चौरी चौरा कांड 1922: वह दिन जब गांधी ने असहयोग आंदोलन रोक दिया
4 फ़रवरी 1922 को गोरखपुर के चौरी चौरा में भीड़ ने थाना जला दिया और 22 पुलिसवाले मारे गए। आठ दिन में गांधी ने बारदोली में असहयोग आंदोलन रोक दिया।
1920 से 1922 तक चला असहयोग आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश भर में पहला जन आंदोलन था। वकीलों ने वकालत छोड़ दी। छात्र सरकारी कॉलेजों से बाहर निकल आए। विदेशी कपड़े के ढेर लगाकर सरेआम जलाए गए। शराब की दुकानों पर धरनों ने दर्जनों ज़िलों में सरकार की कमाई बंद कर दी। 1922 की शुरुआत तक औपनिवेशिक प्रशासन सचमुच परेशान था।
फिर 4 फ़रवरी 1922 को संयुक्त प्रांत के गोरखपुर ज़िले के एक छोटे-से क़स्बे चौरी चौरा में स्वयंसेवकों और किसानों की भीड़ ने थाने पर हमला कर दिया, क्योंकि पुलिस ने उनके जुलूस पर गोली चलाई थी। जलते हुए थाने में बाईस पुलिसवाले और तीन आम लोग मारे गए। आठ दिन के भीतर गांधी ने बारदोली में आंदोलन रोक दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने वह सबसे अच्छा मौक़ा गँवा दिया, जिससे अंग्रेज़ों को 1947 से एक पीढ़ी पहले बाहर किया जा सकता था।
यह लेख चौरी चौरा कांड को उसी तरह पढ़ता है जैसे UPSC मुख्य परीक्षा का परीक्षक पढ़वाना चाहता है। इसमें 4 फ़रवरी तक की तैयारी है, उस दिन की घटनाएँ हैं, बारदोली में गांधी का विवादित फ़ैसला है, और उसके बाद इतिहास लेखन में चली लंबी बहस है।
एक नज़र में ज़रूरी बातें

- तारीख़: 4 फ़रवरी 1922
- जगह: चौरी चौरा, गोरखपुर ज़िला, संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश)
- आंदोलन: असहयोग आंदोलन, जिसे गांधी ने 1920 में शुरू किया
- तात्कालिक वजह: स्वयंसेवक दल के जुलूस पर पुलिस की गोलीबारी
- मौतें: 22 पुलिसवाले और 3 आम लोग मारे गए; थाना जलकर राख हो गया
- गांधी का जवाब: 5 फ़रवरी से पाँच दिन का प्रायश्चित उपवास
- बारदोली प्रस्ताव: कांग्रेस कार्य समिति ने 12 फ़रवरी 1922 को पास किया
- आंदोलन की स्थिति: बारदोली में औपचारिक रूप से रोक दिया गया
- गांधी की गिरफ़्तारी: 10 मार्च 1922 को धारा 124-ए के तहत
- सज़ा: छह साल की क़ैद, बाद में 1924 में सेहत के आधार पर जल्दी रिहाई
- पहला फ़ैसला: सत्र न्यायालय (गोरखपुर) ने 172 लोगों को फाँसी की सज़ा सुनाई
- आख़िरी फ़ैसला: इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील के बाद 19 को फाँसी और 110 को काला पानी
- स्मारक: 1973 में उसी जगह शहीद स्मारक का उद्घाटन
4 फ़रवरी 1922 को हुआ क्या था
4 फ़रवरी 1922 की सुबह क़रीब 2,500 से 3,000 असहयोग स्वयंसेवक और स्थानीय किसान चौरी चौरा के बाज़ार में जमा हुए। तात्कालिक शिकायत मांस के ऊँचे दाम और मिट्टी के तेल की बढ़ती क़ीमत थी। पुरानी शिकायत तीन दिन पहले स्थानीय पुलिस से हुई भिड़ंत थी। 1 फ़रवरी को हेड कांस्टेबल गुप्तेश्वर सिंह ने भगवान अहीर को पीटा था, जो शराबबंदी का धरना चला रहे एक स्वयंसेवक नेता थे। भगवान अहीर ने स्थानीय थाने में शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ।
