Anantam IASHindi Note · 14 September 2026

यंग बंगाल आंदोलन: डेरोजियो, हिंदू कॉलेज और बंगाल के पहले उग्र सुधारवादी

यंग बंगाल आंदोलन को समझिए: हिंदू कॉलेज में डेरोजियो के तर्कवादी शिष्य, उनकी सभाएँ और पत्रिकाएँ, वे आगे चलकर क्या बने और आंदोलन कहाँ चूक गया।

यंग बंगाल आंदोलन 1820 के दशक के आखिर और 1830 के दशक में कलकत्ता के हिंदू कॉलेज के छात्रों के बीच उठी खुली, तर्क पर टिकी सोच की एक लहर था। इसकी प्रेरणा उनके युवा शिक्षक हेनरी लुई विवियन डेरोजियो थे। उनके शिष्य डेरोजियन कहलाए। इन लोगों ने तर्क के नाम पर हिंदू रूढ़िवाद पर हमला किया, और आगे चलकर अखबारों में प्रेस की आजादी और जूरी द्वारा मुकदमे की सुनवाई के पक्ष में लिखा। यह आंदोलन इसलिए अहम है क्योंकि बंगाल पुनर्जागरण के इस दौर में, आधुनिक भारत में रीति-रिवाज को यह पहली खुली तर्कवादी चुनौती थी। और यह राममोहन राय से भी आगे गया।

ज्यादातर पाठक यंग बंगाल को एक ऐसे संगठन की तरह देखते हैं जिसे डेरोजियो ने बनाया और चलाया। असल में इस आंदोलन का न कोई संविधान था, न सदस्यों की कोई सूची। यह नाम कलकत्ता के समाज ने उनके छात्रों पर चिपका दिया था। और उन्होंने जो कुछ खड़ा किया, उसका बड़ा हिस्सा डेरोजियो के जाने के बाद आया। दबाव में उन्हें अप्रैल 1831 में हिंदू कॉलेज छोड़ना पड़ा, और उसी साल दिसंबर में 22 साल की उम्र में हैजे से उनकी मौत हो गई। यह नोट दो चीजें अलग करके देखता है: डेरोजियो के जीते-जी क्या हुआ, और डेरोजियनों ने बाद में क्या किया। साथ ही यह उस पुराने आरोप को भी तौलता है कि इनका उग्र सुधारवाद (radicalism) कलकत्ता के अंग्रेजी-पढ़े नौजवानों से आगे कभी नहीं पहुँचा।

यंग बंगाल आंदोलन क्या था?

यंग बंगाल एक समूह था, कोई संस्था नहीं। इतिहासकार सिराजुल इस्लाम ने बांग्लापीडिया में लिखा है कि यह नाम एक सामाजिक-बौद्धिक पहचान थी, जो उस समय के कलकत्ता ने डेरोजियो के अनुयायियों को दी। रोसिंका चौधरी के 2025 के अध्ययन के मुताबिक, 1831 में भी इंडिया गजट का संपादक उन्हें ‘रेडिकल्स’ या ‘अल्ट्रा-रिफॉर्मर्स’ (कट्टर सुधारक) कह रहा था। इन्हें एक साथ बाँधने वाली चीजें दो ही थीं: एक ही शिक्षक, और खुलकर बहस करने की आदत।

तथ्यविवरण
नामयंग बंगाल, यह नाम कलकत्ता के समाज ने डेरोजियो के अनुयायियों को दिया; इन्हें डेरोजियन भी कहा जाता है
केंद्रहिंदू कॉलेज, कलकत्ता, जिसकी स्थापना 1817 में हुई और 1855 में जिसका नाम प्रेसिडेंसी कॉलेज रखा गया
प्रेरणाहेनरी लुई विवियन डेरोजियो (1809-1831), अंग्रेजी साहित्य और इतिहास के शिक्षक
सक्रिय दौर1820 के दशक के आखिर से 1840 के दशक तक
सभाएँएकेडमिक एसोसिएशन (1828); सामान्य ज्ञान प्राप्ति सभा (1838)
पत्रिकाएँपार्थेनन (1830), ज्ञानान्वेषण (1831-1844), एनक्वायरर (1831), हिंदू पायनियर (1838), बंगाल स्पेक्टेटर (1842)
प्रमुख सदस्यरामगोपाल घोष, कृष्णमोहन बनर्जी, रसिक कृष्ण मल्लिक, दक्षिणारंजन मुखर्जी, प्यारीचंद मित्र, राधानाथ सिकदार, रामतनु लाहिड़ी
विचारों के स्रोतवोल्टेयर, ह्यूम, लॉक और टॉम पेन जैसे प्रबोधन युग (Enlightenment) के लेखक; फ्रांसीसी क्रांति
मुख्य कमीकिसानों या आम जनता में कोई आधार नहीं; बिपन चंद्र ने इनके उग्र सुधारवाद को किताबी कहा

डेरोजियो कौन थे, और उन्होंने क्या सिखाया?

