छंद: परिभाषा, मात्रिक और वर्णिक भेद, दोहा से हरिगीतिका तक मात्रा गिनकर
छंद समझिए: Chhand के अंग, लघु-गुरु गिनने के नियम, मात्रिक और वर्णिक भेद, और दोहा से हरिगीतिका तक हर छंद का उदाहरण मात्रा गिनकर।
छंद कविता का वह अनुशासन है जो उसे गद्य से अलग करता है। जब किसी पंक्ति में वर्णों या मात्राओं की गिनती, उनका क्रम, रुकने की जगह और तुक पहले से तय नियम के अनुसार हो, तो वह रचना छंदबद्ध कहलाती है। दोहा, चौपाई और सोरठा ऐसे ही छंद हैं, और कबीर, तुलसी और रहीम की ज्यादातर पंक्तियाँ इन्हीं नियमों पर टिकी हैं।
छंद का अध्याय डराता इसलिए है कि विद्यार्थी परिभाषाएँ रट लेते हैं, पर मात्रा गिनना नहीं सीखते। दोहा 13 और 11 का है, सोरठा 11 और 13 का, यह याद होने पर भी पंक्ति सामने आते ही गिनती गड़बड़ा जाती है, क्योंकि संयुक्त व्यंजन, अनुस्वार और चंद्रबिंदु के नियम साफ नहीं होते। यह नोट पहले लघु-गुरु गिनने के नियम देता है, फिर हर छंद का एक कवि-सहित उदाहरण मात्रा गिनकर दिखाता है।
छंद एक नजर में
पूरे अध्याय का नक्शा पहले देख लीजिए।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| शाब्दिक अर्थ | ‘छन्दांसि छादनात्’ (यास्क); जो मन को आह्लादित करे, ‘चन्दयति आह्लादयति इति छन्दः’ |
| छंद के अंग | चरण (पाद), वर्ण, मात्रा, यति, गति, तुक, गण |
| लघु और गुरु | लघु की एक मात्रा (चिह्न ।), गुरु की दो मात्राएँ (चिह्न ऽ) |
| गण-सूत्र | यमाताराजभानसलगा |
| मुख्य भेद | मात्रिक (मात्राओं की गिनती) और वर्णिक (वर्णों की गिनती और क्रम) |
| प्रमुख मात्रिक छंद | दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला, कुंडलिया, हरिगीतिका |
| प्रमुख वर्णिक छंद | सवैया, वसंततिलका, मालिनी, मंदाक्रांता, शिखरिणी |
| रचना के आधार पर | सम (चारों चरण बराबर), अर्धसम (एक-छोड़कर-एक चरण बराबर), विषम |
छंद की परिभाषा और उसके अंग
सीधी परिभाषा है: वर्णों या मात्राओं की नियमित संख्या, क्रम, यति और तुक से बनी पद्य-रचना छंद कहलाती है। IGNOU की संस्कृत काव्यशास्त्र इकाई यास्क का कथन देती है, ‘छन्दांसि छादनात्’, यानी जो भावों को ढक ले, आच्छादित कर ले, वह छंद है। दूसरी व्याख्या है ‘चन्दयति आह्लादयति इति छन्दः’, यानी जो मन को आनंद दे।
छंद को समझने के लिए उसके अंगों के नाम पक्के होने चाहिए:
- चरण या पाद: छंद का एक हिस्सा। दोहे में चार चरण होते हैं, दो-दो चरणों की दो पंक्तियाँ।
- वर्ण: अक्षर। वर्णिक छंदों में इन्हीं की गिनती होती है।
- मात्रा: किसी वर्ण को बोलने में लगने वाला समय। मात्रिक छंदों में इन्हीं की गिनती होती है।
- यति: पढ़ते समय रुकने की जगह, जैसे दोहे में 13वीं मात्रा के बाद।
- गति: पढ़ने का प्रवाह या लय।
- तुक: चरणों के अंत में मिलती-जुलती ध्वनि।
- गण: तीन वर्णों का समूह, जिससे वर्णिक छंदों का ढाँचा बनता है।