जुलूस दोपहर क़रीब 1:30 बजे थाने के आगे से गुज़रा। दारोगा ने, जो थानेदार था, भीड़ हटाने के लिए पुलिस को गोली चलाने का हुक्म दिया। स्वयंसेवक नारे लगाते रहे और हटने से इनकार कर दिया। पहली ही गोलियों में तीन प्रदर्शनकारी मारे गए और कई घायल हुए।
इसके बाद जो हुआ, उसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। भीड़ पलटकर आगे बढ़ी, थाने को घेर लिया और आग लगा दी। बाईस पुलिसवाले और एक चौकीदार अंदर फँस गए। थाने की इमारत, जो उस वक़्त फूस की छत और ईंट के बरामदे वाली थी, जलकर राख हो गई। शाम ढलते-ढलते तीन आम लोग, बाईस पुलिसवाले और एक चौकीदार मारे जा चुके थे।
पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
असहयोग आंदोलन सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में शुरू हुआ था और दिसंबर 1920 में नागपुर में औपचारिक मंज़ूरी मिली थी। इसके कार्यक्रम के तीन मुख्य खंभे थे। पहला, सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों और विधान परिषदों का बहिष्कार। दूसरा, विदेशी माल का बहिष्कार। तीसरा, एक वैकल्पिक राष्ट्रीय ढाँचा खड़ा करना, जिसमें राष्ट्रीय स्कूल, पंचायती अदालतें और खादी का उत्पादन शामिल था।
हिंसा क्यों भड़की
किताबी जवाब यह है कि चौरी चौरा भीड़ की एक इकलौती हिंसक हरकत थी, जिसे गांधी अपने कड़े अहिंसा के उसूल के चलते बर्दाश्त नहीं कर सके। असलियत इससे ज़्यादा परतदार है।
इतिहासकार शाहिद अमीन ने अपनी किताब “इवेंट, मेटाफ़र, मेमोरी: चौरी चौरा 1922 टु 1992” में स्थानीय शिकायतों का ब्योरा दर्ज किया है। चौरी चौरा के आसपास गोरखपुर के गाँवों का स्थानीय पुलिस से टकराव पुराना था। युद्ध के सालों में गन्ने के दाम गिर चुके थे। कपड़े के दाम चढ़ गए थे। चौरी चौरा के दारोगा की रिश्वत वसूलने की अपनी बदनामी थी। असहयोग आंदोलन के दौरान खड़ा हुआ स्वयंसेवक दल ही वह इकलौती चीज़ थी जो स्थानीय पुलिस की ज़्यादती पर लगाम लगा पाती थी।
1 फ़रवरी को जब भगवान अहीर को पीटा गया और बेइज़्ज़त किया गया, तो स्वयंसेवक दल ने तय किया कि थाने तक जुलूस निकालकर कार्रवाई की माँग की जाए। 4 फ़रवरी का जुलूस कोई अचानक जुटी भीड़ नहीं था। वह स्वयंसेवक दल का अनुशासित प्रदर्शन था। जब पुलिस ने गोली चलाई, तो भीड़ ने इसे अधिकार का जायज़ इस्तेमाल नहीं, बल्कि पुलिस की उसी पुरानी ज़्यादती का अगला क़दम समझा। थाना जलाना उस इलाक़े के अपने मुहावरे में जनता का इंसाफ़ था।
गांधी का पाँच दिन का उपवास और बारदोली प्रस्ताव

चौरी चौरा की ख़बर गांधी तक 5 फ़रवरी को पहुँची। वे साबरमती आश्रम में थे और गुजरात के बारदोली से सामूहिक सविनय अवज्ञा का नया दौर शुरू करने की तैयारी कर रहे थे। बारदोली का अभियान असहयोग आंदोलन की दूसरी लहर बनना था, जो नमक के एकाधिकार और भू-राजस्व व्यवस्था को खुली चुनौती देता।
गांधी हिल गए। अगले ही दिन उन्होंने पाँच दिन का प्रायश्चित उपवास शुरू कर दिया। उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति को लिखा कि आंदोलन अपने स्वयंसेवकों के नैतिक अनुशासन से आगे निकल गया है। उन्होंने 11 और 12 फ़रवरी 1922 को बारदोली में कार्य समिति की आपात बैठक बुलाई। कार्य समिति ने वह प्रस्ताव पास किया जिसे आज बारदोली प्रस्ताव कहते हैं। इस प्रस्ताव ने सारी सविनय अवज्ञा, सारे धरने और अधिकार की हर अवहेलना रोक दी। रचनात्मक काम चलता रहा, जिसमें चरखा, खादी और हिंदू-मुस्लिम एकता शामिल थे।
