Anantam IASHindi Note · 14 September 2026

यक्षगान: कर्नाटक का नृत्य-नाट्य, तेंकुतिट्टु बनाम बडगुतिट्टु और तालमद्दले

यक्षगान की पूरी तस्वीर: तटीय कर्नाटक और कासरगोड का भागवत के नेतृत्व वाला नृत्य-नाट्य, इसकी दो शैलियाँ, इसके ढोल, तालमद्दले और आज इसकी स्थिति।

यक्षगान तटीय कर्नाटक और उससे लगे केरल के कासरगोड जिले का नृत्य-नाट्य है, जो पूरी रात चलता है। इसमें एक मुख्य गायक, जिसे भागवत कहते हैं, पद्य में लिखा नाटक गाता है। वेशभूषा में सजे अभिनेता उस पर नाचते हैं और फिर अपने संवाद वहीं मौके पर खुद गढ़कर बोलते हैं। इसकी कहानियाँ महाकाव्यों और पुराणों से आती हैं। इस परंपरा में सबसे पुराने कवि, जिनके साथ कोई तारीख जोड़ी जा सकती है, कुंबला के पार्थी सुब्बा हैं, जिनका समय आम तौर पर 1600 के आसपास माना जाता है। 2026 में भारत सरकार की एक विज्ञप्ति ने इस कला को चार सदियों से ज्यादा पुराना बताया। यक्षगान इसलिए अहम है, क्योंकि यह भारत का एक पुराना मंच-रूप है जिसमें अभिनेता आज भी अपने शब्द खुद बनाता है।

ज्यादातर छोटे नोट्स यक्षगान नृत्य को लोक नृत्य के खाने में डालकर वहीं रुक जाते हैं, और इस एक लेबल के साथ तीन गलतियाँ भी चली आती हैं। पहली, यह मुख्य रूप से नृत्य नहीं है, क्योंकि इसमें अभिनेता बोलते हैं और वह बोलना मौके पर गढ़ा जाता है। दूसरी, यह एक ही शैली नहीं है, क्योंकि दक्षिण की तेंकुतिट्टु और उत्तर की बडगुतिट्टु अलग-अलग ढोल और झाँझ इस्तेमाल करती हैं। तीसरी, यह UNESCO की किसी सूची में नहीं है। 2024 की खबर यक्षगान की एक मंडली को सलाहकार के रूप में मान्यता (accreditation) मिलने की थी, कला को सूची में दर्ज (inscription) किए जाने की नहीं। यह नोट इन तीनों बातों को साफ करता है। फिर यह यक्षगान को कथकली के बगल में रखकर देखता है, जो केरल की वह कला है जिससे इसे सबसे आसानी से गड़बड़ा दिया जाता है।

यक्षगान क्या है?

यक्षगान कर्नाटक तट और कासरगोड का पारंपरिक रंगमंच है। यह पूरी रात खुले में खेला जाता है। पीछे गायक-निर्देशक और ढोल बजाने वाले बैठते हैं, और आगे वेशभूषा में सजे अभिनेता रहते हैं। भारत सरकार के 2026 के विवरण में नृत्य और संगीत के साथ इसके घटकों में तात्कालिक संवाद (extempore dialogue) का भी नाम है।

तथ्यविवरण
यह क्या हैगीत, नृत्य और मौके पर गढ़े गए संवाद वाला नृत्य-नाट्य; केरल पर्यटन इसे कर्नाटक और कासरगोड के सबसे अहम लोक रंगमंच रूपों में गिनता है
कहाँतटीय कर्नाटक और केरल का कासरगोड जिला; इसका बैठकर होने वाला रूप, तालमद्दले, मलनाड के पहाड़ी जिलों तक पहुँचता है
नामयक्ष और गान (गीत); सहपीडिया इसका शाब्दिक अर्थ दिव्य संगीत बताता है
भाषाकन्नड़, और संवाद गीतों के ढाँचे के भीतर मौके पर गढ़े जाते हैं
सबसे पुराने नामित कविकासरगोड के कुंबला के पार्थी सुब्बा, जिनका समय आम तौर पर 1600 के आसपास माना जाता है; उनकी तिथियाँ विवादित हैं
नेतृत्व कौन करता हैभागवत, यानी मुख्य गायक, जो रफ्तार तय करता है और प्रदर्शन का निर्देशन करता है
संगीतचंडे (डंडियों से बजने वाला ढोल), मद्दले (हाथों से बजने वाला ढोल), झाँझें और हारमोनियम का लगातार बजता आधार-स्वर
शैलियाँतेंकुतिट्टु (दक्षिण) और बडगुतिट्टु (उत्तर); सहपीडिया बडबडगुतिट्टु (सुदूर उत्तर) भी जोड़ता है
UNESCOकिसी सूची में दर्ज नहीं; केरेमने की एक मंडली को जून 2024 में UNESCO के NGO के रूप में मान्यता मिली

