Anantam IASHindi Note · 14 September 2026

पट्टदकल: चालुक्यों का राज्याभिषेक नगर, विरुपाक्ष मंदिर और दो मंदिर शैलियाँ

पट्टदकल: चालुक्यों का राज्याभिषेक नगर, जहाँ नागर और द्रविड़ शैली के मंदिर एक ही समूह में खड़े हैं और विरुपाक्ष मंदिर कांची पर जीत की याद दिलाता है।

पट्टदकल कर्नाटक के बागलकोट जिले में मलप्रभा नदी के किनारे बसा एक गाँव है। यहीं बादामी के चालुक्य अपने राजाओं का राज्याभिषेक करते थे। 7वीं और 8वीं सदी ईस्वी में उन्होंने यहाँ उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय, दोनों शैलियों में मंदिर बनवाए। UNESCO ने पट्टदकल के स्मारक समूह को 1987 में अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। यहाँ का सबसे मशहूर मंदिर विरुपाक्ष मंदिर है। इसे करीब 740 में रानी लोकमहादेवी ने बनवाया था, ताकि उनके पति विक्रमादित्य द्वितीय की कांची के पल्लवों पर जीत की याद बनी रहे।

इस नाम के साथ दो गलतफहमियाँ अक्सर जुड़ जाती हैं। पहली, पट्टदकल चालुक्यों की राजधानी नहीं था। राजधानी बादामी थी, यानी पुराना वातापी, जो यहाँ से 22 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है। पट्टदकल वह पवित्र नगर था जहाँ राजा मुकुट धारण करते थे और जहाँ इस राजवंश ने अपने सबसे बेहतरीन मंदिर खड़े किए। दूसरी, यहाँ का विरुपाक्ष हम्पी वाला विरुपाक्ष नहीं है। हम्पी का विरुपाक्ष विजयनगर की राजधानी में है और विश्व धरोहर सूची की एक अलग प्रविष्टि का हिस्सा है। इन दोनों बातों को अलग रखिए, तो मंदिरों को पढ़ना आसान हो जाता है। एक ही नदी-तट पर, एक ही समूह में, भवन-निर्माण की दो पूरी परंपराएँ खड़ी हैं।

पट्टदकल क्या है: सबसे पहले ये तथ्य पक्के कीजिए

पट्टदकल असल में एक गाँव के पास बने पत्थर के मंदिरों का समूह है। इनमें से ज्यादातर मंदिर उस दौर में बने, जब पश्चिमी दक्कन पर बादामी के चालुक्यों का राज था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) यहाँ 10 मंदिर गिनता है। इनमें से 8 एक ही समूह में हैं, एक उससे करीब 200 मीटर दक्षिण में है और एक करीब 0.5 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में।

तथ्यविवरण
स्थानपट्टदकल गाँव, बादामी तालुक, बागलकोट जिला, कर्नाटक; मलप्रभा नदी के किनारे, बादामी से 22 किलोमीटर उत्तर-पूर्व
किसने बनवायाबादामी (वातापी) के चालुक्य और उनकी रानियाँ, 7वीं और 8वीं सदी ईस्वी
क्या खड़ा है9 हिंदू मंदिर और एक जैन देवालय (UNESCO); कुल 10 मंदिर (ASI)
सबसे पुराना मंदिरसंगमेश्वर, जिसे विजयादित्य सत्याश्रय (शासन 697 से 733) ने बनवाया
सबसे मशहूर मंदिरविरुपाक्ष, जिसका पहला नाम लोकेश्वर था; करीब 740 में रानी लोकमहादेवी ने बनवाया
आखिरी मंदिरजैन नारायण नाम से जाना जाने वाला जैन मंदिर, राष्ट्रकूट राजा कृष्ण द्वितीय के समय, 9वीं सदी
पुराने नामकिसुवोलल या रक्तपुर, यानी “लाल नगर”; पट्टद-किसुवोलल, यानी “राज्याभिषेक का स्थान”
UNESCO दर्जा1987 में विश्व धरोहर समिति के 11वें सत्र में सूची में शामिल; मानदंड (iii) और (iv)
संरक्षित क्षेत्र5.56 हेक्टेयर की संपत्ति, साथ में 113.48 हेक्टेयर का बफर जोन

