Anantam IASHindi Note · 13 September 2026

प्रतापगड किला: शिवाजी का वन-दुर्ग, अफजल खान और भवानी मंदिर

प्रतापगड किला आसान भाषा में: शिवाजी का 1656 में बना पहाड़ी-वन किला, 1659 में अफजल खान से मुलाकात, भवानी मंदिर और 2025 की UNESCO सीरियल धरोहर में इसकी जगह।

प्रतापगड किला (हिंदी में इसे प्रतापगढ़ किला भी लिखा जाता है) महाराष्ट्र के सातारा जिले का एक पहाड़ी किला है। यह महाबलेश्वर से नीचे महाड की ओर जाने वाली सड़क पर करीब 21 किलोमीटर दूर है। इसे 1656 में छत्रपति शिवाजी महाराज के आदेश पर बनवाया गया था। लोग इसे एक दोपहर की वजह से याद रखते हैं। 10 नवंबर 1659 को इसी किले के नीचे ढलान पर शिवाजी की मुलाकात बीजापुर के सेनापति अफजल खान से हुई। मुलाकात खत्म हुई तो अफजल खान मारा जा चुका था और उसकी फौज जंगल में तितर-बितर हो चुकी थी। 11 जुलाई 2025 से यह किला भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य (Maratha Military Landscapes of India) के बारह घटकों में से एक भी है, जिसे UNESCO ने विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है।

ज्यादातर लोगों के मन में प्रतापगड एक फिल्मी दृश्य की तरह बसा है: एक भारी-भरकम सेनापति, एक जानलेवा आलिंगन, और दूसरे आदमी की मुट्ठी में छिपा स्टील का पंजा। लेकिन किला पहले आया था, उस दृश्य से पूरे तीन साल पहले। हत्या दीवारों के नीचे हुई थी, उनके भीतर नहीं। और जिस हथियार को सब याद रखते हैं, वही अकेला ब्योरा है जिस पर पुराने स्रोत एकमत नहीं हैं। इसीलिए 2024 में लंदन से उधार आया एक पंजा जब प्रदर्शनी में रखा गया, तो उसके बगल में एक चेतावनी वाला बोर्ड भी लगाना पड़ा।

प्रतापगड कहाँ है और यह किस बात के लिए जाना जाता है

प्रतापगड पश्चिमी घाट में महाबलेश्वर की पहाड़ियों से निकली एक धार पर बसा है। यह समुद्र तल से 3,543 फुट की ऊँचाई पर है, और पार और किनेश्वर गाँवों के बीच की सड़क पूरी तरह इसकी नजर में रहती है। पश्चिम और उत्तर में पहाड़ी खड़ी चट्टानों के रूप में कोंकण की ओर गिरती है। पूरब और दक्षिण में ढलान हल्की है, और वहाँ कभी घना जंगल हुआ करता था। इसी जंगल की वजह से 2025 का नामांकन अपने बारह किलों में से अकेले प्रतापगड को पहाड़ी-वन किला (hill-forest fort) मानता है।

तथ्यविवरण
स्थानसातारा जिला, महाराष्ट्र; महाड वाली सड़क पर महाबलेश्वर से करीब 21 किलोमीटर
किसने बनवायाशिवाजी; निर्माण का काम मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले ने कराया
कब बना1656
प्रकारदो हिस्सों (ऊपरी और निचला किला) वाला पहाड़ी-वन किला, समुद्र तल से 3,543 फुट ऊँचा
सबसे अहम घटनाकिले के नीचे ढलान पर बीजापुर के अफजल खान से शिवाजी की मुलाकात, 10 नवंबर 1659
बाद में किसके कब्जे में रहामराठा राज्य और पेशवा काल की सैनिक टुकड़ी; 1818 में अंग्रेजों के हवाले
संरक्षण की स्थितिमहाराष्ट्र सरकार के पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय के तहत राज्य-संरक्षित
UNESCO दर्जा2025 में भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के घटक 1739-007 के रूप में सूची में शामिल
किस लिए प्रसिद्धअफजल खान वाली मुठभेड़, भवानी मंदिर और किले के नीचे अफजल खान की कब्र

