सुसंगत नीति-निर्माण (Coherent Policymaking) — आयाम, NGO, FCRA और UPSC नोट्स
सुसंगत नीति-निर्माण पर UPSC GS-II गाइड — क्षैतिज, ऊर्ध्वाधर और अंतरराष्ट्रीय सुसंगति, NGO और सिविल सोसाइटी की भूमिका, FCRA संशोधन 2020, बाधाएँ और सुधार दिशा।
भारत जैसे विशाल और विविध संघीय लोकतंत्र में नीतियाँ अच्छे विचारों के अभाव से शायद ही विफल होती हैं। वे इसलिए विफल होती हैं क्योंकि विचार एक-दूसरे से टकराते हैं — कोई गरीबी उन्मूलन योजना कृषि मूल्य नीति को कमज़ोर कर देती है; कोई निर्यात-प्रोत्साहन किसी पर्यावरणीय नियमन का खंडन कर बैठता है; कोई सामाजिक कल्याण आदेश राजकोषीय क्षमता से आगे निकल जाता है। सुसंगत नीति-निर्माण (Coherent Policymaking) वह अनुशासन है जिसमें नीतियों को इस तरह डिज़ाइन, क्रियान्वित और मूल्यांकित किया जाता है कि उनके उद्देश्य एक-दूसरे को रद्द करने के बजाय परस्पर पुष्ट करें।
2030 सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals, SDGs) को अपनाए जाने के बाद से यह विषय केन्द्रीय हो गया है, क्योंकि वहाँ लक्ष्य स्पष्ट रूप से परस्पर जुड़े हुए हैं। UPSC GS-II के लिए सुसंगत नीति-निर्माण शासन (Governance), NGO/नागरिक समाज की भूमिका तथा FCRA जैसे समकालीन विवादों से जुड़ता है।
क्यों ज़रूरी है यह विषय? भारत के पास नीतियों की कमी कभी नहीं रही — कमी रही है उनके बीच तालमेल की। PMGSY सड़कें बनाती है, जबकि वन संरक्षण कानून वहीं कुछ ख़ास परिस्थितियों में सड़क-निर्माण को सीमित करता है। MNREGA खेत-मज़दूरी के स्तर को ऊपर उठाती है, जबकि कृषि MSP नीति को इस वेतन-वृद्धि का संज्ञान लेने में वर्षों लगते हैं। ऐसे विरोधाभास नीतिगत असंगति (policy incoherence) के सजीव उदाहरण हैं।
सुसंगत नीति-निर्माण के लाभ
- एकाधिक नीति लक्ष्यों को समन्वित ढंग से साधने में सहायक।
- क्षेत्रों के बीच विरोधाभास और टकराव कम करता है।
- विभिन्न क्षेत्रों और स्तरों के बीच तालमेल (synergy) को अधिकतम करता है।
- व्यापक दृष्टिकोण अपनाने पर शासन में उच्च दक्षता और प्रभावशीलता लाता है।
- परिणामों में निरंतरता रहने से सरकार पर जनविश्वास बनता है।
सुसंगति का अभाव कई शासन-समस्याएँ उत्पन्न करता है:
- विभाजन (Compartmentalisation) और साइलो-सोच।
- नीतिगत प्रयासों का विखंडन (fragmentation)।
- मंत्रालयों के बीच परस्पर प्रतिस्पर्धी और असंगत उद्देश्य।
- असंगत नीति-मिश्रण — संकेत आपस में टकराते हैं।
UPSC परिप्रेक्ष्य: GS-II में स्थान
सुसंगत नीति-निर्माण सीधे तौर पर शासन (Governance), लोक सेवा, सहकारी संघवाद, NGO तथा सिविल सोसाइटी से जुड़ता है। इसका विश्लेषण करते समय अभ्यर्थी को मंत्रालयीय समन्वय, नीति आयोग की भूमिका, राज्य-केंद्र संबंध और SDG कार्यान्वयन — चारों आयामों को जोड़ना चाहिए।
सुसंगत नीति-निर्माण के तीन आयाम
क्षैतिज सुसंगति (Horizontal coherence)
- विभिन्न क्षेत्रों के बीच या एक से अधिक क्षेत्रों में फैले क्रॉस-कटिंग मुद्दों के बीच।
- उदाहरण: बाल-पोषण के परिणामों के लिए पोषण (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय), स्वास्थ्य (स्वास्थ्य मंत्रालय), शिक्षा (शिक्षा मंत्रालय), कृषि (बायोफ़ोर्टिफ़ाइड फ़सलों के लिए) और जल एवं स्वच्छता (जल शक्ति) को एक साथ काम करना ज़रूरी है।
