संत तुकाराम: देहू, अभंग और पंढरपुर तक का वारकरी रास्ता
संत तुकाराम को समझिए: देहू का वह व्यापारी जो विठोबा का वारकरी कवि बना, उनके अभंग और गाथा, और उनसे जुड़ी कौन-सी बातें रिकॉर्ड हैं, कौन-सी किंवदंती।
संत तुकाराम वारकरी परंपरा के मराठी कवि-संत थे। वे पुणे के पास इंद्रायणी नदी के किनारे बसे गाँव देहू में रहते थे, और उनकी मृत्यु 1649 या 1650 में हुई। उनके अभंग, यानी पंढरपुर के विठोबा को समर्पित छोटे भक्ति-गीत, आज भी पंढरपुर की सालाना पदयात्रा में गाए जाते हैं। ब्रिटानिका के मुताबिक उन्हें अक्सर मराठी का सबसे बड़ा लेखक माना जाता है। तुकाराम इसलिए अहम हैं कि उन्होंने जाति के घमंड के खिलाफ भक्ति आंदोलन की दलील को एक गाँव के व्यापारी की सीधी-सादी मराठी में कह दिया। और उनके अपने इलाके के पढ़े-लिखे पंडितों ने इसे सीधा उकसावा माना।
ज्यादातर लोग तुकाराम से फिल्मों और कैलेंडर की तस्वीरों के जरिए मिलते हैं, और उनके साथ कहानियाँ भी चली आती हैं। इंद्रायणी से तैरकर वापस ऊपर आई पोथियाँ परंपरा की बात हैं। सशरीर स्वर्ग जाना भी परंपरा है, और शिवाजी से उनकी मुलाकात भी। रिकॉर्ड इससे पतला है, लेकिन ज्यादा काम का है: एक कुनबी व्यापारी का बेटा, जो 1629-30 के अकाल में दिवालिया हो गया और जिसने अपनी पहली पत्नी को भूख से मरते देखा। यह नोट रिकॉर्ड और किंवदंती को अलग-अलग रखकर चलता है।
संत तुकाराम कौन थे?
संत तुकाराम को तुकोबा और तुकाराम महाराज के नाम से भी याद किया जाता है। वे देहू के एक गृहस्थ और व्यापारी थे, जिन्हें वारकरी परंपरा अपने कवि-संतों की कतार में सबसे ऊपर रखती है। नीचे की तालिका में मुख्य तथ्य हैं। जहाँ स्रोत आपस में सहमत नहीं हैं, वहाँ उसी पंक्ति में यह बात लिखी है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | महीपति से आई पारंपरिक तिथि के हिसाब से 1608; देहू और पंढरपुर की वंशावलियाँ 1598 बताती हैं, और पुराने विद्वानों ने 1568 जितनी पुरानी तिथियों के पक्ष में भी तर्क दिए हैं |
| मृत्यु | 1649 या 1650; विद्वानों ने 1648 से 1652 तक की तिथियाँ सुझाई हैं |
| जन्मस्थान | देहू, पुणे के पास इंद्रायणी के दक्षिणी किनारे पर |
| जाति और पेशा | जाति से शूद्र कुनबी; व्यापार करने वाला परिवार, जिसके पास गाँव के महाजन का पुश्तैनी पद था |
| परंपरा | वारकरी पंथ, यानी ‘तीर्थयात्रियों का मार्ग’, जो पंढरपुर के विठोबा (विट्ठल) की भक्ति करता है |
| छंद | अभंग: चार छोटी पंक्तियाँ, हर पंक्ति में तीन से आठ अक्षर |
| मुख्य रचना | तुकाराम गाथा; छपे संस्करणों में लगभग 4,100 से 4,650 अभंग हैं |
| गुरु | बाबाजी, जो सपने में मिले और जिन्होंने उन्हें ‘राम कृष्ण हरि’ मंत्र दिया |
| शुरुआती मुख्य जीवनीकार | महीपति, जिन्होंने 1774 में लिखा, यानी तुकाराम की मृत्यु के लगभग 125 साल बाद |
देहू का व्यापारी वारकरी कवि कैसे बना
तुकाराम का जीवन एक ही आपदा पर आकर मुड़ता है: एक अकाल, जिसने उन्हें दिवालिया कर दिया और उनकी पहली पत्नी की जान ले ली। नीचे दिए गए साल उस कालक्रम पर आधारित हैं, जिसे जे. नेल्सन फ्रेजर और जे. एफ. एडवर्ड्स ने 1922 में तैयार किया था। इसके लिए उन्होंने महीपति के लेखन और तुकाराम की अपनी आत्मकथात्मक कविताओं का सहारा लिया। इसलिए इन सालों को दर्ज तिथियाँ नहीं, बल्कि काफी करीबी अनुमान समझिए।