शिवाजी ने 1656 में प्रतापगड क्यों बनवाया

छोटा जवाब है: जावली। 1656 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने मोरे परिवार से जावली की घाटी छीन ली। यह अभियान उस परिवार के मुखिया यशवंतराव मोरे के मारे जाने के साथ खत्म हुआ था। मोरे परिवार की जमीन में दक्कन और कोंकण के बीच के जंगल भरे दर्रे आते थे। और किसी घाटी पर कब्जा होना उसके बीच से गुजरने वाले रास्तों पर कब्जा होने जैसा नहीं होता। इसलिए शिवाजी ने कृष्णा नदी के उद्गम के पास एक ऊँची चट्टान चुनी और उस पर किला बनाने का आदेश दिया।

सातारा गजेटियर, ग्रांट डफ के विवरण पर चलते हुए, इसका मकसद सीधे शब्दों में बताता है। नए किले ने नीरा और कोयना के किनारे बसी शिवाजी की जमीनों तक उनकी पहुँच पक्की की। साथ ही इसने पार घाट की रक्षा को मजबूत किया, यानी वह रास्ता जो कोंकण के महाड से चढ़कर वाई और महाबलेश्वर की ओर जाता है। दर्रे के ऊपर बना किला सीढ़ियों के ऊपर लगे दरवाजे की तरह काम करता है। उसे खुले मैदान में कोई लड़ाई जीतने की जरूरत नहीं होती। उसे बस इतना करना होता है कि जिसे वह सीढ़ियों पर नहीं चाहता, उसके लिए चढ़ाई इतनी महंगी पड़े कि वह चढ़ ही न पाए।

यह काम मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले को सौंपा गया (गजेटियर उन्हें मोरो त्रिमल पिंगले भी लिखते हैं)। सातारा गजेटियर उन्हें “प्रसिद्ध ब्राह्मण मंत्री” कहता है। कुछ ही समय पहले उन्हें पुरंदर की कमान मिली थी। गजेटियर के मुताबिक जिस ढंग से उन्होंने प्रतापगड खड़ा किया, उससे शिवाजी की उनके बारे में अच्छी राय और पक्की हो गई। नाम का मतलब भी सीधा है: मराठी में “गड” का अर्थ है किला।

10 नवंबर 1659 को प्रतापगड के नीचे क्या हुआ

सीधा जवाब: शिवाजी और अफजल खान के बीच किले के नीचे ढलान पर लगे एक तंबू में सुलह के लिए मुलाकात हुई। यह मुलाकात अफजल खान की मौत पर खत्म हुई, और जंगल में पहले से घात लगाए बैठी मराठा टुकड़ियों ने उसकी फौज को खदेड़ दिया। इस मोटी रूपरेखा पर कोई विवाद नहीं है। विवाद ब्योरों पर है, और परीक्षा के सवाल हों या सार्वजनिक बहस, दोनों इन्हीं ब्योरों में रहते हैं।

पृष्ठभूमि से समझ आता है कि दांव कितना बड़ा था। 1659 तक बीजापुर दरबार शिवाजी को दबाना चाहता था। अफजल खान 1649 से बीजापुर की ओर से वाई जिले का शासन संभाल रहा था और इस इलाके को अच्छी तरह जानता था। उसने खुद आगे बढ़कर इस अभियान की अगुवाई का जिम्मा लिया। उसकी फौज के अनुमान अलग-अलग हैं: जदुनाथ सरकार के विवरण में करीब 10,000 घुड़सवार, तो एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में 20,000 सैनिक। उसकी फौज सितंबर 1659 में पंढरपुर होते हुए वाई की ओर बढ़ी। शिवाजी पीछे हटकर प्रतापगड चले गए और अधीनता मान लेने के संदेश भेजे।

जमीन का यह चुनाव ही असली योजना थी। ब्रिटानिका के शब्दों में, शिवाजी उस फौज को ललचाकर मुश्किल पहाड़ी इलाके में गहरे तक ले आए। सातारा गजेटियर भी लिखता है कि बीजापुर की फौज बड़ी मशक्कत के बाद ही जावली पहुँच पाई।

इतिहासकार किन बातों पर एकमत हैं

दोबारा सुनाए गए किस्सों की परतें हटाइए, तो एक ठोस सच बचता है। इसकी पुष्टि सातारा गजेटियर, ब्रिटानिका और विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम की अपनी कैटलॉग प्रविष्टि से होती है:

यह दृश्य जितना अहम है, उससे ज्यादा अहम उसका नतीजा है। कुछ ही सालों में मुगल बादशाह औरंगजेब शिवाजी के खिलाफ अपना सूबेदार भेज रहा था। इससे पता चलता है कि 1659 ने इस मुकाबले का पैमाना कितना बदल दिया था।

जहाँ विवरण बँट जाते हैं

असल सवाल यह है कि पहला वार किसने किया। ग्रांट डफ ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर थे। सातारा में रेजिडेंट रहने के बाद उन्होंने 1826 में अपनी किताब “हिस्ट्री ऑफ द महरट्टाज” लिखी। उन्होंने इस घटना को बुलाए गए मेहमान की हत्या की तरह पेश किया: उनके मुताबिक गले मिलते समय वार शिवाजी ने किया। पुराने मराठा वृत्तांत, जिनमें 1697 में लिखी सभासद की बखर भी शामिल है, कहते हैं कि पहला वार अफजल खान ने किया। सातारा गजेटियर के विवरण में अफजल खान शिवाजी की गर्दन अपनी बगल में दबोच लेता है और खंजर घोंपता है, जो छिपे हुए जिरहबख्तर पर फिसलकर रह जाता है।

जदुनाथ सरकार ने, जहाँ तक सबूत साथ देते हैं, इस सवाल का फैसला कर दिया। उन्होंने वृत्तांतों के बगल में राजापुर की अंग्रेज फैक्ट्री का 10 दिसंबर 1659 का पत्र रखकर देखा। फैक्ट्री यानी अंग्रेजों की व्यापारिक कोठी। यह पत्र मुलाकात के एक महीने बाद ऐसे लोगों ने लिखा था जिनका इस झगड़े में कोई दांव नहीं था। पत्र कहता है कि बीजापुर ने अफजल खान को हिदायत दी थी कि वह “दोस्ती का दिखावा करके” शिवाजी को काबू में करे। सरकार का निष्कर्ष था कि अफजल खान के मन में धोखा था, और शिवाजी यह जानते थे, इसलिए तैयार होकर आए थे।

सरकार के फैसले में वजन क्यों है, यह समझिए। वे शिवाजी के पैरोकार नहीं थे। इसी किताब में उन्होंने तीन साल पहले जावली पर कब्जे को शिवाजी की ओर से “सोची-समझी हत्या और संगठित विश्वासघात” कहा था। उन्होंने यह भी दिखाया कि जिन पुराने वृत्तांतकारों ने अफजल खान को दोषी ठहराया, वही लोग दूसरी जगहों पर शिवाजी पर खुलकर हत्या का आरोप लगाते थे। जो इतिहासकार सबूतों के आधार पर एक हत्या की निंदा करे और दूसरी में बरी कर दे, वह इतिहास लिख रहा है, किसी का गुणगान नहीं।

वाघनख का सवाल

वाघनख का शाब्दिक अर्थ है “बाघ का नाखून”। यह स्टील का एक हथियार है: एक पट्टी पर मुड़े हुए धारदार नाखून, और दो उँगलियों के लिए छल्ले। यह इतना छोटा होता है कि आधी बंद मुट्ठी में छिप जाए। शिवाजी ने इसका इस्तेमाल किया, यह कहानी सभासद से आती है, और ग्रांट डफ ने इसे दोहराया। सातारा गजेटियर लिखता है कि शिवभारत, जो शिवाजी के जीवनकाल में लिखी गई एक काव्य-रचना है, पंजे वाली कहानी का समर्थन नहीं करता। गजेटियर के अपने विवरण में शिवाजी पहले बिचवा यानी मुड़े हुए खंजर से और फिर तलवार से वार करते हैं। दूसरी ओर सरकार शिवभारत को रूमानी काव्य मानकर उस पर भरोसा नहीं करते थे। तो एक अच्छी तरह प्रमाणित घटना में हथियार ही सबसे कम पक्का हिस्सा है। और यही हिस्सा आखिरकार संग्रहालय के शोकेस तक पहुँच गया।

