भारत की मिसाइलें: IGMDP से शुरुआत, अग्नि और ब्रह्मोस की कड़ी और हर भूमिका
भारत की मिसाइलें: 1983 का IGMDP, भूमिका के हिसाब से हर बड़ी मिसाइल और DRDO या PIB की बताई रेंज, 2024 से 2026 तक के परीक्षण और MTCR।
भारत की मिसाइलें वे निर्देशित हथियार हैं जिन्हें देश अपनी सेनाओं के लिए खुद डिजाइन करता है और खुद बनाता है। इनमें पृथ्वी और अग्नि जैसी बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल है, आकाश वायु रक्षा प्रणाली है और नाग टैंक-रोधी मिसाइल है। इनमें से ज्यादातर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) से आती हैं, और आज की पूरी कोशिश की जड़ 1983 का एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम है। ये इसलिए अहम हैं क्योंकि सबसे लंबी रेंज वाली मिसाइलें भारत का परमाणु प्रतिरोध उठाती हैं। छोटी मिसाइलें देश के आसमान और सीमाओं की रखवाली करती हैं, और कुछ मिसाइलें अब विदेशों से निर्यात के ऑर्डर भी ला रही हैं।
दो बातें ज्यादातर पाठकों को उलझा देती हैं। पहली यह धारणा कि अग्नि-5 एक अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल है, जबकि सरकार की अपनी विज्ञप्तियाँ उसे मध्यवर्ती दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल कहती हैं, जिसकी रेंज 5,000 किलोमीटर तक है। दूसरी यह कि ब्रह्मोस पूरी तरह भारतीय हथियार है, जबकि उसे भारत और रूस का एक संयुक्त उद्यम बनाता है। नीचे दी गई सूची दोनों बातें साफ कर देती है। वह हर बड़ी मिसाइल को उसके काम के हिसाब से रखती है, और हर मिसाइल की सिर्फ वही रेंज बताती है जो किसी आधिकारिक स्रोत ने छापी है।
भूमिका के हिसाब से भारत की मिसाइलों की सूची
भारत की मिसाइलें भूमिका के हिसाब से याद रखना सबसे आसान है। इसलिए तालिका बैलिस्टिक मिसाइलों से शुरू होती है और नीचे उस इकलौते उपग्रह-रोधी परीक्षण तक जाती है। रेंज वाले कॉलम में सिर्फ वही आँकड़ा है जो DRDO, रक्षा मंत्रालय या ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने छापा है। जहाँ कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है, वहाँ खाने में “आधिकारिक रूप से घोषित नहीं” लिखा है। वजह यह है कि ऑनलाइन घूमने वाले कई आँकड़े सिर्फ अनुमान हैं।
| मिसाइल | भूमिका और वर्ग | विकसित करने वाला | आधिकारिक रूप से बताई गई रेंज | स्थिति और हाल की तारीख वाली उपलब्धि |
|---|---|---|---|---|
| पृथ्वी (थलसेना, वायुसेना और नौसेना संस्करण) | बैलिस्टिक: कम दूरी, सतह से सतह पर मार करने वाली | DRDO, IGMDP के तहत | तीनों संस्करणों के लिए 150, 250 और 350 किलोमीटर | सेना में शामिल; 17 जुलाई 2025 को पृथ्वी-II का यूजर लॉन्च |
| अग्नि-1 | बैलिस्टिक: 2023 में मध्यम दूरी की और 2025 में कम दूरी की कही गई | DRDO | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | सामरिक बल कमान के पास; 17 जुलाई 2025 को यूजर लॉन्च |
| अग्नि-3 | बैलिस्टिक: मध्यवर्ती दूरी | DRDO | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | 6 फरवरी 2026 को यूजर लॉन्च |
| अग्नि-4 | बैलिस्टिक: 2022 में मध्यवर्ती दूरी, 2026 में मध्यम दूरी | DRDO | 4,000 किलोमीटर | 6 अगस्त 2026 को यूजर लॉन्च |
| अग्नि-5 | बैलिस्टिक: मध्यवर्ती दूरी, तीन चरणों वाला ठोस ईंधन | DRDO | 5,000 किलोमीटर तक | मार्च 2024 में पहली MIRV उड़ान (मिशन दिव्यास्त्र); 20 अगस्त 2025 को यूजर लॉन्च |
| अग्नि-प्राइम (अग्नि-P) | बैलिस्टिक: नई पीढ़ी, कैनिस्टर से लॉन्च होने वाली | DRDO | 1,000 से 2,000 किलोमीटर | 24 सितंबर 2025 को रेल-आधारित लॉन्चर से दागी गई |
| प्रलय | बैलिस्टिक: अर्ध-बैलिस्टिक, पारंपरिक वारहेड | DRDO (रिसर्च सेंटर इमारत) | 150 से 500 किलोमीटर | जुलाई 2025 में यूजर ट्रायल; 31 दिसंबर 2025 को दो मिसाइलों का सैल्वो |
| ब्रह्मोस | क्रूज: सुपरसोनिक, जहाज-रोधी और जमीनी हमला | ब्रह्मोस एयरोस्पेस (DRDO और रूस की NPO माशिनोस्त्रोयेनिया) | 2019 के परीक्षण में पूरी रेंज 290 किलोमीटर | नौसेना और थलसेना के पास; 28 जनवरी 2022 को फिलीपींस के साथ निर्यात अनुबंध |
| निर्भय | क्रूज: लंबी दूरी, सबसोनिक | DRDO (वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान) | 2014 के परीक्षण में 1,000 किलोमीटर से ज्यादा उड़ी | 15 अप्रैल 2019 को छठा विकास परीक्षण |
| ITCM और LRLACM | क्रूज: सबसोनिक, जमीनी हमला | DRDO, गैस टर्बाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान के इंजन के साथ | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | ITCM का परीक्षण 18 अप्रैल 2024; LRLACM का पहला परीक्षण 12 नवंबर 2024 |
| लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल | हाइपरसोनिक | DRDO (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मिसाइल परिसर, हैदराबाद) | 1,500 किलोमीटर से ज्यादा | 16 नवंबर 2024 को पहला उड़ान परीक्षण |
| आकाश, आकाश प्राइम और आकाश-NG | सतह से हवा में मार करने वाली: कम दूरी | DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास प्रयोगशाला) | 25 किलोमीटर (आकाश) | आकाश 2014 में वायुसेना और 2015 में थलसेना में शामिल; आकाश-NG के यूजर ट्रायल दिसंबर 2025 में पूरे |
| त्रिशूल | सतह से हवा में मार करने वाली: कम दूरी | DRDO, IGMDP के तहत | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | प्रौद्योगिकी प्रदर्शक के रूप में बंद |
| MRSAM | सतह से हवा में मार करने वाली: मध्यम दूरी | DRDO और इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | फायरिंग यूनिटें वायुसेना और थलसेना को सौंपी गईं; थलसेना संस्करण का परीक्षण 3 और 4 अप्रैल 2025 |
| VSHORADS | सतह से हवा में मार करने वाली: कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली | DRDO (रिसर्च सेंटर इमारत) | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | 1 फरवरी 2025 को तीन उड़ान परीक्षणों की खबर |
| कुशा | सतह से हवा में मार करने वाली: लंबी दूरी | DRDO | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | 23 जुलाई 2026 को पहला उड़ान परीक्षण |
| फेज-II BMD इंटरसेप्टर | बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा | DRDO | 5,000 किलोमीटर वर्ग की बैलिस्टिक मिसाइलों से बचाव के लिए बना | 24 जुलाई 2024 को उड़ान परीक्षण |
| नाग और नाग मार्क 2 | टैंक-रोधी: तीसरी पीढ़ी, दागो और भूल जाओ | DRDO; मिसाइल का उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) करती है | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | 22 अक्टूबर 2020 को अंतिम यूजर ट्रायल; मार्क 2 को जनवरी 2025 में सेना में शामिल होने के लिए तैयार घोषित किया गया |
| हेलिना और ध्रुवास्त्र | टैंक-रोधी: हेलीकॉप्टर से दागी जाने वाली | DRDO | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | फरवरी 2021 में संयुक्त यूजर ट्रायल; 11 अप्रैल 2022 को ऊँचाई वाले इलाके में परीक्षण |
| अस्त्र मार्क 1 | हवा से हवा में: दृश्य सीमा से परे | DRDO; उत्पादन BDL करती है | 100 किलोमीटर से ज्यादा | 31 मई 2022 को BDL के साथ 2,971 करोड़ रुपये का ऑर्डर; स्वदेशी सीकर का परीक्षण 11 जुलाई 2025 |
| रुद्रम और रुद्रम-II | हवा से सतह पर: विकिरण-रोधी और प्रहार | DRDO | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | रुद्रम का पहला परीक्षण 9 अक्टूबर 2020; रुद्रम-II 29 मई 2024 को, और 2 जून 2026 को नए परीक्षणों की खबर |
| NASM-SR | जहाज-रोधी: हेलीकॉप्टर से दागी जाने वाली | DRDO और भारतीय नौसेना | आधिकारिक रूप से घोषित नहीं | 25 फरवरी 2025 को परीक्षण; 29 अप्रैल 2026 को पहले सैल्वो लॉन्च की खबर |
| मिशन शक्ति इंटरसेप्टर | उपग्रह-रोधी: सीधी टक्कर से मार (हिट-टू-किल) | DRDO | निचली पृथ्वी कक्षा में एक भारतीय उपग्रह को निशाना बनाया | सिर्फ एक बार परीक्षण, 27 मार्च 2019 को |
रेंज वाले कॉलम को ऊपर से नीचे तक पढ़िए, तो एक पैटर्न दिखता है। सरकार ज्यादातर सामरिक मिसाइलों की और कुछ बड़ी टैक्टिकल (युद्ध के मैदान वाली) मिसाइलों की रेंज छापती है, और बाकी के बारे में बहुत कम बताती है। यही खाली जगह वजह है कि जो नोट हर खाने को पूरे भरोसे वाले आँकड़े से भर देता है, उस पर शक करना चाहिए।
शुरुआत कहाँ से हुई: 1983 का IGMDP
एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम, यानी IGMDP, 1983 में DRDO में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में शुरू हुआ। इसे पाँच मिसाइलें बनाने की मंजूरी मिली थी। आगे चलकर पाँचों का रास्ता अलग-अलग निकला:
- पृथ्वी: सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल, जो थलसेना, वायुसेना और नौसेना के लिए 150, 250 और 350 किलोमीटर वाले संस्करणों में बनी। यह श्रृंखला सेना में शामिल हुई।
- अग्नि: री-एंट्री यानी वायुमंडल में दोबारा प्रवेश की तकनीक का प्रदर्शक। री-एंट्री वह चरण है जब वारहेड वायुमंडल में वापस आता है और उसे जलकर खत्म हुए बिना नीचे पहुँचना होता है। यही तकनीक पूरी अग्नि श्रृंखला में काम आई।
- त्रिशूल: कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल। यह सिर्फ प्रौद्योगिकी प्रदर्शक के रूप में पूरी हुई, क्योंकि तकनीक देर से आई और सेनाओं की जरूरत बदल गई।