महाजन का बेटा
तुकाराम का परिवार कुनबी था। कुनबी किसानों की एक जाति थी, जिसे शूद्र माना जाता था, लेकिन यह परिवार व्यापार से गुजारा करता था। दिलीप चित्रे ने Says Tuka (1991) में तुकाराम का अनुवाद किया है। वे बताते हैं कि तुकाराम के पिता बोल्होबा के पास गाँव के महाजन का पुश्तैनी पद था। महाजन व्यापारियों का वह मुखिया होता था, जिसे कुछ व्यापारियों की देखरेख करने और उनसे राजस्व वसूलने के लिए नियुक्त किया जाता था। परिवार लिखित हिसाब-किताब रखता था, और इसीलिए देहू का एक कुनबी लड़का पढ़ना-लिखना सीखकर बड़ा हुआ। ब्रिटानिका उन्हें सीधे-सीधे एक दुकानदार का बेटा कहता है।
पिता ने 1621 में कारोबार उन्हें सौंप दिया, जब उनकी उम्र लगभग 13 साल थी। दो साल के भीतर उनकी दो शादियाँ हो चुकी थीं, पहले रखमाबाई से और फिर जिजाबाई से, जिन्हें आवली भी कहा जाता है। 1625 में उनके माता-पिता चल बसे। चित्रे लिखते हैं कि 21 साल का होने से पहले ही तुकाराम अपने सबसे करीबी लोगों में से ज्यादातर का अंतिम संस्कार कर चुके थे।
1629-30 का अकाल
फ्रेजर और एडवर्ड्स उनके दिवालिया होने का साल 1629 बताते हैं, जिस साल अकाल शुरू हुआ। अकाल का सबसे बुरा दौर वे 1630 में रखते हैं। उसी साल रखमाबाई भूख से मर गईं, और उनका सबसे बड़ा बेटा भी चल बसा। तुकाराम सब छोड़कर भांबनाथ पहाड़ी पर चले गए। 1631 में उन्होंने देहू का मंदिर फिर से बनवाया और कीर्तनों में जाने लगे। कीर्तन यानी भक्ति-गायन, जिसमें एक गायक आगे-आगे गाता है और भीड़ टेक दोहराती है। 1632 से 1635 के बीच उन्हें कविता की पुकार सुनाई दी और उनकी दीक्षा हुई: सपने में बाबाजी नाम के एक घुमक्कड़ भक्त ने उन्हें ‘राम कृष्ण हरि’ मंत्र दिया, जो विष्णु के तीन नाम हैं।
पुराने संतों से सीख
अपने पद गाने से पहले उन्होंने दूसरों के पद सीखे। महीपति के मुताबिक वे देहू के पश्चिम में भंडारा पहाड़ी पर बैठकर पुराने संतों की रचनाएँ याद करते थे। फ्रेजर और एडवर्ड्स उनकी कविताओं में चार नामों के निशान खोज निकालते हैं:
- ज्ञानेश्वर, तेरहवीं सदी के लेखक, जिन्होंने ज्ञानेश्वरी लिखी;
- नामदेव, वारकरी पंथ के चौदहवीं सदी के संत, जो एक दर्जी के बेटे थे;
- कबीर, जो उनसे सवा सौ साल से भी ज्यादा पहले हुए;
- पैठण के एकनाथ, जिनकी मृत्यु 1599 में हुई।
विरोध रसूखदार लोगों की तरफ से आया, और बहिणाबाई का संस्मरण महीपति के इस ब्योरे की कुछ हद तक पुष्टि करता है। फ्रेजर और एडवर्ड्स के शब्दों में, देहू में बसा मुंबाजी नाम का एक संन्यासी “जाति से शूद्र और पेशे से पंसारी होने के कारण उनसे घृणा करता था”। वाघोली के ब्राह्मण विद्वान रामेश्वर भट्ट ने उनके खिलाफ अदालत में शिकायत की। बाद में वे पछताए और तुकाराम के प्रमुख शिष्य बन गए। उनकी एक और शिष्या बहिणाबाई (1628-1700) को तुकाराम के कीर्तनों में जाने की वजह से मुंबाजी के घर से निकाल दिया गया।
तुकाराम ने क्या सिखाया?