- अतिरिक्त उदाहरण: शहरी वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए MoEFCC + पेट्रोलियम मंत्रालय (BS-VI ईंधन) + सड़क परिवहन मंत्रालय (वाहन-स्क्रैपिंग) + ऊर्जा मंत्रालय (कोयला-संक्रमण) — सभी का एकसाथ चलना अनिवार्य है।
ऊर्ध्वाधर सुसंगति (Vertical coherence)
- स्थानीय योजनाओं, राष्ट्रीय नीति और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के बीच।
- उदाहरण: पेरिस समझौते के जलवायु लक्ष्य → राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDCs) → जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य-योजनाएँ → ज़िला-स्तरीय क्रियान्वयन।
- संवैधानिक आधार: सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) और 73वें-74वें संशोधन ऊर्ध्वाधर सुसंगति की संस्थागत मांग करते हैं — पंचायतों और नगरपालिकाओं के माध्यम से ही केंद्रीय नीतियाँ अंतिम लाभार्थी तक पहुँच पाती हैं।
अंतरराष्ट्रीय सुसंगति (International coherence)
- विभिन्न देशों की नीति-डोमेनों के बीच, जो सीमा-पार स्पिल-ओवर प्रभावों को संबोधित करती हैं।
- उदाहरण: व्यापार नीति, बौद्धिक संपदा (IP) नीति, प्रवासन नीति — साझेदार देशों के बीच सुसंगति आवश्यक।
- हाल का संदर्भ: EU का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) भारत की निर्यात-केंद्रित MSME नीति को सीधे प्रभावित करेगा — यानी यूरोप की पर्यावरण नीति और भारत की औद्योगिक नीति के बीच सुसंगति आवश्यक हो गई है।
सुसंगति के मार्ग में आने वाली बाधाएँ
- मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच अपर्याप्त संवाद।
- समन्वय-तंत्रों के लिए पर्याप्त वित्त-पोषण का अभाव।
- ज्ञान और सूचना के आदान-प्रदान में बाधाएँ।
- मिलने और समन्वय करने के लिए स्थलों का अभाव।
- मंत्रालयों के बीच हितों और अधिकार-क्षेत्रों का टकराव।
- साझा ज़िम्मेदारियों में जवाबदेही की धुंधली रेखाएँ।
- एकल-मंत्रालय निर्णयों की तुलना में अधिक समय-साध्य प्रक्रियाएँ।
- मौजूदा रुटीन और परिपाटियों का उन्मूलन कठिन।
- क्रॉस-कटिंग प्रभाव और प्रभावशीलता को मापने में कठिनाई।
- व्यक्तिगत मंत्रालयों द्वारा नियंत्रण, प्रभाव या स्वायत्तता का ह्रास।
- कई क्षेत्रों को एक साथ लाने पर प्राथमिकताओं का तनुकरण।
भारतीय अनुभव की विशेष बाधाएँ
भारत में सुसंगति के मार्ग में कुछ ख़ास बाधाएँ भी हैं — मंत्रालयों के बीच पारंपरिक प्रतिस्पर्धा, IAS-IPS-IFS जैसे विभिन्न सेवाओं की संस्कृतिक भिन्नता, विधायिका और कार्यपालिका के बीच असंगत प्राथमिकताएँ, तथा संघ-राज्य के बीच राजनीतिक मतभेद। पंचवर्षीय योजनाओं के समाप्त होने और तीन-वर्षीय एक्शन एजेंडा की शुरुआत के बाद भी समन्वय की चुनौतियाँ कम नहीं हुई हैं।
नीति सुसंगति को बढ़ावा देने वाले उपकरण
- केंद्र-स्तरीय समन्वय — PMO, कैबिनेट सचिवालय और नीति आयोग के माध्यम से।
- नियामक प्रभाव मूल्यांकन (Regulatory Impact Assessment, RIA) — नीति अपनाने से पहले स्पिल-ओवर प्रभावों का आकलन।
- बहु-हितधारक परामर्श — मंत्रालय, राज्य, सिविल सोसाइटी और उद्योग की भागीदारी।
- जोखिम प्रबंधन फ़्रेमवर्क।
