तुंगुराहुआ ज्वालामुखी और इक्वाडोर का UNESCO ग्लोबल जियोपार्क
तुंगुराहुआ इक्वाडोर का मशहूर एंडियन स्ट्रैटोवोल्कैनो है। UNESCO ने 2025 में इसके आसपास के इलाक़े को ग्लोबल जियोपार्क नेटवर्क में जोड़ा — ज्वालामुखी भू-दृश्य, क्विचुआ विरासत और पास्ताज़ा के बादल-वन इसकी वजह रहे।
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी दक्षिण अमेरिका के सबसे शानदार सक्रिय स्ट्रैटोवोल्कैनो में से एक है, जो इक्वाडोर के तुंगुराहुआ प्रांत में एंडीज़ पर्वतों से 5,023 मीटर ऊपर उठता है। बर्फ़ और ग्लेशियर से ढका इसका शंकु ऊपरी पास्ताज़ा घाटी पर छाया रहता है और नीचे बसे मशहूर पर्यटन कस्बे बान्योस दे अगुआ सांता को देखता रहता है। अप्रैल 2025 में UNESCO ने आसपास के इलाक़े को नया UNESCO ग्लोबल जियोपार्क घोषित किया — इक्वाडोर का तीसरा — और इस तरह तुंगुराहुआ ज्वालामुखी का इलाक़ा उन क्षेत्रों के वैश्विक नेटवर्क में जुड़ गया जिनकी भूवैज्ञानिक विरासत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम मानी जाती है।
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी दक्षिण अमेरिकी प्लेट के पश्चिमी किनारे पर बैठा है, जहाँ समुद्री नाज़्का प्लेट क़रीब 5-7 सेंटीमीटर प्रति साल की रफ़्तार से नीचे धँस रही है। इसी धँसाव ने पूरा एंडियन ज्वालामुखी चाप बनाया है, और तुंगुराहुआ ज्वालामुखी उसके उत्तरी ज्वालामुखी क्षेत्र (Northern Volcanic Zone) का हिस्सा है।
कहाँ है और भौगोलिक बनावट कैसी है
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी इक्वाडोर की राजधानी क्विटो से क़रीब 140 किलोमीटर दक्षिण में है, एंडीज़ की उन पूर्वी ढलानों पर जहाँ पर्वतमाला अमेज़न बेसिन की तरफ़ उतरने लगती है। यह ज्वालामुखी सांगाय राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है, जो ख़ुद 1983 में UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित हुआ था। अमेज़न की एक बड़ी सहायक नदी पास्ताज़ा, जो आगे मारान्योन को पानी देती है, शंकु के उत्तरी हिस्से में गहरी घाटी काटती है।
एंडीज़ वाला इलाक़ा
एंडीज़ धरती की सबसे लंबी महाद्वीपीय पर्वत शृंखला है, जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी किनारे पर क़रीब 7,000 किलोमीटर तक फैली है। इसे तीन हिस्सों में बाँटा जाता है — उत्तरी, मध्य और दक्षिणी एंडीज़ — और हर हिस्से का अपना सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र है। इनके बीच ऐसे अंतराल भी हैं जहाँ प्लेट के धँसने का कोण इतना कम पड़ जाता है कि मैग्मा बनता ही नहीं। तुंगुराहुआ ज्वालामुखी उत्तरी ज्वालामुखी क्षेत्र में आता है, कोटोपैक्सी, चिम्बोराज़ो, पिचिंचा और रेवेंतादोर के साथ।
एंडीज़ में ज्वालामुखी क्यों हैं
नाज़्का प्लेट दक्षिण अमेरिकी प्लेट के नीचे घुसती है और अपने साथ समुद्री पानी और तलछट को मेंटल में गहराई तक खींच ले जाती है। पानी मेंटल की चट्टान के पिघलने का तापमान गिरा देता है, जिससे मैग्मा बनता है। यह मैग्मा ऊपर की परत से होकर उठता है और सतह पर फूटकर स्ट्रैटोवोल्कैनो खड़े करता है। यही प्रक्रिया पूरे प्रशांत घेरे — प्रशांत रिंग ऑफ़ फ़ायर — को धरती की सबसे ज़्यादा ज्वालामुखी गतिविधि वाली पट्टी बना देती है, जहाँ दुनिया के क़रीब 75 प्रतिशत सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं।