पट्टदकल के मंदिर किसने और कब बनवाए

ये मंदिर बादामी के चालुक्य राजाओं और उनकी दो रानियों ने 7वीं सदी से 740 के दशक के बीच बनवाए। आखिरी मंदिर 9वीं सदी में एक राष्ट्रकूट राजा ने जोड़ा। इस राजवंश की जड़ें यहीं की थीं। ब्रिटानिका पुलकेशिन प्रथम को पट्टदकल का एक सरदार बताता है, जिसका शासन 543 में शुरू हुआ। उसने वातापी की पहाड़ी पर कब्जा किया और उसकी किलेबंदी की। बादामी के चालुक्यों ने उसी राजधानी से 757 तक राज किया। उस साल राष्ट्रकूटों ने कीर्तिवर्मन द्वितीय को हटाकर सत्ता ले ली।

तो सवाल उठता है कि राजाओं का राज्याभिषेक राजधानी की बजाय यहाँ क्यों होता था? ASI का धारवाड़ सर्कल इसका जवाब नदी में देखता है। पट्टदकल में मलप्रभा उत्तर की ओर मुड़ती है। नदी के इस हिस्से को उत्तरवाहिनी कहा जाता है, और ASI इस नगर की पवित्रता को इसी मोड़ से जोड़ता है। शिलालेखों और आरंभिक मध्यकालीन साहित्य में दर्ज है कि चालुक्य राजाओं का राज्याभिषेक यहीं होता था। नाम भी यहीं से निकला: पट्टद-किसुवोलल, यानी “राज्याभिषेक का स्थान”। इससे पुराना नाम किसुवोलल था। संस्कृत में इसे रक्तपुर कहते हैं, और इसका अर्थ है “लाल नगर”।

यह नाम मंदिरों से भी पुराना है। ASI बताता है कि टॉलेमी के ग्रंथ “भूगोल” में, जो करीब 150 ईस्वी में लिखा गया, इस जगह को पेटिर्गल कहा गया है। कन्नड़ काव्यशास्त्र की सबसे पुरानी रचना कविराजमार्ग (करीब 840 ईस्वी) किसुवोलल को उस इलाके की एक सीमा बताती है, जहाँ सबसे शुद्ध कन्नड़ बोली जाती थी।

मंदिरों का निर्माण चार चरणों में हुआ।

चरण 1: 7वीं सदी के छोटे नागर मंदिर

ASI कडसिद्धेश्वर और जंबुलिंगेश्वर मंदिरों को 7वीं सदी का मानता है। दोनों छोटे मंदिर हैं, और दोनों के शिखर उत्तर भारतीय ढंग से घुमावदार हैं। यानी शाही मंदिरों का काम शुरू होने से पहले ही नागर शैली चालुक्यों के हाथ में आ चुकी थी।

चरण 2: विजयादित्य का संगमेश्वर

संगमेश्वर इस स्थल का सबसे पुराना मंदिर है जिसकी तारीख तय की जा सकती है। इसे विजयादित्य सत्याश्रय ने बनवाया, जिन्होंने 697 से 733 तक राज किया। यह द्रविड़ शैली का मंदिर है और इसका विमान तीन मंजिला है। इसका गर्भगृह दो दीवारों के भीतर है। दोनों दीवारों के बीच की जगह एक ढका हुआ रास्ता है, जिस पर चलकर देवता की परिक्रमा की जाती है।

चरण 3: 740 के दशक के विजय मंदिर

ब्रिटानिका की तारीखों के हिसाब से विक्रमादित्य द्वितीय ने 733 से 746 तक राज किया। उन्होंने कांची के पल्लवों से युद्ध किया। ब्रिटानिका लिखता है कि उन्होंने 742 में कांची पर कब्जा किया, लेकिन शहर को बख्श दिया। उनकी रानियों ने इस अभियान को पत्थर में उतार दिया। लोकमहादेवी ने विरुपाक्ष मंदिर बनवाया और त्रैलोक्यमहादेवी ने उसके बगल में मल्लिकार्जुन मंदिर। दोनों का मकसद इसी जीत का जश्न था। चालुक्यों का काम दो और मंदिरों से पूरा होता है। एक है गलगनाथ, जिसे ASI पहले मंदिरों से एक सदी बाद का मानता है। दूसरा है काशी विश्वेश्वर, जो आरंभिक चालुक्य ढंग में बना आखिरी मंदिर है।