1659 के बाद प्रतापगड: मंदिर, जेल और आत्मसमर्पण

1661 की बरसात में शिवाजी तुलजापुर में देवी के बड़े मंदिर तक की यात्रा नहीं कर पाए, तो उन्होंने प्रतापगड पर ही भवानी का मंदिर समर्पित कर दिया। प्रतापगड का भवानी मंदिर निचले किले की पूर्वी तरफ है। इसमें आधुनिक काल में दोबारा बना एक मंडप है, और पत्थर का एक गर्भगृह है जिसमें देवी की काले पत्थर की मूर्ति है। छत पर सीसे की परत सातारा के राजा प्रतापसिंह ने लगवाई थी, जिन्होंने 1818 से 1839 तक शासन किया।

इसके बाद प्रतापगड किले का इतिहास शिवाजी के राज्य से लेकर पुणे में पेशवा के दरबार तक मराठा साम्राज्य के सफर के साथ-साथ चलता है। 1778 में पूना के मंत्री सखाराम बापू को उनके प्रतिद्वंद्वी नाना फडणवीस ने यहाँ कैद कर दिया। फिर उन्हें एक किले से दूसरे किले ले जाया जाता रहा, जब तक रायगड में उनकी मौत नहीं हो गई। 1796 में नाना खुद दौलतराव शिंदे के आसपास चल रही साजिशों से बचकर कोंकण की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने प्रतापगड में एक मजबूत सैनिक टुकड़ी बैठा दी।

अंत चुपचाप हुआ। 1818 के युद्ध में प्रतापगड ने निजी बातचीत के जरिए अंग्रेजों के सामने हथियार डाल दिए, जबकि गजेटियर इसे बड़ी सैनिक टुकड़ी वाला एक अहम गढ़ बताता है। जो किला एक दर्रा बंद करने के लिए बना था, उसे बिना घेराबंदी के सौंप दिया गया। इससे दीवारों के बारे में कम, और उस साल पेशवा की सत्ता के ढह जाने के बारे में ज्यादा पता चलता है।

प्रतापगड की किलेबंदी कैसे काम करती है: हमलावर की नजर से

प्रतापगड असल में एक ही पहाड़ी पर एक के ऊपर एक रखे दो किले हैं। सातारा गजेटियर में 1842 की एक ब्रिटिश निरीक्षण रिपोर्ट उद्धृत है। उसके सहारे आप इस किले में उसी तरह चलकर देख सकते हैं, जैसे किसी हमलावर को चलना पड़ता। इसके दो हिस्से हैं:

शुरुआत उस दिशा से कीजिए जिसे आप इस्तेमाल ही नहीं कर सकते। पश्चिम और उत्तर की ओर खड़ी चट्टानें हैं, जहाँ कुछ जगहों पर सात-आठ सौ फुट की लगभग सीधी गिरावट है। उधर से कोई हमला नहीं करता। दक्षिण में मीनारें और बुर्ज (bastion) तीस से चालीस फुट ऊँचे उठते हैं। वे एक कगार (scarp) के ऊपर खड़े हैं, जो खुद भी लगभग उतना ही ऊँचा है। कगार यानी दीवार की जड़ में नंगी चट्टान का वह हिस्सा, जिसे काटकर या वैसे ही लगभग सीधा खड़ा छोड़ दिया गया हो।

बचा पूरब, और पूरब ही वह जगह है जहाँ बनाने वालों ने अपना जाल बिछाया। जिस अकेले रास्ते पर कड़ा पहरा नहीं था, वह आसान जमीन से होकर गुजरता था, जहाँ मोर्टार तोपखाना जमाया जा सकता था। यह रास्ता एक बाहरी मोर्चे (outwork) के सिरे पर बनी मीनार की ओर ले जाता था। बाहरी मोर्चा यानी मुख्य दीवार से आगे निकालकर बनाई गई एक रक्षात्मक दीवार, जो सामने की जमीन को काबू में रखती है। यही वह मीनार है जिस पर अफजल खान का नाम है। गजेटियर कहता है कि माना जाता था कि यह बाहरी मोर्चा शिवाजी ने 1659 के बाद जुड़वाया। स्थानीय परंपरा कहती है कि अफजल खान का सिर इसी के नीचे दफन है।