तुकाराम ने सिखाया कि दूसरों के साथ मिलकर भगवान का नाम गाना और जपना हर किसी के लिए खुला है, और यह जन्म या विद्या से ज्यादा मायने रखता है। यह बात उन्होंने एक आम गृहस्थ की तरह कही, और अक्सर तीखे ढंग से कही। उनका यह तीखापन जितना खुद पर था, उतना ही उन लोगों पर भी, जिन्होंने धर्म को पेशा बना रखा था।
उनकी ज्यादातर कविता चार विचारों पर टिकी है, और हर विचार के साथ एक मराठी शब्द जुड़ा है, जिसे जान लेना काम का है:
- नाम, यानी भगवान का नाम। नाम जपना ही पूरी साधना है। इसीलिए उनके गुरु ने उन्हें कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि एक मंत्र दिया।
- साझी भक्ति के रूप में कीर्तन। उनके अभंग कीर्तन में ही जीते थे: उन्हें अकेले में पढ़ा नहीं जाता था, बल्कि गाँव की भीड़ के सामने गाया जाता था।
- जाति के घमंड के खिलाफ। 2022 में देहू में प्रधानमंत्री ने उनकी एक पंक्ति सुनाई थी, ‘उंच नीच काही नेणे भगवंत’, यानी भगवान ऊँच-नीच कुछ नहीं जानता।
- सेवा ही संत की कसौटी है। ‘जे का रंजले गांजले, त्यासी म्हणे जो आपुले, तोचि साधु ओळखावा, देव तेथेचि जाणावा’: जो दुखियों और सताए हुए लोगों को अपना कहता है, वही सच्चा साधु है, और भगवान वहीं मिलता है।
उनका गुस्सा भी उनकी सीख का हिस्सा है। जे. मरे मिशेल ने 1882 में उनका अनुवाद किया था, जिसे फ्रेजर और एडवर्ड्स ने दोबारा छापा। उसमें एक अभंग उस आदमी पर आकर खत्म होता है, जो जोर-जोर से भगवान का गुणगान करता है, लेकिन जिसका मन पैसे से चिपका रहता है। ऐसे आदमी के बारे में तुकाराम का फैसला यह है कि कोई उसके मुँह पर थप्पड़ मारे।
जाति पर उनकी आलोचना की भी एक सीमा थी। महीपति बताते हैं कि जब उनकी बेटियाँ ब्याह लायक हुईं, तो तुकाराम ने उनकी शादी अपनी ही जाति के तीन लड़कों से कर दी, जो उन्हें सड़क पर खेलते हुए मिले थे। उनकी कविताएँ जाति के घमंड पर चोट करती हैं, और धर्म पर विद्वानों के एकाधिकार पर भी। लेकिन वे जाति को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में तोड़ने की माँग नहीं करतीं। इस मामले में वे आम तौर पर बाकी भक्ति संतों जैसे ही हैं, जिनका सुधार पहले भक्ति पर काम करता था और समाज पर बाद में।
तुकाराम का अभंग क्या होता है?
अभंग वारकरी कवियों का अपना छंद है, छोटा और गाने के लिए बना हुआ। ब्रिटानिका इस शब्द का अर्थ ‘अखंड’ बताता है। चित्रे के मुताबिक इसमें चार पंक्तियाँ होती हैं, और हर पंक्ति में तीन से आठ अक्षर। यह छंद बोलचाल की मराठी से ही निकला है, और तेरहवीं सदी से वारकरी कवियों का सबसे पसंदीदा छंद रहा है। हर कविता में ‘तुका म्हणे’ की छाप होती है, जिसका अर्थ है ‘तुका कहता है’। चित्रे इस छाप को कविता की गहरी बनावट में जाने का दरवाजा कहते हैं।
गाथा बहुत बाद में छपी
तुकाराम गाथा उनके अभंगों का संग्रह है, और उनके अपने हाथ से लिखी इसकी कोई पूरी प्रति नहीं बची है। देहू का परिवार लगभग 250 कविताओं की एक पांडुलिपि संभालकर रखता है, जिसे उनके वंशज तुकाराम की अपनी लिखावट मानते हैं। फ्रेजर और एडवर्ड्स ने संताजी तेली जगनाडे की पांडुलिपि का एक पन्ना भी छापा था। संताजी तुकाराम के साथी थे, जिन्हें उनकी रचनाएँ लिखकर सहेजने के लिए याद किया जाता है। बाकी सब कुछ नकल की नकल के रास्ते छपाई तक पहुँचा।
छपे संस्करणों की गिनती आपस में मेल नहीं खाती, और यह बात किसी एक संख्या से ज्यादा सिखाती है। फ्रेजर और एडवर्ड्स ने 1867 से 1913 तक के मराठी संस्करणों की तालिका बनाई। ज्यादातर में लगभग 4,100 से 4,650 अभंग हैं, और 1889 के एक संस्करण में यह संख्या फूलकर 8,441 तक पहुँच गई। बंबई के 1869 के इंदु प्रकाश संस्करण में 4,621 अभंग गिने गए। वहीं चित्रे 1873 में सरकारी मदद से छपी इंदु प्रकाश प्रति को मानक पाठ मानते हैं, जिसमें 4,607 अभंग हैं। याद रखने लायक आँकड़ा ब्रिटानिका का गोल आँकड़ा ही है: ‘4,000 से ज्यादा’।
इससे भी मुश्किल एक सवाल है। इंदु प्रकाश के संपादकों ने माना था कि उनकी कुछ पांडुलिपियाँ दो सदियों से ज्यादा समय तक भक्तों के हाथों में रहने के बाद ‘सुधारी’ और ‘फिर से सुधारी’ गई थीं। गाथा का मूल हिस्सा तुकाराम का ही है, लेकिन कोई एक खास अभंग उनका न भी हो, ऐसा मुमकिन है।
इंद्रायणी वाली पोथियाँ एक परंपरा हैं
गाथा से जुड़ी सबसे मशहूर कहानी एक चमत्कार की है, और उसे चमत्कार की तरह ही सुनाया जाना चाहिए। तुकाराम को अपनी पोथियाँ इंद्रायणी में डुबोने पर मजबूर किया गया। उन्होंने 13 दिन उपवास किया, और पोथियाँ बिना किसी नुकसान के ऊपर आ गईं। महीपति वाली कहानी इस दबाव को रामेश्वर भट्ट से जोड़ती है, जबकि चित्रे सिर्फ मजाक उड़ाने वाले विरोधियों की बात करते हैं। देहू के शिला मंदिर में वह चट्टान रखी गई है, जिस पर परंपरा के अनुसार उन्होंने 13 दिन तपस्या की थी।
इतिहास की नजर से पढ़ें, तो यह कहानी दबाव को दर्ज करती है। रसूख वाले किसी व्यक्ति को लगा कि एक शूद्र की पोथियाँ डुबो देने लायक हैं, और इस दुश्मनी की गवाही एक से ज्यादा ब्योरों में मिलती है। पोथियों का वापस मिल जाना आस्था की बात है।
वारकरी संतों में तुकाराम कहाँ खड़े हैं?