चरण 4: राष्ट्रकूटों का आखिरी अध्याय

757 में सत्ता में आए राष्ट्रकूटों ने इस स्थल को छोड़ा नहीं। ASI के मुताबिक पट्टदकल में आखिरी निर्माण 9वीं सदी में कृष्ण द्वितीय के समय हुआ। यह एक जैन मंदिर है, जिसे स्थानीय लोग जैन नारायण कहते हैं। यह मुख्य समूह से अलग खड़ा है।

पट्टदकल में नागर और द्रविड़ मंदिर को कैसे पहचानें

सबसे आसान पहचान गर्भगृह के ऊपर उठने वाले हिस्से से होती है। नागर मंदिर में यह हिस्सा, जिसे ASI रेखा-नागर प्रासाद कहता है, एक घुमावदार ढाँचे की तरह उठता है और ऊपर जाते-जाते पतला होता जाता है। द्रविड़ मंदिर में यही हिस्सा विमान कहलाता है। यह सीढ़ीनुमा मंजिलों में उठता है, और हर मंजिल अपने नीचे वाली मंजिल की छोटी नकल होती है। सबसे ऊपर गुंबद जैसी एक टोपी होती है, जिसे शिखर कहते हैं।

ASI का धारवाड़ सर्कल पट्टदकल के मंदिरों को इस तरह बाँटता है:

Anantam IAS पर नागर मंदिर स्थापत्य और द्रविड़ मंदिर स्थापत्य के नोट्स दोनों शैलियों को अलग-अलग समझाते हैं। पट्टदकल इसमें एक नई चीज जोड़ता है। यहाँ आप नागर और द्रविड़ शैली, दोनों को एक ही राजवंश के हाथों, एक ही जगह पर बना हुआ देख सकते हैं।

इसे एक ही साइनबोर्ड पर लिखी दो लिपियों की तरह समझिए: ऊपर देवनागरी और नीचे कन्नड़। दोनों अपने आप में पूरी हैं, दोनों अपने नियम मानती हैं, और कोई भी दूसरी का मिश्रण नहीं है। यह उपमा ज्यादातर स्थल पर ठीक बैठती है, लेकिन विरुपाक्ष पर आकर टूट जाती है। वहाँ कारीगरों ने दक्षिणी विमान में एक उत्तरी तत्व जोड़ दिया: शुकनासा। यह विमान के सामने वाले हिस्से पर आगे निकली एक “नाक” है। यह उस छोटे कक्ष यानी अंतराल के ठीक ऊपर होती है, जिससे होकर गर्भगृह में जाते हैं। ASI विरुपाक्ष को ऐसा सबसे पुराना तारीख-युक्त मंदिर मानता है जिसमें यह तत्व है, और मल्लिकार्जुन उसके ठीक बाद आता है। पुराने संगमेश्वर में शुकनासा नहीं है, इसलिए वह पल्लव रूप के ज्यादा करीब रहता है।

इसी वजह से दो सरकारी विवरण आपस में टकराते से लगते हैं। UNESCO उत्तरी और दक्षिणी रूपों के एक सधे हुए मेल की बात करता है, जबकि ASI हर मंदिर को एक या दूसरे खेमे में रखता है। दोनों सही हैं, बस अलग-अलग पैमाने पर। पूरे स्थल के स्तर पर मेल दिखता है; ज्यादातर अकेले मंदिरों में नहीं।

कारीगरों ने यहाँ एक दूसरा सवाल भी सुलझाया। चालुक्य स्थलों के लिए भारत की संभावित सूची (Tentative List) वाले दस्तावेज में दो तरह के नक्शों का जिक्र है। पहला है सांधार, जिसमें गर्भगृह की परिक्रमा के लिए ढका हुआ रास्ता होता है। दूसरा है निरंधार, जिसमें ऐसा रास्ता नहीं होता। दोनों को ऐहोले और बादामी में आजमाया गया, और पट्टदकल में आकर इन्हें अंतिम रूप मिला। उसी दस्तावेज के मुताबिक पट्टदकल ने ध्यान मंदिर के रूप से हटाकर उसके पैमाने पर लगाया, और ये चीजें जोड़ीं:

मुख्य समूह की सैर, उत्तर से दक्षिण की ओर

मुख्य समूह को उत्तरी छोर से दक्षिणी छोर की ओर पढ़ना सबसे अच्छा रहता है। UNESCO की संभावित सूची वाले दस्तावेज में दिए गए निर्देशांकों के हिसाब से कडसिद्धेश्वर और जंबुलिंगेश्वर सबसे उत्तर में हैं। दोनों रानियों के मंदिर दक्षिण में हैं, और पापनाथ उनसे भी आगे। यह क्रम जगह के हिसाब से है, तारीख के हिसाब से नहीं। इसलिए मंदिरों का क्रम उनकी तारीखों से तय कीजिए, इस बात से नहीं कि आप पहले किस मंदिर तक पहुँचते हैं।

  1. कडसिद्धेश्वर और जंबुलिंगेश्वर। ये 7वीं सदी के नागर मंदिर हैं। यहाँ के घुमावदार शिखर उत्तरी शैली का सबसे सरल रूप दिखाते हैं।
  2. गलगनाथ। ASI इसे पूरी तरह विकसित रेखा-नागर प्रासाद कहता है। वह यह भी बताता है कि इसकी कई विशेषताएँ पड़ोसी तेलंगाना के आलमपुर के चालुक्य मंदिरों से मिलती हैं। चंद्रशेखर मंदिर भी समूह के इसी हिस्से में है। UNESCO के दस्तावेज में इसका नाम है, लेकिन ASI की शैली वाली सूचियों में यह शामिल नहीं है।
  3. संगमेश्वर। सबसे पुराना तारीख-युक्त भवन: तीन मंजिला द्रविड़ विमान, दो दीवारों के भीतर गर्भगृह, और कोई शुकनासा नहीं।
  4. मल्लिकार्जुन। यह विरुपाक्ष के ठीक बाद और उसी के पास बना। यह उससे छोटा है। इसका विमान चार मंजिला है, गर्दन (ग्रीवा) गोल है और ऊपर की टोपी भी गोल है।
  5. काशी विश्वेश्वर। यह एक नागर मंदिर है, और ASI के अनुसार आरंभिक चालुक्य ढंग में बना आखिरी मंदिर है।
  6. विरुपाक्ष। यह सबसे बड़ा मंदिर है और एक सोचा-समझा परिसर भी। इसकी बात अगले हिस्से में करेंगे।
  7. पापनाथ। यह मुख्य समूह के दक्षिण में है। घुमावदार शिखर की वजह से यह ASI के नागर समूह में आता है। लेकिन इसकी पूर्वी दीवार पर एक शिलालेख इसके दक्षिणी हिस्से का श्रेय रेवडी ओवज्ज को देता है। रेवडी ओवज्ज सर्वसिद्धि आचारी के शिष्य थे, और सर्वसिद्धि आचारी ने द्रविड़ शैली के विरुपाक्ष के दक्षिणी हिस्से की देखरेख की थी। यानी कारीगरों का एक ही समूह दोनों शैलियों में काम कर रहा था।

पट्टदकल का विरुपाक्ष मंदिर: एक रानी का विजय स्मारक

पट्टदकल का विरुपाक्ष मंदिर करीब 740 में विक्रमादित्य द्वितीय की पटरानी लोकमहादेवी ने बनवाया था। इसका मकसद कांची के पल्लवों पर राजा की जीत का जश्न मनाना था। रानी के नाम पर इसका पहला नाम लोकेश्वर रखा गया। UNESCO इसे पूरे समूह की सबसे उत्कृष्ट कृति मानता है।

तारीखों पर एक ईमानदार टिप्पणी जरूरी है। UNESCO करीब 740 कहता है, और ब्रिटानिका कांची पर कब्जे को 742 में रखता है। ASI के अपने पेजों में विक्रमादित्य द्वितीय का शासन 745 या 746 में खत्म होता है। ये आँकड़े आपस में टकराते कम हैं, धुंधले ज्यादा हैं। समझदारी इसी में है कि आप विरुपाक्ष को 740 के दशक का मंदिर मानिए और सटीक साल पर जोर मत दीजिए।

विरुपाक्ष कोई अकेला मंदिर नहीं है। ASI इसे चालुक्य श्रृंखला का सबसे पुराना बचा हुआ मंदिर परिसर मानता है। इसका पूरा परिसर एक ही समय में सोचा गया और एक ही समय में पूरा हुआ:

उस दीवार के ऊपरी हिस्से पर छत की छोटी-छोटी आकृतियाँ बनी हैं। ASI इनका स्रोत महाबलीपुरम के शोर मंदिर में देखता है।

