Opens in a new tab
Join Anantam IAS Channel on Telegram

रस: परिभाषा, चार अंग, नौ रस और स्थायी भाव, कवियों के आसान उदाहरण सहित

रस समझिए: Ras के चार अंग, नौ रस और उनके स्थायी भाव, हर रस का कवि सहित आसान उदाहरण और वे जोड़े जिनमें सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं।

रस पर हिंदी व्याकरण नोट्स का चित्र

रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है। कविता पढ़ते या नाटक देखते हुए मन में जो आनंद जागता है, चाहे वह हँसी हो, करुणा हो या जोश, उसी अनुभव को काव्यशास्त्र में रस कहते हैं। इसका पहला व्यवस्थित विवेचन भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है। भरत ने आठ रस गिनाए थे, बाद के आचार्यों ने शांत को नौवाँ रस माना, और हिंदी भक्ति-काव्य के असर से वात्सल्य और भक्ति भी जोड़े गए।

ज्यादातर विद्यार्थी रसों के नाम और उनके स्थायी भाव तो याद कर लेते हैं, पर किसी पंक्ति को पढ़कर रस बताना हो तो अटक जाते हैं। करुण और वियोग शृंगार में, रौद्र और वीर में, भयानक और वीभत्स में फर्क करना ही असली परीक्षा है। यह नोट हर रस का एक आसान, कवि के नाम सहित उदाहरण देता है, बताता है कि उस पंक्ति में स्थायी भाव, आलंबन और अनुभाव कौन-से हैं, और उन जोड़ों को अलग से खोलता है जिनमें सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं।

रस एक नजर में

पूरे अध्याय का नक्शा पहले देख लीजिए। हर बिंदु आगे विस्तार से आता है।

बिंदुविवरण
शाब्दिक अर्थस्वाद, आनंद; काव्य पढ़ने-सुनने से मिलने वाला आनंद
आधार ग्रंथभरत मुनि का नाट्यशास्त्र; आगे मम्मट का काव्यप्रकाश और विश्वनाथ का साहित्यदर्पण
रस-सूत्रविभावानुभावव्यभिचारिभावसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः
रस के अंगस्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी (व्यभिचारी) भाव
भरत के रसआठ: शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत
नौवाँ रसशांत (स्थायी भाव निर्वेद, विश्वनाथ के अनुसार शम)
बाद में जोड़े गएवात्सल्य (स्थायी भाव वत्सलता या स्नेह) और भक्ति (भगवद्विषयक प्रेम)
संचारी भावनाट्यशास्त्र के अनुसार 33
सात्त्विक भावआठ: स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय

रस की परिभाषा और भरत मुनि का रस-सूत्र

सीधी परिभाषा यह है: जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव मिलकर पाठक या दर्शक के मन में बैठे स्थायी भाव को जगा देते हैं, तो जो आनंद मिलता है, वही रस है। IGNOU की संस्कृत काव्यशास्त्र इकाई भी यही कहती है कि इन साधक भावों से स्थायी भाव इस तरह खड़ा हो जाए कि आम दर्शक उसका दिल से आस्वाद ले सके, तो उसे रस कहते हैं।

भरत मुनि ने यह बात एक सूत्र में कही: “विभावानुभावव्यभिचारिभावसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः”। इसे तोड़कर पढ़िए: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति, यानी रस का जन्म होता है। ध्यान दीजिए कि सूत्र में स्थायी भाव का नाम नहीं है। मम्मट ने इसे साफ किया: विभाव आदि से व्यक्त हुआ स्थायी भाव ही रस कहलाता है।

एक मोटा उदाहरण लीजिए। मंच पर कोई माँ अपने बेटे की मौत पर रो रही है। मरा हुआ बेटा आलंबन है, माँ का रोना और छाती पीटना अनुभाव है, बीच-बीच में आने वाली बेहोशी या चिंता संचारी भाव है। इन सबके मेल से दर्शक के मन का शोक जागता है, और दर्शक जो अनुभव करता है वह करुण रस है। माँ का दुख असली दुख है, पर दर्शक का अनुभव रस है, क्योंकि वह उसे कला के रूप में ग्रहण कर रहा है।

रस के चार अंग: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव

रस के चार अंग माने जाते हैं। इन्हें एक बार ठीक से समझ लिया तो किसी भी पंक्ति का रस पहचानना आसान हो जाता है।