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी को नज़दीक से देखिए
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी एक क्लासिक स्ट्रैटोवोल्कैनो है — गाढ़े लावा, राख और पायरोक्लास्टिक मलबे की एक के ऊपर एक जमी परतों से बना खड़ी ढलान वाला शंकु। इसकी चोटी हमेशा बर्फ़ से ढकी रहती है, और वहाँ के ग्लेशियर चाम्बो और प्वेला नदियों को शुरुआती पानी देते हैं। क्विचुआ भाषा में तुंगुराहुआ दो शब्दों से मिलकर बना है — तुंगुर (गला) और राहुआ (आग) — यानी ‘आग का गला’। यह नाम उस ज्वालामुखी पर ठीक बैठता है जिसका शिखर-क्रेटर सक्रिय दौर में रातों को लाल दहकता दिखता है।
हाल के विस्फोटों का इतिहास
80 साल की चुप्पी के बाद तुंगुराहुआ ज्वालामुखी अक्टूबर 1999 में फिर जागा और लंबे विस्फोटक दौर में चला गया। 2006, 2008, 2010, 2011, 2014 और 2016 में बड़ी हलचलें हुईं, जिनसे कई किलोमीटर ऊँचे राख के स्तंभ उठे और पश्चिमी ढलान पर पायरोक्लास्टिक प्रवाह उतरे। वास्कुन और हुइवे घाटियों में लाहर (ज्वालामुखी वाली कीचड़ बाढ़) बह निकले। 2006 के विस्फोट में पालितावा गाँव के कम से कम छह लोग मारे गए और हज़ारों लोग बेघर हुए।
अब इस ज्वालामुखी को शांत, निगरानी वाले दौर में माना जाता है, लेकिन क्विटो की Escuela Politecnica Nacional का Instituto Geofisico लगातार भूकंपीय, GPS और गैस निगरानी रखता है।
ख़तरे वाले इलाक़े और लाहर
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी के आसपास नागरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती लावा नहीं है — ज़्यादातर लावा मुहाने से कुछ किलोमीटर के भीतर ही रुक जाता है — बल्कि लाहर हैं। ये पिघले पानी, राख और मलबे के अचानक आने वाले बहाव हैं, जो सँकरी घाटियों में 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ सकते हैं। क़रीब 20,000 लोगों की आबादी और चलती-फिरती पर्यटन अर्थव्यवस्था वाला बान्योस दे अगुआ सांता सीधे लाहर के ख़तरे वाले रास्ते पर बसा है, और वहाँ पूरी तरह अभ्यास की हुई निकासी योजना मौजूद है।
UNESCO ग्लोबल जियोपार्क कार्यक्रम
UNESCO ग्लोबल जियोपार्क एक जुड़ा हुआ भौगोलिक इलाक़ा होता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम भूवैज्ञानिक स्थल और भू-दृश्य होते हैं, और जिसे सुरक्षा, शिक्षा और टिकाऊ विकास — तीनों को एक साथ देखते हुए चलाया जाता है। यह दर्जा 2015 में बनाया गया और यह पुराने विश्व धरोहर और बायोस्फ़ीयर रिज़र्व कार्यक्रमों का पूरक है।
ग्लोबल जियोपार्क के तीन खंभे
- भू-संरक्षण: अंतरराष्ट्रीय महत्व की भूवैज्ञानिक विरासत को पहचानना और बचाना
- शिक्षा: पगडंडियों, संग्रहालयों और स्कूलों से जुड़ाव के ज़रिए लोगों को पृथ्वी विज्ञान समझाना
- टिकाऊ विकास: भूविज्ञान को नुक़सान पहुँचाए बिना जियोटूरिज़्म से स्थानीय लोगों की कमाई बढ़ाना
UNESCO ग्लोबल जियोपार्क की हर चार साल में दोबारा जाँच होती है, और मानक गिरने पर यह दर्जा छिन भी सकता है।
इक्वाडोर को 2025 में मिला दर्जा