ASI कहता है कि विरुपाक्ष पर कांचीपुरम के कैलासनाथ मंदिर का असर है। उस पल्लव मंदिर के एक खंभे पर विक्रमादित्य द्वितीय का एक कन्नड़ शिलालेख आज भी मौजूद है, जिसमें मंदिर को दिए गए दान दर्ज हैं। यह ब्रिटानिका की उस बात से मेल खाता है कि राजा ने कांची को बख्श दिया था।

यह असर किस रास्ते से आया, इस पर विद्वान एकमत नहीं हैं। हेनरी कजन्स का मानना था कि राजा पल्लव कारीगरों को अपने साथ ले आए थे। उन्होंने विरुपाक्ष के एक शिलालेख में आए वाक्यांश तेंकण दिसे सूत्रधारी को “दक्षिण से आया वास्तुकार” पढ़ा। पर्सी ब्राउन और दूसरे विद्वानों ने यह विचार नहीं माना। कला इतिहासकार शीलकांत पत्तार का तर्क है कि इसका अर्थ “दक्षिणी हिस्से का वास्तुकार” है, यानी वह हिस्सा जिसकी देखरेख सर्वसिद्धि आचारी ने की थी। वे एक वाजिब सवाल भी पूछते हैं। कोई पल्लव वास्तुकार उत्तरी शुकनासा क्यों जोड़ता? या अपने शिष्य को ऐसी नागर शैली क्यों सिखाता, जिसका पल्लव इलाके में कोई उदाहरण ही नहीं है?

फिर यह असर आगे बढ़ा। ASI के मुताबिक राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम ने एलोरा में तराशे गए कैलास मंदिर के लिए विरुपाक्ष को नमूना बनाया। कांची से पट्टदकल, और पट्टदकल से एलोरा: यह कड़ी याद रखने लायक है, और ASI इसकी दोनों कड़ियाँ दर्ज करता है।

इस मंदिर को हम्पी के विरुपाक्ष मंदिर से अलग रखिए। वह तुंगभद्रा के किनारे विजयनगर की राजधानी में है। वह हम्पी के स्मारक समूह का हिस्सा है, जिसे UNESCO ने 1986 में सूची में शामिल किया।

पट्टदकल की नक्काशी और शिलालेख क्या दर्ज करते हैं

पट्टदकल की दीवारों पर दो तरह के रिकॉर्ड हैं। पहला, देवताओं की मूर्तियाँ और महाकाव्यों की कहानियाँ। दूसरा, वे शिलालेख जो इन्हें बनाने और तराशने वाले लोगों के नाम बताते हैं। छात्र आमतौर पर पहला हिस्सा पढ़ लेते हैं और दूसरा छोड़ देते हैं, जबकि समाज के बारे में असली बात दूसरा ही बताता है।

ASI का धारवाड़ सर्कल मुख्य मूर्तियों की यह सूची देता है:

कथा-फलक इन स्रोतों से लिए गए हैं:

प्रकाशित चालुक्य शिलालेखों पर पत्तार का अध्ययन इन लोगों के नाम बताता है:

एक शिलालेख में मूर्तिकारों को कर में छूट दिए जाने का भी जिक्र है। इन पंक्तियों को साथ रखिए, तो तस्वीर साफ हो जाती है। प्रधान कारीगर गुमनाम हाथ नहीं थे। वे नाम वाले पेशेवर थे, जिन्हें राजा उपाधियों और कर-छूट से पुरस्कृत करता था। यह सामाजिक इतिहास है, जो खुद मंदिरों पर खुदा हुआ है।

आज का पट्टदकल: UNESCO दर्जा, संरक्षण और हाल की खबरें

पट्टदकल मंदिर समूह एक विश्व धरोहर स्थल है, जिसे 1987 में विश्व धरोहर समिति के 11वें सत्र में सूची में शामिल किया गया। यह टिकट वाला स्मारक है, जिसकी देखभाल ASI का धारवाड़ सर्कल करता है। UNESCO की सूची-प्रविष्टि दो मानदंडों का हवाला देती है। आसान शब्दों में इनका मतलब यह है:

रिकॉर्ड की एक बात लोगों को उलझा देती है। UNESCO की प्रविष्टि में आज भी बीजापुर जिले का नाम है, क्योंकि यह स्थल बागलकोट जिला बनने से दस साल पहले सूची में आ गया था। बागलकोट जिला 1997 में बना, और संस्कृति मंत्रालय अब इस स्थल को बागलकोट के तहत दिखाता है। ASI का इस स्थल वाला पेज बताता है कि यह सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