यक्षगान कहाँ से आया

यक्षगान खुले मैदान की कला है, और इसका लिखित रिकॉर्ड लगभग 1600 में, पार्थी सुब्बा के नाटकों के साथ ही पक्का होता है। उससे पहले की हर बात या तो परंपरा है या अनुमान।

नाम में दो शब्द जुड़े हैं। यक्ष, यानी भारतीय मिथकों में उपदेवताओं का एक वर्ग, और गान, यानी गीत। सहपीडिया का प्रदर्शन वाला लेख इसका शाब्दिक अर्थ दिव्य संगीत बताता है। एक ज्यादा सीधा-सादा नाम के. शिवराम कारंत के अध्ययन यक्षगान बयलाट के शीर्षक में बचा हुआ है। बयलाट का मोटा अर्थ है खुले खेत में होने वाला नाटक, और यह कला सचमुच वहीं खेली जाती थी। कर्नाटक पर्यटन बताता है कि सर्दियों की फसल कट जाने के बाद मंडलियाँ गाँव के धान के खेतों में प्रदर्शन करती थीं।

परंपरा जिस पहले नाम के साथ कोई तारीख जोड़ पाती है, वह है पार्थी सुब्बा। उनका जन्म आज के कासरगोड जिले के कुंबला (जिसे कुंबले भी लिखा जाता है) में हुआ था। सहपीडिया उन्हें लगभग 1600 का बताता है और यक्षगान का जनक कहता है। कन्नूर विश्वविद्यालय के कन्नड़ विभाग ने 13 और 14 फरवरी 2020 को उन पर जो राष्ट्रीय संगोष्ठी की, उसमें भी यही उपाधि इस्तेमाल हुई। उनके ज्यादातर ज्ञात नाटक रामायण को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटते हैं, जैसे:

कहानी के ऐसे एक टुकड़े को यक्षगान में प्रसंग कहते हैं, और हर रात का प्रदर्शन आज भी किसी एक प्रसंग पर टिका होता है।

उनकी तिथियाँ ही कमजोर कड़ी हैं। यक्षगान के विद्वान एम. प्रभाकर जोशी भी उन्हें लगभग 1600 में रखते हैं। लेकिन वे साथ में जोड़ते हैं कि उनकी तिथियों पर, और यहाँ तक कि उनके लेखक होने पर भी, काफी विवाद रहा है। एक दूसरी बहस राज्य की सीमा पार कर जाती है। मलयालम साहित्य के इतिहासकार उल्लूर परमेश्वर अय्यर मानते थे कि पार्थी सुब्बा के नाटकों ने रामनाट्टम पर असर डाला। रामनाट्टम कोट्टारक्करा तंपुरान का रामायण-चक्र है, जो कथकली के प्रदर्शन-भंडार की जड़ में है। बाद के विद्वानों, जैसे शिरोमणि कृष्णन नायर, ने इस राय को खारिज कर दिया।

इसलिए सुरक्षित बात यह है: पार्थी सुब्बा यक्षगान के सबसे पुराने प्रसिद्ध कवि हैं, जिनका समय आम तौर पर 1600 के आसपास माना जाता है, और उनकी तिथियाँ विवादित हैं। यह कहना सुरक्षित नहीं है कि उन्होंने यह कला ईजाद की। यक्षगान के जनक सम्मान की एक उपाधि है, कोई जन्म प्रमाणपत्र नहीं। स्रोत यह नहीं दिखाते कि उनसे पहले यह मंच कैसा था।

अगर आपने भक्ति आंदोलन के बारे में पढ़ा है, तो यह ढाँचा जाना-पहचाना लगेगा: महाकाव्यों की कहानियाँ क्षेत्रीय भाषा में उन श्रोताओं के लिए फिर से कही गईं, जिन्हें संस्कृत की जरूरत नहीं थी। रिवीजन में इसे एक मिलती-जुलती मिसाल की तरह इस्तेमाल कीजिए, इसे यक्षगान की साबित उत्पत्ति मत मानिए।

यक्षगान का प्रदर्शन कैसे चलता है

यक्षगान का प्रदर्शन दो टोलियों और एक लिखे हुए पाठ पर चलता है। पीछे बैठे संगीतकार नाटक गाते हैं। आगे खड़े अभिनेता उसे नाचकर दिखाते हैं, और फिर अपने गढ़े हुए गद्य में उस पर बहस करते हैं।

भागवत, हिम्मेला और मुम्मेला

पीछे की पंक्ति हिम्मेला है, जिसका शाब्दिक अर्थ है पीछे की टोली: भागवत और ढोल बजाने वाले। सहपीडिया पारंपरिक मंच का जो वर्णन देता है, उसमें ये लोग पीछे एक ऊँची बेंच पर बैठते हैं। आगे की पंक्ति मुम्मेला है। सहपीडिया इसे अभिनेताओं की वह टोली बताता है जो गीतों का अर्थ खोलती है और उन्हें अभिनय करके दिखाती है।