अंगअर्थशृंगार रस में उदाहरण
स्थायी भावमन में स्थायी रूप से सोया हुआ भाव, जो रस की नींव हैरति (प्रेम)
विभाववह कारण जिससे स्थायी भाव जागता हैनायक या नायिका, चाँदनी, बगीचा
अनुभावभाव जागने के बाद शरीर पर दिखने वाले संकेतमुस्कुराना, भौंहें चलाना, देखना
संचारी भावथोड़ी देर के लिए आने-जाने वाले भाव, जो स्थायी भाव को पुष्ट करते हैंहर्ष, लज्जा, चपलता, उत्सुकता

स्थायी भाव हर इंसान के मन में सोई हुई अवस्था में रहते हैं और मौका मिलने पर जाग उठते हैं। हर रस का अपना एक स्थायी भाव है, और रस पहचानने की पूरी चाबी यही है।

विभाव के दो भेद हैं। आलंबन विभाव वह व्यक्ति या वस्तु है जिसके सहारे भाव जागता है, जैसे शृंगार में प्रिय। उद्दीपन विभाव वे चीजें हैं जो जागे हुए भाव को और भड़काती हैं, जैसे चाँदनी रात, एकांत या प्रिय की चेष्टाएँ।

अनुभाव भाव का बाहरी प्रमाण है। गुस्से में आँखें लाल होना, डर में काँपना, खुशी में हँसना, ये सब अनुभाव हैं। इन्हीं में आठ सात्त्विक भाव भी गिने जाते हैं, जो अपने-आप होते हैं: स्तंभ (जड़ हो जाना), स्वेद (पसीना), रोमांच, स्वरभंग (आवाज बदल जाना), वेपथु (कँपकँपी), वैवर्ण्य (रंग उड़ जाना), अश्रु और प्रलय (बेहोशी)।

संचारी भाव पानी के बुलबुलों की तरह उठते और बैठते हैं। नाट्यशास्त्र के सातवें अध्याय में इनकी संख्या साफ लिखी है: “त्रयस्त्रिंशदिमे भावा विज्ञेया व्यभिचारिणः”, यानी ये तैंतीस भाव व्यभिचारी समझे जाएँ। निर्वेद, ग्लानि, शंका, चिंता, हर्ष, लज्जा, गर्व और मोह इसी सूची के भाव हैं।

नौ रस और उनके स्थायी भाव

रस पहचानने की पहली सीढ़ी स्थायी भाव है। पंक्ति पढ़कर पूछिए कि मन में कौन-सा भाव जाग रहा है। प्रेम जागे तो शृंगार, घिन आए तो वीभत्स, अचरज हो तो अद्भुत। नीचे की तालिका को कंठस्थ कर लीजिए।

रसस्थायी भावसीधी पहचान
शृंगाररतिनायक-नायिका का प्रेम, मिलन या बिछोह
हास्यहासअटपटा रूप, बात या हरकत देखकर हँसी
करुणशोककिसी प्रिय के मरने या हमेशा के लिए खो जाने का दुख
रौद्रक्रोधअपमान या अन्याय पर भड़का गुस्सा
वीरउत्साहयुद्ध, दान, दया या धर्म के लिए जोश
भयानकभयडरावनी चीज देखकर काँप उठना
वीभत्सजुगुप्साघिनौनी चीज देखकर घृणा
अद्भुतविस्मयअनोखी, अलौकिक चीज देखकर अचरज
शांतनिर्वेद (शम)संसार से विरक्ति, मन की शांति
वात्सल्यवत्सलता (स्नेह)माता-पिता का संतान के प्रति प्रेम
भक्तिभगवद्विषयक रति (अनुराग)ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण

IGNOU की इकाई में वात्सल्य का स्थायी भाव स्नेह और भक्ति का भगवद्विषयक प्रेम लिखा है। स्कूली किताबें इन्हें वत्सल या वत्सलता और भगवद्विषयक रति या अनुराग भी कहती हैं। उत्तर में इनमें से कोई भी शब्द लिखें, अर्थ एक ही है।