जिस नदी-तट ने पट्टदकल को पवित्र बनाया, वही इसे खतरे में भी डालता है। 14 अगस्त 2019 को डेक्कन क्रॉनिकल ने खबर दी कि पिछले सप्ताहांत आई बाढ़ में 9 हिंदू मंदिर और जैन मंदिर पानी में डूब गए थे। ASI के अधिकारी उन तक पहुँच भी नहीं पा रहे थे। यह खतरा इस जगह की बनावट के साथ ही आता है, इसलिए बाढ़ से निपटने की तैयारी भी इस स्थल के संरक्षण का हिस्सा है।

धरोहर की फाइल अभी बंद नहीं हुई है। 9 फरवरी 2015 को भारत ने “मंदिर स्थापत्य का विकास – ऐहोले-बादामी-पट्टदकल” को अपनी संभावित सूची में रखा। इसमें ऐहोले और बादामी को 1987 वाली संपत्ति के विस्तार के रूप में, उन्हीं दो मानदंडों के तहत प्रस्तावित किया गया। संभावित सूची में नाम आना सिर्फ इरादे का बयान है, सूची में शामिल होना नहीं।

हाल की घटनाएँ, तारीखों के साथ:

जुलाई 2026 में जब विश्व धरोहर समिति ने सारनाथ को सूची में शामिल किया, तो भारत के विश्व धरोहर स्थलों की कुल संख्या 45 हो गई। Anantam IAS की भारत के विश्व धरोहर स्थलों वाली गाइड पट्टदकल को बाकी स्थलों के साथ रखकर समझाती है।

परीक्षा के लिए पट्टदकल कैसे पढ़ें

पट्टदकल सिलेबस के तीन हिस्सों में आता है:

स्थापत्य वाला हिस्सा सीधे पूछा जाता है। इतिहास वैकल्पिक विषय 2022 के पेपर I में पूछा गया: “प्रतिनिधि उदाहरणों की मदद से मंदिर स्थापत्य की नागर और द्रविड़ शैलियों के बीच मुख्य अंतर बताइए।” पट्टदकल अकेला ऐसा स्थल है जहाँ दोनों तरह के उदाहरण साथ-साथ खड़े हैं। इतिहास वैकल्पिक विषय 2024 के पेपर I ने इसके पीछे की राजनीति भी जोड़ दी: “छठी से आठवीं शताब्दी ईस्वी के बीच पल्लव-चालुक्य संघर्षों के क्रम का परीक्षण कीजिए।”

GS की तरफ, मुख्य परीक्षा 2022 के GS पेपर I में पूछा गया “आप इस बात को कैसे समझाएंगे कि मध्यकालीन भारतीय मंदिरों की मूर्तियाँ उस समय के सामाजिक जीवन को दर्शाती हैं?“। इसके लिए यहाँ के पंचतंत्र फलक और नाम खुदी मूर्तियाँ आपको तैयार सामग्री देती हैं। Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 94 पर कला और संस्कृति का टैग है। इसलिए मंदिरों के नाम भी उतनी ही सावधानी से याद कीजिए, जितनी सावधानी से तारीखें।

ये तथ्य आपको बिना सोचे याद होने चाहिए:

तीन उलझनें नंबर कटवाती हैं:

पट्टदकल को मंदिर स्थापत्य की कहानी के दो और चालुक्य केंद्रों के साथ रखकर देखना मदद करता है:

स्थलचालुक्यों के दौर में भूमिकाक्या बचा हैधरोहर दर्जा
ऐहोलेसंरचनात्मक मंदिरों के प्रयोगदस्तावेज के अनुसार 2 गुफाएँ, एक आंशिक रूप से चट्टान में कटा मंदिर और 12 संरचनात्मक मंदिर, जिनमें दुर्गा, लाडखान और मेगुती मंदिर शामिल हैंसंभावित सूची, 2015
बादामी (वातापी)राजधानी, जिसकी किलेबंदी पुलकेशिन प्रथम ने 543 से कीचट्टान काटकर बने 4 गुफा मंदिर, जिनमें से एक पर 578 से 579 ईस्वी का शिलालेख है, और मालेगित्ति शिवालय जैसे संरचनात्मक मंदिरसंभावित सूची, 2015
पट्टदकलराज्याभिषेक नगर और सबसे परिपक्व मंदिर9 हिंदू मंदिर और एक जैन देवालय, नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों मेंविश्व धरोहर स्थल, 1987