डेरोजियो कलकत्ता में जन्मे, मिली-जुली वंश-परंपरा के एक कवि थे। वे हिंदू कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य और इतिहास पढ़ाते थे, और अपने छात्रों को हर मान्यता को तर्क की कसौटी पर परखने के लिए उकसाते थे। ब्रिटानिका उनकी जन्मतिथि 18 अप्रैल 1809 बताता है। 1884 में उनकी जीवनी लिखने वाले थॉमस एडवर्ड्स उनके पिता के परिवार को डीरोजारियो नाम की एक पुर्तगाली वंश-शाखा से जोड़ते हैं। इग्नू (IGNOU) की उन पर लिखी इकाई बताती है कि छह साल की उम्र से वे डेविड ड्रमंड की धर्मतला अकादमी में पढ़े। ड्रमंड खुले तौर पर तर्कवादी थे, और उनकी गहरी छाप डेरोजियो पर पड़ी।

शिक्षक बनने से पहले वे कवि थे। उनकी कविताएँ सबसे पहले इंडिया गजट में जुवेनिस के उपनाम से छपीं। 1827 तक वे “मेरे देश! बीते गौरव के दिनों में” जैसी देशभक्ति की पंक्तियाँ लिख रहे थे। इसीलिए बिपन चंद्र की NCERT किताब उन्हें शायद आधुनिक भारत का पहला राष्ट्रवादी कवि कहती है।

हिंदू कॉलेज अपने आप में अलग था। मैकाले के 1835 के मिनट ने सरकारी नीति को अंग्रेजी शिक्षा की ओर मोड़ा, लेकिन यह कॉलेज उससे कई साल पहले से अंग्रेजी साहित्य और यूरोपीय इतिहास पढ़ा रहा था। इसके छात्र कलकत्ता के प्रमुख हिंदू परिवारों से आते थे। यानी यहाँ का शिक्षक शहर के कुलीन वर्ग के बेटों से बात करता था।

डेरोजियो हिंदू कॉलेज में कब आए?

स्रोतों में इस पर मतभेद है, और इसकी वजह जानना काम आता है। ब्रिटानिका और बिपन चंद्र की पुरानी NCERT किताब मॉडर्न इंडिया 1826 बताती हैं, और NCERT उनके पढ़ाने का समय 1826 से 1831 तक रखती है। 1884 में लिखने वाले थॉमस एडवर्ड्स नियुक्ति को मार्च 1828 की बताते हैं, जब वे दूसरी और तीसरी कक्षा के लिए अंग्रेजी साहित्य और इतिहास के मास्टर बने। इग्नू की साहित्य वाली इकाई एडवर्ड्स का ही अनुसरण करती है।

पाठ्यपुस्तकों का मानक साल 1826 है। इसलिए वस्तुनिष्ठ प्रश्न में यही सुरक्षित उत्तर है, और एडवर्ड्स का 1828 एक जाना-पहचाना दूसरा मत है। दोनों में से कोई भी साल लें, डेरोजियो कॉलेज में पाँच साल से कम ही रहे।

डेरोजियो ने क्या सिखाया

किसी पाठ्यक्रम से ज्यादा अहम उनका तरीका था। बांग्लापीडिया दर्ज करता है कि उनके शिष्य ह्यूम और टॉम पेन जैसे प्रबोधन युग के धर्म-आलोचकों को पढ़ते थे, और बहस में उन्हें खुलकर उद्धृत करते थे। डेरोजियो अपने छात्रों से क्या चाहते थे, इसे बिपन चंद्र ने यूँ समेटा है:

1828 में उन्होंने और उनके छात्रों ने एकेडमिक एसोसिएशन की स्थापना की। यह एक वाद-विवाद क्लब था, जिसकी अध्यक्षता डेरोजियो करते थे। ब्रिटानिका के मुताबिक धर्म और दर्शन पर इसकी चर्चाओं में अंग्रेज भी आते थे और भारतीय भी। एडवर्ड्स का दावा है कि कुछ ही महीनों में इसकी रोज रात की बहसों के बाद 12 से 14 नए अखबार निकल आए। इनमें से ज्यादातर भारतीय चलाते थे, और उनमें कट्टर हिंदू धर्म से लेकर भौतिकवाद तक, हर तरह के मत रखे जाते थे।

डेरोजियो को हिंदू कॉलेज से क्यों हटाया गया?

