जी.डी. अग्रवाल: इंजीनियर से स्वामी सानंद तक, गंगा के लिए अनशन और उनकी विरासत
जी.डी. अग्रवाल को समझिए: पर्यावरण इंजीनियर, CPCB के पहले सदस्य सचिव, स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद, गंगा के लिए अनशन, भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र और 2018 का आखिरी अनशन।
जी.डी. अग्रवाल (गुरु दास अग्रवाल; अंग्रेजी में नाम Agarwal और Agrawal, दोनों तरह से लिखा मिलता है) एक भारतीय पर्यावरण इंजीनियर थे। वे IIT कानपुर में पढ़ाते थे और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पहले सदस्य सचिव रहे। बाद में संन्यासी स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के रूप में उन्होंने ऊपरी गंगा पर बाँध रोकने के लिए बार-बार अनशन किया। उनका निधन 11 अक्टूबर 2018 को AIIMS ऋषिकेश में 86 वर्ष की उम्र में हुआ। उस दिन नदी की रक्षा के लिए कानून की माँग वाले उनके अनशन का 111वाँ दिन था। उनके पहले के अनशनों के बाद केंद्र ने 2010 में 600 मेगावाट की लोहारीनाग पाला परियोजना रद्द की, और 2012 में भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र अधिसूचित किया।
पाठक आम तौर पर उनसे सिर्फ आखिरी अध्याय के जरिए मिलते हैं: एक बुजुर्ग साधु, जिसने एक नदी के लिए अनशन करते हुए जान दे दी। यह तस्वीर उनके जीवन के पहले साठ साल छोड़ देती है। वे बर्कले से प्रशिक्षित प्रदूषण वैज्ञानिक थे, जिन्होंने भारत का पहला प्रदूषण नियामक खड़ा करने में मदद की। उन्होंने गंगा की पैरवी आस्था की भाषा के साथ-साथ बहाव के माप और परियोजना मंजूरियों की भाषा में भी की। स्वामी सानंद को समझने के लिए यह नोट दोनों हिस्सों को सामने रखता है। साथ ही यह रिकॉर्ड में दर्ज बातों को उनके समर्थकों और आलोचकों के अपने-अपने दावों से अलग करता है।
जी.डी. अग्रवाल कौन थे
जी.डी. अग्रवाल का सार्वजनिक जीवन दो पटरियों पर चला, जो बहुत बाद में जाकर मिलीं। एक थी पर्यावरण इंजीनियरिंग का करियर, और दूसरी गंगा के लिए अभियान, जिसे आखिर में उन्होंने एक संन्यासी, यानी हिंदू त्यागी, के रूप में लड़ा। नीचे दिए तथ्य उनके पढ़ाई वाले संस्थान, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचनाओं और उस समय की रिपोर्टिंग से लिए गए हैं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | गुरु दास अग्रवाल (कई रिकॉर्ड में अंग्रेजी वर्तनी Agrawal) |
| संन्यास का नाम | स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद, 2011 में लिया |
| जन्म | 1932, कांधला, पश्चिमी उत्तर प्रदेश |
| शिक्षा | रुड़की विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग; कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से एम.एस. (1965) और पीएच.डी. (1966) |
| करियर | IIT कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग के प्रोफेसर; CPCB के पहले सदस्य सचिव |
| किस लिए जाने जाते हैं | भागीरथी और अलकनंदा पर बाँधों के खिलाफ अनशन; अविरल (बिना रुकावट बहती) गंगा की माँग |
| उनके अनशनों से जुड़े नीतिगत नतीजे | लोहारीनाग पाला परियोजना रद्द (2010); भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र अधिसूचित (2012) |
| निधन | 11 अक्टूबर 2018, AIIMS ऋषिकेश, अपने आखिरी अनशन के 111वें दिन |
जीवन के चरण
उनके जीवन को चार चरणों में समझना सबसे आसान है: प्रशिक्षण, अध्यापन और नियमन, रिटायरमेंट के बाद सक्रियता, और स्वामी सानंद के रूप में आखिरी अनशन।
इंजीनियर और वैज्ञानिक