लघु और गुरु: मात्रा गिनने के नियम
मात्रा गिनना छंद की रीढ़ है। IGNOU की इकाई इसका आधार साफ लिखती है: ह्रस्व स्वर लघु होता है और उसकी एक मात्रा गिनी जाती है, दीर्घ स्वर गुरु होता है और उसकी दो मात्राएँ। लघु के लिए खड़ी पाई (।) और गुरु के लिए अवग्रह (ऽ) का चिह्न लगता है।
| नियम | लघु या गुरु | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ, इ, उ, ऋ वाला वर्ण | लघु (1) | क, कि, कु, कृ |
| आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ वाला वर्ण | गुरु (2) | का, की, कू, के, कै, को, कौ |
| अनुस्वार वाला वर्ण | गुरु (2) | पं (पंथी), सुं (सुंदर) |
| विसर्ग वाला वर्ण | गुरु (2) | दुः (दुःख) |
| संयुक्त व्यंजन से ठीक पहले का वर्ण | गुरु (2) | ‘सत्य’ में स, ‘बुद्धि’ में बु |
| चंद्रबिंदु वाला लघु वर्ण | लघु ही रहता है (1) | हँ (हँसी) |
| संयुक्त व्यंजन खुद | अपने स्वर के अनुसार | ‘क्या’ में क्या गुरु (2) |
संस्कृत का एक श्लोक ये नियम एक साथ कहता है: ‘सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्। वर्णः संयोगपूर्वश्च तथा पादान्तगोऽपि वा।।’ यानी अनुस्वार वाला, दीर्घ, विसर्ग वाला और संयुक्त व्यंजन से पहले का वर्ण गुरु होता है, और चरण के अंत का वर्ण भी जरूरत पड़ने पर गुरु माना जा सकता है।
हिंदी में दो बातें अलग से याद रखिए। पहली, चंद्रबिंदु मात्रा नहीं बढ़ाता, इसलिए ‘हँस’ में हँ लघु है, जबकि ‘हंस’ में हं गुरु है। अनुस्वार और चंद्रबिंदु का यह फर्क वर्तनी और विराम चिह्न वाले नोट में विस्तार से है। दूसरी, ब्रज और अवधी की पुरानी कविता में कभी-कभी उच्चारण के हिसाब से ए या ओ को लघु पढ़ा जाता है। परीक्षा के उदाहरण आम तौर पर ऐसे चुने जाते हैं जहाँ सीधी गिनती चल जाए। स्वरों के ह्रस्व और दीर्घ भेद पर शक हो, तो हिंदी वर्णमाला एक बार दोहरा लीजिए।
गण: यमाताराजभानसलगा
वर्णिक छंदों में तीन-तीन वर्णों के समूह को गण कहते हैं। गण आठ हैं, और इन्हें याद रखने का सूत्र है यमाताराजभानसलगा। जिस गण का नाम चाहिए, उसका पहला अक्षर सूत्र में ढूँढ़िए और वहाँ से तीन अक्षर लीजिए। जैसे यगण के लिए ‘यमाता’ लीजिए: य लघु, मा गुरु, ता गुरु, यानी ।ऽऽ।
| गण | सूत्र का अंश | रूप |
|---|---|---|
| यगण | यमाता | ।ऽऽ |
| मगण | मातारा | ऽऽऽ |
| तगण | ताराज | ऽऽ। |
| रगण | राजभा | ऽ।ऽ |
| जगण | जभान | ।ऽ। |
| भगण | भानस | ऽ।। |
| नगण | नसल | ।।। |
| सगण | सलगा | ।।ऽ |
सूत्र के आखिरी दो अक्षर ‘ल’ और ‘गा’ अकेले लघु और गुरु के लिए हैं। मात्रिक छंदों में गण का कम काम पड़ता है, पर दोहे और चौपाई के कुछ नियम, जैसे चरण के अंत में जगण न आना, इसी भाषा में कहे जाते हैं।
मात्रिक और वर्णिक छंद में फर्क
लौकिक छंद दो तरह के हैं। मात्रिक छंद में हर चरण की मात्राएँ गिनी जाती हैं; वर्ण कम-ज्यादा हो सकते हैं। वर्णिक छंद में वर्णों की संख्या और उनका लघु-गुरु क्रम, दोनों तय रहते हैं।