हर रस का आसान उदाहरण, कवि के नाम सहित

नीचे हर रस के लिए एक पंक्ति दी गई है। हर उदाहरण कविता कोश या NCERT की पाठ्यपुस्तक से मिलाया गया है। हर पंक्ति के साथ उसका स्थायी भाव, आलंबन और अनुभाव भी लिखा है, ताकि आप तर्क के साथ उत्तर लिख सकें।

शृंगार रस: संयोग और वियोग

शृंगार को रसराज कहा जाता है। इसके दो भेद हैं। संयोग शृंगार में प्रेमी साथ होते हैं, वियोग या विप्रलंभ शृंगार में बिछड़े होते हैं। दोनों का स्थायी भाव रति ही है।

संयोग शृंगार का सबसे आसान उदाहरण बिहारी सतसई का यह दोहा है: “बतरस-लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ। सौंह करै भौंहनु हँसै दैन कहैं नटि जाइ॥” गोपी ने बातचीत का मजा लेने के लालच में कृष्ण की मुरली छिपा दी है। अब वह कसम खाती है, भौंहों से हँसती है, देने को कहती है और फिर मुकर जाती है।

  • स्थायी भाव: रति
  • आलंबन: कृष्ण (गोपी के लिए)
  • उद्दीपन: कृष्ण का मुरली माँगना
  • अनुभाव: कसम खाना, भौंहों से हँसना, हाँ कहकर मुकरना
  • संचारी: हर्ष, चपलता

वियोग शृंगार के लिए सूरदास का पद लीजिए: “निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे।।” कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद गोपियों की आँखें दिन-रात बरसती हैं, मानो उन पर हमेशा बरसात का मौसम छाया रहता हो। यहाँ आँसू अनुभाव हैं, कृष्ण आलंबन हैं और स्मृति व विषाद संचारी भाव हैं। प्रिय जीवित है और लौट सकता है, इसलिए यह करुण नहीं, वियोग शृंगार है।

हास्य रस

किसी के अटपटे रूप, वेश, बात या हरकत से जब हँसी आए, तो हास्य रस होता है। स्थायी भाव हास है। रामचरितमानस के बालकांड में नारद हरि से सुंदर रूप माँगते हैं और उन्हें बंदर का मुँह मिल जाता है। स्वयंवर की सभा में शिव के दो गण ब्राह्मण के भेस में बैठे हैं और नारद को सुनाकर ताना मारते हैं: “करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥” यानी हरि ने क्या खूब सुंदरता दी है!

  • स्थायी भाव: हास
  • आलंबन: बंदर-मुँह वाले नारद
  • उद्दीपन: नारद का अपने रूप पर इतराना
  • अनुभाव: गणों का ताना मारना और हँसना

करुण रस

किसी प्रिय व्यक्ति के मरने, या ऐसे खो जाने पर जहाँ लौटने की आशा न हो, करुण रस होता है। स्थायी भाव शोक है। NCERT की कक्षा 12 की पुस्तक आरोह में रामचरितमानस के लंकाकांड का ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप’ अंश है। शक्ति-बाण से बेहोश पड़े लक्ष्मण को देखकर राम कहते हैं: “मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥” यानी मेरे लिए तुमने माता-पिता छोड़े और वन में ठंड, धूप और आँधी सही।

  • स्थायी भाव: शोक
  • आलंबन: मूर्च्छित लक्ष्मण
  • उद्दीपन: लक्ष्मण के त्याग की याद
  • अनुभाव: राम का विलाप
  • संचारी: स्मृति, विषाद, दैन्य

रौद्र रस

अपमान, अन्याय या शत्रु की ललकार पर जब गुस्सा भड़के, तो रौद्र रस होता है। स्थायी भाव क्रोध है। NCERT कक्षा 10 की पुस्तक क्षितिज के ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ में शिव-धनुष टूटने पर परशुराम लक्ष्मण से कहते हैं: “बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥ बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही॥” यानी बालक समझकर तुझे नहीं मार रहा, तू मुझे निरा मुनि समझता है; मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ, बहुत क्रोधी हूँ और दुनिया जानती है कि क्षत्रियों के कुल का शत्रु हूँ।

  • स्थायी भाव: क्रोध
  • आलंबन: लक्ष्मण
  • उद्दीपन: धनुष का टूटना और लक्ष्मण के व्यंग्य
  • अनुभाव: फरसे की ओर देखना, धमकी देना
  • संचारी: गर्व, उग्रता, अमर्ष