अग्रवाल का जन्म 1932 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छोटे-से कस्बे कांधला में हुआ। इंडिया वॉटर पोर्टल के लिए लिखते हुए उनके एक पूर्व छात्र दर्ज करते हैं कि उनका पालन-पोषण उनकी बुआ ने किया, और उन्होंने एक सिंचाई इंजीनियर के रूप में काम शुरू किया। उन्होंने रुड़की विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग पढ़ी, जो अब IIT रुड़की है। फिर वे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले गए। बर्कले उन्हें अपने पूर्व छात्रों में गिनता है, जिन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में 1965 में एम.एस. और 1966 में पीएच.डी. की।
बर्कले के पूर्व छात्रों वाले नोट के मुताबिक उन्होंने अपना करियर IIT कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग के प्रोफेसर के रूप में शुरू किया। उस समय के विवरण बताते हैं कि वे वहाँ सिविल और पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख रहे। आसान शब्दों में, पर्यावरण इंजीनियरिंग वह शाखा है जो सीवेज साफ करने, पानी शुद्ध करने और प्रदूषण पर काबू पाने की व्यवस्थाएँ बनाती है। यही प्रशिक्षण बताता है कि बाद में उनका नदी अभियान बार-बार बहाव, निकासी और परियोजनाओं की बनावट पर क्यों लौटता रहा।
CPCB के पहले सदस्य सचिव
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन सितंबर 1974 में जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत हुआ। यह भारत का पहला राष्ट्रीय प्रदूषण नियामक था। अग्रवाल इसके पहले सदस्य सचिव थे, यानी वह पूर्णकालिक अधिकारी जो बोर्ड का काम चलाता है। डाउन टू अर्थ और उनके पूर्व छात्र यही दर्ज करते हैं। बड़ी नियामक व्यवस्था में बोर्ड की भूमिका प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वाले नोट में समझाई गई है।
CPCB में उनके कार्यकाल के ठीक-ठीक वर्ष अलग-अलग द्वितीयक स्रोतों में अलग बताए गए हैं। बोर्ड के अपने प्रकाशित पन्नों में उनके कार्यकाल का कोई प्राथमिक रिकॉर्ड नहीं मिला। सुरक्षित बात वही है जिस पर हर स्रोत सहमत है: वे बोर्ड के पहले सदस्य सचिव थे।
चित्रकूट और नदी की ओर मोड़
IIT कानपुर से रिटायर होने के बाद अग्रवाल चित्रकूट में बस गए। उनके पूर्व छात्र के मुताबिक वे वहाँ महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में मानद प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते रहे। उनका ध्यान सिमटकर ऊपरी गंगा पर आ गया, जहाँ गंगोत्री और उत्तरकाशी के बीच भागीरथी पर पनबिजली परियोजनाओं की एक पूरी कतार प्रस्तावित थी। इस तरह की परियोजनाएँ नदी को लंबी सुरंगों से टरबाइनों तक मोड़ती हैं और फिर नीचे जाकर लौटा देती हैं। लोहारीनाग पाला का विरोध करने वालों ने चेतावनी दी थी कि भागीरथी अपनी धारा से गायब हो जाएगी और सिर्फ सुरंगों में बहेगी।
स्वामी सानंद और आखिरी अनशन
2011 में उन्होंने संन्यास लिया और स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद बन गए। नए नाम से उनका तरीका नहीं बदला। वे मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों को ठोस माँगों वाली चिट्ठियाँ लिखते रहे, और जब माँगों का जवाब नहीं आया, तो अनशन करते रहे। उनका आखिरी अनशन 22 जून 2018 को हरिद्वार के मातृ सदन आश्रम में शुरू हुआ, और अक्टूबर में उनकी मौत के साथ खत्म हुआ।
उन्होंने किस बात की पैरवी की
