Anantam IASHindi Note · 3 September 2026

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (CDS): भारत का सबसे बड़ा सैन्य पद, UPSC के लिए पूरी समझ

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ भारत का सबसे सीनियर सैन्य अफ़सर और DMA का मुखिया है। इस पद के बनने की कहानी, ताक़तें, थियेटराइज़ेशन और मौजूदा CDS पर UPSC के लिए पूरी गाइड।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ भारत का सबसे सीनियर वर्दीधारी अफ़सर है और तीनों सेनाओं से जुड़े हर मामले में रक्षा मंत्री का मुख्य सैन्य सलाहकार। यह पद दिसंबर 2019 में बना — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल क़िले से स्वतंत्रता दिवस पर इसका ऐलान करने के छह महीने बाद — और 1947 के बाद भारत के उच्च रक्षा ढाँचे में यह सबसे बड़ा सुधार है। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ रक्षा मंत्रालय के भीतर बने नए सैन्य मामले विभाग (Department of Military Affairs, DMA) का मुखिया भी है, जिससे इस पद को सैन्य और प्रशासनिक, दोनों तरह का अधिकार मिल जाता है। ऐसा अधिकार इससे पहले किसी भारतीय अफ़सर के पास नहीं था।

UPSC GS-III में आंतरिक सुरक्षा पढ़ने वालों के लिए चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का पद बार-बार काम आने वाला टॉपिक है। यह नागरिक-सैन्य संबंध, रक्षा सुधार, थियेटराइज़ेशन, तीनों सेनाओं की साझेदारी और उस पुरानी बहस को छूता है कि भारत की तीनों सेनाएँ अलग-अलग लड़ें या एक जुड़ी हुई ताक़त की तरह। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ चार सितारा जनरल होता है (थलसेना, नौसेना या वायुसेना का समकक्ष रैंक), इसलिए वह तीनों सेना प्रमुखों का बॉस नहीं, बराबरी वालों में पहला होता है।

यह लेख चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ पद की शुरुआत, इसे मिली ताक़तें और ज़िम्मेदारियाँ, थियेटराइज़ेशन पर चल रहा विवाद, और जनरल अनिल चौहान के दौर में 2026 में यह पद कहाँ खड़ा है — इन सब पर एक-एक कर बात करता है।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का पद क्यों बना

जनरल अनिल चौहान, मौजूदा चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़

एक ही जगह से सैन्य सलाह देने वाले अफ़सर पर भारत ने क़रीब पाँच दशक बहस की, तब कुछ किया। मौक़ा 1999 के कारगिल युद्ध और के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता वाली कारगिल समीक्षा समिति से आया, जिसने फ़रवरी 2000 में अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने पाया कि लड़ाई के दौरान ख़ुफ़िया तालमेल, साझा योजना और सेनाओं के बीच बातचीत में गंभीर कमियाँ थीं।

कारगिल समीक्षा समिति और मंत्रिसमूह

कारगिल समीक्षा समिति ने राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की पूरी समीक्षा की सिफ़ारिश की। NDA सरकार ने जो मंत्रिसमूह (Group of Ministers, GoM) बनाया, उसने इन सिफ़ारिशों को चार टास्क फ़ोर्स के ज़रिए देखा। रक्षा प्रबंधन वाली टास्क फ़ोर्स की अध्यक्षता अरुण सिंह ने की और उसने चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का पद बनाने का सुझाव दिया, ताकि सैन्य सलाह एक ही जगह से आए, तीनों सेनाओं में तालमेल बने और सेनाएँ जुड़कर लड़ने के लिए तैयार हों।

मंत्रिसमूह ने 2001 में यह सिफ़ारिश मान ली। लेकिन एक के बाद एक सरकारों में इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बनी। चिंताएँ सेनाओं की आपसी होड़ से लेकर “घोड़े पर सवार जनरल” के डर तक थीं, और यह प्रस्ताव क़रीब दो दशक काग़ज़ पर पड़ा रहा।