याद रखने वाला किरदार भागवत है। सहपीडिया उसे वह गायक कहता है जो प्रदर्शन की रफ्तार और उसकी कलात्मक कार्यवाही पर नियंत्रण रखता है। जोशी उसे प्रदर्शन का निर्देशक कहते हैं, यानी वह व्यक्ति जो पद चुनता है और तय करता है कि हर हिस्सा कितनी देर चलेगा। कर्नाटक पर्यटन इस पूरी व्यवस्था को एक वाक्य में समेट देता है: 15 से 20 अभिनेताओं की एक मंडली, और एक भागवत जो सूत्रधार भी है और मुख्य कथावाचक भी।

भागवत को ऐसा संगीत-संचालक (conductor) समझिए जो नाटक के बोल भी खुद गाता हो। रफ्तार और ढाँचे के मामले में यह तुलना ठीक बैठती है। शब्दों पर आकर यह टूट जाती है, क्योंकि जैसे ही वह गाना रोकता है, संवाद अभिनेता के हाथ में चला जाता है। तब भागवत बहस को सिर्फ इतना तय करके मोड़ सकता है कि अगला पद कब शुरू हो।

चंडे, मद्दले और हिम्मेला के बाकी साज

लय दो ढोल संभालते हैं, और दोनों को बजाने का तरीका ही उन्हें अलग करता है:

याद रखने की कुंजी हाथों में है: चंडे के लिए डंडियाँ, मद्दले के लिए हथेलियाँ।

वेश: पोशाक और मेकअप

पोशाक को वेश कहते हैं, और यही शब्द उस भूमिका के प्रकार का भी नाम है जो अभिनेता निभाता है। सहपीडिया पारंपरिक श्रेणियों की सूची देता है, और ज्यादातर दृश्य समझने के लिए उनमें से तीन काफी हैं:

कर्नाटक पर्यटन दो बातें अलग से बताता है, जो पहली बार देखने वाले को याद रह जाती हैं: सिर पर बड़ा मुकुट, और पैरों में पहने जाने वाले बजते मनके, यानी गेज्जे। परंपरा में हर भूमिका पुरुष निभाते थे, स्त्री भूमिकाएँ भी। उसी पेज पर यह भी दर्ज है कि अब महिलाएँ भी यक्षगान मंडलियों का हिस्सा हैं।

प्रसंग और अर्थ: लिखा हुआ नाटक और बोला हुआ नाटक

लिखा हुआ पाठ प्रसंग है, और भागवत उसके पद गाता है। इसके बाद वह हिस्सा आता है जो कथकली में नहीं है: अभिनेता अर्थ में जवाब देता है, यानी मौके पर गढ़े गए गद्य में। केरल पर्यटन कहता है कि संवाद गीतों के ढाँचे के भीतर, कन्नड़ में, तात्कालिक रूप से पेश किए जाते हैं।

एक जाने-पहचाने प्रसंग पर इसे चलाकर देखिए: रामायण में वाली की मौत। भागवत पद गाता है। फिर वाली बना अभिनेता अपने शब्दों में तर्क देता है कि राम ने छिपकर तीर चलाया और उसके साथ अन्याय किया। राम बने अभिनेता को उसी पल जवाब देना होता है। पद तय है। बहस तय नहीं है। इसलिए एक ही प्रसंग खेलने वाली दो मंडलियाँ आपको दो काफी अलग राम दिखा सकती हैं।

मंच और रात

पारंपरिक मंच छोटा और खुला होता है। सहपीडिया इसे 12 फुट चौड़ा और 15 फुट गहरा आयत बताता है, जिसके तीन तरफ दर्शक बैठते हैं। केरल पर्यटन पारंपरिक समय रात 9 बजे से सुबह 6 बजे तक बताता है, खुले आसमान के नीचे। रात की शुरुआत चंडे की तय थापों से होती है, जिन्हें अब्बर या पीटिके कहते हैं। इसके बाद प्रस्तावना, यानी पूर्वरंग, आती है, जिसमें वंदनाएँ होती हैं। फिर बाल कृष्ण और बाल राम बने कलाकार तेज नाच दिखाते हैं, और उसके बाद ही मुख्य कहानी शुरू होती है।

तेंकुतिट्टु और बडगुतिट्टु कैसे अलग हैं

तेंकुतिट्टु यक्षगान की दक्षिणी शैली है और बडगुतिट्टु उत्तरी। कन्नड़ में तेंकु का अर्थ है दक्षिण और बडगु का अर्थ है उत्तर। तिट्टु का अर्थ है शैली, यानी ये नाम दिशाओं के हैं, किसी संस्थापक के नहीं। दोनों का सबसे साफ फर्क उनके ताल-वाद्यों में दिखता है, और दक्षिणी शैली केरल के ज्यादा करीब है।