अग्रवाल का मुख्य विचार यह था कि गंगा को निर्मल के साथ-साथ अविरल भी होना चाहिए, यानी साफ के साथ-साथ बिना रुकावट बहती हुई भी। गंगा कार्य योजना के बाद से ज्यादातर सरकारी कार्यक्रमों का जोर सफाई पर रहा, खासकर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए। अग्रवाल का तर्क था कि बाँधों और सुरंगों से टुकड़ों में बँटी नदी खुद को साफ नहीं कर सकती, उसके किनारों पर चाहे जितने ट्रीटमेंट प्लांट लगा दिए जाएँ।
बरसों के दौरान उनकी माँगें ठोस रहीं:
- उद्गम क्षेत्र में खुला बहाव। वे चाहते थे कि ऊपरी भागीरथी, और बाद में अलकनंदा और उसकी सहायक नदियाँ, बिना नई पनबिजली मोड़ के अपनी प्राकृतिक धारा में बहें।
- न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह। पर्यावरणीय प्रवाह, या ई-फ्लो, नदी के प्राकृतिक बहाव का वह हिस्सा है जिसे उसे जिंदा रखने के लिए धारा में छोड़ना जरूरी है। उन्होंने इसे तय करने और लागू करने पर जोर दिया।
- गंगा कानून। 2018 में उन्होंने माँग की कि संसद जस्टिस गिरिधर मालवीय की अध्यक्षता वाली समिति का बनाया गंगा संरक्षण विधेयक पास करे।
- गंगा परिषद। उन्होंने सरकारी और गैर-सरकारी सदस्यों वाली 20 सदस्यों की एक संस्था का प्रस्ताव रखा, जिसकी मंजूरी नदी पर असर डालने वाले किसी भी काम से पहले जरूरी होती।
- नदी तल में खनन पर रोक, खासकर हरिद्वार के पास।
उन्होंने नदी को धार्मिक शब्दों में भी रखा, पवित्र और हिंदू जीवन के केंद्र में, और यह सोच-समझकर किया गया था। डाउन टू अर्थ बताता है कि उन्होंने साफ किया था कि वे परियोजनाओं के खिलाफ नहीं थे, सिर्फ उन परियोजनाओं के खिलाफ थे जो गंगा की कीमत पर बनें। गंगा नदी तंत्र वाला नोट भागीरथी और अलकनंदा को पूरे बेसिन में रखकर दिखाता है।
अनशन और उनसे क्या बदला
अग्रवाल के अनशन उनके जीवन का सबसे अच्छी तरह दर्ज हिस्सा हैं, क्योंकि हर अनशन से चिट्ठियाँ, मंत्रियों के जवाब और अखबारी कवरेज पैदा हुए। गिनती पर विवरण अलग हैं। SANDRP के हिमांशु ठक्कर आखिरी अनशन से पहले 2008, 2009, 2010, 2012 और 2013 के अनशन गिनाते हैं, जबकि इंडिया वॉटर पोर्टल के लिए लिखने वाले एक पूर्व छात्र चार अनशनों का जिक्र करते हैं। नतीजे गिनती से ज्यादा साफ हैं।
लोहारीनाग पाला, 2008 से 2010
भागीरथी पर NTPC की बनाई जा रही 600 मेगावाट की लोहारीनाग पाला परियोजना उनका पहला निशाना थी। डाउन टू अर्थ ने बताया कि मंत्रियों के एक समूह ने 8 जुलाई 2010 को निर्माण जारी रखने का फैसला किया, क्योंकि NTPC लगभग ₹600 करोड़ खर्च कर चुकी थी। इसके बाद अग्रवाल ने 20 जुलाई को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, जो इस परियोजना के खिलाफ उनकी तीसरी हड़ताल थी। 20 अगस्त 2010 को मंत्रियों ने अपना फैसला पलटा और परियोजना रद्द कर दी। 23 अगस्त 2010 की एक चिट्ठी में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सरकार की प्रतिबद्धताएँ गिनाईं। इनमें भागीरथी पर परियोजनाएँ रद्द करना और गौमुख से उत्तरकाशी तक के हिस्से को पर्यावरण-संवेदी घोषित करना शामिल था।
यह क्रम दोनों तरफ के दाँव दिखाता है। एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी आधी बनी परियोजना में लगभग ₹600 करोड़ लगा चुकी थी। अनशन ने केंद्र को यह तय करने पर मजबूर किया कि वह खर्च नदी से ज्यादा भारी है या नहीं। डाउन टू अर्थ ने यह भी बताया कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने 3 अगस्त 2010 को प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर परियोजना छोड़ने को कहा था।
भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र, 2012