अब चढ़ाई कीजिए। मीनार से रास्ता बाहरी मोर्चे की दक्षिणी तरफ एक खड़ी, ऊबड़-खाबड़ पगडंडी के रूप में ऊपर जाता है, और पूरे रास्ते मोर्चे की दीवारें उस पर झुकी रहती हैं। ऊपर चढ़ते हर कदम पर आपकी बगल ऊपर से गोली चलाते रक्षकों के सामने खुली रहती है। सबसे ऊपर प्रवेश-द्वार दो मजबूत मीनारों के बीच सिकुड़ जाता है। इनके बीच का फासला चार फुट से ज्यादा नहीं है, और इसे एक दोहरा दरवाजा बंद करता है। चार फुट में ज्यादा से ज्यादा दो आदमी कंधे से कंधा मिलाकर चल सकते हैं। इसलिए हमलावर टुकड़ी कितनी भी बड़ी हो, लड़ पाती है सिर्फ उसकी अगली कतार।

यहाँ जरा रुकिए। दीवारें अपने आप में कुछ खास नहीं थीं। 1842 की रिपोर्ट ने मुंडेर को कमजोर पाया, और परकोटा (rampart) सिर्फ तीन फुट चौड़ा था। ताकत ज्यामिति में थी। दो तरफ चट्टानें रास्ता बंद करती हैं, और तीसरी तरफ जंगल रफ्तार धीमी कर देता है। चौथी तरफ को एक तंग गलियारे में बदल दिया गया है, जिस पर ऊपर से हर पल नजर रहती है।

यही रिपोर्ट कमजोर जगह की ओर भी इशारा करती है। निचले और ऊपरी किले के बीच दो प्रवेश थे। उत्तर-पूर्वी कोने वाला प्रवेश दो मीनारों के बीच बस एक खुली जगह था, जो बाहर की खड़ी चट्टान न होती तो बहुत कमजोर होता। बनाने वालों ने जहाँ भी हो सका, पहाड़ी का सहारा लिया, और यहाँ तो पहाड़ी के सिवा कुछ था ही नहीं।

आज का प्रतापगड: UNESCO, संरक्षण और विवाद

प्रतापगड को 11 जुलाई 2025 को पेरिस में विश्व धरोहर समिति के 47वें सत्र में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के बारह किलों में से एक है, और यह संपत्ति भारत की 44वीं विश्व धरोहर है। UNESCO की सूची इन बारह किलों को एक ही सीरियल प्रॉपर्टी (कई जगहों को मिलाकर बनी एक धरोहर) मानती है। इसमें प्रतापगड का घटक नंबर 1739-007 है, जो 79.3 हेक्टेयर में फैला है और जिसका बफर जोन 12,789.51 हेक्टेयर का है। सूची में शामिल होने पर हमारा करेंट अफेयर्स नोट पूरे समूह की बात करता है। और भारत में UNESCO विश्व धरोहर स्थल वाली गाइड में यह धरोहर भारत की बाकी सूची के साथ दर्ज है।

इस संपत्ति को दो मानदंडों के तहत सूची में जगह मिली। आसान शब्दों में:

प्रतापगड उन चार घटकों में से एक है जिनकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) नहीं करता। इसका संरक्षण राज्य का पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय करता है, जो इस सूची के तीन और किलों की भी देखरेख करता है। बाकी आठ ASI के स्मारक हैं।

इस पहाड़ी पर यादें भी गढ़ी गई हैं। शिवाजी की कांसे की घुड़सवार प्रतिमा 20 फुट ऊँचे चबूतरे पर 17 फुट ऊँची है। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 30 नवंबर 1957 को किया था, और उसी साल मुख्य दरवाजे तक सड़क भी पहुँचाई गई। किले के नीचे, उसके नाम वाली मीनार के दक्षिण-पूर्व में, अफजल खान की दरगाह है, जहाँ हर साल उर्स होता आया है।

यह कब्र एक कानूनी मामला बन गई। 10 नवंबर 2022 को, यानी मुठभेड़ की 363वीं बरसी पर, सातारा जिला प्रशासन ने इसके आसपास बिना इजाजत बने ढाँचे और अतिक्रमण गिरा दिए। यह कार्रवाई बॉम्बे हाई कोर्ट के 2007 के उस आदेश पर हुई, जिसमें इन्हें हटाने को कहा गया था। अगले दिन सुप्रीम कोर्ट ने सातारा के कलेक्टर और उप वन संरक्षक से रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। तब तक राज्य अदालत को बता चुका था कि यह अभियान पूरा हो चुका है।