पट्टदकल वह कड़ी है जिससे चालुक्यों का अध्याय समझ में आता है। ऐहोले और बादामी प्रयोग दिखाते हैं; पट्टदकल नतीजे दिखाता है। इन नतीजों पर उन लोगों के नाम खुदे हैं जिन्होंने इन्हें बनाया, और इनका खर्च उन रानियों ने उठाया जो एक युद्ध की जीत का जश्न मना रही थीं। अगर आप मन ही मन मुख्य समूह की सैर कर सकें और हर मंदिर के शिखर की शैली बता सकें, तो उदाहरणों का एक ही सेट दोनों तरह के प्रश्नों के काम आएगा: स्थापत्य वाले भी और पल्लव-चालुक्य वाले भी।

सामान्य प्रश्न

पट्टदकल के मंदिर किसने बनवाए?

पट्टदकल के मंदिर बादामी के चालुक्यों और उनकी रानियों ने बनवाए, ज्यादातर 7वीं और 8वीं सदी ईस्वी में। सबसे पुराना मंदिर, संगमेश्वर, विजयादित्य सत्याश्रय ने बनवाया। विरुपाक्ष और मल्लिकार्जुन मंदिर विक्रमादित्य द्वितीय की दो रानियों ने बनवाए। आखिरी निर्माण एक जैन मंदिर था, जो 9वीं सदी में राष्ट्रकूट राजा कृष्ण द्वितीय के समय हुआ।

चालुक्य राजाओं का राज्याभिषेक पट्टदकल में क्यों होता था?

शिलालेखों और आरंभिक मध्यकालीन साहित्य में दर्ज है कि चालुक्य राजाओं का राज्याभिषेक पट्टदकल में होता था। इसी से इसका नाम पट्टद-किसुवोलल पड़ा, जिसका अर्थ है ‘राज्याभिषेक का स्थान’। ASI इसकी पवित्रता को उस जगह से जोड़ता है जहाँ मलप्रभा नदी उत्तर की ओर मुड़ती है, और नदी के इस हिस्से को उत्तरवाहिनी कहते हैं। राजधानी बादामी ही रही, इसलिए पट्टदकल शासन का केंद्र नहीं, बल्कि समारोहों का नगर था।

पट्टदकल UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब बना?

पट्टदकल 1987 में UNESCO विश्व धरोहर स्थल बना, जब विश्व धरोहर समिति ने अपने 11वें सत्र में पट्टदकल के स्मारक समूह को सूची में शामिल किया। इसे सांस्कृतिक मानदंड (iii) और (iv) के तहत शामिल किया गया। यह संपत्ति 5.56 हेक्टेयर में फैली है, और इसके साथ 113.48 हेक्टेयर का बफर जोन है।

पट्टदकल का विरुपाक्ष मंदिर किसने बनवाया?

विक्रमादित्य द्वितीय की पटरानी लोकमहादेवी ने करीब 740 ईस्वी में विरुपाक्ष मंदिर बनवाया, ताकि कांची के पल्लवों पर राजा की जीत का जश्न मनाया जा सके। रानी के नाम पर इसका पहला नाम लोकेश्वर था। इसके शिलालेखों में प्रधान वास्तुकार गुंड अनिवारिताचारी का नाम है, जिन्हें त्रिभुवनाचारी की उपाधि मिली थी।

क्या पट्टदकल का विरुपाक्ष मंदिर वही है जो हम्पी में है?

नहीं, ये एक ही नाम के दो अलग मंदिर हैं। पट्टदकल का विरुपाक्ष मलप्रभा के किनारे 8वीं सदी का चालुक्य मंदिर है, और 1987 में सूची में शामिल विश्व धरोहर संपत्ति का हिस्सा है। हम्पी का विरुपाक्ष तुंगभद्रा के किनारे विजयनगर की राजधानी में है। वह हम्पी के स्मारक समूह का हिस्सा है, जिसे 1986 में सूची में शामिल किया गया।

पट्टदकल का सबसे पुराना मंदिर कौन-सा है?