केरल से याद रखने का एक तरीका मिलता है। मलयालम के तेक्कु और वडक्कु, यानी दक्षिण और उत्तर, इन्हीं द्रविड़ जड़ों से आते हैं। केरल कलामंडलम कथकली वेशम के लिए अलग-अलग तेक्कन और वडक्कन कलरी, यानी प्रशिक्षण शालाएँ, रखता है। सहपीडिया भी यही समानता दिखाता है। लेकिन यह समानता सिर्फ नामों तक है; कथकली का दक्षिणी स्कूल और तेंकुतिट्टु दो अलग चीजें हैं।

शैलीकहाँ, सहपीडिया के अनुसारताल-वाद्य और रूप
तेंकुतिट्टु (दक्षिणी)कासरगोड की चंद्रगिरि नदी से उडुपी की कल्याणपुरम नदी तक; कुंबला इसका मुख्य केंद्र हैजगते और चक्रताल झाँझें, मद्दले और कथकली के चेंडा जैसा चंडे; केरल पर्यटन के अनुसार इसकी पोशाकें कुछ हद तक कथकली से मिलती हैं
बडगुतिट्टु (उत्तरी)उडुपी जिला और वहाँ से उत्तर की ओर उत्तर कन्नड़ तककर्नाटक शैली का चंडे, मद्दले और गुब्बिताल, यानी छोटी और मोटी उँगली-घंटियाँ
बडबडगुतिट्टु (सुदूर उत्तरी)उत्तर कन्नड़ का एकदम उत्तरी छोरसहपीडिया के प्रदर्शन वाले लेख में इसका नाम है; कई छोटे विवरण सिर्फ दो शैलियों से काम चलाते हैं

तीन शैलियाँ कौन-से स्रोत गिनाते हैं? यहाँ इस्तेमाल हुए स्रोतों में सिर्फ सहपीडिया का प्रदर्शन वाला लेख, जो मनोरमा बी. एन. ने लिखा है, बडबडगुतिट्टु का नाम लेता है। सहपीडिया का इतिहास वाला लेख एक दक्षिणी और एक उत्तरी शैली की बात करता है। केरल पर्यटन सिर्फ थेंकुतिट्टु का नाम लेता है, जो उसके अपने जिले की शैली है। दो हिस्सों वाला बँटवारा सुरक्षित आधार है; बडबडगुतिट्टु को उत्तरी शैली के भीतर का एक बारीक उप-विभाजन मानकर लिखिए।

मेला, गुरु और संरक्षक

यक्षगान उन मंडलियों में जिंदा है जिन्हें मेला कहा जाता है, और इस कला की आधुनिक संस्थाएँ इन्हीं के इर्द-गिर्द बढ़ीं। कर्नाटक पर्यटन चार प्रमुख मंडलियों के नाम देता है:

एक मंडली के पास अब अंतरराष्ट्रीय पहचान भी है। उत्तर कन्नड़ के होन्नावर तालुक में केरेमने की श्री इडगुंजी महागणपति यक्षगान मंडली UNESCO के मान्यता-प्राप्त NGO के रजिस्टर में दर्ज है। इसका स्थापना वर्ष इस पर निर्भर करता है कि आप कौन-सा रिकॉर्ड देखते हैं। 2024 की खबरें 1934 बताती हैं, जबकि UNESCO की प्रविष्टि इसके बनने का वर्ष 1988 देती है। इसलिए मंडली की उम्र के बजाय उसका नाम लिखना ज्यादा सुरक्षित है।

इस कला की एक अहम आधुनिक हस्ती कलाकार थी ही नहीं। कन्नड़ उपन्यासकार के. शिवराम कारंत ने यक्षगान बयलाट लिखी, जिसे 1959 में कन्नड़ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। अकादमी इसे लोक-नाट्य पर एक शोध-ग्रंथ के रूप में दर्ज करती है। 1971 में केंद्र सरकार के संस्कृति विभाग की गुरु योजना के तहत उडुपी में यक्षगान केंद्र बना। इसकी नींव कारंत के शोध पर रखी गई, और इस परियोजना के पीछे प्रो. के. एस. हरिदास थे।

इस कला का एक कठपुतली वाला जुड़वाँ रूप भी है। सहपीडिया दर्ज करता है कि माना जाता है, यक्षगान बोंबेयाट की शुरुआत पार्थी सुब्बा के अपने परिवार में हुई थी। उसके अनुसार कासरगोड में कभी करीब 30 धागे वाली कठपुतली मंडलियाँ थीं, और उसके विवरण के समय सिर्फ एक बची थी, जिसे के. वी. रमेश चलाते हैं। ये कठपुतलियाँ और भारत के दूसरे हिस्सों में इनकी बिरादरी की परंपराएँ भारत की कठपुतली और पारंपरिक रंगमंच शैलियाँ वाले नोट में शामिल हैं।