कांग्रेस के भीतर प्रतिक्रिया ग़ुस्से भरी थी। मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, लाला लाजपत राय और सुभाष चंद्र बोस — सबने इस रोक का विरोध किया। कलकत्ता की जेल से लिखते हुए सी.आर. दास ने कहा कि गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल की है। सुभाष बोस ने बाद में बारदोली के फ़ैसले को “राष्ट्रीय आपदा” बताया। मोतीलाल नेहरू और सी.आर. दास आख़िरकार गांधीवादी कार्यक्रम से अलग हो गए और विधान परिषदों में जाने के लिए स्वराज पार्टी बना ली।
गहराई से: क्या बारदोली का फ़ैसला सही था
बारदोली के सवाल पर तीन नज़रिए हैं, और UPSC मुख्य परीक्षा के जवाब में तीनों रखने चाहिए।
पहला गांधीवादी नज़रिया है। गांधी मानते थे कि करोड़ों का आंदोलन एक भी सामूहिक हिंसा बर्दाश्त कर ले तो स्वराज का नैतिक आधार ही चला जाएगा। उनका कहना था कि हिंसक आज़ादी की लड़ाई हिंसक आज़ाद भारत ही देगी। उन्होंने चौरी चौरा से सीधे उस लंबी सांप्रदायिक हिंसा तक लकीर खींची जिसका उन्हें डर था। बारदोली की रोक ने आंदोलन की नैतिक पूँजी आगे के लिए बचा ली।
दूसरा बोस और बिपन चंद्र वाला ऐतराज़ है। आंदोलन ने औपनिवेशिक सरकार पर ज़बरदस्त दबाव बना लिया था। सरकारी कॉलेजों में दाख़िले गिर गए थे। कई ज़िलों में लगान की वसूली नाकाम हो रही थी। विदेशी कपड़े का आयात धड़ाम हो चुका था। सबसे ज़्यादा दबाव वाले वक़्त पर, एक ही घटना के आधार पर आंदोलन रोक देना रणनीतिक बढ़त फेंक देना था। 1930 से 1970 के दशक तक भारतीय इतिहासकार मोटे तौर पर यही मानते रहे।
तीसरा सबाल्टर्न ऐतराज़ है, जो शाहिद अमीन और सबाल्टर्न स्टडीज़ समूह से जुड़ा है। इस पाठ का तर्क है कि गांधी का फ़ैसला इस वर्गीय बेचैनी से निकला था कि आंदोलन किसान स्वयंसेवकों के हाथ में जा रहा है। चौरी चौरा ने दिखा दिया कि आम गाँव वाले अब कांग्रेस की इजाज़त का इंतज़ार करना छोड़ चुके हैं। बारदोली का फ़ैसला जन-राजनीति को वापस पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय नेतृत्व की निगरानी में लाने की कोशिश थी।
तीनों पाठ अपनी जगह ठीक हैं। संतुलित जवाब आम तौर पर यह कहता है कि गांधी का नैतिक तर्क और बोस का रणनीतिक ऐतराज़, दोनों आंशिक रूप से सही हैं, जबकि सबाल्टर्न पाठ उस वर्गीय बेचैनी को समझाता है जो असली तो थी, लेकिन निर्णायक नहीं थी।
मुक़दमा और इलाहाबाद का फ़ैसला
औपनिवेशिक प्रशासन ने तेज़ी से क़दम उठाए। फ़रवरी 1922 ख़त्म होते-होते 225 गाँव वाले गिरफ़्तार हो चुके थे। गोरखपुर के सत्र न्यायालय ने 1922 भर चले लंबे मुक़दमे में 172 अभियुक्तों को फाँसी की सज़ा सुनाई। औपनिवेशिक पैमानों से भी ये सज़ाएँ असाधारण थीं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अप्रैल 1923 में जस्टिस थियोडोर पिगॉट के सामने अपील सुनी। अदालत ने फाँसी की सज़ाएँ भारी मात्रा में घटा दीं। आख़िर में 19 अभियुक्तों को 2 जुलाई 1923 को फाँसी दी गई। 110 को उम्र क़ैद के लिए अंडमान भेजा गया। बाक़ी को कम सज़ाएँ मिलीं।