वीर रस

युद्ध, दान, दया या धर्म के काम में जब मन में उत्साह जागे, तो वीर रस होता है। सुभद्राकुमारी चौहान की ‘झांसी की रानी’ की टेक इसका आसान उदाहरण है: “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥” रानी लक्ष्मीबाई का अंग्रेजों से लोहा लेना आलंबन है, युद्ध का वर्णन उद्दीपन है, और सुनने वाले का जोश वीर रस है। वीर रस के चार भेद पढ़ाए जाते हैं: युद्धवीर, दानवीर, दयावीर और धर्मवीर।

भयानक रस

किसी डरावनी चीज या घटना को देखकर जब मन में भय जागे, तो भयानक रस होता है। रामचरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान लंका जलाते हैं और नगर के लोग चीख उठते हैं: “जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥ तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥” नगर जल रहा है, करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं, और लोग पुकार रहे हैं कि इस घड़ी हमें कौन बचाएगा।

  • स्थायी भाव: भय
  • आलंबन: जलता नगर और हनुमान
  • उद्दीपन: लपटों का फैलना
  • अनुभाव: लोगों का बेहाल होना, माता-पिता को पुकारना
  • संचारी: त्रास, दैन्य, आवेग

वीभत्स रस

घिनौनी चीजें, जैसे लाश, खून, मांस या सड़ांध, देखकर जब जुगुप्सा यानी घृणा जागे, तो वीभत्स रस होता है। इसका आसान उदाहरण रामचरितमानस के लंकाकांड का युद्धभूमि-वर्णन है: “काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं॥” कौए और कंक पक्षी कटी हुई भुजाएँ लेकर उड़ रहे हैं और एक-दूसरे से छीनकर खा रहे हैं। इसी प्रसंग में आगे तुलसी लिखते हैं: “खैंचहिं गीध आँत तट भए”, यानी किनारे पर बैठे गिद्ध आँतें खींच रहे हैं।

  • स्थायी भाव: जुगुप्सा
  • आलंबन: युद्ध में कटे शरीर
  • उद्दीपन: पक्षियों का मांस छीनना और आँतें खींचना
  • अनुभाव: कवि ने पात्र का अनुभाव नहीं लिखा, घृणा सीधे पढ़ने वाले के मन में जागती है

अद्भुत रस

किसी अलौकिक, अनोखी चीज को देखकर जब विस्मय यानी अचरज हो, तो अद्भुत रस होता है। रामचरितमानस के बालकांड (दोहा 201) में बाल राम माता कौशल्या को अपना विराट रूप दिखाते हैं: “देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥” माँ देखती है कि राम के हर रोम में करोड़ों ब्रह्मांड लगे हैं। यहाँ आलंबन राम का विराट रूप है, और कौशल्या का अकुलाना अनुभाव है। तुलसी ने इस प्रसंग के ठीक पहले लिखा है “देखि राम जननी अकुलानी”।

शांत रस

जब संसार की चीजों से मन हट जाए और भीतर एक ठहराव आए, तो शांत रस होता है। स्थायी भाव निर्वेद है, जिसे विश्वनाथ शम कहते हैं। तुलसीदास का यह पद इसका सीधा उदाहरण है: “अब लौं नसानी, अब न नसैहों। रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं॥” यानी अब तक जीवन बिगड़ता रहा, पर अब नहीं बिगाड़ूँगा; राम की कृपा से संसार की रात बीत गई है, जागने के बाद फिर बिस्तर नहीं बिछाऊँगा। आलंबन संसार की निस्सारता का बोध है, और संकल्प व धृति संचारी भाव हैं।

वात्सल्य रस

माता-पिता या बड़ों का संतान के प्रति प्रेम जहाँ जागे, वहाँ वात्सल्य रस होता है। हिंदी में इसका सबसे बड़ा कवि सूरदास को माना जाता है। उनका यह पद लोरी जैसा है: “जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-जोइ कछु गावै॥” यशोदा कृष्ण को पालने में झुला रही हैं, दुलार रही हैं और जो मन में आए गा रही हैं। आलंबन बाल कृष्ण हैं, झुलाना, दुलारना और गाना अनुभाव हैं, और हर्ष संचारी है।