- आकाश: 25 किलोमीटर रेंज वाली सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल। इसे वायुसेना ने 2014 में और थलसेना ने 2015 में शामिल किया।
- नाग: तीसरी पीढ़ी की टैंक-रोधी मिसाइल, जिसमें “दागो और भूल जाओ” (fire-and-forget) और ऊपर से हमला (top-attack) वाले मोड हैं। इसने 2020 में अंतिम यूजर ट्रायल पास किया और फिर भारत डायनेमिक्स लिमिटेड में उत्पादन के लिए चली गई।
कई नोट्स लिखते हैं कि यह कार्यक्रम 2008 में बंद हो गया था। आधिकारिक रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि नहीं करता। फरवरी 2008 में रक्षा मंत्री ने राज्यसभा को बताया था कि IGMDP को छोड़ा नहीं जा रहा। फिर अगस्त 2012 में मंत्रालय ने लोकसभा को बताया कि यह मार्च 2012 में पूरा हो चुका है। कार्यक्रम और उसमें कलाम की भूमिका को ज्यादा गहराई से समझने के लिए साइट का कलाम के नेतृत्व में IGMDP वाला नोट पढ़िए।
2008 वाले जवाब में 16 जनवरी 2008 तक का खर्च भी बताया गया था। ये आँकड़े दिखाते हैं कि मेहनत और पैसा कहाँ लगा:
- आकाश: 516.86 करोड़ रुपये।
- पृथ्वी: 298.95 करोड़ रुपये।
- त्रिशूल: 282.68 करोड़ रुपये।
- नाग: 212.27 करोड़ रुपये।
- अग्नि: 74.34 करोड़ रुपये, वह भी सिर्फ प्रदर्शक के लिए।
आकाश पर सबसे ज्यादा खर्च हुआ, और सेना तक पहुँचने में भी उसे सबसे ज्यादा समय लगा। त्रिशूल पर लगभग पृथ्वी जितना खर्च हुआ, फिर भी वह कभी सेना में नहीं पहुँची। तो ईमानदार हिसाब यह बनता है: दो मिसाइलें सेवा में, एक उत्पादन में, एक बंद और एक जो तकनीक का आधार बन गई। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड रक्षा मंत्रालय की कंपनी है, जिसका निगमन 16 जुलाई 1970 को हुआ था। इसके बाद आई कई मिसाइलों के उत्पादन में यही कंपनी साझेदार है।
बैलिस्टिक मिसाइलें: पृथ्वी, अग्नि श्रृंखला और प्रलय
बैलिस्टिक मिसाइल अपना रॉकेट सिर्फ उड़ान के शुरुआती हिस्से में जलाती है। उसके बाद वह एक ऊँचे चाप पर बिना इंजन के आगे बढ़ती है और अपने लक्ष्य पर आ गिरती है, ठीक वैसे ही जैसे हाथ से फेंका गया पत्थर गिरता है। भारत की बैलिस्टिक श्रृंखला पृथ्वी से अग्नि-5 तक जाती है, और इसके साथ पारंपरिक वारहेड वाली प्रलय भी है। हर अग्नि संस्करण को एक-एक करके समझने के लिए अग्नि मिसाइल श्रृंखला वाला नोट देखिए।
यहीं ज्यादातर नोट्स गलती करते हैं। वे वर्ग वाले लेबल रट लेते हैं, लेकिन सरकार की अपनी विज्ञप्तियाँ इन लेबलों को काफी ढीले ढंग से इस्तेमाल करती हैं:
- अग्नि-1: जून 2023 में “मध्यम दूरी”, जुलाई 2025 में “कम दूरी”।
- अग्नि-4: जून 2022 में “मध्यवर्ती दूरी”, अगस्त 2026 में “मध्यम दूरी”।
- अग्नि-5: जनवरी 2018 में “लंबी दूरी”, अगस्त 2025 में “मध्यवर्ती दूरी”।
बताई गई रेंज अपनी जगह टिकी रहती है, जबकि लेबल बदलते रहते हैं। इसलिए संख्या याद कीजिए और लेबल को दूसरे नंबर पर रखिए। यानी अग्नि मिसाइल की रेंज पक्की बात है, उसका लेबल नहीं। अग्नि-5 के लिए आज का आधिकारिक लेबल मध्यवर्ती दूरी है, और उत्तर में यही लिखिए।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक अग्नि-5 तीन चरणों वाली, ठोस ईंधन से चलने वाली मिसाइल है, जो 5,000 किलोमीटर तक दूर के लक्ष्य पर वार कर सकती है। इसके 2021 के परीक्षण की विज्ञप्ति ने इसे सीधे भारत की विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध (credible minimum deterrence) और पहले इस्तेमाल न करने (No First Use) की नीति से जोड़ा। दूसरे शब्दों में, यह मिसाइल इसलिए है कि जवाबी हमला पक्का रहे, पहले वार करने के लिए नहीं।
सबसे नया कदम MIRV है, जिसका पूरा नाम Multiple Independently Targetable Re-entry Vehicle है। हिंदी में इसे बहु-स्वतंत्र लक्ष्य-भेदी री-एंट्री यान कह सकते हैं। इसका मतलब है कि एक मिसाइल कई वारहेड ले जाती है और हर वारहेड को अलग लक्ष्य की ओर छोड़ती है, जैसे कोई बस सवारियों को अलग-अलग स्टॉप पर उतारती जाती है। DRDO ने अग्नि-5 को MIRV के साथ पहली बार मिशन दिव्यास्त्र में उड़ाया। इसकी घोषणा 11 मार्च 2024 को हुई, और परीक्षण ओडिशा के तट के पास डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से हुआ। 8 मई 2026 को एक “एडवांस्ड अग्नि” कई पेलोड लेकर हिंद महासागर क्षेत्र के बड़े इलाके में फैले लक्ष्यों तक गई।
अग्नि-प्राइम नया और हल्का डिजाइन है, जिसकी बताई गई रेंज 1,000 से 2,000 किलोमीटर है। यह कैनिस्टर से लॉन्च होती है। यानी यह एक सील बंद ट्यूब में रहती है, जो उसका लॉन्चर भी है, ताकि उसे बहुत कम समय की सूचना पर दागा जा सके। 24 सितंबर 2025 को इसे रेल-आधारित लॉन्चर से दागा गया। यह लॉन्चर बिना किसी पूर्व शर्त के रेल नेटवर्क पर चल सकता है।