तालमद्दले: बिना पोशाक और नृत्य का यक्षगान

तालमद्दले यक्षगान का वह रूप है जिसमें सिर्फ आवाज बचती है। इसमें भागवत का गायन और ढोल रहते हैं, और बाकी पूरा प्रदर्शन अभिनेताओं की बोली हुई बहस के हवाले होता है, बिना पोशाक और बिना नृत्य के। नाम इसके दो वाद्यों से आया है: ताल यानी झाँझ, और मद्दले ढोल।

जोशी इसकी बैठक सीधे शब्दों में समझाते हैं। भागवत और ढोल बजाने वाले एक सिरे पर बैठते हैं, और उनके सामने कतारों में अर्थधारी, यानी अभिनेता-कथावाचक, बैठते हैं। हर अर्थधारी एक किरदार उठाता है और गाए गए पदों को मौके पर ही नाटकीय गद्य में विस्तार देता है। इस तरह वह चलते-चलते कहानी को फैलाता जाता है। जोशी इसे ऐसा यक्षगान कहते हैं जिसमें सिर्फ बोला हुआ शब्द बचा है, और जो मंदिर के प्रवचन (पुराणप्रवचन) और हरिकथा से भी कुछ लेता है।

कोई इतने बड़े दृश्य-प्रदर्शन को घटाकर सिर्फ बातचीत क्यों बना देगा? जोशी एक व्याख्या बताते हैं: तालमद्दले शायद यक्षगान के बिना पोशाक वाले रिहर्सल के रूप में विकसित हुआ, खास तौर पर बारिश के मौसम में, जब खुले में प्रदर्शन नहीं हो सकते थे। इसे एक सिद्धांत की तरह ही रखिए, क्योंकि वे इसके लिए कोई दस्तावेजी सबूत नहीं देते।

इसका दायरा मंच वाले रूप के तटीय गढ़ से बड़ा है। जोशी इसे तट पर पाते हैं, कासरगोड समेत, और भीतर की ओर शिवमोग्गा और चिक्कमगलूरु जैसे मलनाड जिलों के कुछ हिस्सों में भी।

आज यक्षगान कहाँ खड़ा है

यक्षगान एक जीवित कला है जिसे कर्नाटक दुनिया के सामने पेश करता है। लेकिन यह UNESCO की किसी सूची में दर्ज नहीं है, और संगीत नाटक अकादमी का इसका अपना कोई केंद्र भी नहीं है। मान्यता की तीन परतों को अलग-अलग रखना जरूरी है।

पहली परत UNESCO की है। UNESCO की अमूर्त विरासत सूचियों में भारत की प्रविष्टियों में 2008 में दर्ज दो रंगमंच रूप शामिल हैं, कुटियाट्टम और रामलीला। भारत की सबसे नई प्रविष्टि 2025 में जोड़ी गई दीपावली है। यक्षगान इनमें से किसी सूची में नहीं है। 11 और 12 जून 2024 को UNESCO मुख्यालय में हुए सत्र में इडगुंजी मंडली उन 58 संगठनों में शामिल हुई, जिन्हें अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए 2003 कन्वेंशन के तहत सलाह देने की नई मान्यता मिली। UNESCO के मान्यता-प्राप्त NGO के रजिस्टर में अब इसकी प्रविष्टि है।

सूची में दर्ज होने का मतलब है कि किसी तत्व को, यानी खुद कला को, कोई देश नामांकित करे और फिर UNESCO उसे अपनी सूची में डाले। मान्यता किसी संगठन को कन्वेंशन के निकायों को सलाह देने लायक मानती है। मंडली को दूसरी चीज मिली। कला के पास पहली चीज नहीं है।

दूसरी परत संगीत नाटक अकादमी की है। संस्कृति मंत्रालय ने इसे भारत की अमूर्त विरासत के लिए नोडल केंद्र बनाया है, इसलिए यही नामांकनों का तालमेल करती है और राष्ट्रीय विरासत सूची (National Inventory) रखती है। सितंबर 2026 में प्रकाशित रूप में इस सूची में यक्षगान की कोई प्रविष्टि नहीं है। कुटियाट्टम से तुलना कीजिए। अकादमी ने उसके लिए एक सहायता परियोजना चलाई, UNESCO ने मई 2001 में उसे मानवता की मौखिक और अमूर्त विरासत की उत्कृष्ट कृति घोषित किया, और आज भी उसका अपना कुटियाट्टम केंद्र है। यक्षगान अकादमी की सामान्य मदद पर ही भरोसा कर सकता है, सबसे बढ़कर उसके सालाना पुरस्कारों पर। अकादमी इन पुरस्कारों को कलाकारों को दी जाने वाली सबसे ऊँची राष्ट्रीय मान्यता बताती है।