वाघनख संग्रहालय से उधार के रूप में लौटा। लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम ने स्टील के अपने बाघ-नख तीन साल के लिए महाराष्ट्र को उधार देने पर सहमति दी। इन्हें 19 जुलाई 2024 से सातारा के छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय में प्रदर्शनी में रखा गया, और आगे दूसरे शहरों में भी दिखाने की योजना थी। एक हफ्ते के भीतर संग्रहालय ने एक बोर्ड लगा दिया, जिस पर लिखा था कि यह पक्का करना मुमकिन नहीं है कि यह वही चीज है जिसे शिवाजी ने इस्तेमाल किया था। इतिहासकार इंद्रजीत सावंत भी यही बात कहते आ रहे थे।

म्यूजियम का अपना रिकॉर्ड इस शक की वजह बताता है, और यह किसी चीज के मालिकों के सिलसिले (provenance) को परखने का बढ़िया सबक है। ये नाखून जेम्स ग्रांट डफ के थे, जो 1818 से सातारा में रेजिडेंट थे। इनके नाप का डिब्बा उनके 1823 में स्कॉटलैंड लौटने के बाद ही बना। उस पर खुदे लेख में अफजल खान को “मुगल जनरल” कहा गया है, जबकि वह बीजापुर की सेवा में था। इसी तरह के दावे वाले दूसरे नाखून ग्रांट डफ के जाने के बहुत बाद भी सातारा के शाही संग्रह में दर्ज थे। सातारा गजेटियर यह भी लिखता है कि राजा प्रतापसिंह ने 1827 में एक सेट एल्फिंस्टन को दिया था। लेबल इतिहास नहीं होता।

परीक्षा के लिए प्रतापगड कैसे पढ़ें

सिलेबस में प्रतापगड तीन जगह आता है, और सवाल इनमें से किसी भी दरवाजे से आ सकता है:

इतिहास वाला पहलू ठीक इसी रूप में पूछा जाता है। इतिहास ऑप्शनल 2026, पेपर I में यह सवाल आया: “शिवाजी से पेशवा बालाजी बाजीराव तक मराठा राजव्यवस्था के सफर को रेखांकित कीजिए। पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) का मराठा राज्य पर क्या असर पड़ा? विश्लेषण कीजिए।” प्रतापगड उस सफर के पहले आधे हिस्से को एक ही पहाड़ी पर समेट देता है: 1656 में शिवाजी के बनवाए किले से लेकर 1778 में पेशवा के मंत्रियों की राजकीय जेल तक।

इतिहास ऑप्शनल 2024, पेपर I ने यही बात सैन्य पहलू से पूछी: “मराठों की छापामार युद्ध-नीति ने बड़ी और ज्यादा जमी-जमाई सेनाओं के खिलाफ उनकी सैन्य कामयाबी में कैसे योगदान दिया?” 1659 का अभियान इसका आदर्श उदाहरण है: बीजापुर की बड़ी फौज को जावली के जंगल में खींच लाया गया, और वहाँ पहले से तैनात टुकड़ियों ने उसे खदेड़ दिया।

प्रीलिम्स की तरफ देखें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 94 पर कला और संस्कृति का टैग है, यानी करीब पंद्रह में से एक। और विकल्प ठीक उन्हीं ब्योरों से बनाए जाते हैं जो नीचे की तालिका में हैं: किले का प्रकार और उसका संरक्षण।

रिवीजन में साथ रखने लायक तथ्य:

आम गलतफहमियाँ एक बार नाम देकर पहचान लें, तो आसानी से अलग हो जाती हैं। अंग्रेजी में नाम की वर्तनी दो तरह से मिलती है (Pratapgad और Pratapgarh), और 2025 की PIB विज्ञप्ति में भी दोनों रूप हैं। किला मुठभेड़ से तीन साल पहले बना था, इसलिए जो भी विकल्प इसे जीत का स्मारक बताए, वह गलत है। और अफजल खान बीजापुर का सेनापति था, मुगलों का नहीं, लंदन वाला डिब्बा चाहे जो कहे।