अप्रैल 1831 में कॉलेज की प्रबंध समिति ने डेरोजियो को बाहर का रास्ता दिखाया। रूढ़िवादी अभिभावकों ने उन पर आरोप लगाया था कि वे उनके बेटों को धर्म के खिलाफ कर रहे हैं। कागज पर उन्होंने इस्तीफा दिया, लेकिन उनके अपने पत्र में लिखा है कि यह इस्तीफा मजबूरी का था

असली डर नास्तिकता से ज्यादा धर्म-परिवर्तन का था। स्कॉटिश मिशनरी अलेक्जेंडर डफ ने कॉलेज के पास नौजवानों के सामने भाषण देने शुरू कर दिए थे, और समिति ने पहले अपने छात्रों को ऐसे भाषणों में जाने से रोका। शिवनाथ शास्त्री के 1907 के इतिहास के मुताबिक, फिर केशवचंद्र सेन के दादा रामकमल सेन ने प्रस्ताव रखा कि लड़कों का नैतिक चरित्र बिगाड़ने के लिए डेरोजियो को हटाया जाए। डेविड हेयर और एच. एच. विल्सन ने उनका बचाव किया, और वह प्रस्ताव गिर गया। तब बहुमत ने एक नरम प्रस्ताव पास किया: देश की मौजूदा हालत में उन्हें रखना कॉलेज के लिए नुकसानदेह होगा।

25 अप्रैल 1831 को डेरोजियो ने अपना इस्तीफा भेज दिया, ताकि बर्खास्तगी का औपचारिक नोटिस न झेलना पड़े। एडवर्ड्स ने उनका यह पत्र छापा है। उसमें डेरोजियो विरोध जताते हैं कि उन पर कोई आरोप तय नहीं किया गया, और उन्हें आरोप लगाने वालों का सामना करने का मौका तक नहीं दिया गया। जिन अफवाहों को उन्होंने खारिज किया, शास्त्री उन्हें इस तरह गिनाते हैं:

तो यह बर्खास्तगी थी या इस्तीफा? असल में दोनों। समिति उन्हें हटाने का फैसला कर चुकी थी, और नोटिस पहुँचने से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

वे चुप नहीं बैठे। कॉलेज छोड़ते ही उन्होंने द ईस्ट इंडियन नाम का एक दैनिक अखबार शुरू किया, और कलकत्ता के यूरेशियन समुदाय की एक प्रमुख आवाज बन गए। 17 दिसंबर 1831 को उन्हें हैजा हुआ। एडवर्ड्स और शास्त्री दोनों उनकी मौत छह दिन बाद, 23 दिसंबर 1831 को बताते हैं, जबकि ब्रिटानिका 26 दिसंबर की तारीख देता है। वे 22 साल के थे।

डेरोजियो की मौत के बाद डेरोजियनों ने क्या किया?

डेरोजियन इस बहस को कक्षा से निकालकर अखबारों और सार्वजनिक संस्थाओं तक ले गए। करीब एक दशक के भीतर 1831 के चौंकाने वाले तरीकों की जगह संगठित राजनीतिक काम ने ले ली।

विद्रोह का साल, 1831-1832

शुरुआती महीने काफी शोर भरे रहे। शास्त्री के मुताबिक, 23 अगस्त 1831 को डेरोजियो के कुछ सबसे प्रिय शिष्यों ने कृष्णमोहन बनर्जी के घर एक मुस्लिम बेकरी की डबलरोटी और भुना हुआ मांस खाया। फिर बचा हुआ खाना पड़ोसी के आँगन में फेंक दिया, और चिल्लाए कि यह गोमांस है। पड़ोसियों ने उनके परिवार को मजबूर किया कि कृष्णमोहन को घर से निकाल दें, और उन्होंने दक्षिणारंजन मुखर्जी के यहाँ शरण ली। बांग्लापीडिया बताता है कि इन नौजवानों के लिए गोमांस खाना और शराब पीना अंधविश्वास से अपनी आजादी की सार्वजनिक परीक्षा बन गया था।

कुछ इससे भी आगे गए। डेरोजियो के पुराने शिष्य महेशचंद्र घोष ने 28 अगस्त 1832 को बपतिस्मा लिया, और 17 अक्टूबर 1832 को कृष्णमोहन ने भी। दोनों डफ की शिक्षाओं से खिंचे थे। रूढ़िवादी कलकत्ता के लिए इसने कॉलेज को लेकर उसका सबसे बड़ा डर सच साबित कर दिया।

पत्रिकाएँ और सभाएँ

बांग्लापीडिया के मुताबिक डेरोजियनों ने 1828 से 1843 के बीच एक के बाद एक कई पत्रिकाएँ निकालीं। ज्यादातर कम समय तक चलीं, लेकिन सबको साथ रखकर देखें तो दिखता है कि यह समूह धर्म पर हमलों से राजनीति की ओर बढ़ रहा था:

