अलंकार: शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार, भेद और उदाहरण सहित
अलंकार समझिए: Alankar के तीन भेद, अनुप्रास से अन्योक्ति तक हर अलंकार की पहचान, कवियों के उदाहरण और वे जोड़े जिनमें सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं।
अलंकार का सीधा अर्थ है गहना। जैसे गहना शरीर की शोभा बढ़ाता है, वैसे ही अलंकार कविता या गद्य की बात को सुंदर और असरदार बनाता है। कभी यह असर शब्दों की आवाज से आता है, जैसे एक ही वर्ण का बार-बार आना, और कभी अर्थ से, जैसे मुख की तुलना चंद्रमा से करना। इसी आधार पर अलंकार के तीन भेद माने जाते हैं: शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार।
ज्यादातर विद्यार्थी अलंकारों के नाम और एक-एक रटा हुआ उदाहरण याद कर लेते हैं, और फिर नई पंक्ति सामने आते ही अटक जाते हैं। असली दिक्कत पहचान के तर्क की है: यमक और श्लेष में फर्क, उपमा और रूपक में फर्क, संदेह और भ्रांतिमान में फर्क। यह नोट हर अलंकार की पहचान का एक सूत्र देता है, कवियों की पंक्तियों से उदाहरण देता है और उन जोड़ों को अलग से खोलता है जिनमें सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं।
अलंकार एक नजर में
नीचे की तालिका पूरे अध्याय का नक्शा है। पहले इसे देख लीजिए, फिर हर भेद को विस्तार से पढ़िए।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| शाब्दिक अर्थ | अलम् (शोभा, पर्याप्त) + कार (करने वाला), यानी शोभा बढ़ाने वाला |
| आधार ग्रंथ | भरत का नाट्यशास्त्र, भामह का काव्यालंकार, दंडी का काव्यादर्श, मम्मट का काव्यप्रकाश |
| मुख्य भेद | शब्दालंकार, अर्थालंकार, उभयालंकार (मिश्रालंकार) |
| शब्दालंकार की पहचान | शब्द बदलते ही चमत्कार खत्म हो जाता है |
| अर्थालंकार की पहचान | पर्यायवाची रख देने पर भी चमत्कार बना रहता है |
| प्रमुख शब्दालंकार | अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्ति प्रकाश, वीप्सा |
| प्रमुख अर्थालंकार | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, संदेह, भ्रांतिमान, दृष्टांत, विरोधाभास, अन्योक्ति |
| उभयालंकार | संसृष्टि (अलंकार अलग-अलग पहचाने जा सकें) और संकर (अलंकार घुले-मिले हों) |
अलंकार की परिभाषा और उसका आधार
अलंकार वह तरीका है जिससे कहने की बात में चमत्कार या सुंदरता आती है। संस्कृत काव्यशास्त्र में दंडी ने काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्मों को अलंकार कहा, और वामन ने सौंदर्य को ही अलंकार माना। हिंदी की पाठ्यपुस्तकें इसी परंपरा से परिभाषा लेती हैं: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व अलंकार कहलाते हैं।
इतिहास में अलंकारों की गिनती बढ़ती गई। भरत के नाट्यशास्त्र में सिर्फ चार अलंकार मिलते हैं: उपमा, रूपक, दीपक और यमक। बाद के आचार्यों, खासकर भामह, दंडी, मम्मट और आगे के लेखकों ने यह सूची सौ से ऊपर पहुँचा दी। स्कूल और प्रतियोगी परीक्षाओं में मगर पंद्रह-बीस अलंकार ही बार-बार आते हैं, और यह नोट उन्हीं पर टिका है।