तुकाराम चार महान वारकरी कवियों में आखिरी हैं, और परंपरा उन्हें अपनी इमारत का सबसे ऊपरी पत्थर मानती है। बहिणाबाई के नाम से एक पद चलता है, जिसे चित्रे ने उद्धृत किया है और 2022 में देहू में प्रधानमंत्री ने भी याद किया था। यह पद वारकरी पंथ को एक मंदिर की तरह देखता है:
- ज्ञानदेव ने इसकी नींव रखी;
- नामदेव ने इसकी दीवारें खड़ी कीं;
- एकनाथ ने इसे बीच का खंभा दिया;
- तुकाराम इसका शिखर बने, यानी कलश, सबसे ऊपर लगा घड़े के आकार का कंगूरा।
वारकरी पंथ, जिसे ब्रिटानिका ‘तीर्थयात्रियों का मार्ग’ कहता है, विठोबा के भक्तों का समुदाय है। विठोबा को विट्ठल या पांडुरंग भी कहते हैं। वे विष्णु का एक रूप हैं, जिनकी पूजा उनकी पत्नी रुक्मिणी के साथ भीमा नदी के किनारे बसे पंढरपुर में होती है। पंढरपुर सोलापुर से लगभग 55 किलोमीटर पश्चिम में है। यहाँ का मुख्य मंदिर बारहवीं सदी में देवगिरि के यादवों के समय बना। ब्रिटानिका नामदेव को इस पंथ का सबसे प्रमुख प्रचारक बताता है। उसके मुताबिक नामदेव से प्रेरित परंपरा चार सदियों तक चलती रही और फिर तुकाराम में अपने चरम पर पहुँची। ब्रिटानिका इस पंथ को यह श्रेय भी देता है कि पूजा में इसने जाति की पाबंदियाँ नहीं मानीं।
हर साल आषाढ़ी उत्सव के लिए तीर्थयात्रियों की टोलियाँ पैदल पंढरपुर जाती हैं। हर टोली अपने संत की पालखी (पालकी) लेकर चलती है, जिसमें उस संत की पादुका, यानी चरण-चिह्न, रखी होती हैं। फ्रेजर और एडवर्ड्स ने उनकी टेक ‘ज्ञानोबा, तुकोबा’ दर्ज की थी: एक ही साँस में पहला संत भी और आखिरी संत भी।
| संत | काल | स्थान | पृष्ठभूमि | मुख्य रचना | किस बात के लिए याद रखें |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) | 1275 से 1296 | आलंदी | संन्यास से लौटने के बाद परिवार को जाति से बाहर मान लिया गया | ज्ञानेश्वरी (भावार्थदीपिका), भगवद्गीता पर मराठी में पद्य टीका | मराठी कविता के जनक कहे जाते हैं; संत-परंपरा की नींव |
| नामदेव | लगभग 1270 से 1350 | जन्म नरसी में, मृत्यु पंढरपुर में | दर्जी के बेटे, निचली जाति से | अभंग; सिखों के आदि ग्रंथ में शामिल पद | वारकरी पंथ के सबसे प्रमुख प्रचारक, पंजाब में भी लोकप्रिय |
| एकनाथ | 1544 से 1599 (ब्रिटानिका) | गोदावरी के किनारे पैठण | देशस्थ ब्राह्मण, जिनका जाति के सवाल पर कट्टर ब्राह्मणों से टकराव हुआ | ज्ञानेश्वरी का सुधारा हुआ पाठ; मराठी रामायण | उनकी पंक्ति ‘कुत्ता और ईश्वर एक ही हैं’ |
| तुकाराम | लगभग 1608 से 1649 या 1650 | इंद्रायणी के किनारे देहू | व्यापारी परिवार के शूद्र कुनबी | तुकाराम गाथा में संकलित अभंग | कलश: चारों में सबसे सीधी और सबसे निजी आवाज |
इस तालिका में दो पैटर्न दिखते हैं। ज्ञानेश्वर और एकनाथ ब्राह्मण परिवारों से आए, और उन्होंने संस्कृत ग्रंथों के पांडित्य भरे मराठी रूप लिखे। नामदेव और तुकाराम मेहनतकश जातियों से आए, और उन्हें अभंगों के लिए याद किया जाता है। बड़े भक्ति आंदोलन के भीतर वारकरी एक ऐसे तीर्थयात्री समुदाय के रूप में अलग दिखते हैं, जिसके संत ब्राह्मण घरों से भी आए और मेहनतकश जातियों के घरों से भी।
तुकाराम के बारे में इतिहासकार किन बातों पर असहमत हैं
तुकाराम के बारे में लगभग हर मशहूर तथ्य का स्रोतों में एक नरम जुड़वाँ भी मिलता है, यानी वही बात कम पक्के रूप में। इनमें तीन विवाद सबसे ज्यादा वजन रखते हैं।
उनकी तिथियाँ
फ्रेजर और एडवर्ड्स ने 1922 में जन्म-वर्ष की समस्या सामने रखी, और कहा कि इस पर पक्का कुछ कहना नामुमकिन है। उनकी सूची के संभावित साल ये हैं:
- 1608, महीपति से आई पारंपरिक तिथि, जिसे ब्रिटानिका भी मानता है;
- 1598, देहू और पंढरपुर की पारिवारिक वंशावलियों से;
- 1588, जिसे जनार्दन रामचंद्र मानते थे;
- 1577, जिसे दूसरे विद्वान मानते थे;
- 1568, जिसके पक्ष में इतिहासकार राजवाड़े ने वाई के पास मिली एक पुरानी वंशावली के आधार पर तर्क दिया।
चित्रे 1609 बताते हैं। मृत्यु के लिए ब्रिटानिका पारंपरिक तिथि 1649 पर टिका है, जबकि चित्रे 1650 बताते हैं। विद्वानों की तिथियाँ 1648 से 1652 तक जाती हैं। ईमानदारी से छोटे में कहना हो, तो यही कहिए: लगभग 1608 से 1649 या 1650।
उनका जीवन कैसे खत्म हुआ
वारकरी परंपरा के मुताबिक वे सशरीर स्वर्ग गए: महीपति आकाश में रथों का वर्णन करते हैं, जो तुकाराम को विष्णु के धाम वैकुंठ ले गए। देहू के मंदिर में लगा एक शिलालेख कहता है कि वे उसी जगह से वैकुंठ गए। 1920 में इस मंदिर में हर फाल्गुन महीने में 20,000 से 40,000 लोग जुटते थे।
इसके साथ दो और व्याख्याएँ भी चलती हैं। ब्रिटानिका यह मान्यता दर्ज करता है कि उन्होंने नदी में कूदकर जान दे दी और डूब गए। फ्रेजर और एडवर्ड्स ने गौर किया कि मंदिर का मुँह इंद्रायणी के सबसे गहरे कुंड की ओर है। चित्रे विदाई वाली कविताओं को एक ऐसे आदमी की आवाज के रूप में पढ़ते हैं, जो अपने दोस्तों से विदा लेकर हमेशा के लिए देहू छोड़ रहा है। सशरीर स्वर्ग जाना आस्था है, और डूबना एक अनुमान। गाँव छोड़कर जाना कविताओं की एक व्याख्या है। इन तीनों में से कोई भी बात दर्ज रिकॉर्ड नहीं है।
क्या तुकाराम शिवाजी से मिले थे?
परंपरा कहती है हाँ, लेकिन रिकॉर्ड इसकी पुष्टि नहीं कर पाता। महीपति की कहानी में शिवाजी तुकाराम को बुलाने के लिए मशाल और छत्र के साथ एक घोड़ा भेजते हैं। तुकाराम अभंगों में जवाब देकर मना कर देते हैं। फिर शिवाजी खुद सोना लेकर आते हैं, और तुकाराम उनसे कहते हैं कि बस तुलसी की माला पहनिए और खुद को विठोबा का सेवक कहिए। फ्रेजर और एडवर्ड्स ने पाया कि विद्वान इस पर बँटे हुए हैं, और उन्होंने कहा कि किसी भी पक्ष में पक्के तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है।
असली दिक्कत कालक्रम की है। जदुनाथ सरकार ने शिवाजी का जन्म फरवरी 1630 में रखा, जबकि पुरानी तिथि 1627 थी। यानी तुकाराम की मृत्यु के समय शिवाजी लगभग 20 साल के थे, और जैसा चित्रे बताते हैं, तब तक मराठा राज्य बना ही नहीं था। परंपरा जिस संत को शिवाजी के आध्यात्मिक सलाहकार के रूप में उनके साथ जोड़ती है, वे रामदास हैं।
इस मुलाकात के पीछे एक बड़ा दावा छिपा है: कि संतों ने महाराष्ट्र को मराठा राज्य के लिए तैयार किया। फ्रेजर और एडवर्ड्स के अध्ययन में छपा एक अंश ज्ञानेश्वर को “मराठा राष्ट्रीयता का जनक, जिसकी परिणति महान शिवाजी के मराठा साम्राज्य में हुई” कहता है। इसे एक व्याख्या की तरह ही लीजिए। संतों ने मराठी बोलने वालों को जाति की रेखाओं के आर-पार एक साझी भक्ति-भाषा दी, लेकिन इस बात के सबूत कमजोर हैं कि इसी से एक राज्य खड़ा हुआ।
संत तुकाराम आज
आज तुकाराम की मौजूदगी एक जीती-जागती तीर्थयात्रा में है, और देहू के उन मंदिरों में, जिन्हें संत तुकाराम महाराज संस्थान चलाता है। 2026 में इसके पदाधिकारी मोरे परिवार से थे, और चित्रे देहू के एक मोरे को तुकाराम का सबसे पुराना सीधा वंशज बताते हैं। तारीख के साथ दर्ज दो घटनाएँ अहम हैं:
- शिला मंदिर, 14 जून 2022। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देहू में उस चट्टान के चारों ओर बने मंदिर का उद्घाटन किया, जिस पर परंपरा के अनुसार तुकाराम ने 13 दिन तपस्या की थी। देहू में प्रधानमंत्री के भाषण में चार लेन वाले पालखी राजमार्गों के शिलान्यास को भी याद किया गया, जिनमें संत तुकाराम महाराज पालखी मार्ग तीन चरणों में बनना है।
- 2026 की पालखी। सकाळ ने 4 जून 2026 को संस्थान का जो कार्यक्रम छापा, उसके मुताबिक पालखी 7 जुलाई 2026 को देहू से निकली और उसे 24 जुलाई को पंढरपुर पहुँचना था। रिपोर्टों ने इसे यात्रा का 341वाँ साल गिना।
उसी भाषण से पता चलता है कि आज सार्वजनिक जीवन उन्हें कैसे पढ़ता है। भाषण ने ‘उंच नीच काही नेणे भगवंत’ को बिना भेदभाव वाली योजनाओं के वादे के साथ रखा, और ‘जे का रंजले गांजले’ को अंत्योदय का मूल मंत्र बताया, यानी आखिरी कतार में खड़े व्यक्ति का कल्याण। जिस संत पर इतने सारे खेमे दावा करते हों, वह किसी एक खेमे का नहीं होता। उनकी पंक्तियों को उसी अर्थ में उद्धृत करना सबसे अच्छा है, जो वे खुद कहती हैं। उनकी पहुँच के बारे में कोई भाषण उतना नहीं बताता, जितना पालखी बताती है: अपने 341वें साल में चल रही एक यात्रा, जिसमें आम वारकरी एक कुनबी व्यापारी के पद गाते हुए पैदल चलते हैं।
परीक्षा के लिए संत तुकाराम कैसे पढ़ें
संत तुकाराम सिलेबस में दो जगह आते हैं: सामान्य अध्ययन (GS) पेपर I में भारतीय संस्कृति और भक्ति आंदोलन के तहत, और इतिहास वैकल्पिक विषय के पेपर I में मध्यकालीन धार्मिक आंदोलनों के तहत। महाराष्ट्र की राज्य सेवा परीक्षा वारकरी संतों में और गहराई तक जाती है, और MPSC गाइड उसी सिलेबस को कवर करती है।
सवालों में उनका नाम कम ही आता है। सवाल भक्ति साहित्य के बारे में पूछे जाते हैं, और इस बारे में कि संतों ने समाज को कितना बदला। ऐसे जवाबों के भीतर तुकाराम पर एक सटीक पैराग्राफ सबूत का काम करता है। मुख्य परीक्षा 2014 में GS पेपर I ने उम्मीदवारों से इस पर टिप्पणी माँगी थी: “सूफी और मध्यकालीन रहस्यवादी संत हिंदू/मुस्लिम समाजों के धार्मिक विचारों और रीतियों को, या उनके बाहरी ढाँचे को, किसी उल्लेखनीय हद तक बदलने में नाकाम रहे। टिप्पणी कीजिए।“
तुकाराम इस जवाब के दोनों पक्षों में फिट बैठते हैं। अपनी ही जाति में बेटियों की शादी इस दावे का समर्थन करती है, और एक कुनबी पंसारी का वारकरी संत-परंपरा का कलश बन जाना इसके खिलाफ जाता है। इतिहास वैकल्पिक विषय ने यह विषय सीधे भी पूछा है। 2014 के पेपर I में उम्मीदवारों से कहा गया, “मध्यकालीन भक्ति साहित्य के विकास में वैष्णव संतों के योगदान का मूल्यांकन कीजिए”, और 2017 के पेपर I में यह चर्चा करने को कहा गया कि क्या “भक्ति और सूफी आंदोलनों ने एक ही सामाजिक उद्देश्य पूरा किया।”
प्रीलिम्स में, 2013 से 2026 तक के Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 में से 94 सवाल कला और संस्कृति से हैं, और इतिहास से 184। तुकाराम पर सवाल आए, तो उसकी सबसे संभावित शक्ल संत और रचना या संत और जगह की जोड़ी वाली होगी। इसलिए ऊपर दी गई चार संतों वाली तालिका याद कर लीजिए।
दोहराने के लिए ये तथ्य पक्के कर लीजिए:
- देहू, पुणे के पास इंद्रायणी के किनारे; लगभग 1608 से 1649 या 1650, और जन्म-वर्ष पर 1568 जितनी पुरानी तिथि तक के तर्क।
- जाति से शूद्र कुनबी और पेशे से व्यापारी; पिता के पास गाँव के महाजन का पद था।
- 1629-30 के अकाल ने उन्हें दिवालिया कर दिया और उनकी पहली पत्नी रखमाबाई की जान ले ली।
- गुरु बाबाजी, जो सपने में मिले और जिन्होंने ‘राम कृष्ण हरि’ मंत्र दिया।