1838 में उन्होंने सामान्य ज्ञान प्राप्ति सभा (Society for the Acquisition of General Knowledge) बनाई। इसके अध्यक्ष ताराचंद चक्रवर्ती थे। प्यारीचंद मित्र और रामतनु लाहिड़ी इसके सचिव बने। शास्त्री जोड़ते हैं कि इसकी पहली बैठक संस्कृत कॉलेज के हॉल में हुई थी, और पुराना एकेडमिक एसोसिएशन तब भी डेविड हेयर की देखरेख में चल रहा था। नई सभा सत्ता को चिढ़ा भी सकती थी। इसकी एक बैठक में दक्षिणारंजन बोल रहे थे, तभी वहाँ मौजूद अंग्रेज टोरी कैप्टन डी. एल. रिचर्डसन ने उन्हें बोलने से रोक दिया। रिचर्डसन ने सदस्यों का मजाक उड़ाते हुए उन्हें “चक्रवर्ती गुट” कहा, और यह नाम सालों तक चिपका रहा।

उन्होंने व्यावहारिक सुधारों का भी साथ दिया। बांग्लापीडिया उन्हें पश्चिमी चिकित्सा शिक्षा के समर्थन का श्रेय देता है, जिसने 1835 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना में योगदान दिया। वह उन्हें इस बात का श्रेय भी देता है कि उन्होंने वहाँ के छात्रों को शव-विच्छेदन से जुड़ी वर्जना तोड़ने में मदद की।

बहस से राजनीति तक

डेरोजियनों की सबसे साफ छाप राजनीति के क्षेत्र में दिखती है। बिपन चंद्र की NCERT किताब कहती है कि उन्होंने राममोहन राय की उस परंपरा को आगे बढ़ाया जिसमें अखबारों और सार्वजनिक संस्थाओं के जरिए जनता को जागरूक किया जाता था। उन्होंने इन जैसे सवालों पर अभियान चलाए:

इसका संगठित रूप 1843 में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के रूप में सामने आया, जो आम जनता के हितों की रक्षा के लिए बनी थी। 1851 में यह 1837 की लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (जमींदारों की सभा) के साथ मिल गई, और इससे ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन बना। शास्त्री इसकी स्थापना 31 अक्टूबर 1851 को बताते हैं। ऐसी संस्थाएँ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रांतीय पूर्वज थीं।

रामगोपाल घोष से पता चलता है कि यह समूह कितना आगे आ चुका था। विधि सदस्य के तौर पर ड्रिंकवाटर बेथ्यून ने कुछ विधेयक तैयार किए। इनका मकसद था कि गाँवों में रहने वाले यूरोपीय लोग कंपनी की फौजदारी अदालतों के प्रति जवाबदेह हों, और कंपनी के इलाके में जूरी से सुनवाई लागू हो। ब्रिटिश निवासियों ने इन्हें “काले कानून” (Black Acts) कहा, और इन्हें रुकवाने के लिए 36,000 रुपये जुटाए। शास्त्री लिखते हैं कि रामगोपाल के सिवा किसी भी भारतीय ने इनके पक्ष में न भाषण दिया, न लेख लिखा।

प्रमुख डेरोजियन कौन थे?

बांग्लापीडिया डेरोजियो के एक दर्जन से ज्यादा प्रिय छात्रों के नाम गिनाता है। नीचे दिए सात नाम याद रखने लायक हैं। उनके बाद के करियर दिखाते हैं कि आंदोलन का असर कितनी दूर तक फैला, और हर व्यक्ति ने उसे कितने अलग ढंग से आगे बढ़ाया।

डेरोजियनउग्र सुधारवाद के वर्षों मेंआगे चलकर क्या किया
रामगोपाल घोष (1815-1868)अंधविश्वास पर डेरोजियो के हमलों को अपनाने वाले पहले लोगों मेंव्यापारी बने; पहले एक यूरोपीय फर्म में साझेदार, फिर अपनी फर्म आर. जी. घोष एंड कंपनी; बेथ्यून के विधेयकों के पक्ष में अकेली भारतीय आवाज
कृष्णमोहन बनर्जी1831 से एनक्वायरर का संपादन; गोमांस वाली घटना के बाद घर से निकाले गए1832 में बपतिस्मा, 1837 में पादरी बने, 1852 से 1868 तक बिशप्स कॉलेज में प्रोफेसर; 13 खंडों वाला एनसाइक्लोपीडिया बेंगालेंसिस तैयार किया
रसिक कृष्ण मल्लिक (1810-1858)सुप्रीम कोर्ट में गंगाजल की कसम खाने से इनकार किया, और कहा कि वे हिंदू नहीं हैंज्ञानान्वेषण का संगठन किया; हेयर स्कूल में पढ़ाया, फिर बर्दवान के डिप्टी कलेक्टर रहे
दक्षिणारंजन मुखर्जी (1814-1878)कृष्णमोहन को शरण दी; सभा की उस बैठक के मुख्य वक्ता जिसे रिचर्डसन ने रोकामिर्जापुर में लड़कियों के स्कूल के लिए जमीन दी, जो 1849 में बेथ्यून स्कूल बना; लखनऊ चले गए और 1857 के बाद उन्हें राजा की उपाधि मिली
प्यारीचंद मित्र1838 की सभा के सचिवकलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन और बाद में क्यूरेटर; टेकचंद ठाकुर के नाम से आलालेर घरेर दुलाल (1857) लिखा, जिसे अक्सर पहला बांग्ला उपन्यास कहा जाता है
राधानाथ सिकदार (1813-1870)हिंदू कॉलेज में गणित के सीनियर स्कॉलर30 रुपये महीने पर कंप्यूटर (गणना करने वाले) के रूप में ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे में शामिल हुए, और सर्वे में ऊपर तक पहुँचे
रामतनु लाहिड़ी1838 की सभा के सचिवशिक्षक; 1851 तक जनेऊ उतार चुके थे, जब बर्दवान के रूढ़िवादी हिंदुओं ने उन्हें जाति से बाहर घोषित कर दिया