भेद तय करने का एक आसान टेस्ट है। पंक्ति में जिस शब्द से चमत्कार आ रहा है, उसकी जगह उसका पर्यायवाची रख दीजिए। अगर चमत्कार गायब हो जाए, तो वह शब्दालंकार है। अगर अर्थ का चमत्कार बना रहे, तो अर्थालंकार है। “कनक कनक” में कनक की जगह “सोना धतूरा” लिख दें, तो सारा खेल खत्म, इसलिए यमक शब्दालंकार है। “मुख चंद्रमा के समान है” में चंद्रमा की जगह “शशि” लिख दें, तो भी तुलना बची रहती है, इसलिए उपमा अर्थालंकार है।
शब्दालंकार: जहाँ चमत्कार शब्द की आवाज में है
शब्दालंकार में सुंदरता शब्द के रूप, उसकी ध्वनि या उसके दोहराव से आती है। IGNOU की संस्कृत काव्यशास्त्र इकाई अनुप्रास, यमक, श्लेष और वक्रोक्ति को शब्दालंकार में गिनती है। हिंदी में इनके साथ पुनरुक्ति प्रकाश और वीप्सा भी पढ़ाए जाते हैं।
अनुप्रास अलंकार
जहाँ एक ही वर्ण बार-बार आए और उससे पंक्ति में लय पैदा हो, वहाँ अनुप्रास होता है। मम्मट की परिभाषा छोटी है: वर्णों की समानता अनुप्रास है। स्वर अलग हों तो भी चलेगा, व्यंजन की समानता होनी चाहिए।
मैथिलीशरण गुप्त की ‘पंचवटी’ की यह पंक्ति अनुप्रास का सबसे जाना-पहचाना उदाहरण है: “चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल थल में।” यहाँ च वर्ण चार बार आया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के ‘यमुना-वर्णन’ की पंक्ति “तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए” में त की झड़ी है।
| अनुप्रास का भेद | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| छेकानुप्रास | कई वर्णों की एक बार आवृत्ति, क्रम सहित | “बंदउँ गुरु पद पदुम परागा” (तुलसीदास), प और द का क्रम |
| वृत्यनुप्रास | एक या अनेक वर्णों की कई बार आवृत्ति | “चारु चंद्र की चंचल किरणें” |
| लाटानुप्रास | शब्द और अर्थ वही, पर अन्वय बदलने से तात्पर्य बदल जाए | “पूत सपूत तो क्यों धन संचै, पूत कपूत तो क्यों धन संचै” वाली उक्ति |
| अंत्यानुप्रास | पंक्तियों के अंत में तुक मिलना | चौपाई और दोहे के चरणों की तुक |
| श्रुत्यनुप्रास | एक ही उच्चारण-स्थान के वर्णों की आवृत्ति | त, थ, द, ध, न जैसे दंत्य वर्ण साथ आएँ |
यमक अलंकार
जहाँ एक ही शब्द दो या ज्यादा बार आए और हर बार उसका अर्थ अलग हो, वहाँ यमक होता है। बिहारी का दोहा इसका पक्का उदाहरण है: “कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय।” पहले कनक का अर्थ है सोना, दूसरे का धतूरा। कवि कहता है कि सोने में धतूरे से सौ गुना नशा है, क्योंकि धतूरा खाने पर बौराता है और सोना पाने भर से।
पाठ्यपुस्तकों में “काली घटा का घमंड घटा” भी खूब चलता है। पहला घटा बादल है, दूसरा “कम हुआ”। यमक में शर्त यही है कि शब्द दिखने में एक हो और कम से कम दो बार लिखा गया हो।
श्लेष अलंकार
श्लेष का अर्थ है चिपका हुआ। यहाँ शब्द एक ही बार आता है, पर उसमें एक साथ कई अर्थ चिपके रहते हैं। रहीम का दोहा सबसे प्रसिद्ध है: “पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून।” यहाँ एक ही ‘पानी’ मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए इज्जत और चून यानी आटे के लिए जल है।