बालाकोट का धक्का और 2019 का फ़ैसला

फ़रवरी 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक और उसके बाद भारत-पाकिस्तान के बीच हुई हवाई भिड़ंत ने तालमेल की उन्हीं कमियों को खोल दिया जिन्हें कारगिल समीक्षा समिति ने 2000 में गिनाया था। 15 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री मोदी ने लाल क़िले से चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के पद का ऐलान किया। सुरक्षा पर मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Security) ने 24 दिसंबर 2019 को इसे औपचारिक मंज़ूरी दी।

साथ ही रक्षा मंत्रालय से अलग कर सैन्य मामले विभाग (DMA) बनाया गया, जिसका मुखिया चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ को रखा गया। यही प्रशासनिक बदलाव था जिसने इस पद को दिखावटी नहीं, असली ताक़त वाला बना दिया।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ की ताक़तें और ज़िम्मेदारियाँ

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ दो टोपियाँ पहनता है। सैन्य अफ़सर के तौर पर वह चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमिटी (COSC) का स्थायी अध्यक्ष है, जिससे साझा मामलों में उसे तीनों सेना प्रमुखों पर संस्थाओं के स्तर पर बढ़त मिल जाती है। DMA के सचिव के तौर पर वह रक्षा मंत्रालय के भीतर सिविल सचिव का दर्जा रखने वाला एकमात्र सैन्य अफ़सर है।

सैन्य ज़िम्मेदारियाँ

तीनों सेनाओं से जुड़े हर मामले में चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ रक्षा मंत्री का मुख्य सैन्य सलाहकार होता है। अपनी-अपनी सेना के ख़ास मामलों पर सलाह तीनों सेना प्रमुख देते रहते हैं। बाक़ी सैन्य ज़िम्मेदारियाँ ये हैं:

थियेटराइज़ेशन की ज़िम्मेदारी

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ को ख़ास तौर पर यह काम दिया गया है कि साझा/थियेटर कमान बनाकर तीनों सेनाओं में तालमेल लाया जाए और सैन्य कमानों को इस तरह नया रूप दिया जाए कि साधनों का सबसे अच्छा इस्तेमाल हो। यह इस पद की सबसे भारी ज़िम्मेदारी है, और थियेटराइज़ेशन चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के सामने सुधार की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। इसका ब्यौरा हमने भारतीय सेना के थियेटराइज़ेशन पर अलग लेख में दिया है।

ख़रीद और क्षमता बढ़ाना

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ को यह भी देखना है कि बुनियादी ढाँचे का सबसे अच्छा इस्तेमाल हो और तीनों सेनाओं के तालमेल से उसे तर्कसंगत बनाया जाए। यह पद “देश के बाहर की आकस्मिक स्थितियों” (out-of-area contingencies) और परमाणु कमान प्राधिकरण जिन हालात को ज़रूरी समझे, उनके लिए बनी योजनाओं की भी जाँच करता है — इसमें रणनीतिक परमाणु ज़ख़ीरा भी शामिल है।

सैन्य मामले विभाग (DMA): प्रशासनिक हाथ

सैन्य मामले विभाग रक्षा मंत्रालय के भीतर पाँचवाँ विभाग है (बाक़ी चार हैं — रक्षा, रक्षा उत्पादन, रक्षा अनुसंधान एवं विकास, और पूर्व सैनिक कल्याण)। यह पहला विभाग है जिसका मुखिया एक सेवारत सैन्य अफ़सर है और जो भारत सरकार के सचिव के तौर पर काम करता है।

DMA को क्या काम मिला है

DMA 24 दिसंबर 2019 को बना और इसे जो काम सौंपे गए, उनमें ये शामिल हैं:

रक्षा विभाग से फ़र्क़

रक्षा विभाग, जिसका मुखिया रक्षा सचिव है, अब भी पूँजीगत ख़रीद, सीमाओं से जुड़ी नीति, तटरक्षक बल, सीमा सड़क संगठन और कुल रक्षा नीति देखता है। DMA और रक्षा विभाग के बीच यह बँटवारा कई बार इलाक़े की खींचतान पैदा कर चुका है, ख़ासकर पूँजीगत ख़रीद पर।

भारत के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़: जनरल बिपिन रावत

जनरल बिपिन रावत ने 1 जनवरी 2020 को भारत के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का पद संभाला। ठीक एक दिन पहले, 31 दिसंबर 2019 को, वे 27वें थलसेना प्रमुख के पद से रिटायर हुए थे। रावत थियेटराइज़ेशन के पक्के समर्थक थे। उन्होंने वायु रक्षा कमान और समुद्री थियेटर कमान बनाने पर ज़ोर लगाया, साथ ही उत्तरी और पश्चिमी मोर्चों पर जुड़े हुए ज़मीनी थियेटर बनाने पर।

रावत के कार्यकाल की उपलब्धियाँ

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के तौर पर अपने दो साल में जनरल रावत ने थियेटराइज़ेशन का ढाँचा तैयार किया, अंडमान एवं निकोबार कमान के साझा ढाँचे का एकीकरण पूरा किया, जून 2020 में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुई झड़प पर भारत की प्रतिक्रिया की निगरानी की, और नेगेटिव इंपोर्ट लिस्ट के ज़रिए देश में ही साज़-सामान बनाने की मुहिम चलाई। वे सैन्य आधुनिकीकरण का सार्वजनिक चेहरा भी थे और एकीकरण को उन्होंने अपने सुधार की पहचान बना लिया था।

कुन्नूर हेलिकॉप्टर हादसा

8 दिसंबर 2021 को तमिलनाडु में कुन्नूर के पास Mi-17V5 हेलिकॉप्टर के दर्दनाक हादसे में जनरल रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत और 11 अन्य लोगों की मौत हो गई। जाँच अदालत (Court of Inquiry) ने हादसे की वजह ख़राब मौसम में “कंट्रोल्ड फ़्लाइट इनटू टेरेन” (CFIT) बताई। उनकी मौत के बाद चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का पद क़रीब नौ महीने ख़ाली रहा, जिससे संस्थाओं की निरंतरता पर सवाल उठे।

जनरल अनिल चौहान: दूसरे चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़

जनरल बिपिन रावत, भारत के पहले CDS

जनरल अनिल चौहान ने 30 सितंबर 2022 को दूसरे चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का पद संभाला। वे रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल थे। इससे पहले वे सैन्य अभियान महानिदेशक (Director General of Military Operations) और पूर्वी कमान के जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग-इन-चीफ़ रह चुके थे। जून 2022 में सरकार ने भर्ती नियम बदल दिए, जिससे 62 साल तक की उम्र के रिटायर्ड तीन सितारा और चार सितारा अफ़सर भी इस पद के हक़दार हो गए। इसी बदलाव से उनकी नियुक्ति मुमकिन हुई।

थियेटराइज़ेशन पर चौहान का रुख़

जनरल चौहान ने थियेटराइज़ेशन पर अपने पहले वाले से ज़्यादा बातचीत वाला रास्ता चुना है। ढाँचे में बदलाव आदेश से थोपने की जगह उन्होंने तीनों सेनाओं के बीच सहमति बनाने पर ज़ोर दिया है। उनके दौर में संसद ने अंतर-सेवा संगठन (कमान, नियंत्रण और अनुशासन) अधिनियम, 2023 पास किया, जो साझा अंतर-सेवा संगठनों के कमांडरों को दूसरी सेनाओं के जवानों पर अनुशासन का अधिकार देता है। काम करने वाले थियेटर बनाने के लिए यही क़ानूनी पहली शर्त है।