| आधार | मात्रिक छंद | वर्णिक छंद |
|---|---|---|
| क्या गिना जाता है | मात्राएँ | वर्ण और उनका क्रम |
| ढाँचा | मात्राओं की कुल संख्या तय, वर्ण घट-बढ़ सकते हैं | गणों का क्रम तय |
| उदाहरण | दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला, हरिगीतिका, कुंडलिया | सवैया, वसंततिलका, मालिनी, मंदाक्रांता |
| परंपरा | हिंदी की भक्ति और रीति कविता में सबसे ज्यादा | संस्कृत काव्य में सबसे ज्यादा, हिंदी में सवैया और कवित्त |
रचना के हिसाब से भी छंद बँटते हैं। सम छंद में चारों चरणों की मात्राएँ बराबर होती हैं, जैसे चौपाई (16-16) और रोला। अर्धसम छंद में पहला और तीसरा चरण एक जैसे और दूसरा और चौथा एक जैसे होते हैं, जैसे दोहा और सोरठा। विषम छंद में चरण अलग-अलग नाप के होते हैं; कुंडलिया, जिसमें दोहा और रोला जुड़े हैं, इसका आम उदाहरण है।
दोहा: 13 और 11 मात्राएँ
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसकी हर पंक्ति में 24 मात्राएँ होती हैं: विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 13, और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 11। सम चरणों के अंत में गुरु-लघु (ऽ।) आता है और उन्हीं में तुक मिलती है।
कबीर दोहावली का पहला दोहा सबसे आसान उदाहरण है: “दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय॥” पहली पंक्ति गिनकर देखिए:
| चरण | शब्द और मात्राएँ | कुल |
|---|---|---|
| पहला (विषम) | दुख (1+1) में (2) सुमरिन (1+1+1+1) सब (1+1) करे (1+2) | 13 |
| दूसरा (सम) | सुख (1+1) में (2) करे (1+2) न (1) कोय (2+1) | 11 |
दूसरी पंक्ति भी इसी तरह 13 (जो सुख में सुमरिन करे) और 11 (दुख काहे को होय) पर बैठती है। सम चरणों का अंत ‘कोय’ और ‘होय’ पर है: दोनों गुरु-लघु हैं और आपस में तुक मिलाते हैं। कबीर की भाषा और उनके दोहों की परंपरा के लिए कबीर पर नोट देखिए।
सोरठा: दोहे का उलटा
सोरठा भी अर्धसम मात्रिक छंद है, पर दोहे का उलटा। इसके विषम चरणों में 11 और सम चरणों में 13 मात्राएँ होती हैं। तुक विषम चरणों (पहले और तीसरे) के अंत में मिलती है, और वहीं गुरु-लघु आता है।
रामचरितमानस के बालकांड की शुरुआत में कविता कोश इसे ‘सो0’ लिखकर दिखाता है: “जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥”
| चरण | शब्द और मात्राएँ | कुल |
|---|---|---|
| पहला (विषम) | जो (2) सुमिरत (1+1+1+1) सिधि (1+1) होइ (2+1) | 11 |
| दूसरा (सम) | गन (1+1) नायक (2+1+1) करिबर (1+1+1+1) बदन (1+1+1) | 13 |
| तीसरा (विषम) | करउ (1+1+1) अनुग्रह (1+2+1+1) सोइ (2+1) | 11 |
| चौथा (सम) | बुद्धि (2+1) रासि (2+1) सुभ (1+1) गुन (1+1) सदन (1+1+1) | 13 |