प्यारीचंद का लेखन अपने आप में एक शांत क्रांति था। शास्त्री के मुताबिक उन्होंने बोलचाल वाली बांग्ला पहली बार एक छोटी मासिक पत्रिका में आजमाई, जिसे वे राधानाथ सिकदार के साथ मिलकर निकालते थे। यह भाषा ईश्वरचंद्र विद्यासागर और अक्षय कुमार दत्त के भारी संस्कृतनिष्ठ गद्य के खिलाफ एक प्रतिक्रिया थी।

राधानाथ सिकदार वाला सवाल

लोकप्रिय कहानियाँ सिकदार को पीक XV की ऊँचाई की गणना का श्रेय देती हैं, जिसका नाम बाद में एवरेस्ट पड़ा। कहा जाता है कि 1852 के आसपास उन्होंने अपने अफसरों को बताया था कि यह दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत है। यह श्रेय विवादित है। विज्ञान के इतिहासकार राजेश कोचर ने 2021 में सर्वे के प्रकाशित रिकॉर्ड के आधार पर तर्क दिया कि पीक XV के प्रेक्षणों की गणना होने से पहले ही सिकदार कलकत्ता जा चुके थे, और हिमालय की चोटियों की ऊँचाई निकालने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। सुरक्षित बात यह है कि सिकदार सर्वे के एक प्रमुख कंप्यूटर थे, और एवरेस्ट वाली कहानी पर विवाद है।

क्या यंग बंगाल आंदोलन नाकाम रहा?

यंग बंगाल आंदोलन जन-आंदोलन के रूप में नाकाम रहा, लेकिन प्रशिक्षण के मैदान के रूप में कामयाब। पहली बात पर इतिहासकार एकमत हैं। दूसरी बात को कितना वजन दिया जाए, इस पर बहस है।

बिपन चंद्र की NCERT किताब इसके खिलाफ वाला पक्ष सबसे साफ रखती है। वे लिखते हैं कि डेरोजियनों ने महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा की पैरवी की, फिर भी वे कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए। इसकी वजहें ये थीं:

उनका फैसला यह है कि इनका उग्र सुधारवाद किताबी था, और भारतीय असलियत से कभी नहीं जुड़ पाया। डेरोजियो पर इग्नू की इकाई सामाजिक पहलू को और तीखा करती है: उनके शिष्य कलकत्ता के ऊपरी तबके के परिवारों से आते थे, यानी वह अंग्रेजी-पढ़ा वर्ग जो आगे चलकर नया मध्यम वर्ग बना।

सिराजुल इस्लाम की बांग्लापीडिया प्रविष्टि इससे भी कड़ी है। उनका तर्क है कि डेरोजियनों को पश्चिम की हर चीज में पूर्णता दिखती थी, और अपनी संस्कृति के बारे में वे इतना कम जानते थे कि उसे परख ही नहीं सकते थे। उनके विवरण में ये लोग बंगाली साहित्यकारों तक को अपने साथ नहीं ला सके, और 19वीं सदी के आखिरी दौर तक यंग बंगाल सामाजिक गपशप का विषय बन चुका था।

सुमित सरकार का निबंध “यंग बंगाल की जटिलताएँ” एक बारीक बात कहता है। रूस के डिसेम्ब्रिस्टों की तरह डेरोजियन निर्वासन में खत्म नहीं हुए। उनमें से ज्यादातर इज्जतदार बुढ़ापे तक जिए, और सरकार का निष्कर्ष है कि धर्म या दर्शन पर उन्होंने कोई खास स्थायी छाप नहीं छोड़ी।

इनके पक्ष की दलील इस पर टिकी है कि उन्होंने आगे क्या किया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने उन्हें “बंगाल की आधुनिक सभ्यता के अग्रदूत, हमारी जाति के कुलपिता” कहा। रोसिंका चौधरी की किताब इंडियाज फर्स्ट रेडिकल्स (पेंगुइन, फरवरी 2025) 1843 के उनके काम के आधार पर ज्यादा उदार नजरिए की वकालत करती है:

उनकी ऊर्जा दूसरी संस्थाओं में भी गई। बिपन चंद्र बताते हैं कि देवेंद्रनाथ टैगोर की 1839 की तत्त्वबोधिनी सभा में डेरोजियो के कई अनुयायी शामिल हो गए। यही सभा आगे चलकर राममोहन के ब्रह्म समाज को फिर से जिंदा करने वाली थी।

दोनों में से कोई भी फैसला अकेले न्याय नहीं करता। समझदारी दोनों को साथ रखने में है। यंग बंगाल अपने समय में हिंदू समाज को बदलने के लिए बहुत संकीर्ण था, और बहुत नकलची भी। लेकिन इसी ने उन लोगों को तैयार किया जिन्होंने कलकत्ता की पहली राजनीतिक संस्थाएँ बनाईं, और उसकी सार्वजनिक बहस का बड़ा हिस्सा गढ़ा। यह दावा “बंगाल की आधुनिक सभ्यता के अग्रदूत” से छोटा है, और सामाजिक गपशप से बड़ा।

आज का यंग बंगाल: हिंदू कॉलेज, विरासत और नया शोध

आज यंग बंगाल नाम का कोई संगठन नहीं है। यह कभी पंजीकृत संस्था था ही नहीं, इसलिए इसकी किसी कानूनी हैसियत पर नजर रखने की जरूरत नहीं। जो बचा है, वह है इसे जन्म देने वाला कॉलेज, और इसकी कही हुई बात।

संस्था के नाम पर कॉलेज ही बचा है। 1855 में सरकार ने हिंदू कॉलेज को अपने हाथ में लिया और इसका नाम प्रेसिडेंसी कॉलेज रखा। प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी के अपने इतिहास के मुताबिक, पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 7 जुलाई 2010 को इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया।

शोध अब भी आगे बढ़ रहा है। चौधरी की 2025 की किताब इस विषय पर सबसे ताजा पूरा अध्ययन है। यह ध्यान को 1831 के गोमांस-और-शराब वाले वर्षों से हटाकर 1843 के शांत राजनीतिक काम की ओर ले जाती है।

यह विचार संविधान तक पहुँचा है। मौलिक कर्तव्यों में अनुच्छेद 51A(h) हर नागरिक से कहता है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करे, साथ ही जाँच-पड़ताल और सुधार की भावना भी। सितंबर 2026 का एक नोट, जाति और विज्ञान पर, इसी कर्तव्य के सहारे यह तर्क देता है कि आनुवंशिक सबूत पुश्तैनी सामाजिक भूमिकाओं का कोई आधार नहीं देते। यह लगभग वही तर्क है जो डेरोजियन 1831 में जाति के खिलाफ दे रहे थे।

परीक्षा के लिए यंग बंगाल आंदोलन कैसे पढ़ें

यंग बंगाल आंदोलन GS पेपर I में आधुनिक भारतीय इतिहास के तहत आता है, 19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के हिस्से के रूप में। इतिहास वैकल्पिक विषय के पेपर II में यह फिर आता है। इग्नू की सुधार आंदोलनों पर यूनिट 26 एक छोटी और ठोस बुनियाद देती है। बाकी हिस्सा बिपन चंद्र की पुरानी NCERT किताब का सामाजिक और सांस्कृतिक जागरण वाला अध्याय पूरा कर देता है।

मुख्य परीक्षा में इसका नाम सीधे लिया जा चुका है। मुख्य परीक्षा 2021 के GS पेपर I में पूछा गया: “यंग बंगाल और ब्रह्म समाज के विशेष संदर्भ में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के उदय और विकास का पता लगाइए।” यह प्रश्न उसी अंतर पर अंक देता है जो यह नोट दिखाता है: ब्रह्म समाज ने हिंदू धर्म के भीतर से सुधार किया, जबकि यंग बंगाल ने बाहर खड़े होकर उसे नकार दिया। प्रीलिम्स के लिए देखें तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 184 इतिहास के हैं। इसलिए तारीखें और सभाओं के नाम पक्के कर लीजिए।

दोहराने लायक तथ्य:

आम तौर पर होने वाली गड़बड़ियाँ, अलग-अलग करके:

संस्थास्थापनाप्रमुख व्यक्तिआस्था का आधारहिंदू रीति-रिवाज पर रुख
यंग बंगाल1820 के दशक का आखिर, कलकत्ताडेरोजियो और उनके शिष्यतर्क और प्रबोधन युग के लेखकरूढ़िवाद को सिरे से नकारा
ब्रह्म समाज1828, कलकत्ताराममोहन रायएक ईश्वर, उपनिषदभीतर से सुधार; मूर्ति पूजा के खिलाफ
तत्त्वबोधिनी सभा1839, कलकत्तादेवेंद्रनाथ टैगोरवेदांत और बांग्ला विद्याईसाई धर्म-परिवर्तन का जवाब दिया
प्रार्थना समाज1867, बंबईआत्माराम पांडुरंगएक ईश्वर, मराठी भक्ति संतभीतर से सुधार, परंपरा से कोई जबरन नाता-तोड़ नहीं

प्रार्थना समाज के साथ रखकर देखें तो यंग बंगाल सुधार के दायरे का सबसे आखिरी छोर है, यानी वह बिंदु जहाँ सुधार ने परंपरा से मोलभाव करना बंद कर दिया। अगर आप समझा सकें कि यह उग्र सुधारवाद एक दशक में क्यों बुझ गया, और फिर भी कलकत्ता की राजनीति को आकार कैसे दे गया, तो आपके पास ज्यादातर ऐसे प्रश्नों का उत्तर है जो पूछते हैं कि पश्चिमी विचार भारतीय सार्वजनिक जीवन में कैसे आए। पहले गिनी-चुनी तारीखें याद कीजिए, फिर अपना समय इसी आकलन पर लगाइए।

सामान्य प्रश्न

यंग बंगाल आंदोलन की स्थापना किसने की?

औपचारिक अर्थ में यंग बंगाल आंदोलन के संस्थापक कोई नहीं थे। यह आंदोलन 1820 के दशक के आखिर में कलकत्ता के हिंदू कॉलेज में हेनरी लुई विवियन डेरोजियो के छात्रों के बीच पनपा, और डेरोजियो को इसका प्रेरक और नेता माना जाता है। खुद यह नाम कलकत्ता के समाज ने उनके अनुयायियों को दिया था।

डेरोजियन कौन थे?

डेरोजियन हिंदू कॉलेज में डेरोजियो के वे छात्र थे जिन्होंने उनका तर्कवादी, खुलकर सोचने वाला नजरिया अपनाया। इनमें सबसे जाने-माने नाम हैं रामगोपाल घोष, जो व्यापारी और राजनीतिक वक्ता बने, और कृष्णमोहन बनर्जी, जो ईसाई पादरी और विद्वान बने। कई दूसरे लोग भी आगे चलकर कलकत्ता और उसके बाहर सार्वजनिक जीवन में ऊँचे मुकाम तक पहुँचे।

एकेडमिक एसोसिएशन क्या था?

एकेडमिक एसोसिएशन एक वाद-विवाद क्लब था, जिसकी स्थापना 1828 में डेरोजियो और उनके छात्रों ने की, और डेरोजियो इसके अध्यक्ष थे। इसके सदस्य धर्म और सामाजिक रीति-रिवाजों पर बहस करते थे, और अक्सर ह्यूम और टॉम पेन जैसे लेखकों को उद्धृत करते थे। ब्रिटानिका के मुताबिक इसकी चर्चाओं में अंग्रेज भी आते थे और भारतीय भी।

डेरोजियो को हिंदू कॉलेज से क्यों बर्खास्त किया गया?

रूढ़िवादी हिंदू अभिभावकों ने डेरोजियो पर आरोप लगाया कि वे उनके बेटों को धर्म के खिलाफ कर रहे हैं, और कॉलेज की प्रबंध समिति ने अप्रैल 1831 में उन्हें हटाने का प्रस्ताव पास किया। औपचारिक बर्खास्तगी से बचने के लिए उन्होंने 25 अप्रैल 1831 को इस्तीफा दे दिया, और इसे मजबूरी का इस्तीफा कहा। उन्होंने सारे आरोपों से इनकार किया, इस अफवाह से भी कि वे नास्तिकता का प्रचार करते थे।

डेरोजियो की मौत कब हुई?

डेरोजियो की मौत दिसंबर 1831 में कलकत्ता में हैजे से हुई, तब वे 22 साल के थे। उनके जीवनीकार थॉमस एडवर्ड्स और इतिहासकार शिवनाथ शास्त्री उनकी मौत की तारीख 23 दिसंबर 1831 बताते हैं, जबकि ब्रिटानिका 26 दिसंबर बताता है। वे 17 दिसंबर को बीमार पड़े थे।

यंग बंगाल समूह ने कौन-सी पत्रिकाएँ निकालीं?

डेरोजियनों ने 1820 के दशक के आखिर से 1840 के दशक की शुरुआत तक कई पत्रिकाएँ शुरू कीं। सबसे लंबे समय तक चलने वाली पत्रिका द्विभाषी ज्ञानान्वेषण थी, जो 1831 से 1844 तक निकली। आखिरी पत्रिका 1842 का बंगाल स्पेक्टेटर था। समय के साथ इनके पन्नों का रुख हिंदू रूढ़िवाद पर हमलों से हटकर राजनीतिक सवालों की ओर गया।

यंग बंगाल आंदोलन नाकाम क्यों रहा?