तीसरी परत राज्य की है। 31 जनवरी 2026 को भारत पर्व में कर्नाटक के कन्नड़ और संस्कृति विभाग ने यक्षगान पेश किया। केंद्र सरकार की विज्ञप्ति ने इसे रात भर चलने वाली ऐसी कला बताया, जो दुनिया भर में कर्नाटक की सांस्कृतिक दूत बनी हुई है।

कला के भीतर तीन बदलाव दर्ज हैं:

हर बदलाव एक सौदा है: एक तरफ दर्शक बनाए रखना, दूसरी तरफ पुराना रूप बचाए रखना। किसी भी प्रमाणपत्र से ज्यादा, यही सौदा आज यक्षगान की असली हालत है।

यक्षगान बनाम कथकली

सबसे छोटा जवाब: यक्षगान में अभिनेता बोलते हैं, कथकली में नहीं बोलते। यह एक फर्क पक्का हो जाए, तो बाकी ज्यादातर फर्क याद रखना आसान हो जाता है।

दोनों एक जैसे दिखते हैं, और इसकी वजह है। स्रोत मेल के तीन बिंदु बताते हैं:

अब देखिए दोनों कहाँ अलग होते हैं। इसके लिए केरल कलामंडलम का कथकली के बारे में अपना विवरण लिया गया है; पूरी तस्वीर कथकली वाले नोट में है।

बिंदुयक्षगानकथकली
घरतटीय कर्नाटक और कासरगोडकेरल
शब्द कौन बोलता हैभागवत पद गाता है; फिर अभिनेता मौके पर गढ़ा गद्य (अर्थ) बोलते हैंअभिनेताओं के पीछे खड़े दो गायक पाठ गाते हैं; अभिनेता बोलते नहीं
पाठकन्नड़ प्रसंगअट्टकथा: संस्कृत से भरे श्लोकम और मलयालम में पदम
दर्शक तक बात कैसे पहुँचती हैगीत, नृत्य और बोली गई बहसहस्तलक्षणदीपिका की 24 मूल मुद्राओं पर टिकी हाथ के इशारों की भाषा
मुख्य ढोलचंडे और मद्दलेचेंडा और मद्दलम
किरदारों के प्रकारराज वेश, बण्णद वेश, स्त्री वेश और दूसरेपच्चा, कत्ती, ताडी, मिनुक्कु और पझुप्पु
शुरुआती नामित लेखकपार्थी सुब्बा, लगभग 1600, तिथियाँ विवादितकोट्टारक्करा तंपुरान, जिनका रामनाट्टम चक्र कथकली के प्रदर्शन-भंडार की शुरुआत करता है

एक और फर्क मंच से बाहर है। केरल कलामंडलम कथकली को एक शास्त्रीय कला रूप कहता है, और इसे भारत के शास्त्रीय नृत्य रूपों में गिना जाता है। दूसरी तरफ कर्नाटक पर्यटन और केरल पर्यटन, दोनों यक्षगान को लोक कला बताते हैं।

परीक्षा के लिए यक्षगान कैसे पढ़ें

यक्षगान GS पेपर I के भारतीय संस्कृति वाले हिस्से में आता है, जिसमें कला रूपों के मुख्य पहलू शामिल हैं। प्रीलिम्स में यह कला और संस्कृति वाले हिस्से का विषय है। Anantam IAS का प्रीलिम्स प्रश्न बैंक 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 94 को कला और संस्कृति में रखता है, और आप इन्हें प्रीलिम्स के पिछले वर्षों के प्रश्नों के बैंक में हल कर सकते हैं।

इस बैंक में मुख्य परीक्षा का कोई भी प्रश्न यक्षगान का नाम नहीं लेता। यह कला बड़े प्रश्नों के भीतर एक उदाहरण बनकर अंक दिलाती है। मुख्य परीक्षा 2017, GS पेपर I में पूछा गया था: “भारत की विविधता के संदर्भ में, क्या यह कहा जा सकता है कि राज्यों के बजाय क्षेत्र सांस्कृतिक इकाइयाँ बनाते हैं? अपने दृष्टिकोण के पक्ष में उदाहरणों के साथ कारण बताइए।” तटीय कर्नाटक और केरल के कासरगोड जिले में साझा एक नृत्य-नाट्य, जिसकी दक्षिणी शैली का केंद्र केरल का एक कस्बा है, ठीक वैसा उदाहरण है जिस पर यह प्रश्न अंक देता है।

ये सात तथ्य तब तक दोहराइए, जब तक बिना जोर लगाए याद न आने लगें:

चार उलझनें अंक कटवाती हैं, और हर एक का इलाज एक लाइन में है:

यक्षगान को एक बार इसके भाई-बहनों के बगल में रख दीजिए, और नक्शा दिमाग में बैठ जाएगा:

कलाकहाँयाद रखने वाली बात
यक्षगानतटीय कर्नाटक और कासरगोडभागवत गाता है; अभिनेता संवाद खुद गढ़ते हैं
तालमद्दलेवही क्षेत्र, भीतर मलनाड तकबैठकर; न पोशाक, न नृत्य
कथकलीकेरलअभिनेता चुप; गायक गाते हैं; 24 मूल हस्त मुद्राएँ
कुटियाट्टमकेरलसंस्कृत रंगमंच; 2001 में UNESCO की उत्कृष्ट कृति
चिंदु यक्षगानमतेलंगानाएक अलग कला; 2024 में गद्दम सम्मैया को पद्म श्री

राज्यवार नक्शे के लिए, जो यक्षगान को बाकी कलाओं के साथ रखता है, राज्यों के अनुसार शास्त्रीय और लोक नृत्यों की सूची देखिए। और साल-दर-साल कला और संस्कृति के प्रश्न कैसे आए हैं, यह जानने के लिए कला और संस्कृति के प्रीलिम्स प्रश्नों का विश्लेषण पढ़िए।

यक्षगान इतना छोटा विषय है कि एक बैठक में पूरा हो जाए, और इसका फायदा इसके अपने प्रश्न से कहीं आगे तक जाता है। जो अभ्यर्थी समझा सके कि किसी मंडली को मिली UNESCO मान्यता सूची में दर्ज होना क्यों नहीं है, या कासरगोड की एक कला राज्य की सीमा को क्यों नहीं मानती, उसके पास एक तैयार उदाहरण है। यह उदाहरण क्षेत्रीय संस्कृति और जीवित विरासत के संरक्षण, दोनों तरह के उत्तरों में काम आता है। इसे राज्यवार सूची की एक पंक्ति की तरह नहीं, एक पूरी व्यवस्था की तरह सीखने का यही फायदा है।

सामान्य प्रश्न

यक्षगान क्या है?

यक्षगान तटीय कर्नाटक और केरल के कासरगोड जिले का पारंपरिक नृत्य-नाट्य है। इसमें भागवत नाम का मुख्य गायक पद्य में लिखा नाटक गाता है, और वेशभूषा में सजे अभिनेता उस पर नाचते हैं और कन्नड़ में मौके पर गढ़े संवाद बोलते हैं। परंपरा में इसके प्रदर्शन खुले में पूरी रात चलते थे।

यक्षगान किस राज्य का है?

यक्षगान मुख्य रूप से कर्नाटक के तटीय जिलों का है, लेकिन केरल के कासरगोड जिले में भी यह उतना ही अपना है। यक्षगान के जनक कहे जाने वाले पार्थी सुब्बा का जन्म कासरगोड के कुंबला में हुआ था। इसका बैठकर होने वाला रूप, तालमद्दले, भीतर मलनाड तक भी पहुँचता है।

क्या यक्षगान शास्त्रीय नृत्य है?

नहीं। कर्नाटक पर्यटन और केरल पर्यटन, दोनों इसे लोक कला बताते हैं। लोग भले इसे यक्षगान नृत्य कहें, इसे नृत्य से ज्यादा पारंपरिक रंगमंच समझना बेहतर है, क्योंकि इसके अभिनेता बोलते हैं। कथकली, यानी केरल का वह नृत्य-नाट्य जिससे इसकी अक्सर तुलना होती है, वह कला है जिसे केरल कलामंडलम शास्त्रीय कला रूप कहता है।

तेंकुतिट्टु और बडगुतिट्टु में क्या अंतर है?

तेंकुतिट्टु दक्षिणी शैली है। इसका केंद्र कुंबला है, यह कासरगोड से उडुपी के पास तक फैली है, और इसमें केरल जैसा चंडे और बड़ी झाँझें बजती हैं। बडगुतिट्टु उडुपी और उत्तर कन्नड़ की उत्तरी शैली है, जिसमें कर्नाटक शैली का चंडे और छोटी उँगली-घंटियाँ होती हैं। सहपीडिया सुदूर उत्तर की एक बडबडगुतिट्टु शैली का भी नाम लेता है।

यक्षगान में भागवत कौन होता है?

भागवत मुख्य गायक है, जो प्रदर्शन का निर्देशन भी करता है। वह प्रसंग के पद गाता है और तय करता है कि हर हिस्सा कितनी देर चलेगा। उसके गीतों के बीच अभिनेता अपने संवाद मौके पर गढ़ते हैं।

तालमद्दले क्या है?