UNESCO के कार्यकारी बोर्ड ने 2025 में तुंगुराहुआ-चिम्बोराज़ो भूवैज्ञानिक क्षेत्र को ग्लोबल जियोपार्क नेटवर्क में जोड़ा — इम्बाबूरा (2019) और नापो सुमाको (2024) के बाद इक्वाडोर का तीसरा। नए जियोपार्क में ज्वालामुखी से बनी भू-आकृतियाँ, चिम्बोराज़ो पर हिमनद से बनी संरचनाएँ (चिम्बोराज़ो धरती के केंद्र से सबसे दूर पड़ने वाला बिंदु है), और क्विचुआ आदिवासी सांस्कृतिक स्थल शामिल हैं। अब 50 देशों में 200 से ज़्यादा UNESCO ग्लोबल जियोपार्क हो चुके हैं।
भारत और जियोपार्क
भारत में अभी एक भी UNESCO ग्लोबल जियोपार्क नहीं है, जबकि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) एक अस्थायी सूची रखता है जिसमें महाराष्ट्र की लोनार झील, हिमाचल की सॉल्ट रेंज, शिवालिक जीवाश्म पार्क, और कर्नाटक में सेंट मैरीज़ आइलैंड्स के पास के ज्वालामुखीय दक्कन ट्रैप शामिल हैं। राष्ट्रीय भूविरासत विधेयक का मसौदा बन चुका है, पर अब तक पास नहीं हुआ। इक्वाडोर को तुंगुराहुआ का दर्जा मिलने के बाद भारत के खान मंत्रालय ने दोहराया है कि वह 2028 तक कम से कम एक जियोपार्क का नाम भेजना चाहता है।
UPSC के लिए यह क्यों मायने रखता है
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी का मामला UPSC के कई हिस्सों को छूता है — एंडीज़ की विवर्तनिकी, रिंग ऑफ़ फ़ायर, आपदा प्रबंधन, आदिवासी विरासत, और UNESCO के भूविरासत कार्यक्रम का बहुपक्षीय ढाँचा। भारत की अपनी ज्वालामुखी विरासत (दक्कन ट्रैप, अंडमान सागर में बैरन द्वीप) से तुलना करने के लिए भी यह काम का उदाहरण है।
भारतीय ज्वालामुखी भू-दृश्यों से तुलना
| पहलू | तुंगुराहुआ (इक्वाडोर) | बैरन द्वीप (भारत) | दक्कन ट्रैप (भारत) |
|---|---|---|---|
| प्रकार | सक्रिय स्ट्रैटोवोल्कैनो | भारत का इकलौता सक्रिय ज्वालामुखी | बुझे हुए फ़्लड बेसाल्ट |
| उम्र | 14,000 साल से कम | होलोसीन, आख़िरी विस्फोट 2022 | 6.6 करोड़ साल |
| बनावट | प्लेट का धँसना (नाज़्का-दक्षिण अमेरिकी) | प्लेट का धँसना (भारतीय-बर्मा) | रीयूनियन हॉटस्पॉट |
| UNESCO दर्जा | ग्लोबल जियोपार्क (2025) | कोई नहीं | अस्थायी सूची |
आदिवासी समुदाय और पास्ताज़ा का जलग्रहण क्षेत्र
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी वाले इलाक़े में किचवा (क्विचुआ) और सलासाका समुदाय रहते हैं। मौसम, मिट्टी और पानी की उनकी पारंपरिक समझ ज्वालामुखी की निचली ढलानों पर चल रहे वनरोपण कार्यक्रमों को राह दिखाती है। नीचे की तरफ़ पास्ताज़ा का जलग्रहण क्षेत्र इक्वाडोर के अमेज़न इलाक़े में रहने वाले आचुआर और शुआर लोगों को सहारा देता है। नया UNESCO ग्लोबल जियोपार्क साफ़ तौर पर आदिवासियों के साथ मिलकर प्रबंधन का मॉडल अपनाता है — यही मॉडल भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण अपने आगे के जियोपार्क प्रस्तावों के लिए पढ़ रहा है।
जियोटूरिज़्म और स्थानीय अर्थव्यवस्था
बान्योस दे अगुआ सांता तुंगुराहुआ ज्वालामुखी तक पहुँचने का दरवाज़ा है और लगभग पूरी तरह पर्यटन पर टिका है — गर्म पानी के सोते, झरनों तक की पैदल यात्राएँ, ज्वालामुखी के सामने लगा Casa del Arbol वाला झूला, और पास्ताज़ा में राफ़्टिंग। उम्मीद है कि जियोपार्क के दर्जे से पाँच साल में रात भर रुकने वाले पर्यटकों की संख्या 15-20 प्रतिशत बढ़ेगी, और पार्क की फ़ीस भूविरासत की सुरक्षा में लगेगी।
सामान्य प्रश्न
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी कहाँ है?
