गंगा भारत की सबसे पवित्र और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण नदी है। यह 2,525 किमी लंबी है और देश की 40% जनसंख्या को जल प्रदान करती है। परंतु दशकों से औद्योगिक, कृषि और घरेलू प्रदूषण से गंगा की दशा चिंताजनक है।
गंगा प्रदूषण के प्रमुख स्रोत
- अनुपचारित सीवेज — गंगा बेसिन में 12,000+ MLD सीवेज प्रतिदिन।
- औद्योगिक अपशिष्ट — चर्मशोधन (Tanneries), कागज उद्योग, रासायनिक कारखाने।
- कृषि अपवाह — उर्वरक, कीटनाशक।
- धार्मिक और अंत्येष्टि अवशिष्ट।
- ठोस अपशिष्ट निपटान।
नमामि गंगे मिशन (2014-2015)
राष्ट्रीय नमामि गंगे मिशन (NMCG) — ₹20,000 करोड़ से शुरू; 2021 में ₹22,500 करोड़ तक विस्तार।
प्रमुख घटक
- सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) — 100+ नए STP; क्षमता: 5,200+ MLD।
- घाट और श्मशान — 5,000+ घाटों का नवीनीकरण।
- औद्योगिक बहिःस्राव — 1,000+ प्रदूषणकारी उद्योगों को बंद/नोटिस।
- जैव-विविधता संरक्षण — डॉल्फिन, घड़ियाल संरक्षण।
- प्राकृतिक खेती — गंगा के किनारे 5 किमी में रासायनिक उर्वरक मुक्त।
प्रगति और उपलब्धियाँ
- प्रयागराज और वाराणसी में BOD (Biochemical Oxygen Demand) में सुधार।
- गंगा डॉल्फिन की संख्या बढ़ी।
- STP क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि।
चुनौतियाँ
- STP का अकुशल संचालन — बिजली आपूर्ति, रखरखाव।
- गैर-बिंदु स्रोत प्रदूषण नियंत्रण कठिन।
- राज्यों के बीच समन्वय की कमी।
नमामि गंगे 2.0 (2024-2026)
- ₹22,500 करोड़ के साथ जारी।
- अर्थ गंगा — आर्थिक गतिविधि को गंगा संरक्षण से जोड़ना।
यूपीएससी प्रासंगिकता
- GS-III: पर्यावरण, जल प्रदूषण।
- GS-II: सरकारी योजनाएँ।
- मुख्य: “नमामि गंगे की उपलब्धियाँ और शेष चुनौतियाँ।”
गंगा की सफाई केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं — यह सांस्कृतिक, आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न है। नमामि गंगे ने सही नींव रखी है — अब STP संचालन की गुणवत्ता और राज्यों का सहयोग निर्णायक है।