नियमित परीक्षण अब सामरिक बल कमान (SFC) के हाथ में हैं। यही कमान भारत की सामरिक मिसाइलें संभालती है। इसके हाल के यूजर लॉन्च दिखाते हैं कि ये मिसाइलें विकास के दौर में नहीं, बल्कि सेवा में हैं:
- पृथ्वी-II और अग्नि-1: 17 जुलाई 2025।
- अग्नि-5: 20 अगस्त 2025।
- अग्नि-3: 6 फरवरी 2026।
- अग्नि-4: 6 अगस्त 2026।
इनमें प्रलय सबसे अलग है, क्योंकि वह परमाणु नहीं, बल्कि पारंपरिक वारहेड ले जाती है। वह अर्ध-बैलिस्टिक रास्ते पर उड़ती है, यानी ज्यादातर बैलिस्टिक ढंग से, लेकिन बीच में दिशा बदलने की क्षमता के साथ। उसकी रेंज 150 से 500 किलोमीटर है। 28 और 29 जुलाई 2025 के यूजर ट्रायल में उसकी अधिकतम और न्यूनतम रेंज परखी गई। फिर 31 दिसंबर 2025 को दो प्रलय मिसाइलें एक ही लॉन्चर से तेजी से एक के बाद एक छोड़ी गईं। पूरी परीक्षण श्रृंखला के लिए साइट की प्रलय परीक्षण रिपोर्ट देखिए।
भारत की पनडुब्बी से दागी जाने वाली K श्रृंखला ज्यादातर सार्वजनिक रिकॉर्ड से बाहर है, और उसकी कोई आधिकारिक रेंज नहीं छपी है। INS अरिघात से K-4 लॉन्च पर आई खबरें इसी सावधानी के साथ पढ़िए।
क्रूज और हाइपरसोनिक मिसाइलें: ब्रह्मोस, निर्भय और स्क्रैमजेट की कोशिश
क्रूज मिसाइल एक छोटे, बिना पायलट वाले जेट की तरह उड़ती है। उड़ान के ज्यादातर हिस्से में उसे हवा से ऑक्सीजन लेने वाला इंजन चलाता है, और वह रडार की पकड़ से बचने के लिए नीचे उड़ सकती है। सुपरसोनिक ब्रह्मोस और सबसोनिक निर्भय भारत की दो मुख्य क्रूज श्रृंखलाएँ हैं।
ब्रह्मोस अकेले DRDO की मिसाइल नहीं, बल्कि एक साझा उत्पाद है। इसका संयुक्त उद्यम भारत और रूस के बीच 12 फरवरी 1998 को मॉस्को में हुए अंतर-सरकारी समझौते से शुरू हुआ। इसमें DRDO की जोड़ी रूस की NPO माशिनोस्त्रोयेनिया से बनी। भारतीय पक्ष की हिस्सेदारी 50.5% है और रूसी पक्ष की 49.5%। नाम ब्रह्मपुत्र और मोस्कवा नदियों को जोड़कर बना है। DRDO के मुताबिक यह मिसाइल जमीन, समुद्र और हवा, तीनों से दागी जा सकती है। इसके जहाज-रोधी और जमीनी हमले वाले संस्करण हैं, और यह नौसेना और थलसेना में सेवा में है। 30 सितंबर 2019 के परीक्षण में, भारत में बने प्रणोदन और एयरफ्रेम के साथ, इसने अपनी 290 किलोमीटर की पूरी रेंज तय की।
बदलाव का सबसे साफ संकेत इसका निर्यात रिकॉर्ड है। 28 जनवरी 2022 को ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने फिलीपींस के साथ तट-आधारित जहाज-रोधी मिसाइल प्रणाली का अनुबंध किया। 11 मई 2025 को रक्षा मंत्री ने लखनऊ में ब्रह्मोस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी सेंटर का उद्घाटन किया। मंत्रालय की 2025 की सालाना समीक्षा कहती है कि वहाँ बनी पहली मिसाइलें पाँच महीने के भीतर रवाना कर दी गईं। संयुक्त उद्यम को ज्यादा विस्तार से समझने के लिए साइट का ब्रह्मोस मिसाइल वाला नोट पढ़िए।
निर्भय का पहला लॉन्च मार्च 2013 में सिर्फ आंशिक रूप से सफल रहा। 17 अक्टूबर 2014 को यह एक घंटे 10 मिनट से कुछ ज्यादा देर तक उड़ी, और DRDO प्रमुख ने कहा कि इसने 1,000 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय की। दो नई मिसाइलें इसी काम को आगे बढ़ाती हैं:
- ITCM (स्वदेशी प्रौद्योगिकी क्रूज मिसाइल): इसका परीक्षण 18 अप्रैल 2024 को हुआ। इसमें गैस टर्बाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान का बनाया इंजन था, और यह समुद्र के ऊपर बहुत नीचे उड़ी।
- LRLACM (लंबी दूरी की जमीनी हमला क्रूज मिसाइल): इसका पहला परीक्षण 12 नवंबर 2024 को हुआ। इसे बेंगलुरु के वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान ने विकसित किया है। उत्पादन में BDL और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड साझेदार हैं।
हाइपरसोनिक का मतलब है ध्वनि की गति से पाँच गुना से ज्यादा तेज। मंत्रालय इस गति को 6,100 किलोमीटर प्रति घंटा से ऊपर बताता है। भारत इस पर दो रास्तों से काम कर रहा है। पहला रास्ता स्क्रैमजेट है। यह हवा से ऑक्सीजन लेने वाला ऐसा इंजन है, जो अपने अंदर सुपरसोनिक गति से गुजरती हवा में ईंधन जलाता है। हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल ने 7 सितंबर 2020 को ध्वनि की छह गुना गति पर 20 सेकंड से ज्यादा उड़ान भरी। फिर 9 मई 2026 को एक पूरे आकार का स्क्रैमजेट कम्बस्टर जमीन पर 1,200 सेकंड से ज्यादा चला।