- क्रॉस-मंत्रालय डेटा साझाकरण — DigiLocker, Aadhaar, इंडिया स्टैक।
- बहुस्तरीय शासन (multilevel governance) — नीति आयोग गवर्निंग काउंसिल, अंतर्राज्यीय परिषद जैसे मंचों के ज़रिए केंद्र-राज्य-स्थानीय समन्वय।
- क्षेत्रीय समन्वय मंच — कैबिनेट कमेटियाँ, संकट के समय Empowered Groups।
NGO और सिविल सोसाइटी की विकास-प्रक्रिया में भूमिका
गैर-सरकारी संगठन (Non-Governmental Organisations, NGOs) लाभ-निरपेक्ष निकाय हैं, जो सरकार के समर्थन से स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। ये व्यापक नागरिक समाज (civil society) का हिस्सा हैं — समुदाय-आधारित, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन, जो सामाजिक, मानवीय या पर्यावरणीय लक्ष्यों के लिए कार्यरत हैं।
NGO की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ
- अंतर-सरकारी वार्ताओं की प्रेरक शक्ति — खतरनाक अपशिष्टों के नियमन से लेकर बारूदी सुरंगों पर वैश्विक प्रतिबंध, और गुलामी विरोधी अभियानों तक।
- विधायी सुधारों को बढ़ावा — कमज़ोर वर्गों के अधिकारों और सेवाओं को प्रभावित करने वाले महत्त्वपूर्ण सुधारों के लिए सरकार पर दबाव।
- स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, सामाजिक समावेशन और कौशल-वृद्धि में क्षमता-निर्माण।
- गरीबी और भुखमरी का उन्मूलन।
- निर्वाचनी लोकतंत्र की पूरकता — कल्याण योजनाओं और उभरते मुद्दों पर सरकारों को जनमत से अवगत कराते हैं।
- सामुदायिक भागीदारी — राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या स्थानीय मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाते हैं और सहभागी लोकतंत्र को मज़बूत करते हैं।
- उद्योग के साथ इंटरफ़ेस — मंत्रालय अक्सर FICCI, CII, ASSOCHAM जैसे उद्योग निकायों के साथ क्षेत्रीय चुनौतियों को समझने के लिए सत्र आयोजित करते हैं।
- सिविल सोसायटियों के बीच प्रतिस्पर्धा नागरिकों और सरकार दोनों के लिए लाभकारी और उत्पादक है।
- कमज़ोर वर्गों की आवाज़ — सेक्स वर्कर, LGBT समुदाय, HIV पीड़ित, हाथ से मैला ढोने वाले, दलित हिंसा-पीड़ित और हिरासत में यातना के शिकार।
- महिला सशक्तीकरण — आजीविका पहलों के माध्यम से।
- नवीन दृष्टिकोण — नौकरशाही चिंतन के बाहर वैकल्पिक समाधान विकसित करने की क्षमता।
NGO की आलोचना
- अनावश्यक PIL — पर्याप्त साक्ष्य के बिना न्यायालयों में दायर, जिससे उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में PIL-संस्कृति का प्रसार हुआ।
- जिन समूहों का समर्थन करते हैं, उनके निहित स्वार्थों को बढ़ावा।
- अभिजात कब्ज़ा (elite capture) — कई NGO संस्थापकों के महिमामंडन के साधन बन जाते हैं।
- FCRA के तहत विदेशी फ़ंडिंग का दुरुपयोग।
- सीमित डेटा के आधार पर भ्रामक तर्कों से दबाव बनाना।
- पूर्ण लोकतांत्रिक होने का दावा कठिन — वे समाज के केवल एक छोटे, फंडेड वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आगे का मार्ग
- स्वैच्छिक क्षेत्र (voluntary sector) को सक्षम ढाँचे के साथ मज़बूत बनाना; विश्वास और सम्मान का पुनर्निर्माण।
- स्वैच्छिक क्षेत्र के लिए नोडल मंत्रालय — एकसमान रिपोर्टिंग दिशानिर्देश और एकल-खिड़की पंजीकरण।
- कार्य-मानकों और अनुकूलनशीलता के लिए क्षमता-निर्माण; युवाओं में स्वयंसेवा की भावना का पुनर्जागरण।