‘अनुग्रह’ में नु गुरु गिना गया, क्योंकि उसके ठीक बाद संयुक्त व्यंजन ग्र है। ‘बुद्धि’ में बु भी इसी वजह से गुरु है। विषम चरणों का अंत ‘होइ’ और ‘सोइ’ पर है, दोनों गुरु-लघु और आपस में तुकांत। यही सोरठा की पहचान है।
चौपाई: हर चरण में 16 मात्राएँ
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसके हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं, और दो चरणों की एक अर्धाली में तुक मिलती है। परंपरा से चरण के अंत में जगण (।ऽ।) या तगण (ऽऽ।) नहीं आता, यानी अंत गुरु-लघु पर नहीं होता। रामचरितमानस का बड़ा हिस्सा चौपाई में है, और बीच-बीच में दोहे और सोरठे आते हैं। तुलसी की रचनाओं का परिचय तुलसीदास वाले नोट में है।
बालकांड की यह अर्धाली लीजिए: “बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥”
| चरण | शब्द और मात्राएँ | कुल |
|---|---|---|
| पहला | बंदउ (2+1+1) गुरु (1+1) पद (1+1) पदुम (1+1+1) परागा (1+2+2) | 16 |
| दूसरा | सुरुचि (1+1+1) सुबास (1+2+1) सरस (1+1+1) अनुरागा (1+1+2+2) | 16 |
‘बंदउ’ में बं अनुस्वार की वजह से गुरु है। दोनों चरण ‘परागा’ और ‘अनुरागा’ पर खत्म होते हैं, जो दो गुरु हैं, और आपस में तुक मिलाते हैं।
रोला: 24 मात्राएँ, 11 पर यति
रोला सम मात्रिक छंद है। इसके हर चरण में 24 मात्राएँ होती हैं, और 11 तथा 13 मात्राओं पर यति आती है। इसकी हर पंक्ति देखने में उलटे दोहे जैसी लगती है, पर दोहे के उलट इसके चारों चरण बराबर होते हैं।
मैथिलीशरण गुप्त की ‘मातृभूमि’ की शुरुआती पंक्तियाँ रोले का सधा हुआ उदाहरण हैं: “नीलांबर परिधान हरित पट पर सुन्दर है। सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥”
| पंक्ति | पहला खंड (11) | दूसरा खंड (13) |
|---|---|---|
| पहली | नीलांबर (2+2+1+1) परिधान (1+1+2+1) = 11 | हरित (1+1+1) पट (1+1) पर (1+1) सुन्दर (2+1+1) है (2) = 13 |
| दूसरी | सूर्य (2+1) चन्द्र (2+1) युग (1+1) मुकुट (1+1+1) = 11 | मेखला (2+1+2) रत्नाकर (2+2+1+1) है (2) = 13 |
‘सुन्दर’ में सु और ‘चन्द्र’ में च गुरु हैं, क्योंकि उनके बाद संयुक्त व्यंजन है। ‘रत्नाकर’ में र भी इसी नियम से गुरु है।
कुंडलिया: दोहा और रोला का जोड़
कुंडलिया छह चरणों का विषम मात्रिक छंद है। पहले दो चरण दोहा होते हैं और बाकी चार रोला। इसकी दो पहचानें हैं: दोहे का आखिरी चरण रोले की शुरुआत में दोहराया जाता है, और छंद जिस शब्द से शुरू होता है, उसी पर खत्म होता है, जैसे साँप कुंडली मारकर अपनी पूँछ पकड़ ले।
गिरिधर कविराय की यह कुंडलिया कविता कोश में ‘कुण्डलियाँ’ श्रेणी में है: “साईं, बैर न कीजिए, गुरु, पंडित, कवि, यार। बेटा, बनिता, पँवरिया, यज्ञ-करावनहार॥ यज्ञ-करावनहार, राजमंत्री जो होई।”
- पहला चरण ‘साईं, बैर न कीजिए’ में 13 मात्राएँ हैं: साईं (2+2) बैर (2+1) न (1) कीजिए (2+1+2)।