दूसरा रास्ता वह लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल है जो 16 नवंबर 2024 को उड़ी। इसे 1,500 किलोमीटर से ज्यादा की रेंज तक पेलोड ले जाने के लिए बनाया गया है। इन दोनों रास्तों को अलग-अलग रखिए। उस मिसाइल की विज्ञप्ति यह नहीं कहती कि उसमें स्क्रैमजेट लगा है। इसलिए जो उत्तर दोनों को आपस में जोड़ देता है, वह रिकॉर्ड से ज्यादा दावा करता है।
वायु रक्षा और उपग्रह-रोधी मिसाइलें: आकाश से कुशा तक
भारत की रक्षात्मक मिसाइलें रेंज के हिसाब से परतों में बनी हैं। कंधे से दागी जाने वाली VSHORADS और आकाश अंदर की परतें संभालती हैं। MRSAM और नई कुशा उससे आगे तक पहुँचती हैं। इन सबके ऊपर एक अलग बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम है।
आकाश इनमें सबसे पुरानी खिलाड़ी है। इसकी रेंज 25 किलोमीटर है। मंत्रालय ने इसकी स्वदेशी सामग्री 96 प्रतिशत से ज्यादा बताई, और कैबिनेट ने 30 दिसंबर 2020 को इसके निर्यात को मंजूरी दी। DRDO इसे कम दूरी की प्रणाली कहता है, हालाँकि 2014 की एक मंत्रालय विज्ञप्ति ने इसे मध्यम दूरी की कहा था। इसलिए DRDO के अपने विवरण को ही मानिए। इसके बाद इसके दो उन्नत संस्करण आए:
- आकाश प्राइम: इसका पहला परीक्षण 27 सितंबर 2021 को स्वदेशी रेडियो-फ्रीक्वेंसी सीकर के साथ हुआ। सीकर मिसाइल की अपनी रडार वाली आँख है, जो आखिरी चरण में उसे लक्ष्य तक ले जाती है।
- आकाश-NG: दिसंबर 2025 में इसके यूजर मूल्यांकन ट्रायल पूरे हुए। इसने अपनी रेंज के किनारे के पास कम ऊँचाई वाले लक्ष्यों को भेदा, और लंबी दूरी पर ऊँची उड़ान वाले लक्ष्यों को भी, जैसा आकाश-NG ट्रायल रिपोर्ट बताती है।
आकाश के ऊपर लंबी रेंज वाली प्रणालियाँ आती हैं। MRSAM, DRDO और इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज का संयुक्त कार्यक्रम है, जिसकी फायरिंग यूनिटें वायुसेना और थलसेना को सौंपी जा चुकी हैं। कुशा स्वदेशी, लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। इसने 23 जुलाई 2026 को पहली उड़ान भरी और एक इलेक्ट्रॉनिक लक्ष्य को भेदा, जो तेज और ऊँची उड़ान वाले खतरे की नकल कर रहा था। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह क्षमता दुनिया के गिने-चुने देशों के पास ही है।
बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा का मतलब है आती हुई बैलिस्टिक मिसाइल को उड़ान के दौरान ही मार गिराना। 24 जुलाई 2024 को DRDO ने अपने फेज-II एंडो-एटमॉस्फेरिक इंटरसेप्टर का परीक्षण किया। यह ऐसी मिसाइल है जो वायुमंडल के अंदर ही अपना निशाना भेदती है। परीक्षण में इसके सामने दुश्मन की मिसाइल की नकल करने वाला लक्ष्य था। DRDO ने कहा कि इस परीक्षण ने 5,000 किलोमीटर वर्ग की बैलिस्टिक मिसाइलों के खिलाफ क्षमता दिखाई। 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री ने लाल किले से मिशन सुदर्शन चक्र की घोषणा की, जिसका मकसद दुश्मन की रक्षा घुसपैठ को बेअसर करना है।
इसी इंटरसेप्टर परिवार ने भारत को उसका इकलौता उपग्रह-रोधी परीक्षण दिया। 27 मार्च 2019 को मिशन शक्ति में DRDO के बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा इंटरसेप्टर ने निचली पृथ्वी कक्षा में एक भारतीय उपग्रह को हिट-टू-किल मोड में नष्ट किया। यह इंटरसेप्टर तीन चरणों वाली मिसाइल थी, जिसमें दो ठोस रॉकेट बूस्टर थे। हिट-टू-किल का मतलब है विस्फोट से नहीं, बल्कि सीधी टक्कर से नष्ट करना। मंत्रालय ने कहा कि इसके साथ भारत यह क्षमता रखने वाला चौथा देश बन गया। परीक्षण का पूरा ब्योरा मिशन शक्ति वाले नोट में है।
टैक्टिकल मिसाइलें: टैंक-रोधी, हवा से हवा में और जहाज-रोधी
टैक्टिकल मिसाइलें युद्ध के मैदान के हथियार हैं, जो गाड़ियों, हेलीकॉप्टरों, लड़ाकू विमानों और जहाजों से दागी जाती हैं। ये अग्नि जितनी मशहूर नहीं हैं, लेकिन भारत के उत्पादन और निर्यात की सबसे नई कहानी यहीं लिखी जा रही है।
नाग एक दागो और भूल जाओ वाली टैंक-रोधी मिसाइल है। एक बार दागने के बाद यह खुद अपना रास्ता तय करके टैंक तक पहुँचती है, इसलिए दागने वाला दल वहाँ से हट सकता है। इसका टॉप-अटैक मोड टैंक की छत पर वार करता है, जहाँ कवच पतला होता है। इसने 22 अक्टूबर 2020 को पोखरण में अंतिम यूजर ट्रायल पास किया। यह ट्रायल NAMICA से हुआ, जो BMP-II वाहन पर बना मिसाइल वाहक है। मिसाइल BDL बनाती है, और नाग मार्क 2 को जनवरी 2025 में सेना में शामिल होने के लिए तैयार घोषित किया गया।
थलसेना के लिए हेलिना और वायुसेना के लिए ध्रुवास्त्र, हेलीकॉप्टर से दागे जाने वाले इसके चचेरे भाई हैं। दोनों लॉक-ऑन-बिफोर-लॉन्च मिसाइलें हैं। यानी मिसाइल के हेलीकॉप्टर से निकलने से पहले ही उसका सीकर टैंक पर लॉक हो जाता है।