बचाव पक्ष की अगुवाई मदन मोहन मालवीय ने की, जिन्होंने एक पैसा फ़ीस नहीं ली। पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उनकी मदद की। भारतीय क़ानूनी इतिहास में यह अपील बड़े पैमाने के सबसे शुरुआती राजनीतिक बचाव मुक़दमों में थी, और इसने राष्ट्रवादी वकीलों की एक पूरी पीढ़ी को तैयार किया।
तुलना: चौरी चौरा और बाद के जन आंदोलन

चौरी चौरा की मिसाल ने बाद के हर गांधीवादी जन आंदोलन को गढ़ा। 1930 का नमक सत्याग्रह इतनी बारीक़ी से गढ़ा गया, तो ठीक इसीलिए कि गांधी ने चौरी चौरा से सबक़ लिया था। दांडी मार्च की शुरुआती यात्रा में सिर्फ़ अठहत्तर आश्रमवासियों का छोटा और अनुशासित दल था, और जनता की भागीदारी दांडी पहुँचने के बाद ही बढ़ी। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन अलग कहानी थी। गांधी को अंदाज़ा था कि उनकी गिरफ़्तारी के बाद सामूहिक हिंसा होगी, और उन्होंने इसे चुकाने लायक़ क़ीमत मान लिया, क्योंकि रणनीतिक घड़ी आख़िरकार आ चुकी थी।
असली बात यही है। चौरी चौरा के बाद गांधी ने सामूहिक अहिंसा के नैतिक सवाल को हालात के हिसाब से देखा, हर हाल में एक जैसा नहीं। उन्होंने एक आंदोलन रोका और दूसरा क़बूल किया। यह बदलाव उस एकरूपता से ज़्यादा अहम है।
दिक़्क़तें और लंबा असर
असहयोग रोकने के कई नतीजे निकले।
कांग्रेस स्वराजवादियों और नो-चेंजर्स में बँट गई। मोतीलाल नेहरू और सी.आर. दास की अगुवाई में स्वराजवादी 1923 से विधान परिषदों में गए, ताकि उन्हें भीतर से ही ठप कर सकें। वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद की अगुवाई में नो-चेंजर्स ने गाँवों के रचनात्मक काम पर ध्यान दिया। पार्टी 1920 के दशक के आख़िर तक दोबारा एक नहीं हुई।
ख़िलाफ़त का गठबंधन बिखर गया। मार्च 1924 में कमाल अतातुर्क ने उस्मानी ख़िलाफ़त ख़त्म कर दी। ख़िलाफ़त का मुद्दा अपना आधार खो बैठा। 1920 से 1922 के बीच बना हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक पुल कमज़ोर पड़ गया। 1923 से 1925 के बीच मुल्तान, अमृतसर और अलीगढ़ जैसे शहरों में सांप्रदायिक दंगे बढ़े।
क्रांतिकारी राजनीति फिर ज़िंदा हो गई। 1923 की चौरी चौरा वाली 19 फाँसियों ने क्रांतिकारी भर्ती की लहर पैदा कर दी। अक्तूबर 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बनी, 1925 में काकोरी षड्यंत्र हुआ, और 1920 के दशक के आख़िर में भगत सिंह की मंडली उभरी। बारदोली की रोक ने आज़ादी की लड़ाई को अहिंसक नहीं बनाया था। उसने बस हिंसक धारा को भूमिगत कर दिया था।
प्रीलिम्स पॉइंटर्स
- चौरी चौरा आज के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले में है।
- घटना 4 फ़रवरी 1922 को हुई।
- 22 पुलिसवाले और 3 आम लोग मारे गए।
- गांधी ने 12 फ़रवरी 1922 को कांग्रेस कार्य समिति के बारदोली अधिवेशन में असहयोग आंदोलन रोक दिया।
- बारदोली गुजरात में है, उत्तर प्रदेश में नहीं; प्रस्ताव का नाम बैठक की जगह पर पड़ा।
- गांधी ने 5 फ़रवरी 1922 से पाँच दिन का प्रायश्चित उपवास किया।
- गांधी 10 मार्च 1922 को गिरफ़्तार हुए और उन्हें छह साल की क़ैद की सज़ा मिली।