भक्ति रस

जहाँ प्रेम का पात्र ईश्वर हो, वहाँ भक्ति रस होता है। मीराबाई का पद इसका सबसे आसान उदाहरण है: “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥ जाके सिर है मोरपखा मेरो पति सोई।” मीरा के लिए गिरधर ही सब कुछ हैं, और जिसके सिर पर मोर-पंख है वही उनका पति है। आलंबन कृष्ण हैं, समर्पण और अनन्यता इसके मुख्य संचारी हैं।

वे जोड़े जिनमें सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं

कुछ रस आपस में इतने मिलते हैं कि जल्दबाजी में उलट जाते हैं। हर जोड़े में एक सवाल पूछिए, उत्तर अपने-आप निकल आएगा।

जोड़ापहचान का सवालफर्क
करुण और वियोग शृंगारक्या प्रिय के लौटने की आशा है?आशा है तो वियोग शृंगार, आशा नहीं (मृत्यु) तो करुण
रौद्र और वीरमन में गुस्सा है या जोश?रौद्र में क्रोध और बदले की भावना, वीर में उत्साह और कर्तव्य
भयानक और वीभत्समन डर रहा है या घिन कर रहा है?डर हो तो भयानक, घृणा हो तो वीभत्स
शांत और भक्तिध्यान संसार से हटने पर है या ईश्वर से जुड़ने पर?विरक्ति प्रधान हो तो शांत, ईश्वर-प्रेम प्रधान हो तो भक्ति
वात्सल्य और शृंगारप्रेम किसके प्रति है?संतान के प्रति वात्सल्य, प्रेमी-प्रेमिका के प्रति शृंगार

करुण और वियोग शृंगार का फर्क सबसे ज्यादा पूछा जाता है। सूरदास की गोपियाँ भी रो रही हैं और लक्ष्मण के लिए राम भी रो रहे हैं। पर गोपियों के कृष्ण मथुरा में जीवित हैं, जबकि विलाप की उस घड़ी में राम लक्ष्मण को खोया हुआ मानकर रो रहे हैं। इसलिए पहला वियोग शृंगार है और दूसरा करुण।

रस पहचानने का तरीका और आम गलतियाँ

किसी नई पंक्ति में रस ढूँढ़ना हो, तो इस क्रम से चलिए:

  1. पंक्ति का अर्थ पहले अपने शब्दों में लिखिए। अर्थ साफ नहीं होगा तो रस भी साफ नहीं होगा।
  2. पूछिए कि पढ़ते हुए मन में कौन-सा भाव जागा। वही स्थायी भाव है।
  3. आलंबन ढूँढ़िए: भाव किसके कारण जाग रहा है?
  4. अनुभाव ढूँढ़िए: पात्र के शरीर पर क्या दिख रहा है, जैसे रोना, काँपना, हँसना?
  5. स्थायी भाव से रस का नाम लिखिए और एक लाइन में कारण दीजिए।

कुछ गलतियाँ बार-बार दिखती हैं। पहली, विद्यार्थी शब्द देखकर रस बता देते हैं, भाव देखकर नहीं। “आँसू” शब्द आते ही करुण लिख देना गलत है, क्योंकि आँसू वियोग शृंगार में भी आते हैं। दूसरी, रौद्र रस में क्रोध पात्र का होना चाहिए, पढ़ने वाले का गुस्सा रस तय नहीं करता। तीसरी, कई पंक्तियों में एक से ज्यादा रस होते हैं। ऐसे में जो भाव पूरी पंक्ति पर छाया हो, वही मुख्य रस है, बाकी उसके सहायक।

रस और अलंकार भी अक्सर गड़बड़ा जाते हैं। अलंकार कहने के ढंग की सुंदरता है, रस उससे जागने वाला भाव। एक ही पंक्ति में दोनों हो सकते हैं: सूरदास की “सदा रहत पावस ऋतु हम पर” में रस वियोग शृंगार है, जबकि आँसुओं की झड़ी को कभी न रुकने वाली बरसात कहना कहने का ढंग है, जो अलंकार का विषय है। अलंकार की पूरी पहचान के लिए अलंकार के भेद और उदाहरण वाला नोट साथ पढ़िए। रस वाले ज्यादातर उदाहरण तुलसी, सूर और मीरा से आते हैं, इसलिए तुलसीदास के जीवन और रचनाओं और भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि जानना पंक्तियों का प्रसंग समझने में सीधी मदद करता है।