- स्वैच्छिक क्षेत्र के प्रति सरकारी अधिकारियों और कॉर्पोरेट क्षेत्र में व्यवहारिक परिवर्तन।
- राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सरकार-स्वैच्छिक क्षेत्र की भागीदारी और परस्पर विश्वास।
- गुणवत्ता मानकों, जवाबदेही, पारदर्शिता और भरोसे के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (National Accreditation Council)।
- स्वैच्छिक क्षेत्र की स्पष्ट परिभाषा — निजी अस्पताल, धार्मिक संगठन, स्कूल, खेल क्लब, RWA जैसी संस्थाओं के ढीले समावेशन से संख्याएँ बढ़ती हैं और विश्वसनीयता घटती है।
- वास्तविक NGOs को विदेशी अनुदान प्राप्त करने में सक्षम बनाने के लिए FCRA प्रावधानों में लचीलापन।
FCRA (संशोधन) अधिनियम, 2020
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act, FCRA) में 2020 के संशोधनों के विरुद्ध NGO और स्वैच्छिक क्षेत्र ने अनेक चिंताएँ उठाई हैं। आलोचकों का आरोप है कि प्रावधान इस क्षेत्र का दम घोंट रहे हैं।
2020 संशोधन की मुख्य विशेषताएँ
- एक प्राप्तकर्ता से दूसरी संस्था को विदेशी अंशदान का अंतरण निषिद्ध।
- प्रशासनिक व्यय की सीमा विदेशी निधियों के 50% से घटाकर 20%।
- संदिग्ध उल्लंघनों की जाँच लंबित रहने के दौरान केंद्र किसी संगठन को विदेशी अंशदान का उपयोग न करने का निर्देश दे सकता है।
- विदेशी अंशदान नई दिल्ली स्थित स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) की शाखा के निर्दिष्ट FCRA खाते में जमा कराना अनिवार्य।
- अनुमोदन के लिए केंद्र मुख्य पदाधिकारियों के आधार नंबर प्राप्त कर सकता है।
- अनुपालन न करने पर NGO का निलंबन।
- FCRA पंजीकरण की सरेंडर की व्यवस्था।
संशोधन के पक्ष में तर्क
- कुछ विदेशी शक्तियाँ और गैर-राज्य कर्ता (non-state actors) भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप के समान गतिविधियाँ करते हैं।
- प्राप्तकर्ता संस्थाओं की प्रभावी निगरानी और जवाबदेही।
- NGO अपनी स्वयं की कार्य-शक्ति के बल पर बढ़ने की अपेक्षा रखते हैं।
- कुछ NGO में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है और मालिक उच्च वेतन लेते हैं।
- कुछ NGO बिना जाँच के विदेशी अंशदान को अन्य संस्थाओं की ओर मोड़ रहे थे।
- विदेशी अंशदान का अनुमोदन एक निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए होता है — निधियों के डायवर्ज़न से निगरानी जटिल हो जाती है।
- FCRA संप्रभुता और अखंडता का क़ानून है — विदेशी पैसा भारत में सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक और सामाजिक विमर्श पर हावी न हो, यह सुनिश्चित करता है।
- केंद्रीकृत SBI दिल्ली शाखा — विदेशी अंशदान की निगरानी सरल बनाती है।
संशोधन की आलोचना
- सर्वव्यापी प्रकृति — सभी विदेशी अंशदानों को आतंक-वित्तपोषण या मनी लॉन्ड्रिंग के रूप में चिह्नित करना अनुचित।
- कई भारतीय नागरिक प्रवासी चैनलों के माध्यम से अपने देश के विकास में योगदान देना चाहते हैं।
- असंगति: सरकार FDI को आसान बना रही है, जबकि विदेशी अंशदान के नियम कठोर हो रहे हैं।
- एक बैंक, एक शाखा, एक शहर — डिजिटल युग में अतार्किक।
- राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर केंद्र को खुली छूट नहीं हो सकती; उसे यह स्थापित करना होगा कि सुरक्षा को कैसे ख़तरा है।
- अंतरण पर सर्वव्यापी प्रतिबंध इस तथ्य की उपेक्षा करता है कि कई NGO सब-ग्रांट के माध्यम से सहयोग करते हैं।
- कई NGO पूरे देश में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं और किसी क़ानून के उल्लंघन में नहीं पाए गए हैं।
FCRA पर तुलनात्मक तालिका — पक्ष बनाम विपक्ष
| पहलू | सरकार का पक्ष | सिविल सोसाइटी का पक्ष |
|---|---|---|
| अंतरण पर रोक | डेज़ी-चेन तनुकरण रोकने हेतु आवश्यक | सब-ग्रांट से ज़मीनी सहयोग रुक जाता है |
| प्रशासनिक व्यय 20% | क्षेत्रीय कार्य पर अधिक धन सुनिश्चित | शोध, कानूनी और लेखा-परीक्षा खर्चे असंभव |
| SBI दिल्ली खाता | केंद्रीकृत निगरानी | डिजिटल युग में अनावश्यक भौतिक केंद्रीकरण |
| अनुमोदन व आधार | पदाधिकारियों की पहचान सत्यापित | गोपनीयता और निजता पर प्रश्न |
आगे का मार्ग
- क़ानून के उद्देश्यों और स्वैच्छिक संगठनों के विदेशी निधि-पहुँच के अधिकारों के बीच संतुलन।
- श्रेणीबद्ध जाँच (graduated scrutiny) — सर्वव्यापी नियंत्रण के बजाय जोखिम-आधारित निरीक्षण।
- निलंबित या रद्द पंजीकरणों के लिए पारदर्शी अपील-तंत्र।
- NGO के लिए नियमित FCRA अनुपालन प्रशिक्षण।
हालिया घटनाक्रम (2024-26)
- कई बड़े NGO के FCRA पंजीकरण रद्द हुए, जिससे सिविल सोसाइटी में चिंता बढ़ी।
- केंद्रीय गृह मंत्रालय नियमों को स्पष्ट कर रहा है; FCRA पोर्टल का उन्नयन जारी।
- NGO पंजीकरण के लिए नीति आयोग का दर्पण पोर्टल आधुनिक बनाया गया।
- कंपनी अधिनियम 2013 के अंतर्गत CSR नियम परिष्कृत; NGO के माध्यम से विशिष्ट क्षेत्रों के लिए धन प्रवाहित।
- अद्यतन संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट ने FCRA 2020 के प्रमुख प्रावधानों की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी (नोएल हार्पर बनाम भारत संघ, 2022) — कार्यपालिका को व्यापक स्वतंत्रता मिली। विशिष्ट रद्दीकरणों को चुनौती देने वाली कई PIL लंबित हैं।
UPSC प्रासंगिकता
प्रीलिम्स के लिए याद रखें:
- FCRA, 2010 और FCRA संशोधन, 2020।
- NGO के लिए नीति आयोग दर्पण पोर्टल।
- कंपनी अधिनियम 2013 की धारा-8 — NGO का प्रमुख माध्यम।
- नोएल हार्पर बनाम भारत संघ (2022) — FCRA 2020 की वैधता।
- SDG लक्ष्य 17 — साझेदारियाँ; नीतिगत सुसंगति का वैश्विक माप।
मुख्य परीक्षा (GS-II):
- भारत में सुसंगत नीति-निर्माण की अवधारणा और इसके मार्ग की बाधाओं पर चर्चा कीजिए।
- भारतीय विकास-प्रक्रिया में NGO की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
- FCRA (संशोधन) अधिनियम 2020 का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
अभ्यास प्रश्न: “नीतिगत असंगति शासन की अदृश्य लागत है।” इस कथन के आलोक में भारत में सुसंगत नीति-निर्माण के लिए संस्थागत उपायों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
निबंधों में सुसंगत नीति-निर्माण शासन, लोक प्रशासन और सहकारी संघवाद की वास्तुकला को जोड़ने वाला परिष्कृत विषय है — SDG कार्यान्वयन और भारतीय विकास-नीति के भविष्य से इसका प्रत्यक्ष संबंध है।
सामान्य प्रश्न
सुसंगत नीति-निर्माण क्या है?