- 225 अभियुक्तों का मुक़दमा गोरखपुर सत्र न्यायालय में चला।
- इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील के बाद 19 अभियुक्तों को 2 जुलाई 1923 को फाँसी दी गई।
- बचाव की अपील की अगुवाई मदन मोहन मालवीय और गोविंद बल्लभ पंत ने की।
- चौरी चौरा में शहीद स्मारक का उद्घाटन 1973 में हुआ।
मुख्य परीक्षा के प्रश्न
- “चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन रोकने का गांधी का फ़ैसला उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी ग़लती थी।” आलोचनात्मक जाँच कीजिए। (GS पेपर I, 15 अंक)
- 4 फ़रवरी 1922 की चौरी चौरा की घटनाओं के ख़ास संदर्भ में असहयोग आंदोलन में किसान स्वयंसेवकों की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (GS पेपर I, 15 अंक)
- चौरी चौरा कांड ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन, दोनों को बदल दिया। विश्लेषण कीजिए। (GS पेपर I, 10 अंक)
- “1922 का बारदोली प्रस्ताव नैतिक फ़ैसला कम और वर्गीय फ़ैसला ज़्यादा था।” असहयोग आंदोलन के सबाल्टर्न पाठ के आलोक में चर्चा कीजिए। (निबंध / GS पेपर I, 10 अंक)
विरासत और आगे का रास्ता
भारत सरकार ने 1973 में चौरी चौरा में शहीद स्मारक बनवाया। यह जगह अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत श्रेणी-ए का संरक्षित स्मारक है। उत्तर प्रदेश सरकार हर 4 फ़रवरी को चौरी चौरा शताब्दी दिवस मनाती है। 2021 और 2022 में उसने साल भर चलने वाला शताब्दी कार्यक्रम भी चलाया।
बड़ा काम इतिहास लेखन का है। 1923 में फाँसी चढ़े 19 गाँव वालों को दशकों तक स्वतंत्रता सेनानी नहीं, आम अपराधी माना जाता रहा। भारत सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में औपचारिक मान्यता 1973 में दी, यानी फाँसी के पचास साल बाद। उनके परिवारों को इसके तुरंत बाद स्वतंत्रता सेनानी पेंशन मिली। उन 19 नामों की पूरी सूची उत्तर प्रदेश राज्य अभिलेखागार ने छापी है और वह अब असहयोग आंदोलन के मानक संदर्भ सामग्री का हिस्सा है।
चौरी चौरा कांड को महात्मा गांधी के पूरे सफ़र के साथ पढ़िए तो साफ़ हो जाता है कि 1920 और 1930 के दशकों में अहिंसक जन-राजनीति कैसे बदली। 1922 से 1928 के साइमन कमीशन विरोध और वहाँ से 1930 के दांडी मार्च तक जाने वाली लकीर असल में वह लंबी बहस है, जो कांग्रेस ख़ुद अपने भीतर कर रही थी — जन आंदोलन ऐसे कैसे चलाया जाए कि वह हाथ से न निकले। गांधी के फ़ैसलों की तुलना भगत सिंह वाली समानांतर क्रांतिकारी धारा से करना मुख्य परीक्षा की तैयारी का सबसे फ़ायदेमंद अभ्यास है।
सामान्य प्रश्न
4 फ़रवरी 1922 को चौरी चौरा में क्या हुआ था?
असहयोग आंदोलन के क़रीब 2,500 से 3,000 स्वयंसेवकों और स्थानीय किसानों का जुलूस गोरखपुर ज़िले के चौरी चौरा थाने के सामने से गुज़रा। पुलिस ने गोली चलाई और तीन प्रदर्शनकारी मारे गए। भीड़ ने थाने को घेरकर आग लगा दी। जलती इमारत में बाईस पुलिसवाले और एक चौकीदार मारे गए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह सबसे ज़्यादा पढ़े गए मौक़ों में से एक है।
गांधी ने असहयोग आंदोलन क्यों रोक दिया?