दूसरा नतीजा कानूनी था। 18 दिसंबर 2012 को पर्यावरण मंत्रालय ने गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी के लगभग 100 किमी के पूरे जलग्रहण क्षेत्र को पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र अधिसूचित किया। यह 4,179.59 वर्ग किलोमीटर में फैला है, और इसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचना S.O. 2930(E) से अधिसूचित किया गया। पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र अपने भीतर बड़ी पनबिजली और खदान जैसी गतिविधियों पर रोक लगाता है या उन्हें नियंत्रित करता है। तब से अधिसूचना में संशोधन हुए हैं, सबसे हाल में 10 नवंबर 2022 को। ऐसे क्षेत्रों के नियम पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र वाले नोट में हैं, और मूल कानून पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 वाले नोट में।
आखिरी अनशन, 2018
24 फरवरी 2018 को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी माँगें गिनाते हुए चिट्ठी लिखी, और 22 जून से अनशन की घोषणा की। कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने हरिद्वार के मातृ सदन में अनशन शुरू किया। 9 अक्टूबर 2018 को सरकार ने राजपत्र अधिसूचना से गंगा के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह अधिसूचित किया। केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने उनसे अनशन खत्म करने की अपील की। उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि उनकी मुख्य माँगें पूरी नहीं हुईं। उन्होंने पानी भी छोड़ दिया, उन्हें AIIMS ऋषिकेश ले जाया गया, और 11 अक्टूबर 2018 को वहीं उनका निधन हुआ। डाउन टू अर्थ ने इसे अनशन का 111वाँ दिन बताया।
विरासत और उन्हें कैसे याद किया जाता है
अग्रवाल की विरासत तीन जगहों पर है: कानून में, नदी नीति की बहस में और विरोध की नैतिकता में।
कानून में उनके अनशन सीधे दो स्थायी फैसलों से जुड़े हैं: लोहारीनाग पाला का रद्द होना और भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र। 9 अक्टूबर 2018 की ई-फ्लो अधिसूचना उनके आखिरी अनशन के दौरान आई। इसने ऊपरी बेसिन का बहाव नवंबर से मार्च के सूखे महीनों में मासिक औसत का 20%, अक्टूबर, अप्रैल और मई में 25% और मानसून में 30% तय किया। साथ ही भीमगोडा, बिजनौर, नरोरा और कानपुर बैराजों पर न्यूनतम पानी छोड़ना तय किया। केंद्रीय जल आयोग अब इसके पालन की रिपोर्टें प्रकाशित करता है।
नीति की बहस में, सफाई से ज्यादा बहाव पर उनका जोर अब मुख्यधारा की शब्दावली बन चुका है। जिस राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण से उनका वास्ता पड़ा, वह 7 अक्टूबर 2016 को भंग कर दिया गया। उसकी जगह प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद आई, और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन उसकी अमल करने वाली शाखा बना। इस कहानी का सफाई वाला पहलू गंगा प्रदूषण वाले नोट में है।
नैतिकता में, उनके अनशन अहिंसक आत्म-पीड़ा की उस गांधीवादी परंपरा का हिस्सा हैं जिसका मकसद सरकार का मन बदलना होता है। इनकी तुलना हिमालय के दूसरे पर्यावरण आंदोलनों से की जाती है, जैसे चिपको आंदोलन, और उसी नदी पर टिहरी बाँध के खिलाफ चले लंबे विरोध से।
क्या अब भी विवादित है
अग्रवाल के बारे में तीन सवाल अब भी खुले हैं, और एक ईमानदार उत्तर में इनका नाम होना चाहिए।
- क्या सरकार ने उनकी माँगें पूरी कीं। सरकार का जवाब 9 अक्टूबर 2018 की ई-फ्लो अधिसूचना थी, जो अनशन खत्म करने की गडकरी की अपील के साथ जारी हुई। अग्रवाल और उनके समर्थकों का मानना था कि मुख्य माँगें, यानी गंगा कानून और अलकनंदा परियोजनाओं पर रोक, पूरी नहीं हुईं। ठक्कर जैसे आलोचकों ने अधिसूचना को बहुत कम और बहुत देर से उठाया गया कदम कहा।