अस्त्र मार्क 1 भारत की दृश्य सीमा से परे (beyond visual range) मार करने वाली हवा से हवा में मिसाइल है। इसे दुश्मन के उन विमानों को मारने के लिए बनाया गया है जो इतनी दूर होते हैं कि पायलट उन्हें देख नहीं सकता। इसकी बताई गई रेंज 100 किलोमीटर से ज्यादा है। मंत्रालय ने 31 मई 2022 को वायुसेना और नौसेना के लिए BDL के साथ 2,971 करोड़ रुपये का अनुबंध किया। फिर 11 जुलाई 2025 को स्वदेशी सीकर वाली दो अस्त्र मिसाइलों ने अपने लक्ष्य नष्ट किए, जैसा अस्त्र सीकर परीक्षण वाली रिपोर्ट बताती है।
रुद्रम भारत की पहली स्वदेशी विकिरण-रोधी मिसाइल (anti-radiation missile) है। यह दुश्मन के रडार से निकलने वाले सिग्नल पकड़कर उसी रडार पर जा गिरती है। इसे लंबी दूरी से दुश्मन की वायु रक्षा को दबाने के लिए बनाया गया है। इसका पहला परीक्षण 9 अक्टूबर 2020 को Su-30 MKI विमान से हुआ। इसकी अगली कड़ी रुद्रम-II ने 29 मई 2024 को उड़ान भरी। रुद्रम-II के उड़ान परीक्षण आगे भी चलते रहे, और 2 जून 2026 को नए परीक्षणों की खबर आई।
समुद्र में NASM-SR नौसेना की पहली स्वदेशी, हवा से दागी जाने वाली जहाज-रोधी मिसाइल है, जिसे सी किंग हेलीकॉप्टर से दागा जाता है। 25 फरवरी 2025 को इसने अपनी अधिकतम रेंज पर एक छोटे जहाज वाले लक्ष्य को भेदा। इस दौरान यह पायलट को सीकर की लाइव तस्वीरें भेजती रही, और पायलट उड़ान के बीच में लक्ष्य बदल सकता था। एक ही हेलीकॉप्टर से दो मिसाइलों के पहले सैल्वो लॉन्च की खबर 29 अप्रैल 2026 को आई।
भारत किन नियमों को मानता है: MTCR और हेग आचार संहिता
मिसाइलों से जुड़ी दोनों मुख्य व्यवस्थाओं में भारत शामिल है। वह 27 जून 2016 को मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR) में उसके 35वें सदस्य के रूप में शामिल हुआ। जून 2016 से वह बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के खिलाफ हेग आचार संहिता में भी भाग ले रहा है। इनमें से कोई भी संधि नहीं है। MTCR देशों का एक अनौपचारिक समूह है, जो मिसाइलों और उनसे जुड़ी तकनीक के निर्यात नियंत्रण में आपसी तालमेल रखता है। हेग संहिता के तहत भारत अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों और अंतरिक्ष लॉन्च की पहले से सूचना देता है।
इसके 2 साल के भीतर भारत दो और निर्यात नियंत्रण समूहों में शामिल हुआ:
- वासेनार व्यवस्था: भारत 8 दिसंबर 2017 को 42वें भागीदार देश के रूप में शामिल हुआ।
- ऑस्ट्रेलिया समूह: भारत 19 जनवरी 2018 को 43वें भागीदार के रूप में शामिल हुआ।
सदस्यता इस पर कोई रोक नहीं लगाती कि भारत अपनी सेनाओं के लिए क्या बनाए। वह सिर्फ यह बदलती है कि भारत दूसरे सदस्यों के साथ संवेदनशील तकनीक का लेन-देन कैसे करता है। साइट का बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं वाला नोट चारों समूहों की तुलना करता है, उस समूह समेत जिसमें भारत अभी तक शामिल नहीं हुआ है।
भारत की मिसाइलें आज: 2024 से 2026 तक क्या बदला
पिछले दो साल की तस्वीर तीन बदलावों से बनती है:
- अग्नि पर कई वारहेड;
- लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल की पहली उड़ान;
- लंबी दूरी की वायु रक्षा की ओर जोरदार कदम।
आधिकारिक विज्ञप्तियों के आधार पर तारीखवार रिकॉर्ड यह है:
- 11 मार्च 2024: मिशन दिव्यास्त्र, यानी अग्नि-5 की पहली MIRV उड़ान।
- 16 नवंबर 2024: लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल की पहली उड़ान।
- 11 मई 2025: लखनऊ में ब्रह्मोस की सुविधा खुली।
- 15 अगस्त 2025: मिशन सुदर्शन चक्र की घोषणा।
- 24 सितंबर 2025: अग्नि-प्राइम रेल लॉन्चर से दागी गई।
- 23 दिसंबर 2025: आकाश-NG ने यूजर मूल्यांकन ट्रायल पूरे किए।
- 8 मई 2026: एडवांस्ड अग्नि MIRV के साथ उड़ी।
- 23 जुलाई 2026: कुशा की पहली उड़ान।
पैटर्न साफ है। सामरिक मिसाइलें अब रूटीन बन चुकी हैं, जिन्हें सामरिक बल कमान तैयारी परखने के लिए दागती है। नया काम हाइपरसोनिक उड़ान, कई वारहेड और वायु रक्षा की तरफ चला गया है।
परीक्षा के लिए भारत की मिसाइलें कैसे पढ़ें
यह विषय सिलेबस में तीन जगह आता है:
- GS पेपर III: विज्ञान और प्रौद्योगिकी, खासकर तकनीक का स्वदेशीकरण; साथ ही आंतरिक और बाहरी सुरक्षा।
- GS पेपर II: अंतरराष्ट्रीय संबंध, यानी निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएँ और रक्षा निर्यात।
- प्रीलिम्स: विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़े करेंट अफेयर्स, जहाँ परीक्षणों के नाम, रेंज और विकसित करने वाली संस्थाएँ बार-बार आती हैं।
