Anantam IASHindi Note · 4 September 2026

रेपो दर: RBI की नीति दर भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे चलाती है

रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर RBI बैंकों को एक दिन का पैसा देता है। रेपो सौदा, 2025 का नरमी वाला दौर, असर नीचे तक पहुँचना, SDF-MSF कॉरिडोर, और EMI पर सीधा असर।

भारत की मौद्रिक नीति में रेपो दर सबसे ताक़तवर आँकड़ा है। यह वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक सरकारी प्रतिभूतियों (G-sec) की ज़मानत पर अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को एक दिन का पैसा उधार देता है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) जब भी बैठती है, बाज़ार और घर-परिवार जिस एलान का इंतज़ार करते हैं वह नई रेपो दर ही है — क्योंकि यही एक आँकड़ा चुपचाप तय कर देता है कि आपके होम लोन की EMI कितनी महँगी होगी, कारोबार कितनी हिम्मत से क़र्ज़ लेंगे, और रुपया डॉलर के सामने कितनी मज़बूती से टिकेगा। दिसंबर 2025 की MPC समीक्षा के मुताबिक़ रेपो दर 5.50 प्रतिशत है, जो 2024 भर बनी रही 6.50 प्रतिशत की ऊँचाई से 2025 के नरमी वाले दौर में कुल 100 बेसिस पॉइंट घटने के बाद यहाँ पहुँची है।

रेपो दर का असल मतलब

“रेपो” शब्द दरअसल “रीपर्चेज़ एग्रीमेंट” यानी दोबारा ख़रीदने के समझौते का छोटा रूप है। रेपो सौदे में बैंक अपनी योग्य सरकारी प्रतिभूतियाँ RBI को बेचता है और साथ ही यह भी तय कर लेता है कि अगले कामकाजी दिन उन्हें थोड़ी ज़्यादा क़ीमत पर वापस ख़रीद लेगा। क़ीमत का यही फ़र्क़, साल भर के हिसाब से प्रतिशत में बदलकर, रेपो दर कहलाता है। क़ानूनी तौर पर यह बेचना-और-वापस-ख़रीदना है; अर्थशास्त्र के लिहाज़ से यह केंद्रीय बैंक से बैंकिंग तंत्र को मिला एक दिन का पूरी तरह गिरवी-सुरक्षित क़र्ज़ है।

इसलिए रेपो दर अर्थव्यवस्था में मिलने वाली सबसे भरोसेमंद रुपया-नक़दी की क़ीमत है — पैसा जो ख़ुद केंद्रीय बैंक देता है, सरकारी काग़ज़ की ज़मानत पर, एक कामकाजी दिन के लिए। क़ानूनी तौर पर उपलब्ध सबसे सस्ता अल्पकालिक केंद्रीय-बैंक पैसा यही है, इसलिए देश की बाक़ी हर ब्याज दर — बैंकों के आपसी कॉल रेट से लेकर कॉरपोरेट बॉन्ड यील्ड तक, MCLR से जुड़े क़र्ज़ से लेकर बाहरी बेंचमार्क वाले होम लोन तक — आख़िरकार इसी के इर्द-गिर्द ख़ुद को ढाल लेती है।

रेपो सौदा, क़दम-दर-क़दम

तरलता समायोजन सुविधा (LAF) की एक आम रेपो नीलामी इस तरह चलती है:

चूँकि पूरा सौदा गिरवी पर टिका है, RBI को क़र्ज़ डूबने का जोख़िम लगभग शून्य रहता है। इसीलिए वह उन बैंकों को भी नीति दर पर उधार दे सकता है जो कुछ समय के लिए दबाव में हों।

2025–26 का रुख़: सोच-समझकर नरमी का दौर

महामारी के बाद की महँगाई की लहर थामने के लिए रेपो दर क़रीब दो साल तक 6.50 प्रतिशत पर टिकी रही। फिर फ़रवरी 2025 में MPC ने 25 bps की कटौती के साथ रुख़ बदला। अप्रैल, जून और अक्टूबर 2025 की आगे की कटौतियों ने दर को 5.50 प्रतिशत पर ला दिया, और रुख़ “उदारता वापस लेने” से “तटस्थ” और आख़िर में “उदार” हो गया — क्योंकि CPI महँगाई 4 प्रतिशत के लक्ष्य की तरफ़ नरम पड़ रही थी और 2025-26 की पहली छमाही में विकास के संकेत कमज़ोर हो रहे थे। समिति बार-बार कहती रही है कि आगे के फ़ैसले आँकड़ों पर टिके रहेंगे, यानी इस पर कि महँगाई टिकाऊ तरीक़े से लक्ष्य के साथ बैठती है या नहीं, और दुनिया भर की ब्याज दरों का माहौल किस तरफ़ जाता है।