यह नीतियों को इस तरह डिज़ाइन और क्रियान्वित करने का अनुशासन है कि उनके उद्देश्य आपस में टकराने के बजाय एक-दूसरे को मज़बूत करें।
नीति सुसंगति के तीन आयाम कौन से हैं?
क्षैतिज (विभिन्न मंत्रालयों/क्षेत्रों के बीच), ऊर्ध्वाधर (केंद्र-राज्य-स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के बीच), और अंतरराष्ट्रीय (देशों के बीच नीति-समन्वय)।
भारत में नीति सुसंगति की मुख्य बाधाएँ क्या हैं?
मंत्रालयों के बीच अपर्याप्त संवाद, हितों का टकराव, धुंधली जवाबदेही, समन्वय-स्थलों का अभाव और मापन-संबंधी कठिनाइयाँ।
FCRA संशोधन 2020 के मुख्य प्रावधान क्या हैं?
विदेशी अंशदान के अंतरण पर रोक, प्रशासनिक व्यय की सीमा 50% से 20%, SBI दिल्ली में निर्दिष्ट खाता, पदाधिकारियों के लिए आधार और जाँच के दौरान निधि-उपयोग रोकने का अधिकार।
NGO की विकास-प्रक्रिया में मुख्य भूमिकाएँ क्या हैं?
नीति-समर्थन, क्षमता-निर्माण, कमज़ोर वर्गों की आवाज़, सहभागी लोकतंत्र को मज़बूती, और सरकार-समाज के बीच पुल का काम।
नोएल हार्पर बनाम भारत संघ (2022) का क्या महत्व है?
सुप्रीम कोर्ट ने FCRA 2020 के प्रमुख संशोधनों की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी, जिससे विदेशी अंशदान पर कार्यपालिका को व्यापक नियंत्रण-शक्ति मिली।
नीति आयोग का दर्पण पोर्टल क्या है?
दर्पण (Darpan) पोर्टल NGO के पंजीकरण और सरकारी अनुदान आवेदन का केंद्रीकृत मंच है, जिसे हाल में आधुनिकीकृत किया गया है।
नीति-सुसंगति को मज़बूत करने वाले संस्थागत उपकरण कौन से हैं?
नियामक प्रभाव मूल्यांकन (RIA), बहु-हितधारक परामर्श, क्रॉस-मंत्रालय डेटा साझाकरण (इंडिया स्टैक), नीति आयोग गवर्निंग काउंसिल, अंतर्राज्यीय परिषद और कैबिनेट कमेटियाँ।
स्वैच्छिक क्षेत्र की स्पष्ट परिभाषा क्यों ज़रूरी है?
निजी अस्पताल, धार्मिक संगठन, स्कूल, RWA जैसी संस्थाओं के ढीले समावेशन से NGO क्षेत्र की संख्या भ्रामक रूप से बढ़ती है और वास्तविक संगठनों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
SDG और नीति-सुसंगति का क्या संबंध है?
2030 एजेंडा का लक्ष्य 17 स्पष्ट रूप से ‘नीति सुसंगति’ (Policy Coherence for Sustainable Development) पर केंद्रित है — यानी विकास, पर्यावरण और सामाजिक नीति को एक साथ साधना।