तुंगुराहुआ ज्वालामुखी मध्य इक्वाडोर में है, क्विटो से क़रीब 140 किमी दक्षिण, तुंगुराहुआ प्रांत में एंडीज़ की पूर्वी ढलान पर। यह समुद्र तल से 5,023 मीटर ऊँचा है और सांगाय राष्ट्रीय उद्यान के भीतर पड़ता है।
क्या तुंगुराहुआ ज्वालामुखी अब भी सक्रिय है?
हाँ। 80 साल की ख़ामोशी के बाद तुंगुराहुआ ज्वालामुखी 1999 में फिर जागा और 2016 तक ख़ूब सक्रिय रहा। अभी यह शांत, निगरानी वाले दौर में है, लेकिन इसे बुझा हुआ नहीं माना जाता।
UNESCO ने 2025 में तुंगुराहुआ इलाक़े को अपने ग्लोबल जियोपार्क नेटवर्क में क्यों जोड़ा?
UNESCO ने माना कि इस इलाक़े में सक्रिय एंडियन ज्वालामुखी गतिविधि, पड़ोसी चिम्बोराज़ो पर हिमनद से बनी भू-आकृतियाँ, क्विचुआ आदिवासी विरासत और अच्छी तरह विकसित जियोटूरिज़्म ढाँचा — ये सब मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम हैं।
UNESCO ग्लोबल जियोपार्क और विश्व धरोहर स्थल में क्या फ़र्क़ है?
विश्व धरोहर स्थल एक तय जगह के असाधारण वैश्विक महत्व की रक्षा करता है। ग्लोबल जियोपार्क एक बड़ा, आबाद इलाक़ा होता है जिसे भू-संरक्षण, शिक्षा और टिकाऊ विकास — तीनों के लिए एक साथ चलाया जाता है, और हर चार साल में उसकी दोबारा जाँच ज़रूरी होती है।
भारत के पास कितने UNESCO ग्लोबल जियोपार्क हैं?
भारत के पास अभी एक भी UNESCO ग्लोबल जियोपार्क नहीं है, हालाँकि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण एक अस्थायी सूची रखता है जिसमें लोनार झील, सॉल्ट रेंज और सेंट मैरीज़ आइलैंड्स शामिल हैं।
स्ट्रैटोवोल्कैनो क्या होता है?
स्ट्रैटोवोल्कैनो खड़ी ढलानों वाला शंकु आकार का ज्वालामुखी होता है, जो गाढ़े लावा और पायरोक्लास्टिक मलबे की कई परतों से बनता है। इनका मैग्मा सिलिका और घुली हुई गैस से भरा होता है, इसलिए इनके विस्फोट अक्सर धमाकेदार होते हैं। तुंगुराहुआ ज्वालामुखी, माउंट फ़ूजी और वेसुवियस इसके क्लासिक उदाहरण हैं।
तुंगुराहुआ नाम का मतलब क्या है?
तुंगुराहुआ क्विचुआ भाषा का शब्द है, जो तुंगुर (गला) और राहुआ (आग) से मिलकर बना है — यानी ‘आग का गला’। यह नाम उस लावा और दहकते टेफ़्रा की तरफ़ इशारा करता है जो अक्सर इसकी चोटी पर दिखता है।
प्रशांत रिंग ऑफ़ फ़ायर क्या है?
प्रशांत रिंग ऑफ़ फ़ायर प्रशांत महासागर के किनारे-किनारे घोड़े की नाल जैसी शक्ल में फैली ज्वालामुखियों और भूकंप क्षेत्रों की पट्टी है। दुनिया के क़रीब 75 प्रतिशत सक्रिय ज्वालामुखी — जिनमें तुंगुराहुआ ज्वालामुखी और भारत का बैरन द्वीप भी शामिल हैं — इसी पर पड़ते हैं।