नीति का असर नीचे तक पहुँचना

रेपो दर तय कर देना सिर्फ़ पहला क़दम है। असली मुश्किल है असर का नीचे तक पहुँचना (transmission) — यानी नीति का यह संकेत सचमुच उन क़र्ज़ और जमा दरों को हिलाए जो लोगों और कारोबारों के सामने आती हैं। RBI ने इस पूरी पाइपलाइन को सुधारने में दो दशक लगाए हैं।

असर पहुँचने के रास्ते

EBLR की व्यवस्था ने खुदरा क़र्ज़ों में असर पहुँचना बहुत बेहतर कर दिया है: MPC की कटौती अब एक तिमाही के अंदर होम लोन की EMI तक पहुँच जाती है, जबकि 2019 से पहले के MCLR दौर में इसमें 6 से 9 महीने लग जाते थे। महँगाई को लक्ष्य बनाकर चलने की चुनौतियाँ — खाने-पीने की चीज़ों की चिपकी हुई महँगाई, सप्लाई के झटके, राजकोषीय और मौद्रिक नीति का तालमेल — सीधे तय करती हैं कि MPC रेपो दर को कितनी हिम्मत से हिला सकती है।

रेपो दर और रिवर्स रेपो दर

रिवर्स रेपो इसका उल्टा सौदा है। जब बैंकों के पास फ़ालतू नक़दी हो और वे उसे एक रात के लिए किसी सुरक्षित जगह रखना चाहें, तो वे सरकारी प्रतिभूतियों की ज़मानत पर RBI को उधार देते हैं। रिवर्स रेपो दर वही है जो RBI उन्हें चुकाता है। 2022 में RBI ने अपने कॉरिडोर की निचली सीमा पर तय रिवर्स रेपो की जगह स्टैंडिंग डिपॉज़िट फैसिलिटी (SDF) ले आया; पुरानी रिवर्स रेपो दर अब लगभग बेकार पड़ी है।

बातरेपो दररिवर्स रेपो / SDF
पैसा किस तरफ़ बहता हैRBI → बैंकबैंक → RBI
ज़मानतसरकारी प्रतिभूतियाँSDF में कोई नहीं; पुराने रिवर्स रेपो में सरकारी प्रतिभूतियाँ
मक़सदनक़दी डालनानक़दी खींचना
कॉरिडोर में जगहबीच का बिंदु (नीति दर)निचली सीमा (अभी SDF = रेपो − 25 bps)
अभी का स्तर (दिसंबर 2025)5.50%SDF 5.25%, पुरानी रिवर्स रेपो 3.35%

रेपो दर और सीमांत स्थायी सुविधा (MSF)

MSF आपात खिड़की है। जिन बैंकों ने LAF रेपो का अपना कोटा ख़त्म कर लिया हो, वे अपनी SLR प्रतिभूतियों के बदले एक रात का क़र्ज़ ले सकते हैं — यहाँ तक कि क़ानूनी SLR में 2 प्रतिशत अंक तक सेंध लगाकर भी — पर रेपो से ऊँची सज़ा वाली दर पर। अभी MSF दर रेपो + 25 bps = 5.75 प्रतिशत है, और यही नीति कॉरिडोर की ऊपरी सीमा बनाती है। जब नक़दी अचानक तंग हो जाती है, जैसे मार्च के आख़िर में साल बंद होने की भागदौड़ में, तब MSF से उधारी अचानक बढ़ जाती है — यह मुद्रा बाज़ार के दबाव का साफ़ थर्मामीटर है।

नीति दर का कॉरिडोर

भारत की मौद्रिक नीति एक बने-बनाए कॉरिडोर के अंदर चलती है:

कॉरिडोर कितना चौड़ा है, यह RBI का जान-बूझकर दिया गया संकेत है कि वह भारित औसत कॉल दर (WACR) को — जो उसका असली परिचालन लक्ष्य है — रेपो दर के कितने पास बाँधकर रखना चाहता है। 50 bps का तंग कॉरिडोर (जो अभी चल रहा है) बताता है कि RBI नक़दी को सक्रिय रूप से सँभाल रहा है और चाहता है कि कॉल दर लगभग नीति दर के बराबर ही रहे; 100 bps का चौड़ा कॉरिडोर रोज़मर्रा की ज़्यादा उठापटक की छूट देता है। महामारी के दौरान फ़ालतू नक़दी को जगह देने के लिए कॉरिडोर 90 bps तक चौड़ा किया गया, और SDF आने के बाद फिर 50 bps पर सिकोड़ दिया गया। खुले बाज़ार की क्रियाएँ और CRR में बदलाव (देखें नक़द आरक्षित अनुपात) जैसे औज़ार WACR को रेपो से बाँधे रखते हैं।