रस का सिद्धांत सिर्फ कविता का नहीं, नाटक और नृत्य का भी है, क्योंकि भरत ने इसे नाट्य के लिए ही लिखा था। शास्त्रीय नृत्य में भाव और रस की यही परंपरा कैसे चलती है, यह भरतनाट्यम वाले नोट में देखा जा सकता है।

परीक्षा में रस कैसे पूछा जाता है

राज्य स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के सामान्य हिंदी प्रश्नपत्र में रस आम तौर पर तीन तरह से आता है। पहला, किसी रस का स्थायी भाव पूछा जाता है, जैसे वीभत्स का जुगुप्सा। दूसरा, पंक्ति देकर रस पूछा जाता है। तीसरा, रस के अंगों या रस-सूत्र पर सीधा प्रश्न होता है, जैसे रस-सूत्र किसने दिया या संचारी भाव कितने हैं। सिविल सेवा के अनिवार्य हिंदी प्रश्नपत्र की तैयारी के लिए हिंदी व्याकरण का पूरा नक्शा देख लीजिए, और हिंदी साहित्य वैकल्पिक लेने वालों के लिए हिंदी साहित्य वैकल्पिक की गाइड में काव्यशास्त्र की जगह समझिए।

रस का अध्याय रटने से ज्यादा पढ़ने का अध्याय है। ग्यारह रसों के स्थायी भाव एक दिन में याद हो जाते हैं, पर सही उत्तर तभी आता है जब आप पंक्ति का अर्थ समझकर पूछते हैं कि मन में कौन-सा भाव जागा। हर रस का एक पक्का उदाहरण, उसके आलंबन और अनुभाव के साथ, याद कर लीजिए; नई पंक्ति पर भी वही तर्क काम आएगा।

अभ्यास प्रश्न

नीचे की पंक्तियों में रस बताइए और स्थायी भाव के साथ एक लाइन में कारण लिखिए। आखिरी पाँच प्रश्न परिभाषा और फर्क पर हैं। उत्तर इस खंड के अंत में हैं।

  1. बतरस-लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ।
  2. निसिदिन बरसत नैन हमारे।
  3. मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥
  4. बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही॥
  5. खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
  6. जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥
  7. काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं॥
  8. रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥
  9. जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
  10. मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।
  11. भरत मुनि का रस-सूत्र लिखिए और उसमें आए तीन भावों के नाम बताइए।
  12. विभाव के दो भेद कौन-से हैं? उदाहरण सहित लिखिए।
  13. नाट्यशास्त्र के अनुसार संचारी भाव कितने हैं? किन्हीं चार के नाम लिखिए।
  14. करुण रस और वियोग शृंगार में मुख्य अंतर क्या है?
  15. शांत रस का स्थायी भाव क्या है, और विश्वनाथ उसे क्या कहते हैं?

उत्तर

  1. संयोग शृंगार: स्थायी भाव रति; गोपी कृष्ण से बातचीत के लालच में मुरली छिपाती है।
  2. वियोग शृंगार: स्थायी भाव रति; कृष्ण जीवित हैं, बस दूर हैं, इसलिए करुण नहीं।
  3. करुण: स्थायी भाव शोक; मूर्च्छित लक्ष्मण पर राम का विलाप।
  4. रौद्र: स्थायी भाव क्रोध; परशुराम का लक्ष्मण पर गुस्सा।
  5. वीर: स्थायी भाव उत्साह; रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का वर्णन।
  6. भयानक: स्थायी भाव भय; जलते नगर में लोगों का बेहाल होना।
  7. वीभत्स: स्थायी भाव जुगुप्सा; पक्षियों का कटी भुजाएँ छीनकर खाना।
  8. अद्भुत: स्थायी भाव विस्मय; राम के रोम-रोम में करोड़ों ब्रह्मांड।
  9. वात्सल्य: स्थायी भाव वत्सलता; यशोदा का कृष्ण को पालने में झुलाना।
  10. भक्ति: स्थायी भाव भगवद्विषयक रति; मीरा का कृष्ण के प्रति अनन्य समर्पण।
  11. “विभावानुभावव्यभिचारिभावसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः”। तीन भाव: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भाव।
  12. आलंबन विभाव, जैसे शृंगार में प्रिय; उद्दीपन विभाव, जैसे चाँदनी रात या एकांत।
  13. 33। उदाहरण: निर्वेद, ग्लानि, शंका, हर्ष (चिंता, लज्जा, गर्व भी सही)।
  14. करुण में प्रिय की मृत्यु या स्थायी खोना होता है, लौटने की आशा नहीं रहती। वियोग शृंगार में प्रिय जीवित और दूर होता है, मिलन की आशा बनी रहती है।
  15. निर्वेद; विश्वनाथ इसे शम कहते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रस किसे कहते हैं?