सवाल सूचियों से ज्यादा वर्गीकरण और प्रणालियों के बीच के फर्क को परखते हैं। मुख्य परीक्षा 2021, GS पेपर III में पूछा गया था: “S-400 वायु रक्षा प्रणाली दुनिया में अभी मौजूद किसी भी दूसरी प्रणाली से तकनीकी रूप से किस तरह बेहतर है?” यह 10 अंकों का सवाल था। इसमें वही छात्र अच्छे अंक लाता है जो जानता है कि आयात की गई यह प्रणाली भारत की अपनी परतों में कहाँ फिट होती है। प्रीलिम्स 2023 में दो कथनों वाला एक प्रश्न आया था, जिसमें अग्नि-V को “मध्यम दूरी की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल” और ब्रह्मोस को “ठोस ईंधन वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल” कहा गया था। दोनों कथन गलत थे, और यह अदला-बदली ठीक वही उलझन है जिससे यह नोट शुरू हुआ था। साइट के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 192 प्रश्न विज्ञान और प्रौद्योगिकी के हैं।
इन बातों को तब तक दोहराइए, जब तक ये अपने-आप याद न आने लगें:
- IGMDP: 1983 में कलाम के नेतृत्व में शुरू, पाँच मिसाइलें, मार्च 2012 में पूरा।
- अग्नि-5: 5,000 किलोमीटर तक, आधिकारिक रूप से मध्यवर्ती दूरी; पहली MIRV उड़ान मिशन दिव्यास्त्र में, मार्च 2024।
- अग्नि-प्राइम: 1,000 से 2,000 किलोमीटर; 24 सितंबर 2025 को रेल से लॉन्च।
- प्रलय: 150 से 500 किलोमीटर, पारंपरिक वारहेड और अर्ध-बैलिस्टिक उड़ान।
- ब्रह्मोस: 12 फरवरी 1998 से संयुक्त उद्यम, 50.5% हिस्सेदारी भारतीय; पहला निर्यात अनुबंध 28 जनवरी 2022 को फिलीपींस के साथ।
- याद रखने लायक रेंज: आकाश 25 किलोमीटर, अस्त्र 100 किलोमीटर से ज्यादा, हाइपरसोनिक मिसाइल 1,500 किलोमीटर से ज्यादा।
- याद रखने लायक तारीखें: MTCR 27 जून 2016, और मिशन शक्ति 27 मार्च 2019।
पाँच उलझनें सबसे ज्यादा अंक कटवाती हैं:
- अग्नि-5 और ICBM: आधिकारिक लेबल मध्यवर्ती दूरी है।
- ब्रह्मोस और निर्भय: ब्रह्मोस सुपरसोनिक है और भारत-रूस की साझा मिसाइल है; निर्भय सबसोनिक है और पूरी तरह DRDO की है।
- त्रिशूल: IGMDP की वह मिसाइल जो कभी सेवा में नहीं आई।
- आकाश का वर्ग: DRDO इसे कम दूरी की कहता है, किसी पुरानी विज्ञप्ति में चाहे जो लिखा हो।
- MTCR और संधियाँ: MTCR और हेग संहिता अपनी मर्जी से मानी जाने वाली व्यवस्थाएँ हैं, संधियाँ नहीं।
वर्गों को अलग रखने का सबसे तेज तरीका यह देखना है कि हर वर्ग उड़ता कैसे है:
| वर्ग | कैसे उड़ती है | भारतीय उदाहरण | आधिकारिक रूप से बताई गई रेंज |
|---|---|---|---|
| बैलिस्टिक | रॉकेट से धक्का, फिर बिना इंजन का चाप | पृथ्वी, अग्नि श्रृंखला, प्रलय | 150 किलोमीटर (पृथ्वी) से 5,000 किलोमीटर (अग्नि-5) |
| क्रूज | उड़ान के ज्यादातर हिस्से में हवा से ऑक्सीजन लेने वाला इंजन, नीची और सीधी उड़ान | ब्रह्मोस, निर्भय, ITCM, LRLACM | 290 किलोमीटर (ब्रह्मोस का पूरी रेंज वाला परीक्षण, 2019); निर्भय 1,000 किलोमीटर से ज्यादा उड़ी |
| हाइपरसोनिक | ध्वनि की पाँच गुना गति से ऊपर | लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल; प्रदर्शक के रूप में HSTDV | 1,500 किलोमीटर से ज्यादा |
| इंटरसेप्टर | आते हुए विमान, मिसाइल या उपग्रह को नष्ट करने के लिए दागी जाती है | आकाश, MRSAM, कुशा, फेज-II इंटरसेप्टर, मिशन शक्ति | 25 किलोमीटर (आकाश); 5,000 किलोमीटर वर्ग की मिसाइलों से बचाव (फेज-II) |
यह विषय लंबी सूची से ज्यादा छोटे और सटीक मूल ज्ञान को इनाम देता है। सरकार की छापी हुई रेंज, 2024 से 2026 तक की पहली उपलब्धियाँ और मिसाइलों से जुड़ी दोनों व्यवस्थाएँ सीख लीजिए। फिर हर नया परीक्षण उस नक्शे में बस एक अपडेट बन जाएगा जो आपके दिमाग में पहले से मौजूद है। जो अभ्यर्थी यह समझा सके कि अग्नि-5 को मध्यवर्ती दूरी की मिसाइल क्यों माना जाता है, उसने रटे हुए नामों के पूरे पन्ने से ज्यादा समझ लिया है।
सामान्य प्रश्न
IGMDP के तहत भारत की कौन-सी मिसाइलें विकसित की गईं?
1983 के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम को पाँच मिसाइलें बनाने की मंजूरी मिली थी: पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, आकाश और नाग। पृथ्वी और आकाश सेवा में आईं, नाग उत्पादन तक पहुँची और त्रिशूल को प्रौद्योगिकी प्रदर्शक के रूप में बंद कर दिया गया। अग्नि री-एंट्री प्रदर्शक के रूप में शुरू हुई थी, और उसकी तकनीक पूरी अग्नि श्रृंखला में काम आई।
अग्नि-5 की रेंज कितनी है?
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक अग्नि-5 अपने लक्ष्य पर 5,000 किलोमीटर तक की दूरी से वार कर सकती है। इसमें तीन चरणों वाला ठोस ईंधन इंजन है, और सरकार की विज्ञप्तियाँ इसे मध्यवर्ती दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल कहती हैं। मार्च 2024 में मिशन दिव्यास्त्र में यह कई स्वतंत्र रूप से निशाना साधने वाले वारहेड के साथ उड़ी।
ब्रह्मोस भारतीय मिसाइल है या रूसी?