श्लेष के दो रूप माने जाते हैं। शब्द-श्लेष में चमत्कार शब्द पर टिका है, पर्यायवाची रखते ही खत्म। अर्थ-श्लेष में शब्द बदल देने पर भी दोहरा अर्थ बना रहता है। इसी वजह से कुछ किताबें श्लेष को उभयालंकार के पास भी रखती हैं। परीक्षा में श्लेष को शब्दालंकार ही लिखिए, जब तक प्रश्न उपभेद न पूछे।
वक्रोक्ति, पुनरुक्ति प्रकाश और वीप्सा
बचे हुए तीन शब्दालंकार छोटे हैं, पर इनकी पहचान अक्सर गड़बड़ा जाती है। तीनों को एक साथ देखिए:
- वक्रोक्ति: कहने वाला एक अर्थ में कहे और सुनने वाला उसे दूसरे अर्थ में ले ले। यह दो तरह की है: श्लेष वक्रोक्ति, जहाँ शब्द के दो अर्थ से खेल होता है, और काकु वक्रोक्ति, जहाँ बोलने के लहजे से अर्थ उलट जाता है। “क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ?” पूछने का लहजा कहता है कि “मैं नौकर नहीं हूँ”।
- पुनरुक्ति प्रकाश: एक ही शब्द लगातार दोहराया जाए और अर्थ वही रहे, ताकि भाव गहरा हो। महादेवी वर्मा की पंक्ति “मधुर-मधुर मेरे दीपक जल” इसका उदाहरण है।
- वीप्सा: आदर, घृणा, शोक या आश्चर्य जैसे भाव जताने के लिए शब्द दोहराना, जैसे “छि: छि:”, “हाय-हाय”, “राम-राम”। कई किताबें इसे पुनरुक्ति प्रकाश का ही एक रूप मानती हैं।
अर्थालंकार: जहाँ चमत्कार अर्थ में है
अर्थालंकार में सुंदरता शब्दों के अर्थ से आती है, इसलिए पर्यायवाची रखने पर भी वह बनी रहती है। इनमें सबसे बड़ा परिवार सादृश्य यानी समानता पर टिके अलंकारों का है: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, संदेह और भ्रांतिमान। इन्हें समझने से पहले उपमा के चार अंग पक्के कर लीजिए, क्योंकि बाकी सब इन्हीं के घटने-बढ़ने से बनते हैं।
उपमा अलंकार
जहाँ किसी वस्तु की तुलना उससे ज्यादा प्रसिद्ध किसी दूसरी वस्तु से की जाए, वहाँ उपमा होती है। रामचरितमानस के अयोध्याकांड में तुलसीदास दशरथ की दुविधा यों लिखते हैं: “पीपर पात सरिस मनु डोला।” यहाँ मनु का अर्थ मन है, और मन की तुलना पीपल के पत्ते से है। पत्ता जैसे हवा में काँपता है, वैसे ही राजा का मन डोल रहा है।
| उपमा का अंग | अर्थ | “पीपर पात सरिस मनु डोला” में |
|---|---|---|
| उपमेय | जिसकी तुलना की जाए | मन |
| उपमान | जिससे तुलना की जाए | पीपर पात (पीपल का पत्ता) |
| साधारण धर्म | दोनों में साझा गुण | डोलना |
| वाचक शब्द | तुलना बताने वाला शब्द | सरिस (सा, सी, सम, समान, जैसा, ज्यों, तुल्य) |
जब चारों अंग मौजूद हों, तो पूर्णोपमा होती है। एक या ज्यादा अंग गायब हों, तो लुप्तोपमा। “मुख चंद्रमा जैसा है” में साधारण धर्म (सुंदर) नहीं लिखा, इसलिए यह लुप्तोपमा है। एक उपमेय के कई उपमान हों, तो मालोपमा बनती है।
रूपक अलंकार
रूपक में तुलना इतनी गहरी हो जाती है कि उपमेय और उपमान को एक ही मान लिया जाता है। वाचक शब्द हट जाता है और दोनों के बीच अक्सर योजक चिह्न आ जाता है। सूरदास की पंक्ति “चरन-कमल बंदौं हरि-राइ” में चरण कमल जैसे नहीं, चरण ही कमल हैं।