2025 की सूची में प्रतापगड को उसके साथी किलों के बगल में रखकर देखना भी काम आता है, क्योंकि विकल्प अक्सर किले के प्रकार और संरक्षण को आपस में मिला देते हैं। मराठा व्यवस्था से बाहर का फर्क देखना हो, तो दौलताबाद किला इसी समस्या का बिल्कुल अलग हल दिखाता है: एक ऐसा गढ़, जिसके बनाने वालों ने जंगल का सहारा लेने के बजाय पहाड़ी को ही काटकर एकदम खड़ी दीवार जैसा बना दिया।

किला2025 के नामांकन में भू-भाग का प्रकारसंरक्षकयाद रखने लायक एक तथ्य
प्रतापगडपहाड़ी-वन किलाराज्य का पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालयअफजल खान से मुठभेड़, 1659
रायगडपहाड़ी किलाASIशिवाजी की राजधानी; 1674 में यहीं राज्याभिषेक
लोहगडपहाड़ी किलाASI1648 में जीता, 1665 में सौंपा, 1670 में फिर जीता
पन्हालापहाड़ी-पठार किलाASIजहाँ बीजापुर ने शिवाजी को घेरा और वे निकल भागे
सिंधुदुर्गद्वीप किलाASIसूची के तीन द्वीप किलों में से एक

प्रतापगड उस अभ्यर्थी को ज्यादा देता है जो इसे तमाशे की तरह नहीं, सबूत की तरह पढ़ता है। किला सिखाता है कि जमीन ने कैसे दीवारों का काम किया। मुठभेड़ सिखाती है कि सबकी मानी हुई बात को विवादित ब्योरे से अलग कैसे रखा जाए। ये दोनों आदतें किसी भी धरोहर वाले सवाल में साथ ले जाइए। तब आपका उत्तर गले मिलने वाले दृश्य के किसी भी दोहराव से ज्यादा वजन के साथ खुद-ब-खुद लिखा जाएगा।

सामान्य प्रश्न

प्रतापगड किला किसने बनवाया?

प्रतापगड किला 1656 में छत्रपति शिवाजी महाराज के आदेश पर बनवाया गया था। निर्माण का काम मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले ने कराया, जिन्हें गजेटियर मोरो त्रिमल पिंगले भी कहते हैं। शिवाजी चाहते थे कि यह किला पार घाट और उनकी नई जीती जावली घाटी की रखवाली करे।

प्रतापगड किला कहाँ है?

प्रतापगड किला महाराष्ट्र के सातारा जिले में है, महाड वाली सड़क पर महाबलेश्वर से करीब 21 किलोमीटर दूर। यह पश्चिमी घाट में महाबलेश्वर की पहाड़ियों की एक धार पर, समुद्र तल से 3,543 फुट की ऊँचाई पर खड़ा है। इसकी खड़ी चट्टानें पश्चिम में कोंकण की ओर हैं।

1659 में प्रतापगड में क्या हुआ था?

10 नवंबर 1659 को शिवाजी ने बीजापुर सल्तनत के सेनापति अफजल खान से किले के नीचे एक तंबू में सुलह के लिए मुलाकात की। अफजल खान इस मुलाकात में मारा गया, और फिर जंगल में छिपी मराठा टुकड़ियों ने उसकी फौज को खदेड़ दिया। इस घटना ने शिवाजी को एक स्थानीय विद्रोही से दक्कन की एक बड़ी ताकत बना दिया।

क्या शिवाजी ने अफजल खान को मारने के लिए वाघनख का इस्तेमाल किया था?

सभासद का पुराना मराठा वृत्तांत कहता है कि हाँ, और ग्रांट डफ ने 1826 में यह कहानी दोहराई। सातारा गजेटियर लिखता है कि शिवाजी के जीवनकाल की काव्य-रचना शिवभारत पंजे वाली कहानी का समर्थन नहीं करती, और गजेटियर के अपने विवरण में शिवाजी मुड़े हुए खंजर और तलवार का इस्तेमाल करते हैं। इतिहासकार हत्या पर तो एकमत हैं, लेकिन असल हथियार अब भी सबसे कम पक्का ब्योरा है।

क्या प्रतापगड किला UNESCO विश्व धरोहर स्थल है?