दोनों। ब्रह्मोस को ब्रह्मोस एयरोस्पेस बनाती है, जो भारत के DRDO और रूस की NPO माशिनोस्त्रोयेनिया का संयुक्त उद्यम है। यह उद्यम 12 फरवरी 1998 को हुए एक समझौते से शुरू हुआ, और इसमें भारत की हिस्सेदारी 50.5% है। नाम ब्रह्मपुत्र और मोस्कवा नदियों को जोड़कर बना है।
भारत की सबसे लंबी रेंज वाली मिसाइल कौन-सी है?
जिन मिसाइलों की रेंज आधिकारिक रूप से बताई गई है, उनमें अग्नि-5 सबसे आगे है, जिसकी रेंज 5,000 किलोमीटर तक है। नवंबर 2024 में परखी गई लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल 1,500 किलोमीटर से ज्यादा की रेंज के लिए बनी है। भारत अपनी पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलों की कोई आधिकारिक रेंज नहीं छापता, इसलिए रिकॉर्ड के आधार पर उन्हें इस क्रम में नहीं रखा जा सकता।
भारत MTCR में कब शामिल हुआ?
भारत 27 जून 2016 को मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था में उसके 35वें सदस्य के रूप में शामिल हुआ। उसी महीने वह बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के खिलाफ हेग आचार संहिता में भी भागीदार बना। इनमें से कोई भी संधि नहीं है। दोनों मिसाइल निर्यात और पारदर्शिता से जुड़ी ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जिन्हें देश अपनी मर्जी से मानते हैं।
मिशन शक्ति क्या था?
मिशन शक्ति 27 मार्च 2019 को हुआ भारत का उपग्रह-रोधी मिसाइल परीक्षण था। इसमें DRDO के बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा इंटरसेप्टर ने निचली पृथ्वी कक्षा में एक भारतीय उपग्रह को सीधी टक्कर से नष्ट किया। सरकार ने कहा कि इससे भारत यह क्षमता रखने वाला चौथा देश बन गया।
भारत की मिसाइलें कौन बनाता है?
ज्यादातर मिसाइलों का डिजाइन DRDO करता है, इसलिए इन्हें आम तौर पर DRDO की मिसाइलें कहा जाता है। नाग और अस्त्र जैसी मिसाइलों का उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड करती है, जो 1970 में बनी रक्षा मंत्रालय की कंपनी है। ब्रह्मोस को भारत-रूस संयुक्त उद्यम ब्रह्मोस एयरोस्पेस बनाता है। नए कार्यक्रमों में निजी उद्योग भी विकास और उत्पादन साझेदार के रूप में जुड़ रहा है।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसे 1983 में DRDO के तहत शुरू किया गया था। 2. त्रिशूल को इसकी संचालित मिसाइलों में से एक के रूप में सशस्त्र बलों में शामिल किया गया था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) त्रिशूल सिर्फ प्रौद्योगिकी प्रदर्शक के रूप में पूरी हुई और कभी सेवा में नहीं आई।
2. मार्च 2024 में घोषित मिशन दिव्यास्त्र निम्नलिखित में से किसका पहला उड़ान परीक्षण था?
- (a) रेल-आधारित लॉन्चर से अग्नि-प्राइम
- (b) बहु-स्वतंत्र लक्ष्य-भेदी री-एंट्री यान (MIRV) तकनीक के साथ अग्नि-5
- (c) लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल
- (d) एक उपग्रह-रोधी इंटरसेप्टर
उत्तर: (b) मिशन दिव्यास्त्र, MIRV तकनीक के साथ अग्नि-5 की पहली उड़ान थी।
3. ब्रह्मोस के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसका उत्पादन DRDO और रूस की NPO माशिनोस्त्रोयेनिया का संयुक्त उद्यम करता है। 2. यह एक सबसोनिक क्रूज मिसाइल है। 3. इसका पहला निर्यात अनुबंध फिलीपींस के साथ हुआ था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 1 और 3
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) ब्रह्मोस सुपरसोनिक है; भारत की सबसोनिक क्रूज मिसाइल निर्भय है।
4. किस भारतीय मिसाइल की आधिकारिक रूप से बताई गई रेंज 150 से 500 किलोमीटर है और वह पारंपरिक वारहेड ले जाती है?
- (a) पृथ्वी-II
- (b) अग्नि-प्राइम
- (c) प्रलय
- (d) अस्त्र मार्क 1
उत्तर: (c) प्रलय एक अर्ध-बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी बताई गई रेंज 150 से 500 किलोमीटर है।
5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत 2016 में मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था में शामिल हुआ। 2. भारत बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के खिलाफ हेग आचार संहिता में भाग लेता है। 3. भारत मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था में शामिल होने से पहले वासेनार व्यवस्था में शामिल हुआ था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) भारत वासेनार व्यवस्था में दिसंबर 2017 में शामिल हुआ, यानी जून 2016 में MTCR में शामिल होने के बाद।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- भारत का मिसाइल कार्यक्रम IGMDP के तहत प्रौद्योगिकी प्रदर्शन से आगे बढ़कर निर्यात तक पहुँचा है। इस सफर का क्रम बताइए और बची हुई कमियों का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- MIRV तकनीक क्या है? भारत के विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध और पहले इस्तेमाल न करने के सिद्धांत के लिए मिशन दिव्यास्त्र का महत्व समझाइए। (10 अंक, 150 शब्द)
- भारतीय उदाहरणों के साथ बैलिस्टिक, क्रूज और हाइपरसोनिक मिसाइलों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के लिए स्क्रैमजेट प्रणोदन क्यों अहम है? (15 अंक, 250 शब्द)
- आकाश, MRSAM, कुशा और भारत के बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम के संदर्भ में परतदार वायु रक्षा का विचार समझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
- MTCR और दूसरी निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं की सदस्यता ने भारत के मिसाइल निर्यात को कैसे आकार दिया है? उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)