- मुद्दे को रखने का तरीका। हमदर्द नदी कार्यकर्ताओं ने भी, जिनमें ठक्कर शामिल हैं, लिखा कि वे हमेशा उनके सिर्फ गंगा पर या धार्मिक आधार पर जोर से सहमत नहीं थे। वे चाहते थे कि सामाजिक और पारिस्थितिक आधार पर सभी नदियों के साथ एक जैसा बर्ताव हो।
- छोटे तथ्यात्मक फासले। स्रोत उनके अनशनों की संख्या पर, इस पर कि उन्होंने पानी 9 अक्टूबर को छोड़ा या 10 अक्टूबर 2018 को, और CPCB में उनके कार्यकाल के वर्षों पर अलग-अलग बात कहते हैं।
जी.डी. अग्रवाल और आज की गंगा
जी.डी. अग्रवाल का नाम अब एक ऐसी बहस से जुड़ा है जिसका फैसला अब भी अदालत और नीति में हो रहा है। जिस कानून की उन्होंने माँग की थी, वह नहीं बना। गंगा अब भी पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के तहत जारी 2016 के प्राधिकरण आदेश और 2018 की ई-फ्लो अधिसूचना से चलती है।
मई 2026 में पनबिजली का सवाल आगे बढ़ा। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त हलफनामा दायर किया। उसमें कहा गया कि वह ऊपरी गंगा के अलकनंदा-भागीरथी बेसिन में कोई नई पनबिजली परियोजना मंजूर नहीं करेगी, और सिर्फ 7 परियोजनाओं को अनुमति देगी, जिनमें 4 चालू हो चुकी हैं और 3 काफी आगे बढ़ चुकी हैं। हलफनामे ने भूकंपीय नाजुकता, जैव विविधता, पाँच प्रयागों और एहतियाती सिद्धांत का हवाला दिया, जैसा ऊपरी गंगा बेसिन में कोई नई पनबिजली परियोजना नहीं वाला व्याख्यात्मक लेख बताता है। राज्य उनकी मुख्य माँग के इससे ज्यादा करीब कभी नहीं आया, हालाँकि यह एक हलफनामे के जरिए आया है, उस कानून के जरिए नहीं जिसकी उन्होंने माँग की थी।
परीक्षा के लिए जी.डी. अग्रवाल को कैसे पढ़ें
जी.डी. अग्रवाल संदर्भ में रखकर पढ़ा जाने वाला व्यक्ति है, रटने वाली जीवनी नहीं। वे GS पेपर III में पर्यावरण और संरक्षण के तहत आते हैं (नदी प्रदूषण, पर्यावरणीय प्रवाह, पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र और पनबिजली)। GS पेपर II में वे दबाव समूहों और नागरिक समाज के तहत आते हैं, और GS पेपर IV में अंतरात्मा और अहिंसक विरोध के केस स्टडी के रूप में। प्रीलिम्स में उनका नाम आने के बजाय उन चीजों के जरिए सवाल आने की संभावना ज्यादा है जिन पर उनका असर पड़ा, जैसे भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र या ई-फ्लो।
मुख्य परीक्षा ने उन नदी नीतियों पर प्रश्न पूछे हैं जिन्हें उन्होंने चुनौती दी। मुख्य परीक्षा 2015 के GS पेपर III में पूछा गया था: “नमामि गंगे और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) कार्यक्रमों की और पिछली योजनाओं के मिले-जुले नतीजों के कारणों की चर्चा कीजिए। धीरे-धीरे बढ़ने वाले प्रयासों के मुकाबले कौन-सी बड़ी छलाँगें गंगा नदी को बेहतर ढंग से बचा सकती हैं?” उनका अविरल गंगा वाला तर्क दूसरे हिस्से का तैयार उत्तर है।
इन्हें तब तक दोहराइए जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:
- CPCB के पहले सदस्य सचिव, उस बोर्ड के जिसका गठन सितंबर 1974 में जल अधिनियम के तहत हुआ।
- स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद: वह नाम जो उन्होंने 2011 में लिया।
- लोहारीनाग पाला: भागीरथी पर NTPC की 600 मेगावाट की परियोजना, जो 20 अगस्त 2010 को रद्द हुई।
- भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र: गौमुख से उत्तरकाशी तक लगभग 100 किमी, 4,179.59 वर्ग किमी, 18 दिसंबर 2012 को अधिसूचित।