संगमेश्वर पट्टदकल का सबसे पुराना तारीख-युक्त मंदिर है। इसे विजयादित्य सत्याश्रय ने बनवाया, जिन्होंने 697 से 733 तक राज किया, और इसका विमान तीन मंजिला द्रविड़ विमान है। बाद में बने विरुपाक्ष के उलट इसमें शुकनासा नहीं है, यानी विमान के सामने की ओर आगे निकला हिस्सा।

पट्टदकल नागर स्थल है या द्रविड़?

पट्टदकल दोनों है, और इसी वजह से यह अहम है। ASI यहाँ तीन द्रविड़ मंदिर गिनता है, जिनमें सबसे आगे विरुपाक्ष है। वह पाँच नागर मंदिर भी गिनता है, जिनमें गलगनाथ और पापनाथ शामिल हैं। दोनों शैलियाँ यहाँ साथ-साथ खड़ी हैं, और कुछ उधार लिए गए ब्योरे भी दिखते हैं, जैसे विरुपाक्ष पर शुकनासा।

पट्टदकल बादामी और ऐहोले से कितनी दूर है?

कर्नाटक पर्यटन के आँकड़ों के अनुसार पट्टदकल बादामी से 22 किलोमीटर और ऐहोले से करीब 14 किलोमीटर दूर है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बादामी स्टेशन है, जो करीब 17 किलोमीटर दूर है। यह बादामी शहर से अलग है, इसलिए दोनों दूरियाँ अलग-अलग हैं। तीनों स्थल आमतौर पर साथ देखे जाते हैं, क्योंकि ये चालुक्य मंदिर-निर्माण की एक ही लगातार कहानी सुनाते हैं।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. पट्टदकल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसे 1987 में UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। 2. यह बादामी के चालुक्यों की राजधानी था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (a) UNESCO ने पट्टदकल को 1987 में सूची में शामिल किया, लेकिन राजधानी बादामी (वातापी) थी; पट्टदकल राज्याभिषेक नगर था।

2. पट्टदकल का कौन-सा मंदिर रानी लोकमहादेवी ने पल्लवों पर विक्रमादित्य द्वितीय की जीत का जश्न मनाने के लिए बनवाया था?

उत्तर: (b) विरुपाक्ष, जिसका पहला नाम रानी के नाम पर लोकेश्वर रखा गया, करीब 740 में बना।

3. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संगमेश्वर पट्टदकल का सबसे पुराना तारीख-युक्त मंदिर है। 2. पट्टदकल का जैन मंदिर राष्ट्रकूट राजा कृष्ण द्वितीय के समय जोड़ा गया। 3. काशी विश्वेश्वर मंदिर में द्रविड़ विमान है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?

उत्तर: (b) काशी विश्वेश्वर का शिखर नागर शैली का है; बाकी दोनों कथन ASI के विवरण से मेल खाते हैं।

4. पट्टदकल के मंदिरों और उनकी शिखर शैलियों के निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. विरुपाक्ष : द्रविड़ विमान 2. गलगनाथ : रेखा-नागर प्रासाद 3. मल्लिकार्जुन : रेखा-नागर प्रासाद। ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

उत्तर: (b) मल्लिकार्जुन में भी, अपने बगल वाले विरुपाक्ष की तरह, द्रविड़ विमान है।

5. ASI के अनुसार पट्टदकल का विरुपाक्ष मंदिर निम्नलिखित में से किसके लिए नमूना बना?

उत्तर: (b) ASI के अनुसार राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम ने एलोरा का कैलास मंदिर विरुपाक्ष के नमूने पर बनवाया; कांचीपुरम के कैलासनाथ ने विरुपाक्ष को प्रभावित किया, न कि उल्टा।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. पट्टदकल के मंदिरों में नागर और द्रविड़ परंपराएँ आपस में घुली हुई नहीं, बल्कि साथ-साथ खड़ी दिखती हैं। उदाहरणों के साथ चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  2. बादामी के चालुक्यों और कांची के पल्लवों की होड़ ने पट्टदकल में मंदिर निर्माण को किस तरह आकार दिया? (15 अंक, 250 शब्द)
  3. ऐहोले और बादामी से पट्टदकल तक आरंभिक चालुक्य मंदिर स्थापत्य के विकास का क्रम समझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
  4. पट्टदकल के शिलालेख आरंभिक मध्यकालीन भारत में वास्तुकारों और मूर्तिकारों की स्थिति के बारे में क्या बताते हैं? (10 अंक, 150 शब्द)
  5. भारतीय कला विरासत की रक्षा करना इस समय की आवश्यकता है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।