- अभंग: चार छोटी पंक्तियाँ, जिन पर ‘तुका म्हणे’ की छाप होती है; गाथा में ऐसे 4,000 से ज्यादा अभंग हैं।
- पंढरपुर के विठोबा का वारकरी पंथ; देहू की पालखी आषाढ़ी उत्सव के लिए वहीं तक पैदल जाती है।
- बहिणाबाई की मंदिर वाली छवि: ज्ञानदेव नींव हैं, तुकाराम कलश।
चार उलझनें नंबर कटवाती हैं, और हर एक को अलग करने का साफ तरीका है:
- सिखों के आदि ग्रंथ में नामदेव के पद हैं, तुकाराम के नहीं।
- ज्ञानेश्वरी गीता पर ज्ञानेश्वर की टीका है, और एकनाथ ने इसका पाठ सुधारा; तुकाराम की रचना अभंग हैं, टीका नहीं।
- शिवाजी के आध्यात्मिक सलाहकार के रूप में परंपरा से रामदास का नाम लिया जाता है, तुकाराम का नहीं; तुकाराम और शिवाजी की मुलाकात एक परंपरा है।
- एकनाथ की मृत्यु 1599 में हो चुकी थी, इसलिए तुकाराम ने उनके पदों से सीखा, उनसे खुद मिलकर नहीं।
भक्ति और सूफी की तुलना के लिए इस नोट को सूफी आंदोलन वाले नोट के साथ पढ़िए। एथिक्स की केस सामग्री के लिए भक्ति और सूफी नैतिकता वाला नोट इन्हीं संतों को लेकर चलता है। मराठी साहित्य वैकल्पिक विषय वाले उम्मीदवार उन्हें मूल मराठी में पढ़ते हैं, और मराठी साहित्य वैकल्पिक गाइड में ज्ञानेश्वर और तुकाराम के टीका-सहित संस्करण उन किताबों में गिनाए गए हैं, जो आपके पास होनी चाहिए।
सिलेबस में तुकाराम छोटे हैं, लेकिन जवाब के भीतर बड़े, क्योंकि वे भक्ति की दलील को एक ऐसे इंसान में बदल देते हैं, जिसका नाम है और जिसके पीछे तारीख के साथ दर्ज एक अकाल खड़ा है। 2022 में देहू में सुनाई गई उनकी अपनी पंक्ति पूरी तैयारी के लिए सलाह है: ‘असाध्य ते साध्य करिता सायास, कारण अभ्यास, तुका म्हणे’, यानी कोशिश से असंभव भी संभव हो जाता है, और इसकी वजह है अभ्यास। अगर आप उन्हें सटीक जगह पर रख पाते हैं, तिथियों को सावधानी से और किंवदंतियों को किंवदंती कहकर, तो आप परीक्षक को ठीक वही आदत दिखा रहे हैं, जिसका इनाम ये सवाल देते हैं।
सामान्य प्रश्न
संत तुकाराम कौन थे?
संत तुकाराम सत्रहवीं सदी के मराठी कवि-संत थे, जो वारकरी परंपरा से जुड़े थे और पुणे के पास देहू के रहने वाले थे। उन्होंने अभंग रचे, यानी पंढरपुर के विठोबा को समर्पित छोटे भक्ति-गीत, जो तुकाराम गाथा में संकलित हैं। उनकी पारंपरिक तिथियाँ 1608 से 1649 या 1650 हैं।
संत तुकाराम का जन्म कब हुआ था?
पारंपरिक तिथि 1608 है, जो जीवनीकार महीपति से ली गई है और जिसे ब्रिटानिका भी मानता है। देहू और पंढरपुर की पारिवारिक वंशावलियाँ 1598 बताती हैं, और दूसरे विद्वानों ने 1568 जितनी पुरानी तिथियों के पक्ष में भी तर्क दिए हैं, इसलिए यह साल सचमुच विवादित है। ज्यादातर ब्योरे उनकी मृत्यु 1649 या 1650 में बताते हैं।
तुकाराम का अभंग क्या होता है?
अभंग चार पंक्तियों की एक छोटी मराठी भक्ति-कविता है, जिसकी हर पंक्ति में तीन से आठ अक्षर होते हैं, और जिसे कीर्तन में और तीर्थयात्रा के दौरान गाया जाता है। ब्रिटानिका इस शब्द का अर्थ ‘अखंड’ बताता है। तुकाराम के अभंग हमेशा उनकी छाप, ‘तुका म्हणे’, के साथ आते हैं, जिसका अर्थ है ‘तुका कहता है’।
तुकाराम गाथा क्या है?
तुकाराम गाथा उनके अभंगों का संग्रह है। 1867 से आगे के छपे संस्करणों में लगभग 4,100 से 4,650 कविताएँ हैं, और बंबई सरकार की मदद से 1873 में छपी इंदु प्रकाश प्रति को मानक पाठ माना जाता है। छपाई से पहले दो सदियों तक पांडुलिपियों की नकल होती रही और उनमें सुधार होते रहे, इसलिए विद्वान किसी एक कविता को थोड़ी सावधानी से पढ़ते हैं।
क्या इंद्रायणी में तुकाराम की पोथियों वाली कहानी सच है?