रूपक के तीन भेद पढ़ाए जाते हैं। सांग रूपक में उपमेय के अंगों पर उपमान के अंगों का भी आरोप होता है। निरंग रूपक में सिर्फ एक आरोप होता है। परंपरित रूपक में एक आरोप दूसरे आरोप की वजह बनता है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाती है। पहचान उसके वाचक शब्दों से होती है: मानो, मनो, मनु, जानो, जनु, मनहुँ, जनहुँ। बिहारी के दोहे में पीले वस्त्र ओढ़े साँवले कृष्ण के लिए कवि कल्पना करता है: “मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात।” मानो नीलम के पहाड़ पर सुबह की धूप पड़ी हो।
उत्प्रेक्षा के तीन भेद हैं: वस्तूत्प्रेक्षा, जिसमें एक वस्तु में दूसरी की संभावना हो; हेतूत्प्रेक्षा, जिसमें जो कारण नहीं है उसे कारण मान लिया जाए; और फलोत्प्रेक्षा, जिसमें जो फल नहीं है उसे फल मान लिया जाए।
अतिशयोक्ति और मानवीकरण
अतिशयोक्ति में किसी बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है कि वह लोक की सीमा से बाहर चली जाए। पाठ्यपुस्तकों में चलने वाला उदाहरण है: “हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग।” आग लगने से पहले ही लंका का जल जाना असंभव है, यही अतिशयोक्ति है।
मानवीकरण में जड़ चीजों या प्रकृति पर इंसानी भावों और कामों का आरोप किया जाता है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता में बादल किसी मेहमान की तरह सजकर आते हैं: “मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।” मानवीकरण संस्कृत की पुरानी सूची में नहीं था। हिंदी में यह छायावाद के दौर में खूब चला, और इसे आम तौर पर अंग्रेजी के personification के असर से जोड़ा जाता है। अब यह पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
संदेह और भ्रांतिमान
दोनों में उपमेय को देखकर उपमान का ख्याल आता है, पर मन की हालत अलग होती है। संदेह में मन तय नहीं कर पाता कि यह उपमेय है या उपमान: “यह मुख है या चाँद?” वाक्य में अक्सर “या”, “कि”, “किधौं” जैसे शब्द आते हैं। भ्रांतिमान में भ्रम पक्का हो जाता है और देखने वाला उपमेय को उपमान ही समझकर कुछ कर भी बैठता है: “ओस की बूँदों को मोती समझकर बच्चा उन्हें बटोरने दौड़ा।”
दृष्टांत, विरोधाभास और अन्योक्ति
ये तीन अलंकार अर्थ के अलग-अलग खेल हैं, और इनकी पहचान वाक्य के ढाँचे से हो जाती है:
- दृष्टांत: पहले एक बात कही जाए, फिर उसी जैसी दूसरी बात से उसकी पुष्टि की जाए, बिना वाचक शब्द के। वृंद का दोहा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है: “करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान॥” रस्सी के घिसने से पत्थर पर निशान पड़ने वाली बात पहली बात को साबित करती है।
- विरोधाभास: बात सुनने में विरोधी लगे, पर अर्थ में विरोध न हो। बिहारी ने कृष्ण के प्रेम में डूबे मन के बारे में लिखा: “ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ।” काले रंग में डूबकर उजला होना उल्टा लगता है, पर अर्थ है कि कृष्ण-प्रेम में मन निर्मल होता जाता है।
- अन्योक्ति: बात किसी और से कही जाए, पर निशाना कोई और हो। बिहारी का दोहा भौंरे से कहता है: “अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल।” प्रसिद्ध कथा के अनुसार यह दोहा आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह को उनके कर्तव्य की याद दिलाने के लिए लिखा गया था। यह कथा परंपरा में चलती है, इतिहास के रूप में इसकी पुष्टि नहीं है।