हाँ। प्रतापगड को 11 जुलाई 2025 को मानदंड (iv) और (vi) के तहत भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के बारह घटकों में से एक के रूप में सूची में शामिल किया गया। UNESCO की सूची में इसका घटक नंबर 1739-007 है।

क्या अफजल खान की कब्र प्रतापगड में है?

हाँ, अफजल खान की दरगाह किले के नीचे, उसके नाम वाली मीनार के दक्षिण-पूर्व में है। 10 नवंबर 2022 को सातारा प्रशासन ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 2007 के आदेश के तहत कब्र के आसपास बिना इजाजत बने ढाँचे हटा दिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जिले के अधिकारियों से रिपोर्ट माँगी।

प्रतापगड किले के अंदर कौन-सा मंदिर है?

सबसे जाना-माना मंदिर निचले किले का भवानी मंदिर है, जिसे शिवाजी ने 1661 में तब समर्पित किया जब वे तुलजापुर के मंदिर तक नहीं जा सके। ऊपरी किले में महादेव का एक मंदिर भी है। भवानी मंदिर की छत पर सीसे की परत सातारा के राजा प्रतापसिंह ने लगवाई थी।

प्रतापगड किले का संरक्षण कौन करता है, ASI या राज्य?

प्रतापगड का संरक्षण महाराष्ट्र सरकार का पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय करता है, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नहीं। 2025 की विश्व धरोहर सूची के बारह घटकों में यह उन चार किलों में से एक है जो राज्य-संरक्षित हैं।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. प्रतापगड किले के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसे अफजल खान की मौत के बाद शिवाजी की जीत की याद में बनवाया गया था।
2. इसके निर्माण का श्रेय मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले को दिया जाता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (b) प्रतापगड 1656 में, यानी 1659 की मुठभेड़ से तीन साल पहले, मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले ने बनवाया था।

2. भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के 2025 के नामांकन में प्रतापगड को किस श्रेणी में रखा गया है?

उत्तर: (c) प्रतापगड अकेला घटक है जिसे पहाड़ी-वन किला माना गया है; पहाड़ी-पठार किला पन्हाला है।

3. भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस संपत्ति को मानदंड (iv) और (vi) के तहत सूची में शामिल किया गया।
2. इसके सभी बारह घटक महाराष्ट्र में हैं।
3. प्रतापगड का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (a) जिंजी किला तमिलनाडु में है, और प्रतापगड का संरक्षण महाराष्ट्र का पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय करता है।

4. अफजल खान वाली घटना को परखने के लिए जदुनाथ सरकार ने अंग्रेज फैक्ट्री के जिस समकालीन पत्र का इस्तेमाल किया, वह कहाँ लिखा गया था?

उत्तर: (b) 10 दिसंबर 1659 का राजापुर वाला पत्र कहता है कि अफजल खान से दोस्ती का दिखावा करके शिवाजी को काबू में करने को कहा गया था।

5. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. प्रतापगड : सातारा जिला
2. प्रतापगड का भवानी मंदिर : 1661 में समर्पित
3. अफजल खान : मुगल साम्राज्य का सेनापति
ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

उत्तर: (b) अफजल खान बीजापुर की आदिलशाही सल्तनत की सेवा में था, मुगलों की नहीं।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. “प्रतापगड अपनी दीवारों की मोटाई से ज्यादा अपने भू-भाग पर टिका था।” किले की बनावट और उस तक पहुँचने के रास्तों के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  2. 1659 में अफजल खान के मारे जाने से जुड़े स्रोतों का मूल्यांकन कीजिए। बाद में लिखे गए वृत्तांतों को समकालीन दस्तावेजों के सामने तौलने के बारे में यह बहस क्या सिखाती है? (15 अंक, 250 शब्द)
  3. “संग्रहालय का लेबल इतिहास नहीं होता।” 2024 में महाराष्ट्र को उधार दिए गए वाघनख के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. 2025 में भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य को सूची में शामिल करते समय भू-भाग को ही धरोहर माना गया। प्रतापगड का उदाहरण लेते हुए सीरियल नामांकन के महत्व की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  5. भारतीय कला विरासत की सुरक्षा करना इस समय की आवश्यकता है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।