हाल के अभियान

जनरल चौहान की अगुआई में सशस्त्र सेनाओं ने अभ्यास तरंग शक्ति 2024 किया, जो भारत में हुआ अब तक का सबसे बड़ा बहुराष्ट्रीय हवाई अभ्यास है, और LAC पर चीन के साथ सेना पीछे हटाने और तनाव घटाने की बातचीत जारी रखी है। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ ने एकीकृत रक्षा साइबर एजेंसी, रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी और सशस्त्र बल विशेष अभियान डिवीज़न के ज़रिए साइबर, अंतरिक्ष और विशेष अभियानों के क्षेत्र में क्षमता बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया है।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ और भारत की रणनीतिक ताक़त

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ मैदान की लड़ाई और रणनीतिक परमाणु रोक (strategic deterrence) के बीच संस्थाओं का पुल है। ज़मीन से चलने वाली रोक के लिए अग्नि मिसाइल सीरीज़, पारंपरिक हमले के लिए ब्रह्मोस मिसाइल, नौसेना की दूर समुद्र तक पहुँच के लिए INS विक्रांत जैसे देसी प्लैटफ़ॉर्म, और एयरोस्पेस में आत्मनिर्भरता के लिए DRDO का कावेरी इंजन — इन सब पर क्षमता बढ़ाने का तालमेल इसी पद के हाथ में है। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ भारत के बढ़ते हथियार आयात और निर्यात पर भी नज़र रखता है, जिसके ताज़ा आँकड़े भारत के रक्षा कारोबार पर SIPRI 2025 के आँकड़ों में दर्ज हैं।

तीनों सेनाओं के कर्मियों का ढाँचा जड़ से बदल रही अग्निपथ भर्ती योजना जैसी योजनाओं के ज़रिए सेनाओं को आधुनिक बनाने का केंद्र भी यही पद है।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के सामने चुनौतियाँ

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के सामने जो चुनौतियाँ हैं, वे किसी एक अफ़सर या कार्यकाल से बड़ी हैं। सेनाओं की आपसी होड़ लगातार अड़चन बनी हुई है, ख़ासकर थियेटराइज़ेशन पर भारतीय वायुसेना और भारतीय थलसेना के बीच। वायुसेना अपनी गिनी-चुनी स्क्वाड्रन और एक जगह से कमान चलाने की सोच को लेकर हमेशा बचाव के मूड में रही है, जबकि थलसेना जुड़े हुए ज़मीनी थियेटर के पक्ष में रही है।

साधनों की कमी भी उतनी ही बड़ी बात है। भारत का रक्षा बजट GDP के 2 प्रतिशत से नीचे है, पूँजीगत ख़रीद में देरी होती है, और तकनीकी शाखाओं में मंज़ूर पदों और भरे हुए पदों का फ़ासला बढ़ गया है। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ को तालमेल तो लाना है, पर उसके हिसाब से बजट की गुंजाइश नहीं है। इसलिए कड़े फ़ैसले टाले नहीं जा सकते।

नागरिक-सैन्य तालमेल भी बदल रहा है। रक्षा मंत्रालय के भीतर सचिव के दर्जे पर एक सेवारत अफ़सर के बैठने से सिविल अफ़सरशाही के साथ समीकरण नए सिरे से बने हैं। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़, रक्षा सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बीच का प्रोटोकॉल तय होना अब भी बाक़ी है।

सामान्य प्रश्न

भारत के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ कौन थे?

जनरल बिपिन रावत भारत के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ थे। उन्होंने 1 जनवरी 2020 को पद संभाला और 8 दिसंबर 2021 को कुन्नूर के पास हेलिकॉप्टर हादसे में मौत तक इस पद पर रहे। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ बनने से पहले वे 27वें थलसेना प्रमुख थे।

मौजूदा चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ कौन हैं?