तालमद्दले बिना पोशाक और बिना नृत्य का यक्षगान है। भागवत और ढोल बजाने वाले एक सिरे पर बैठते हैं, और बैठे हुए अभिनेता-कथावाचक, जिन्हें अर्थधारी कहते हैं, गीतों को तात्कालिक गद्य में बदलते हैं। इसका नाम इसके दो वाद्यों से आया है, ताल और मद्दले।

क्या यक्षगान UNESCO की अमूर्त विरासत सूची में है?

नहीं। UNESCO की सूचियों में भारत की प्रविष्टियों में कुटियाट्टम और रामलीला हैं, लेकिन यक्षगान नहीं। जून 2024 में केरेमने की इडगुंजी महागणपति यक्षगान मंडली को 2003 कन्वेंशन के तहत NGO के रूप में मान्यता मिली, और यह सूची में दर्ज होने से अलग बात है।

यक्षगान के जनक किसे कहा जाता है?

कासरगोड जिले के कुंबला में जन्मे कवि पार्थी सुब्बा को यक्षगान का जनक कहा जाता है। उनका समय आम तौर पर 1600 के आसपास माना जाता है, हालाँकि उनकी तिथियाँ और उनके लेखक होने के कुछ दावे अब भी विवादित हैं। उनके नाटक रामायण के प्रसंगों को फिर से कहते हैं, जैसे पंचवटी और वालिवधे।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. यक्षगान के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भागवत मुख्य गायक है, जो प्रदर्शन का निर्देशन भी करता है। 2. इसके अभिनेता चुप रहते हैं, जबकि गायक पूरा पाठ गाते हैं। 3. तालमद्दले बैठकर, बिना पोशाक और नृत्य के किया जाने वाला रूप है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (b) कथन 2 कथकली का वर्णन है; यक्षगान के अभिनेता अर्थ नाम का तात्कालिक संवाद बोलते हैं।

2. यक्षगान के शब्दों और उनके अर्थों के निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. चंडे : दो डंडियों से बजने वाला ढोल 2. मद्दले : दोनों हाथों से बजने वाला ढोल 3. मुम्मेला : पीछे बैठे संगीतकार। ऊपर दिए गए युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?

उत्तर: (b) मुम्मेला आगे खड़े अभिनेताओं की टोली है; पीछे बैठे संगीतकार हिम्मेला बनाते हैं।

3. यक्षगान की शैलियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. तेंकुतिट्टु दक्षिणी शैली है, जिसका मुख्य केंद्र कासरगोड जिले का कुंबला है। 2. बडगुतिट्टु उत्तरी शैली है, जो उडुपी जिले से उत्तर की ओर मिलती है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

उत्तर: (c) तेंकु का अर्थ दक्षिण और बडगु का अर्थ उत्तर है, और सहपीडिया तेंकुतिट्टु का मुख्य केंद्र कुंबला बताता है।

4. 2024 में कर्नाटक की श्री इडगुंजी महागणपति यक्षगान मंडली खबरों में थी, क्योंकि उसे

उत्तर: (b) मान्यता संगठनों को दी जाती है; खुद यक्षगान UNESCO की किसी सूची में दर्ज नहीं है।

5. निम्नलिखित में से किसे यक्षगान का जनक कहा जाता है?

उत्तर: (b) कुंबला के पार्थी सुब्बा का समय आम तौर पर 1600 के आसपास माना जाता है; कारंत ने इस कला का अध्ययन किया, और कोट्टारक्करा तंपुरान ने कथकली का रामनाट्टम लिखा।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. भारतीय कला विरासत का संरक्षण इस समय की जरूरत है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।
  2. यक्षगान के अभिनेता बोलते हैं, जबकि कथकली के अभिनेता नहीं बोलते। इस अंतर को आधार बनाकर समझाइए कि भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट की ये दो नृत्य-नाट्य परंपराएँ पाठ, संगीत और तकनीक में कैसे अलग हैं। (10 अंक, 150 शब्द)
  3. “तालमद्दले दिखाता है कि यक्षगान जितनी देखने की कला है, उतनी ही बहस की भी।” परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. छोटे होते प्रदर्शन, रटे हुए संवाद और बदलते दर्शक यक्षगान जैसी पारंपरिक रंगमंच शैलियों को नया रूप दे रहे हैं। चुनौतियों पर चर्चा कीजिए और ऐसी जीवित परंपराओं के संरक्षण के उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
  5. UNESCO की अमूर्त विरासत सूचियों में किसी तत्व के दर्ज होने और 2003 कन्वेंशन के तहत किसी NGO की मान्यता के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। यक्षगान को एक उदाहरण के रूप में लेते हुए परीक्षण कीजिए कि इसे सूची में दर्ज कराने के लिए भारत को क्या करना होगा। (15 अंक, 250 शब्द)