- अविरल और निर्मल: बिना रुकावट बहती और साफ, जीवित नदी के लिए उनकी दो शर्तें।
- 9 अक्टूबर 2018: गंगा ई-फ्लो अधिसूचना।
- 11 अक्टूबर 2018: AIIMS ऋषिकेश में उनका निधन, आखिरी अनशन के 111वें दिन।
दो भ्रम नंबर कटवाते हैं। गंगा कार्य योजना या नमामि गंगे का श्रेय उन्हें मत दीजिए; ये सरकारी कार्यक्रम थे, और 2018 की उनकी चिट्ठियों का तर्क था कि इनके तहत हुए काम ने नदी को नहीं बचाया। और 2012 के क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान या अभयारण्य मत कहिए; यह पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के तहत एक पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र है।
| व्यक्ति | क्षेत्र | मुख्य नदी या इलाका | तरीका | मुख्य नतीजा |
|---|---|---|---|---|
| जी.डी. अग्रवाल | पर्यावरण इंजीनियर और संन्यासी | भागीरथी और अलकनंदा | चिट्ठियाँ और अनशन | लोहारीनाग पाला रद्द; भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र |
| सुंदरलाल बहुगुणा | गांधीवादी कार्यकर्ता | टिहरी में भागीरथी; हिमालय के जंगल | पदयात्राएँ और अनशन, चिपको का हिस्सा | टिहरी बाँध के खिलाफ लंबा विरोध |
| मेधा पाटकर | सामाजिक कार्यकर्ता | नर्मदा | नर्मदा बचाओ आंदोलन, सत्याग्रह | पुनर्वास और बाँध की ऊँचाई पर बहस |
जी.डी. अग्रवाल किसी उत्तर के लिए अपनी जीवनी से कहीं ज्यादा काम के हैं। वे आपको नदी के बहाव के पक्ष में एक इंजीनियर का तर्क देते हैं, किसी विरोध ने क्या हासिल किया इसका तारीखों वाला रिकॉर्ड देते हैं, और एक नागरिक और एक राज्य के एक-दूसरे की बात न समझ पाने का ईमानदार उदाहरण देते हैं। उन्हें तारीखों के साथ सबूत की तरह इस्तेमाल कीजिए, और वे पर्यावरण या नैतिकता के किसी उत्तर को आम उत्तरों से ऊपर उठा देंगे।
सामान्य प्रश्न
जी.डी. अग्रवाल कौन थे?
जी.डी. अग्रवाल एक भारतीय पर्यावरण इंजीनियर थे, जो IIT कानपुर में पढ़ाते थे और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य सचिव थे। 2011 में वे संन्यासी बने और उनका नाम स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद हुआ। वे ऊपरी गंगा पर पनबिजली परियोजनाएँ रोकने के लिए किए गए अपने अनशनों के लिए जाने जाते हैं। 2018 में गंगा संरक्षण कानून के लिए अनशन के दौरान उनका निधन हुआ।
जी.डी. अग्रवाल ने अनशन क्यों किया?
उन्होंने ऊपरी गंगा को उसकी प्राकृतिक धारा में बहता रखने और भागीरथी और अलकनंदा पर नई पनबिजली परियोजनाएँ रोकने के लिए अनशन किया। 2018 के अपने आखिरी अनशन में उन्होंने जस्टिस गिरिधर मालवीय समिति के मसौदे पर आधारित गंगा संरक्षण कानून, एक वैधानिक गंगा परिषद और नदी तल में खनन पर रोक की माँग भी की।
जी.डी. अग्रवाल का निधन कैसे हुआ?
उनका निधन 11 अक्टूबर 2018 को AIIMS ऋषिकेश में 86 वर्ष की उम्र में हुआ। वे 22 जून 2018 से हरिद्वार के मातृ सदन में अनशन पर थे, और अस्पताल ले जाए जाने से कुछ ही पहले उन्होंने पानी भी छोड़ दिया था। अस्पताल के निदेशक ने अनशन के 111वें दिन उनकी मौत की वजह दिल का दौरा बताई।
जी.डी. अग्रवाल ने क्या हासिल किया?
उनके अनशन अगस्त 2010 में भागीरथी पर 600 मेगावाट की लोहारीनाग पाला पनबिजली परियोजना के रद्द होने से, और दिसंबर 2012 में गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र की अधिसूचना से जुड़े हैं। गंगा की पर्यावरणीय प्रवाह अधिसूचना 9 अक्टूबर 2018 को उनके आखिरी अनशन के दौरान आई।
भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र क्या है?