उभयालंकार: जब एक पंक्ति में कई अलंकार हों
जहाँ शब्द और अर्थ दोनों से चमत्कार आए, या एक ही पंक्ति में एक से ज्यादा अलंकार मिलें, वहाँ उभयालंकार माना जाता है। संस्कृत परंपरा में इसे मिश्रालंकार भी कहते हैं, और इसके दो भेद हैं।
संसृष्टि में अलंकार तिल और चावल की तरह मिले होते हैं, यानी हर एक को अलग पहचाना जा सकता है। “चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल थल में” में च का अनुप्रास भी है और किरणों के खेलने में मानवीकरण भी, और दोनों अलग-अलग दिखते हैं। संकर में अलंकार दूध और पानी की तरह घुल जाते हैं, उन्हें अलग करना मुश्किल होता है। स्कूल स्तर पर उभयालंकार की परिभाषा और ये दो नाम जान लेना काफी है।
वे जोड़े जिनमें सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं
अलंकार के प्रश्न अक्सर दो मिलते-जुलते अलंकारों के बीच फँसाते हैं। नीचे की तालिका में हर जोड़े का एक-लाइन वाला फर्क है। इसे परीक्षा से पहले दोहराइए।
| जोड़ा | पहला | दूसरा |
|---|---|---|
| यमक और श्लेष | यमक: शब्द दो बार, अर्थ हर बार अलग | श्लेष: शब्द एक बार, अर्थ एक साथ कई |
| अनुप्रास और यमक | अनुप्रास: वर्ण दोहराया, अर्थ का सवाल नहीं | यमक: पूरा शब्द दोहराया, अर्थ बदला |
| पुनरुक्ति प्रकाश और यमक | पुनरुक्ति: शब्द दोहराया, अर्थ वही | यमक: शब्द दोहराया, अर्थ अलग |
| उपमा और रूपक | उपमा: “के समान”, दोनों अलग | रूपक: वाचक नहीं, दोनों एक |
| उपमा और उत्प्रेक्षा | उपमा: पक्की तुलना (सा, सम, सरिस) | उत्प्रेक्षा: कल्पना या संभावना (मानो, जनु) |
| संदेह और भ्रांतिमान | संदेह: मन दुविधा में, तय नहीं | भ्रांतिमान: भ्रम पक्का, उसी पर काम |
| दृष्टांत और उपमा | दृष्टांत: दो पूरे वाक्य, बिना वाचक | उपमा: एक वाक्य में वाचक शब्द से तुलना |
अलंकार पहचानने का तरीका और आम गलतियाँ
किसी नई पंक्ति में अलंकार ढूँढ़ना हो, तो एक तय क्रम से चलिए। पहले देखिए कि कोई वर्ण या शब्द दोहराया गया है या नहीं। फिर देखिए कि तुलना हो रही है या नहीं, और उसका वाचक शब्द क्या है। आखिर में वाक्य का ढाँचा देखिए: विरोध, बढ़ा-चढ़ाकर कहना या किसी और पर रखकर कहना।
- दोहराव है तो पूछिए: वर्ण दोहराया (अनुप्रास), शब्द दोहराया और अर्थ बदला (यमक), या शब्द दोहराया और अर्थ वही (पुनरुक्ति प्रकाश)?
- एक शब्द में कई अर्थ हैं, पर वह एक ही बार आया है? तो श्लेष।
- सा, सी, सम, समान, सरिस जैसे वाचक शब्द हैं? तो उपमा।
- मानो, जनु, मनहुँ हैं? तो उत्प्रेक्षा।
- वाचक नहीं है और दो चीजें योजक चिह्न से एक कर दी गई हैं? तो रूपक।
- जड़ चीज इंसान की तरह कुछ कर रही है? तो मानवीकरण।
- बात असंभव हद तक बढ़ी हुई है? तो अतिशयोक्ति।
कुछ गलतियाँ बार-बार दिखती हैं। विद्यार्थी “चरण-कमल” जैसे हर योजक वाले शब्द को रूपक मान लेते हैं, जबकि “माता-पिता” में कोई आरोप नहीं, वह सिर्फ द्वंद्व समास है। समास के इस फर्क के लिए हिंदी समास वाला नोट देखिए। दूसरी गलती है “मानो” वाली हर पंक्ति को उपमा लिख देना। तीसरी है उत्तर में सिर्फ अलंकार का नाम लिखना। नाम के साथ एक लाइन का कारण लिखिए, जैसे “कनक दो बार, दो अर्थ में, इसलिए यमक”, क्योंकि जाँचने वाला तर्क देखकर ही पूरे अंक देता है।
