से सिर्फ 91 पाकिस्तान के पक्ष में गए।
3. प्रिवी पर्स के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान (26वां संशोधन) अधिनियम, 1971 ने अनुच्छेद 291 और 362 हटा दिए। 2. माधव राव सिंधिया बनाम भारत संघ (1970) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शासकों की मान्यता खत्म करने वाले राष्ट्रपति के आदेशों को सही ठहराया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) कोर्ट ने 1970 के आदेशों को अधिकार-क्षेत्र से बाहर बताकर रद्द किया था, इसीलिए संसद को संविधान में संशोधन करना पड़ा।
4. 1950 में संविधान के तहत निम्नलिखित में से कौन-से भाग B राज्य थे? 1. मैसूर 2. सौराष्ट्र 3. मणिपुर 4. त्रावणकोर-कोचीन। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a) केवल 1, 2 और 3
- (b) केवल 1, 2 और 4
- (c) केवल 2, 3 और 4
- (d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b) मणिपुर एक भाग C राज्य था, जिसे मुख्य आयुक्त चलाता था।
5. सितंबर 1948 में शुरू किया गया ऑपरेशन पोलो निम्नलिखित में से किससे जुड़ा है?
- (a) जूनागढ़
- (b) जम्मू और कश्मीर
- (c) हैदराबाद
- (d) मणिपुर
उत्तर: (c) ऑपरेशन पोलो वह पुलिस कार्रवाई थी जो 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद की सेना के आत्मसमर्पण के साथ खत्म हुई।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- 1947 में विलय पत्र पर दस्तखत रियासतों के एकीकरण का आसान आधा हिस्सा था; असली काम पूर्ण विलय था। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- विलय पत्र और यथास्थिति समझौते के उद्देश्य में क्या अंतर था? हैदराबाद के उदाहरण से समझाइए। (10 अंक, 150 शब्द)
- जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू और कश्मीर में भारत ने जिन सिद्धांतों का सहारा लिया, उनकी तुलना कीजिए। क्या वे एक जैसे थे? (15 अंक, 250 शब्द)
- विलय समझौतों से लेकर 26वें संशोधन, 1971 तक प्रिवी पर्स की संवैधानिक यात्रा का वर्णन कीजिए। क्या उन्हें खत्म करना वचन तोड़ना था या एकीकरण को पूरा करना? (15 अंक, 250 शब्द)
- रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल, वी. पी. मेनन और लॉर्ड माउंटबेटन की अपनी-अपनी भूमिकाओं का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)