कविता पढ़ने, सुनने या नाटक देखने से मन में जो आनंद जागता है, उसे रस कहते हैं। काव्यशास्त्र की भाषा में, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव मिलकर जब स्थायी भाव को जगा देते हैं, तो वह स्थायी भाव रस बन जाता है। इसीलिए रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है।

रस के कितने भेद होते हैं?

भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में आठ रस माने: शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स और अद्भुत। बाद के आचार्यों ने शांत को नौवाँ रस माना, इसलिए नौ रस की बात सबसे आम है। हिंदी में वात्सल्य और भक्ति को जोड़कर ग्यारह रस भी पढ़ाए जाते हैं।

रस के कितने अंग होते हैं?

रस के चार अंग हैं: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव। स्थायी भाव मन में सोया भाव है, विभाव उसे जगाने वाला कारण है, अनुभाव शरीर पर दिखने वाला संकेत है, और संचारी भाव बीच-बीच में उठने वाले छोटे भाव हैं। विभाव के दो भेद होते हैं, आलंबन और उद्दीपन।

शृंगार रस का आसान उदाहरण क्या है?

संयोग शृंगार का आसान उदाहरण बिहारी का दोहा है, जिसमें गोपी बातचीत के लालच में कृष्ण की मुरली छिपा देती है और कसम खाकर भी लौटाने से मुकर जाती है। वियोग शृंगार के लिए सूरदास का पद निसिदिन बरसत नैन हमारे सबसे सरल है। दोनों का स्थायी भाव रति है।

वीभत्स रस का आसान उदाहरण क्या है?

रामचरितमानस के लंकाकांड में युद्धभूमि का वर्णन वीभत्स रस का आसान उदाहरण है, जहाँ कौए और कंक पक्षी कटी भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक-दूसरे से छीनकर खाते हैं। इसका स्थायी भाव जुगुप्सा यानी घृणा है। पढ़ते हुए डर नहीं, घिन आती है, इसलिए यह भयानक नहीं, वीभत्स है।

रसराज किस रस को कहते हैं?

शृंगार रस को रसराज कहा जाता है। इसका स्थायी भाव रति है और इसके दो भेद हैं, संयोग और वियोग। प्रेम का भाव सबसे व्यापक माना गया, इसलिए इसे रसों का राजा कहा गया।

वात्सल्य रस का स्थायी भाव क्या है?

वात्सल्य रस का स्थायी भाव वत्सलता है, जिसे स्नेह भी कहा जाता है। इसमें माता-पिता या बड़ों का संतान के प्रति प्रेम दिखाया जाता है। सूरदास के बाल-लीला के पद, जैसे यशोदा का कृष्ण को पालने में झुलाना, इसके सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हैं।

रस-सूत्र किसने दिया?

रस-सूत्र भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में दिया। सूत्र है: विभावानुभावव्यभिचारिभावसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः, यानी विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। बाद के आचार्यों ने इसी सूत्र की अलग-अलग व्याख्याएँ कीं।

Tell Google you want more of this.

Add Anantam IAS as a preferred source

One tap, and this site shows up more often in your own Top Stories, AI Overviews and AI Mode. Remove it any time.

Share this

PDF

Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

Recognized as one of India’s best content marketers, Gaurav Tiwari is an SEO strategist, WordPress developer, and founder of Gatilab. He builds websites that load in under a second, creates content that ranks on Google’s first page, and develops WordPress plugins and tools used on thousands of live sites.

Specialises in · Writing, web development, design — UPSC prep tooling Experience · 16+ years Visit website ↗

Preparing for UPSC CSE 2026? Sit in a free demo class.

No sales call. No brochure. Watch a real Monday-morning GS session taught by ex-Rau's IAS faculty.