यमक और श्लेष की तैयारी में शब्द-भंडार सबसे ज्यादा काम आता है। जिस शब्द के कई अर्थ आपको पहले से पता हैं, उसका खेल आप तुरंत पकड़ लेंगे। इसके लिए अनेकार्थी शब्दों की सूची और पर्यायवाची शब्दों वाला नोट साथ में पढ़िए, क्योंकि पर्यायवाची वाला टेस्ट शब्दालंकार और अर्थालंकार को अलग करता है।
परीक्षा में अलंकार कैसे पूछा जाता है
CBSE के 2025-26 के हिंदी A पाठ्यक्रम में अलंकार दो कक्षाओं में बँटा है। कक्षा 9 में शब्दालंकार (अनुप्रास, यमक, श्लेष) पर 4 अंक हैं, और कक्षा 10 में अर्थालंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण) पर 4 अंक। दोनों में पाँच में से चार प्रश्न करने होते हैं। इसलिए ऊपर की जोड़े वाली तालिका सीधे इन्हीं प्रश्नों के काम की है।
राज्य स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के सामान्य हिंदी प्रश्नपत्र में अलंकार अक्सर बहुविकल्पीय रूप में आता है: पंक्ति दी जाती है और चार अलंकारों में से सही चुनना होता है। सिविल सेवा के अनिवार्य हिंदी प्रश्नपत्र में अलंकार अलग से नहीं पूछा जाता, पर निबंध और उत्तर-लेखन में उपमा या दृष्टांत का सही प्रयोग भाषा को असरदार बनाता है। पूरे व्याकरण की तैयारी का क्रम अनिवार्य हिंदी व्याकरण गाइड में है। जो विद्यार्थी हिंदी साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में ले रहे हैं, उनके लिए अलंकार-संप्रदाय और रीतिकाल की कविता गहराई से पढ़ने वाले विषय हैं, जिनका ढाँचा हिंदी साहित्य वैकल्पिक गाइड में है।
अलंकार रटने का अध्याय नहीं, पहचानने का अध्याय है। अगर आप हर अलंकार का एक सूत्र और एक पक्का उदाहरण याद रखते हैं, तो नई पंक्ति पर भी सही उत्तर तक पहुँच जाएँगे। वर्णों की आवृत्ति ठीक से पकड़ने के लिए हिंदी वर्णमाला एक बार दोहरा लेना भी अनुप्रास में मदद करता है।
अभ्यास प्रश्न
नीचे की पंक्तियों में अलंकार का नाम बताइए और एक लाइन में कारण लिखिए। आखिरी तीन प्रश्न परिभाषा और फर्क पर हैं। उत्तर इस खंड के अंत में हैं।
- चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल थल में।
- कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय।
- पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून।
- पीपर पात सरिस मनु डोला।
- चरन-कमल बंदौं हरि-राइ।
- मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात।
- मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।
- हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई।
- मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।
- ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ।
- काली घटा का घमंड घटा।
- उपमा के चार अंग लिखिए और “मुख चंद्रमा जैसा है” में कौन-सा अंग गायब है, बताइए।
- यमक और श्लेष में एक मुख्य अंतर लिखिए।
- संसृष्टि और संकर में क्या फर्क है?