जनरल अनिल चौहान मौजूदा चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ हैं। उन्होंने 30 सितंबर 2022 को पद संभाला, जब सरकार ने नियम बदलकर 62 साल तक की उम्र के रिटायर्ड तीन सितारा और चार सितारा अफ़सरों की नियुक्ति का रास्ता खोल दिया। इससे पहले वे सैन्य अभियान महानिदेशक और पूर्वी सेना कमांडर रह चुके थे।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ और चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमिटी के अध्यक्ष में क्या फ़र्क़ है?

2019 से पहले चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमिटी का अध्यक्ष तीनों सेना प्रमुखों में सबसे सीनियर अफ़सर होता था और यह पद बारी-बारी से मिलता था। अब चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ COSC का स्थायी अध्यक्ष है और साथ में सैन्य मामले विभाग का मुखिया भी। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ एक ही जगह से सैन्य सलाह देता है, जबकि पुरानी व्यवस्था अपने ढाँचे से ही बारी-बारी वाली और सामूहिक थी।

क्या चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ तीनों सेना प्रमुखों से ऊपर होता है?

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ बराबरी वालों में पहला है। इस पद के पास थलसेना, नौसेना या वायुसेना पर ऑपरेशन की कमान नहीं होती — इन तीनों की कमान उनके अपने सेना प्रमुखों के हाथ में ही रहती है। चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ साझा मामलों और थियेटराइज़ेशन में तालमेल बैठाता है और एक ही जगह से सलाह देता है, लेकिन सेना प्रमुखों की अपनी-अपनी सेना वाली भूमिका में उन्हें ओवररूल नहीं करता।

सैन्य मामले विभाग क्या है?

सैन्य मामले विभाग रक्षा मंत्रालय के भीतर पाँचवाँ विभाग है, जो 24 दिसंबर 2019 को बना। यह रक्षा मंत्रालय का एकमात्र विभाग है जिसका मुखिया एक सेवारत सैन्य अफ़सर (चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़) है, और यह तीनों सेनाओं से जुड़े मामले, आपसी तालमेल और थियेटराइज़ेशन देखता है। पूँजीगत ख़रीद अब भी रक्षा विभाग के पास है।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ के तहत थियेटराइज़ेशन क्या है?

थियेटराइज़ेशन का मतलब है भारत की मौजूदा 17 सिंगल-सर्विस कमानों को 4-5 साझा थियेटर कमानों में फिर से बाँटना, जहाँ हर थियेटर में तीनों सेनाओं के साधन एक ही कमांडर के नीचे जुड़े हों। यह सुधार आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ को दी गई है, और आज़ादी के बाद भारतीय सेना में ढाँचे का यह सबसे बड़ा बदलाव है।

2022 में चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का पद नौ महीने ख़ाली क्यों रहा?

यह पद 8 दिसंबर 2021 (जनरल बिपिन रावत की मौत) से 30 सितंबर 2022 (जनरल अनिल चौहान की नियुक्ति) तक ख़ाली रहा। सरकार ने पात्रता के नियम बदलने में समय लिया, ताकि उम्मीदवारों का दायरा सेवारत सेना प्रमुखों से आगे बढ़कर 62 साल तक की उम्र के रिटायर्ड तीन सितारा और चार सितारा अफ़सरों तक पहुँचे। इससे चुनाव का दायरा बड़ा हुआ और यह संकेत भी गया कि नियुक्ति सोच-समझकर, बातचीत से की जा रही है।

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ का कार्यकाल कितना होता है?

चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ 65 साल की उम्र तक पद पर रहता है, जो तीनों सेना प्रमुखों की 62 साल की रिटायरमेंट उम्र से ज़्यादा है। यह लंबा कार्यकाल जान-बूझकर रखा गया, ताकि इस पद में निरंतरता बनी रहे और पद पर बैठे अफ़सर को थियेटराइज़ेशन जैसे ढाँचागत सुधार आगे बढ़ाने का पूरा वक़्त मिले।