यह एक परंपरा है, कोई दर्ज घटना नहीं। कहानी कहती है कि उन्हें अपनी पोथियाँ इंद्रायणी में डुबोने पर मजबूर किया गया, और 13 दिन उपवास करने के बाद वे बिना नुकसान के ऊपर आ गईं। हाँ, यह कहानी उस असली दुश्मनी को जरूर दिखाती है, जो रसूख वाले कुछ लोगों ने एक शूद्र कवि के प्रति दिखाई।
क्या संत तुकाराम शिवाजी से मिले थे?
यह मुलाकात अठारहवीं सदी के जीवनीकार महीपति की सुनाई एक कहानी है, और विद्वान इसकी पुष्टि नहीं कर पाए हैं। तुकाराम की मृत्यु के समय शिवाजी सिर्फ लगभग 20 साल के थे, और मराठा राज्य तब तक बना नहीं था। शिवाजी के आध्यात्मिक सलाहकार के रूप में आम तौर पर जिस संत का नाम लिया जाता है, वे रामदास हैं।
संत तुकाराम की मृत्यु कैसे हुई?
पक्के तौर पर कोई नहीं जानता। वारकरी मानते हैं कि वे देहू से सशरीर विष्णु के धाम वैकुंठ गए, जबकि ब्रिटानिका यह मान्यता दर्ज करता है कि वे नदी में डूब गए। अनुवादक दिलीप चित्रे उनकी विदाई वाली कविताओं को गाँव छोड़कर जाने के रूप में पढ़ते हैं, और इनमें से कोई भी ब्योरा दर्ज रिकॉर्ड नहीं है।
संत तुकाराम पालखी क्या है?
यह पालकी की वह यात्रा है, जो तुकाराम की पादुका, यानी उनके प्रतीकात्मक चरण-चिह्न, विठोबा के आषाढ़ी उत्सव के लिए देहू से पंढरपुर ले जाती है। वारकरी संतों के अभंग गाते हुए इसके साथ पैदल चलते हैं। 2026 की यात्रा का 7 जुलाई 2026 को देहू से निकलना तय था, और इसे 341वीं यात्रा गिना गया।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. संत तुकाराम के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. उनका जन्म पैठण के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 2. उनके पिता के पास देहू में गाँव के महाजन का पुश्तैनी पद था। 3. उन्होंने अपनी भक्ति-कविता मुख्य रूप से अभंग छंद में रची। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) तुकाराम देहू के शूद्र कुनबी थे; पैठण के ब्राह्मण संत एकनाथ थे।
2. निम्नलिखित मराठी संतों में से किसके पद सिखों के आदि ग्रंथ में शामिल हैं?
- (a) तुकाराम
- (b) एकनाथ
- (c) नामदेव
- (d) ज्ञानेश्वर
उत्तर: (c) नामदेव के कुछ पद सिखों के धर्मग्रंथ आदि ग्रंथ में शामिल हैं।
3. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ज्ञानेश्वरी भगवद्गीता पर मराठी में लिखी गई एक पद्य टीका है। 2. एकनाथ ने ज्ञानेश्वरी का सुधारा हुआ संस्करण तैयार किया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) ज्ञानदेव ने तेरहवीं सदी के आखिर में ज्ञानेश्वरी रची, और सोलहवीं सदी में एकनाथ ने इसके बिगड़ चुके पाठ को सुधारा।
4. संत और स्थान के निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. तुकाराम और देहू 2. ज्ञानेश्वर और आलंदी 3. एकनाथ और पंढरपुर। ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 1 और 2
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) एकनाथ का संबंध गोदावरी के किनारे बसे पैठण से है, पंढरपुर से नहीं।
5. तुकाराम गाथा के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. देहू में तुकाराम के अपने हाथ से लिखी गाथा की एक पूरी पांडुलिपि बची हुई है। 2. गाथा के छपे संस्करणों में अभंगों की संख्या अलग-अलग है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b) देहू की पांडुलिपि में सिर्फ लगभग 250 कविताएँ हैं, और 1867 से 1913 तक के छपे संस्करणों में लगभग 4,100 से लेकर 4,600 से ज्यादा तक अभंग हैं, जबकि एक संस्करण इस दायरे से बहुत बाहर है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- भक्ति साहित्य की प्रकृति और भारतीय संस्कृति में उसके योगदान का मूल्यांकन कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2021, GS पेपर I।
- “संत तुकाराम की कविता ने जाति के घमंड पर चोट की, लेकिन जाति को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में चुनौती नहीं दी।” उनके जीवन और अभंगों के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- मध्यकालीन महाराष्ट्र में वारकरी परंपरा ने धार्मिक भक्ति को ब्राह्मणवादी व्यवस्था से बाहर के लोगों तक कैसे पहुँचाया? नामदेव और तुकाराम के उदाहरण से स्पष्ट कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- संत तुकाराम के जीवन के बारे में ऐतिहासिक रिकॉर्ड किन बातों का समर्थन करता है और परंपरा क्या मानती है, इन दोनों में अंतर स्पष्ट कीजिए। एक इतिहासकार के लिए यह अंतर क्यों मायने रखता है? (10 अंक, 150 शब्द)
- “महाराष्ट्र के संतों ने मराठा शक्ति के उदय की जमीन तैयार की।” इस मत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)