यह गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी का लगभग 100 किमी का जलग्रहण क्षेत्र है, जो 4,179.59 वर्ग किलोमीटर में फैला है। पर्यावरण मंत्रालय ने इसे 18 दिसंबर 2012 को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया। यह क्षेत्र के भीतर बड़ी पनबिजली और खनन जैसी गतिविधियों पर रोक लगाता है या उन्हें नियंत्रित करता है।
अविरल गंगा का क्या मतलब है?
अविरल का मतलब है बिना रुकावट या लगातार बहता हुआ। अग्रवाल का तर्क था कि गंगा को निर्मल, यानी साफ, होने के साथ-साथ अविरल भी होना चाहिए। वजह यह कि बाँधों से टूटी और सुरंगों में मोड़ी गई नदी खुद को जिंदा नहीं रख सकती, उसके किनारों पर चाहे जितना सीवेज साफ किया जाए।
क्या जी.डी. अग्रवाल CPCB के संस्थापक थे?
नहीं। वे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य सचिव थे, यानी बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी। लेकिन बोर्ड खुद सितंबर 1974 में जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत कानून से बना था।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. जी.डी. अग्रवाल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. वे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य सचिव थे। 2. उन्होंने संन्यास का नाम स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद लिया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) दोनों सही हैं; उन्होंने 2011 में संन्यास लिया।
2. भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह गौमुख से उत्तरकाशी तक के जलग्रहण क्षेत्र को कवर करता है। 2. इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अधिसूचित किया गया। 3. इसे दिसंबर 2012 में अधिसूचित किया गया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 1 और 3
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) इसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया गया।
3. जी.डी. अग्रवाल के अनशन समेत कई विरोधों के बाद 2010 में रद्द हुई लोहारीनाग पाला पनबिजली परियोजना किस नदी पर थी?
- (a) अलकनंदा
- (b) मंदाकिनी
- (c) भागीरथी
- (d) यमुना
उत्तर: (c) NTPC की 600 मेगावाट की यह परियोजना भागीरथी पर थी।
4. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन किस कानून के तहत हुआ?
- (a) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
- (b) जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974
- (c) वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981
- (d) राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010
उत्तर: (b) CPCB का गठन सितंबर 1974 में जल अधिनियम के तहत हुआ।
5. नदी प्रबंधन के संदर्भ में ‘पर्यावरणीय प्रवाह’ शब्द किसे दर्शाता है?
- (a) मानसून में किसी बाँध में जमा किया जा सकने वाला अधिकतम पानी
- (b) वह बहाव जो किसी नदी को अपना पारिस्थितिकी तंत्र बनाए रखने के लिए अपनी धारा में रखना चाहिए
- (c) किसी नदी में छोड़े गए साफ किए गए सीवेज की मात्रा
- (d) किसी पनबिजली टरबाइन को पूरी क्षमता पर चलाने के लिए जरूरी बहाव
उत्तर: (b) ई-फ्लो धारा में छोड़ा गया न्यूनतम बहाव है; गंगा का ई-फ्लो 9 अक्टूबर 2018 को अधिसूचित हुआ।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- भारत में बड़ी परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के नतीजों को प्रभावित करने में पर्यावरण NGO और कार्यकर्ता क्या भूमिका निभाते हैं? सभी जरूरी ब्योरों के साथ चार उदाहरण दीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2024, GS पेपर III।
- पर्यावरण दबाव समूह क्या हैं? भारत में जागरूकता बढ़ाने, नीतियों को प्रभावित करने और पर्यावरण संरक्षण की पैरवी करने में उनकी भूमिका की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2025, GS पेपर II।
- बहती गंगा के बिना साफ गंगा मुमकिन नहीं है। ऊपरी गंगा बेसिन में पनबिजली और 2018 के पर्यावरणीय प्रवाह मानदंडों के संदर्भ में इस तर्क का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- जी.डी. अग्रवाल के अनशन यह सवाल उठाते हैं कि लोकतंत्र में जनता को राजी करने के औजार के रूप में आत्म-पीड़ा कहाँ तक जायज है। नैतिक नजरिए से चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- भागीरथी पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र के संदर्भ में, संरक्षण के औजार के रूप में पर्यावरण-संवेदी क्षेत्रों के महत्व का मूल्यांकन कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)