- दूसरा चरण ‘गुरु, पंडित, कवि, यार’ में 11: गुरु (1+1) पंडित (2+1+1) कवि (1+1) यार (2+1)।
- दोहे का चौथा चरण ‘यज्ञ-करावनहार’ ही रोले के पहले चरण की शुरुआत बनता है।
- रोले का यह चरण 11 और 13 पर बँटता है: यज्ञ-करावनहार (2+1+1+2+1+1+2+1 = 11), राजमंत्री जो होई (2+1+2+2+2+2+2 = 13)।
- छंद ‘साईं’ से शुरू होता है और कविता कोश के पाठ में आखिरी चरण भी ‘साईं’ पर खत्म होता है।
हरिगीतिका: 16 और 12 मात्राएँ
हरिगीतिका सम मात्रिक छंद है। इसके हर चरण में 28 मात्राएँ होती हैं, 16 और 12 पर यति के साथ, और चरण का अंत लघु-गुरु (।ऽ) पर होता है।
मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘आर्य’ की पहली पंक्तियाँ इसका सबसे जाना-पहचाना उदाहरण हैं: “हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी / आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी”
| पंक्ति | पहला खंड (16) | दूसरा खंड (12) |
|---|---|---|
| पहली | हम (1+1) कौन (2+1) थे (2) क्या (2) हो (2) गये (1+2) हैं (2) = 16 | और (2+1) क्या (2) होंगे (2+2) अभी (1+2) = 12 |
| दूसरी | आओ (2+2) विचारें (1+2+2) आज (2+1) मिल (1+1) कर (1+1) = 16 | यह (1+1) समस्याएं (1+2+2+2) सभी (1+2) = 12 |
दोनों पंक्तियाँ ‘अभी’ और ‘सभी’ पर खत्म होती हैं: अ और स लघु, भी गुरु, यानी लघु-गुरु। ‘समस्याएं’ में म गुरु है, क्योंकि उसके बाद संयुक्त व्यंजन स्य है।
वर्णिक छंद की एक झलक
वर्णिक छंदों में मात्रा नहीं, वर्णों का क्रम गिना जाता है। IGNOU की इकाई वसंततिलका का ढाँचा देती है: हर चरण में तगण, भगण, दो जगण और अंत में दो गुरु। गिनिए तो 3+3+3+3+2, यानी हर चरण में 14 वर्ण। इसी इकाई में मालिनी, मंदाक्रांता, शिखरिणी, शार्दूलविक्रीडित और स्रग्धरा भी हैं, जो संस्कृत काव्य के प्रमुख वर्णिक छंद हैं।
हिंदी में सबसे लोकप्रिय वर्णिक छंद सवैया है। रसखान के सवैये कविता कोश में ‘सवैया’ शीर्षक से दर्ज हैं: “मानुष हों तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।” सवैये के कई रूप होते हैं, और उनकी पहचान गणों के क्रम से होती है, मात्राओं की कुल संख्या से नहीं।
वे जोड़े जिनमें सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं
| जोड़ा | पहचान | फर्क |
|---|---|---|
| दोहा और सोरठा | पहले चरण की मात्राएँ गिनिए | 13 से शुरू तो दोहा, 11 से शुरू तो सोरठा |
| दोहा और सोरठा की तुक | तुक कहाँ मिलती है? | दोहे में सम चरणों के अंत में, सोरठे में विषम चरणों के अंत में |
| चौपाई और रोला | एक चरण में कितनी मात्राएँ? | चौपाई में 16, रोले में 24 |
| रोला और दोहा | क्या चारों चरण बराबर हैं? | रोला सम (हर चरण 24), दोहा अर्धसम (13-11) |
| कुंडलिया और रोला | कितने चरण, शुरुआत और अंत का शब्द? | कुंडलिया में 6 चरण, दोहा+रोला, एक ही शब्द से शुरू और खत्म |