वेरिएबल रेट रेपो और रिवर्स रेपो

तय दर वाली एक-रात की क्रियाओं के अलावा RBI वेरिएबल रेट रेपो (VRR) और वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) की नीलामियाँ भी करता है, जो 7 दिन, 14 दिन या उससे लंबी मियाद की होती हैं और जिनकी दर बाज़ार तय करता है। नक़दी सँभालने का असली काम अब यही औज़ार करते हैं, जबकि तय दर वाला रेपो धीरे-धीरे सिर्फ़ पीछे खड़ा सहारा बनता जा रहा है। 14 दिन वाला VRR अब मुख्य क्रिया है, हर शुक्रवार होता है, और MPC की दो बैठकों के बीच पूरे तंत्र की नक़दी को बारीकी से सँभालने का यही मुख्य ज़रिया है।

रेपो दर आपके लिए क्यों मायने रखती है

हर तिमाही तीन ठोस रास्तों से यह आम घरों तक पहुँचती है:

सीमाएँ और आलोचनाएँ

रेपो दर कोई जादुई बटन नहीं है। UPSC के GS-3 उत्तरों के लिए तीन बातें अहम हैं:

सामान्य प्रश्न

भारत में अभी रेपो दर क्या है?

दिसंबर 2025 की MPC समीक्षा के मुताबिक़ रेपो दर 5.50 प्रतिशत है। 2025 के नरमी वाले दौर में इसे 6.50 प्रतिशत से कुल 100 बेसिस पॉइंट घटाया गया है।

रेपो दर कौन तय करता है?

छह सदस्यों वाली मौद्रिक नीति समिति, जो संशोधित RBI अधिनियम 1934 के तहत बनी है, बहुमत से रेपो दर तय करती है। MPC की अध्यक्षता RBI गवर्नर करते हैं, और बराबरी की हालत में उनका निर्णायक वोट चलता है।

रेपो दर और बैंक दर में फ़र्क़ क्या है?

रेपो दर रोज़मर्रा की नक़दी के लिए एक रात का गिरवी-सुरक्षित उधार देने की दर है; बैंक दर वह लंबी अवधि की बिना गिरवी वाली दर है जिस पर RBI बिलों को दोबारा भुनाता है। बैंक दर अब MSF दर के बराबर रखी जाती है और ज़्यादातर एक क़ानूनी संदर्भ दर भर रह गई है।

रेपो दर घटने का होम लोन पर क्या असर पड़ता है?

बाहरी बेंचमार्क उधारी दर (EBLR) से जुड़े होम लोन — जो अक्टूबर 2019 से हर फ़्लोटिंग-रेट खुदरा क़र्ज़ के लिए ज़रूरी हैं — MPC के फ़ैसले के तीन महीने के अंदर नई दर पर आ जाते हैं और EMI उसी अनुपात में घट जाती है। पुराने MCLR से जुड़े क़र्ज़ों में यह बदलाव देर से आता है।

नीति दर का कॉरिडोर क्या है?

यह वह दायरा है जिसके अंदर छोटी अवधि की बाज़ार दरें ऊपर-नीचे होती हैं: MSF दर ऊपरी सीमा बनाती है, रेपो दर बीच की नीति दर है, और SDF दर निचली सीमा। अभी यह कॉरिडोर 50 bps चौड़ा है।

SDF क्या है और यह रिवर्स रेपो से कैसे अलग है?

स्टैंडिंग डिपॉज़िट फैसिलिटी अप्रैल 2022 में शुरू हुई, और इसमें बैंक अपनी फ़ालतू रक़म बिना कोई ज़मानत रखे RBI के पास जमा कर सकते हैं। इसने कॉरिडोर की निचली सीमा पर तय रिवर्स रेपो की जगह ली और यह SDF दर चुकाती है (अभी रेपो − 25 bps)।

RBI कभी-कभी रेपो दर को जस का तस क्यों छोड़ देता है?

दर न बदलना यह संकेत है कि MPC कुछ और आँकड़ों का इंतज़ार कर रही है — आम तौर पर तब, जब महँगाई ऊपर-नीचे हो रही हो, विकास की रफ़्तार पर भरोसा न बन रहा हो, या दुनिया के केंद्रीय बैंक ख़ुद बदलाव के दौर में हों। दर रोके रखने से महँगाई की उम्मीदें भी बँधी रहती हैं, और नई दिशा में जाने का वादा भी नहीं करना पड़ता।

क्या अकेली रेपो दर भारत में महँगाई क़ाबू कर सकती है?

नहीं। रेपो दर में बदलाव माँग की तरफ़ से आने वाली महँगाई पर निशाना लगाता है। खाने-पीने और ईंधन की महँगाई, जो भारत की CPI टोकरी का लगभग आधा हिस्सा है, सप्लाई से जुड़ी है और उसके लिए मौद्रिक क़दमों के साथ-साथ राजकोषीय, व्यापार और खेती की नीतियाँ भी चाहिए।