यह आंदोलन जन-शक्ति नहीं बन पाया, क्योंकि कलकत्ता के अंग्रेजी-पढ़े एक छोटे दायरे के बाहर इसका कोई सामाजिक आधार नहीं था। बिपन चंद्र का तर्क था कि डेरोजियनों ने कभी किसानों का मुद्दा नहीं उठाया और आम लोगों से कट गए; उन्होंने इनके उग्र सुधारवाद को किताबी कहा। इनका असर बाद की संस्थाओं और अलग-अलग सदस्यों के करियर के जरिए जिंदा रहा।

यंग बंगाल ब्रह्म समाज से कैसे अलग था?

दोनों 1820 के दशक के आखिर में कलकत्ता में आकार ले रहे थे, लेकिन दोनों ने उल्टे रास्ते चुने। राममोहन राय के ब्रह्म समाज ने एक ईश्वर और उपनिषदों की ओर लौटकर हिंदू धर्म को भीतर से सुधारने की कोशिश की। डेरोजियनों ने तर्क के नाम पर हिंदू रूढ़िवाद को सिरे से नकार दिया, और उनमें से कुछ ने ईसाई धर्म अपना लिया।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. हेनरी लुई विवियन डेरोजियो के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. उन्होंने कलकत्ता के हिंदू कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य और इतिहास पढ़ाया। 2. एकेडमिक एसोसिएशन की स्थापना उनकी मौत के बाद हुई। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (a) डेरोजियो ने हिंदू कॉलेज में पढ़ाया, और एकेडमिक एसोसिएशन की स्थापना 1828 में हुई, जब वे वहीं थे; उनकी मौत के बाद 1838 में बनी सभा सामान्य ज्ञान प्राप्ति सभा थी।

2. डेरोजियन रसिक कृष्ण मल्लिक ने निम्नलिखित में से किस पत्रिका का संगठन किया था?

उत्तर: (a) द्विभाषी ज्ञानान्वेषण (1831 से 1844) का संगठन रसिक कृष्ण मल्लिक ने किया था; तत्त्वबोधिनी पत्रिका देवेंद्रनाथ टैगोर के दायरे की थी, और सुबोध पत्रिका प्रार्थना समाज की।

3. यंग बंगाल आंदोलन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. डेरोजियनों ने प्रेस की आजादी और जूरी द्वारा सुनवाई के लिए अभियान चलाया। 2. बिपन चंद्र ने डेरोजियनों को किसानों के बीच मजबूत जनाधार का श्रेय दिया। 3. कृष्णमोहन बनर्जी ने ईसाई धर्म अपनाया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (b) कथन 1 और 3 सही हैं; बिपन चंद्र ने कथन 2 का उल्टा कहा था, कि डेरोजियनों ने कभी किसानों का मुद्दा नहीं उठाया।

4. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. टेकचंद ठाकुर : प्यारीचंद मित्र 2. एकेडमिक एसोसिएशन : हेनरी लुई विवियन डेरोजियो 3. तत्त्वबोधिनी सभा : रामगोपाल घोष। ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

उत्तर: (b) प्यारीचंद मित्र टेकचंद ठाकुर के नाम से लिखते थे, और एकेडमिक एसोसिएशन की अध्यक्षता डेरोजियो करते थे; तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना 1839 में देवेंद्रनाथ टैगोर ने की थी।

5. कलकत्ता का हिंदू कॉलेज, जहाँ डेरोजियो पढ़ाते थे, 1855 में किस नए नाम से जाना गया?

उत्तर: (a) सरकार ने हिंदू कॉलेज को अपने हाथ में लेकर 1855 में इसका नाम प्रेसिडेंसी कॉलेज रखा; 2010 में यह प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी बना।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. उन्नीसवीं सदी के ‘भारतीय पुनर्जागरण’ और राष्ट्रीय पहचान के उदय के बीच के संबंधों का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2019, GS पेपर I।
  2. ‘यंग बंगाल का उग्र सुधारवाद किताबी था और उसका कोई सामाजिक आधार नहीं था।’ इस आकलन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  3. 19वीं सदी की शुरुआत के बंगाल में तर्कसंगत चिंतन के विकास में हेनरी लुई विवियन डेरोजियो के योगदान का मूल्यांकन कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. 1831 के बाद डेरोजियन सुधार की बहस को प्रेस और सार्वजनिक संस्थाओं तक कैसे ले गए? (10 अंक, 150 शब्द)
  5. 19वीं सदी की शुरुआत के बंगाल में पश्चिमी विचारों की प्रतिक्रिया के रूप में यंग बंगाल आंदोलन की तुलना ब्रह्म समाज से कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)