उत्तर
- अनुप्रास (वृत्यनुप्रास): च वर्ण की बार-बार आवृत्ति। साथ में किरणों के खेलने में मानवीकरण भी है।
- यमक: कनक दो बार आया, पहली बार सोना और दूसरी बार धतूरा।
- श्लेष: पानी एक बार आया, पर मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए इज्जत और चून के लिए जल।
- उपमा: मन उपमेय, पीपर पात उपमान, डोला साधारण धर्म, सरिस वाचक शब्द।
- रूपक: चरण पर कमल का आरोप, वाचक शब्द नहीं।
- उत्प्रेक्षा: “मनौ” से संभावना की कल्पना।
- मानवीकरण: बादलों पर सजने-सँवरने वाले मेहमान का आरोप।
- अतिशयोक्ति: आग लगने से पहले लंका जलना असंभव, बात हद से बढ़ाकर कही गई।
- पुनरुक्ति प्रकाश: मधुर दोहराया गया, अर्थ वही रहा।
- विरोधाभास: काले रंग में डूबकर उजला होना विरोधी लगता है, पर अर्थ में विरोध नहीं।
- यमक: पहला घटा बादल, दूसरा कम हुआ।
- उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द। इस वाक्य में साधारण धर्म (सुंदरता) गायब है, इसलिए लुप्तोपमा।
- यमक में शब्द कम से कम दो बार आता है और हर बार अर्थ अलग होता है। श्लेष में शब्द एक ही बार आता है, पर उसमें कई अर्थ एक साथ रहते हैं।
- संसृष्टि में अलंकार अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं (तिल-चावल की तरह)। संकर में वे घुल-मिल जाते हैं (दूध-पानी की तरह)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अलंकार किसे कहते हैं?
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों को अलंकार कहते हैं। शब्द का अर्थ ही गहना है, यानी जैसे गहना शरीर को सजाता है, वैसे ही अलंकार कविता को सजाता है। इसके तीन मुख्य भेद हैं: शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार।
अलंकार के कितने भेद होते हैं?
अलंकार के तीन मुख्य भेद माने जाते हैं। शब्दालंकार में चमत्कार शब्द से आता है, अर्थालंकार में अर्थ से, और उभयालंकार में दोनों से या कई अलंकारों के मेल से। उभयालंकार के दो भेद हैं, संसृष्टि और संकर।
शब्दालंकार और अर्थालंकार को कैसे पहचानें?
चमत्कार वाले शब्द की जगह उसका पर्यायवाची रखकर देखिए। अगर चमत्कार खत्म हो जाए तो शब्दालंकार है, और अगर बना रहे तो अर्थालंकार। यमक में कनक की जगह सोना लिखते ही खेल खत्म हो जाता है, जबकि उपमा में चंद्रमा की जगह शशि लिखने पर भी तुलना बची रहती है।
यमक और श्लेष में क्या अंतर है?
यमक में एक ही शब्द दो या ज्यादा बार आता है और हर बार उसका अर्थ अलग होता है। श्लेष में शब्द एक ही बार आता है, पर उसमें कई अर्थ एक साथ चिपके रहते हैं। कनक कनक यमक है, जबकि रहीम के दोहे का पानी श्लेष है।
उपमा और रूपक में क्या फर्क है?
उपमा में उपमेय और उपमान अलग रहते हैं और उनके बीच सा, समान या सरिस जैसा वाचक शब्द आता है। रूपक में वाचक शब्द हट जाता है और उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है। मुख चंद्रमा के समान है उपमा है, जबकि मुख-चंद्र रूपक है।
उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान क्या है?
उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाती है। इसकी सबसे आसान पहचान वाचक शब्द हैं: मानो, मनो, मनु, जनु, जानो, मनहुँ और जनहुँ। बिहारी के दोहे में नीलम के पहाड़ पर धूप पड़ने की कल्पना उत्प्रेक्षा का उदाहरण है।
मानवीकरण अलंकार क्या है?
जब प्रकृति या किसी जड़ चीज पर इंसानी भावों और कामों का आरोप किया जाए, तो मानवीकरण होता है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता में बादलों का मेहमान की तरह सजकर आना इसका उदाहरण है। यह अलंकार हिंदी में छायावाद के दौर में खूब चला।
भरत के नाट्यशास्त्र में कितने अलंकार हैं?
भरत के नाट्यशास्त्र में चार अलंकार मिलते हैं: उपमा, रूपक, दीपक और यमक। बाद के आचार्यों ने यह संख्या बढ़ाकर सौ से ऊपर कर दी। स्कूल और प्रतियोगी परीक्षाओं में आम तौर पर पंद्रह-बीस अलंकार ही पूछे जाते हैं।