| हरिगीतिका और रोला | यति और कुल मात्राएँ | हरिगीतिका 28 (16-12), रोला 24 (11-13) |
| मात्रिक और वर्णिक | मात्रा गिनी जाती है या वर्ण? | दोहा, चौपाई मात्रिक; सवैया, वसंततिलका वर्णिक |
मात्रा गिनने में आम गलतियाँ
सबसे आम गलती अनुस्वार और चंद्रबिंदु को एक मान लेना है। ‘पंथी’ में पं गुरु है, पर ‘हँसी’ में हँ लघु। दूसरी गलती संयुक्त व्यंजन के नियम को उलटा लगाना है: गुरु वह वर्ण होता है जो संयुक्त व्यंजन से पहले आता है, संयुक्त व्यंजन खुद नहीं। ‘सत्य’ में स गुरु है, त्य नहीं बदलता।
तीसरी गलती पूरे शब्द को एक इकाई मान लेना है। ‘सुमरिन’ चार लघु वर्णों का शब्द है, यानी 4 मात्राएँ, न कि ‘एक शब्द तो दो मात्रा’। हर वर्ण अलग गिनिए और ऊपर । या ऽ लिखते जाइए। चौथी, यति की जगह पर रुककर गिनती की जाँच कीजिए: दोहे में 13 पर रुककर देखिए, फिर 11 गिनिए। एक साथ 24 गिनेंगे तो गलती पकड़ में नहीं आएगी।
कविता की लय छंद से आती है, और उसकी सुंदरता अलंकार से। एक ही पंक्ति में दोनों पूछे जा सकते हैं, इसलिए अलंकार के भेद और उदाहरण साथ पढ़िए। तीसरा कोना रस है: छंद लय देता है, अलंकार कहने का सौंदर्य, और रस वह भाव जो पढ़ने वाले के मन में जागता है।
परीक्षा में छंद कैसे पूछा जाता है
राज्य स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के सामान्य हिंदी प्रश्नपत्र में छंद आम तौर पर तीन रूपों में आता है: पंक्ति देकर छंद का नाम, किसी छंद की मात्राएँ या यति, और मात्रिक-वर्णिक का भेद। दोहा, सोरठा, चौपाई और रोला सबसे ज्यादा पूछे जाते हैं। सिविल सेवा के अनिवार्य हिंदी प्रश्नपत्र के लिए अनिवार्य हिंदी व्याकरण का नक्शा देखिए, और हिंदी साहित्य वैकल्पिक लेने वालों के लिए हिंदी साहित्य वैकल्पिक की गाइड में भक्तिकाल और रीतिकाल के पाठ्यक्रम की जगह समझिए।
छंद का अध्याय गिनती का अध्याय है, और गिनती अभ्यास से ही आती है। हर छंद का एक उदाहरण कंठस्थ कर लीजिए और उसकी मात्राएँ अपने हाथ से गिनकर देखिए; नई पंक्ति सामने आने पर वही गिनती उत्तर तक ले जाएगी।
अभ्यास प्रश्न
पंक्तियों में छंद पहचानिए और मात्राएँ गिनकर कारण लिखिए। बाकी प्रश्न नियमों पर हैं। उत्तर इस खंड के अंत में हैं।
- दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय।
- जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
- बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
- नीलांबर परिधान हरित पट पर सुन्दर है।
- हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी।
- ‘सुंदर’ और ‘हँसना’ के पहले वर्ण में लघु-गुरु बताइए।
- ‘अनुग्रह’ की मात्राएँ गिनिए।
- यगण और भगण का रूप लिखिए।
- दोहा और सोरठा में दो अंतर लिखिए।
- कुंडलिया किन दो छंदों से बनता है, और उसकी दो पहचान क्या हैं?
- मात्रिक और वर्णिक छंद का एक-एक उदाहरण दीजिए।
- वसंततिलका के एक चरण में कितने वर्ण होते हैं?