गांधी मानते थे कि भारत की आज़ादी की लड़ाई का जायज़ आधार सिर्फ़ सामूहिक अहिंसा है। उनका कहना था कि जो आंदोलन चौरी चौरा जैसी घटनाएँ नहीं रोक सकता, वह अपने स्वयंसेवकों के नैतिक अनुशासन से आगे निकल चुका है। उन्होंने 5 फ़रवरी से पाँच दिन का प्रायश्चित उपवास किया और बारदोली में कांग्रेस कार्य समिति बुलाई, जिसने 12 फ़रवरी 1922 को सारी सविनय अवज्ञा रोकने का प्रस्ताव पास किया।
बारदोली प्रस्ताव क्या था?
बारदोली प्रस्ताव कांग्रेस कार्य समिति का वह प्रस्ताव था जो 12 फ़रवरी 1922 को गुजरात के बारदोली में पास हुआ। इसने असहयोग आंदोलन से जुड़ी सारी सविनय अवज्ञा, धरने और अधिकार की अवहेलना औपचारिक रूप से रोक दी। रचनात्मक काम जारी रखने की इजाज़त थी, जिसमें चरखा, खादी का उत्पादन और हिंदू-मुस्लिम एकता के काम शामिल थे।
बारदोली प्रस्ताव का विरोध किसने किया?
मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, लाला लाजपत राय और सुभाष चंद्र बोस समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं ने इस रोक का विरोध किया। कलकत्ता की जेल से लिखते हुए सी.आर. दास ने इसे गांधी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल बताया। इसी मतभेद से 1923 में मोतीलाल नेहरू और सी.आर. दास ने स्वराज पार्टी बनाई।
चौरी चौरा कांड में कितने लोगों को सज़ा हुई?
गोरखपुर सत्र न्यायालय ने 1922 में 172 अभियुक्तों को फाँसी की सज़ा सुनाई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1923 में अपील सुनकर सज़ाएँ काफ़ी घटा दीं। आख़िर में 19 अभियुक्तों को 2 जुलाई 1923 को फाँसी दी गई। 110 को उम्र क़ैद के लिए अंडमान भेजा गया। बाक़ी अभियुक्तों को कम सज़ाएँ मिलीं या वे बरी हो गए।
चौरी चौरा के अभियुक्तों की पैरवी किसने की?
बचाव पक्ष की अगुवाई मदन मोहन मालवीय ने की और उन्होंने कोई फ़ीस नहीं ली। पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उनकी मदद की। भारतीय क़ानूनी इतिहास में यह बड़े पैमाने के सबसे शुरुआती राजनीतिक बचाव मुक़दमों में था, और इसने राष्ट्रवादी वकीलों की एक पूरी पीढ़ी को जन-राजनीतिक पैरवी का काम सिखाया।
चौरी चौरा का शहीद स्मारक क्या है?
शहीद स्मारक वह यादगार है जो भारत सरकार ने 1973 में चौरी चौरा में जले हुए थाने की जगह पर बनवाई। यह 1923 में फाँसी चढ़े 19 गाँव वालों की याद में है और अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत श्रेणी-ए का संरक्षित स्मारक है। यहाँ हर 4 फ़रवरी को आयोजन होता है।
चौरी चौरा ने बाद के आंदोलनों को कैसे बदला?
चौरी चौरा के तजुर्बे ने गांधी के हर अगले आंदोलन को गढ़ा। 1930 के नमक सत्याग्रह में अहिंसा पर पकड़ बनाए रखने के लिए शुरुआती यात्रा छोटी और अनुशासित रखी गई। सविनय अवज्ञा आंदोलन ज़िला स्तर की कांग्रेस समितियों के इर्द-गिर्द गढ़ा गया। इसके उलट 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में यह मान लिया गया कि गांधी की गिरफ़्तारी के बाद सामूहिक हिंसा हो सकती है। चौरी चौरा से गांधी ने जो सबक़ लिया, वह जन आंदोलन के वक़्त और डिज़ाइन के बारे में था, जन आंदोलन से बचने के बारे में नहीं।
क्या चौरी चौरा UPSC के पाठ्यक्रम में है?
हाँ। चौरी चौरा प्रीलिम्स और मुख्य परीक्षा, दोनों के लिए ऊँचे मोल का विषय है। तारीख़, जगह, मौतों की गिनती और बारदोली प्रस्ताव पर प्रीलिम्स के सवाल कई बार आ चुके हैं। रोक की वजह और किसान स्वयंसेवकों की भूमिका पर मुख्य परीक्षा के सवाल GS पेपर I में नियमित रूप से आते हैं।