उत्तर
- दोहा: पहला चरण 13 (दुख में सुमरिन सब करे), दूसरा 11 (सुख में करे न कोय), अंत गुरु-लघु।
- सोरठा: पहला चरण 11 (जो सुमिरत सिधि होइ), दूसरा 13 (गन नायक करिबर बदन)।
- चौपाई: दोनों चरणों में 16-16 मात्राएँ।
- रोला: 11 (नीलांबर परिधान) और 13 (हरित पट पर सुन्दर है), कुल 24।
- हरिगीतिका: 16 (हम कौन थे, क्या हो गये हैं) और 12 (और क्या होंगे अभी), अंत लघु-गुरु।
- ‘सुंदर’ में सुं अनुस्वार के कारण गुरु; ‘हँसना’ में हँ चंद्रबिंदु होने पर भी लघु।
- अ (1) नु (2, संयुक्त व्यंजन ग्र से पहले) ग्र (1) ह (1) = 5।
- यगण ।ऽऽ (यमाता), भगण ऽ।। (भानस)।
- दोहे में विषम चरण 13 और सम 11 के होते हैं, सोरठे में उलटा। दोहे की तुक सम चरणों में मिलती है, सोरठे की विषम चरणों में।
- दोहा और रोला। दोहे का आखिरी चरण रोले की शुरुआत में दोहराया जाता है, और छंद जिस शब्द से शुरू होता है उसी पर खत्म होता है।
- मात्रिक: दोहा (या चौपाई, रोला)। वर्णिक: सवैया (या वसंततिलका, मालिनी)।
- 14 वर्ण: तगण, भगण, जगण, जगण (12) और दो गुरु (2)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छंद किसे कहते हैं?
वर्णों या मात्राओं की नियमित संख्या, क्रम, यति और तुक से बनी पद्य-रचना को छंद कहते हैं। यास्क ने इसे ‘छन्दांसि छादनात्’ कहा, यानी जो भाव को ढक ले। छंद ही कविता को लय देता है और उसे गद्य से अलग करता है।
छंद के कितने भेद होते हैं?
लौकिक छंद के दो मुख्य भेद हैं: मात्रिक और वर्णिक। मात्रिक छंद में मात्राएँ गिनी जाती हैं, जैसे दोहा और चौपाई, और वर्णिक छंद में वर्णों की संख्या और क्रम, जैसे सवैया और वसंततिलका। रचना के आधार पर छंद सम, अर्धसम और विषम भी कहलाते हैं।
दोहा छंद का उदाहरण क्या है?
कबीर का दोहा ‘दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय॥’ सबसे आसान उदाहरण है। इसके विषम चरणों में 13 और सम चरणों में 11 मात्राएँ हैं। सम चरणों का अंत ‘कोय’ और ‘होय’ पर गुरु-लघु से होता है।
सोरठा छंद का आसान उदाहरण क्या है?
रामचरितमानस के बालकांड का पहला सोरठा ‘जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन’ सबसे जाना-पहचाना उदाहरण है। इसके विषम चरणों में 11 और सम चरणों में 13 मात्राएँ हैं, यानी यह दोहे का उलटा है। तुक विषम चरणों के अंत, ‘होइ’ और ‘सोइ’, में मिलती है।
चौपाई में कितनी मात्राएँ होती हैं?
चौपाई के हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं, और यह सम मात्रिक छंद है। दो चरणों की एक अर्धाली में तुक मिलती है और चरण के अंत में गुरु-लघु नहीं आता। रामचरितमानस का बड़ा हिस्सा चौपाई में लिखा गया है।
मात्रा कैसे गिनते हैं?
ह्रस्व स्वर वाले वर्ण की एक मात्रा और दीर्घ स्वर वाले वर्ण की दो मात्राएँ गिनी जाती हैं। अनुस्वार और विसर्ग वाला वर्ण, और संयुक्त व्यंजन से ठीक पहले का वर्ण, गुरु यानी दो मात्रा का होता है। चंद्रबिंदु वाला लघु वर्ण लघु ही रहता है।
कुंडलिया छंद की पहचान क्या है?
कुंडलिया छह चरणों का छंद है, जिसमें पहले एक दोहा और फिर एक रोला आता है। दोहे का आखिरी चरण रोले की शुरुआत में दोहराया जाता है। छंद जिस शब्द से शुरू होता है, उसी पर खत्म होता है, जैसे गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ साईं से शुरू होकर साईं पर खत्म होती हैं।
रोला और दोहा में क्या अंतर है?
दोहा अर्धसम छंद है, जिसके चरण 13 और 11 मात्राओं के होते हैं। रोला सम छंद है, जिसके हर चरण में 24 मात्राएँ होती हैं, 11 और 13 पर यति के साथ। रोले की हर पंक्ति देखने में उलटे दोहे जैसी लगती है, पर उसके चारों चरण बराबर नाप के होते हैं।