छत्रपति शिवाजी टर्मिनस: स्टीवंस का गोथिक स्टेशन, इसके नाम और UNESCO दर्जा
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस को समझिए: GIP रेलवे के लिए बना स्टीवंस का गोथिक स्टेशन, इसके तीन नाम, 2004 में UNESCO सूची में जगह और CSMT का पुनर्विकास।
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस दक्षिण मुंबई का वह गोथिक रेलवे स्टेशन है, जिसे अंग्रेजों ने ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के लिए विक्टोरिया टर्मिनस के नाम से बनवाया था। इसे फ्रेडरिक विलियम स्टीवंस ने डिजाइन किया। काम 1878 में शुरू हुआ और करीब दस साल चला। यह इमारत आज भी रोज दो काम करती है: यहाँ से ट्रेनें चलती हैं, और इसी में मध्य रेलवे का मुख्यालय है। UNESCO ने 2004 में इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया, क्योंकि यह विक्टोरियन गोथिक रिवाइवल वास्तुकला और भारतीय पारंपरिक तत्वों के मेल का उत्कृष्ट उदाहरण है। जुलाई 2017 से इसका आधिकारिक नाम छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस है, जिसे छोटे में CSMT कहते हैं।
इस इमारत के बारे में तीन बातें अक्सर गड्डमड्ड हो जाती हैं। पहली, इसकी शैली को अक्सर इंडो-सारसेनिक मान लिया जाता है, जबकि UNESCO इसे भारतीय पारंपरिक तत्वों वाली विक्टोरियन इटैलियनेट गोथिक रिवाइवल शैली कहता है। दूसरी, नाम आपस में उलझ जाते हैं, क्योंकि विश्व धरोहर सूची में आज भी 1996 वाला नाम दर्ज है, जबकि रेलवे 2017 वाला नाम इस्तेमाल करती है। तीसरी, तारीखें एक-दूसरे को काटती-सी लगती हैं, जब तक आप यह न देख लें कि हर तारीख एक अलग घटना की है। यह नोट तीनों उलझनें सुलझा देता है।
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस क्या है और यह क्यों अहम है
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस दक्षिण मुंबई के फोर्ट इलाके में बना एक चालू स्टेशन भी है और दफ्तर की इमारत भी। इसे ग्रेट इंडियन पेनिनसुला (GIP) रेलवे के टर्मिनस और मुख्य दफ्तर के रूप में बनाया गया था। इसकी अहमियत दो वजहों से है। पहली, UNESCO इसे एक ही इमारत में दो संस्कृतियों के मिलन का उत्कृष्ट उदाहरण मानता है, जहाँ ब्रिटिश वास्तुकारों ने भारतीय कारीगरों के साथ मिलकर काम किया। दूसरी, यह आज भी वही काम कर रही है, जिसके लिए इसे बनाया गया था। सबसे पहले ये तथ्य पक्के कर लीजिए।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थान | दक्षिण मुंबई का फोर्ट इलाका, महाराष्ट्र |
| किसके लिए बना | ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के लिए, उसके स्टेशन और मुख्य दफ्तर के रूप में, बोरी बंदर वाली जगह पर |
| वास्तुकार | फ्रेडरिक विलियम स्टीवंस (1848 से 1900), सलाहकार वास्तुकार |
| निर्माण | काम 1878 में शुरू हुआ; 1887 में जुबली दिवस पर औपचारिक उद्घाटन और नामकरण हुआ; 1888 में पूरा हुआ |
| लागत | इमारत पर 16,13,863 रुपये, यानी लगभग 16.14 लाख रुपये (रेल मंत्रालय) |
| शैली | भारतीय पारंपरिक तत्वों के साथ मिली विक्टोरियन इटैलियनेट गोथिक रिवाइवल शैली (UNESCO) |
| नाम | विक्टोरिया टर्मिनस (1887); छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (1996); छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (जुलाई 2017) |
| आज का इस्तेमाल | उपनगरीय और लंबी दूरी की ट्रेनों का टर्मिनस; मध्य रेलवे का मुख्यालय |
| संरक्षण | 2004 से विश्व धरोहर स्थल, मानदंड (ii) और (iv); 21 अप्रैल 1997 से हेरिटेज ग्रेड I इमारत |
तारीखें एक-एक लाइन में समझ आ जाती हैं। काम 1878 में शुरू हुआ। 1887 में जुबली दिवस पर इमारत का औपचारिक उद्घाटन हुआ, और इसका नाम महारानी विक्टोरिया के नाम पर रखा गया। रेल मंत्रालय ने 20 मई 2018 को इसके निर्माण के 130 वर्ष पूरे होने का दिन मनाया। इस हिसाब से निर्माण मई 1888 में पूरा हुआ, यानी शुरुआत के ठीक दस साल बाद। यह UNESCO की इस बात से पूरी तरह मेल खाता है कि इमारत “10 वर्षों में बनी”। तो स्टेशन इमारत पूरी होने से पहले ही खुल गया था। स्रोतों की एक चूक भी जान लीजिए। ICOMOS (स्मारकों और स्थलों की अंतरराष्ट्रीय परिषद) के मूल्यांकन में 1887 के मौके को विक्टोरिया की रजत जयंती कहा गया है। लेकिन 1887 उनके शासन का पचासवाँ वर्ष था, इसलिए वह असल में उनकी स्वर्ण जयंती थी।
विक्टोरिया टर्मिनस किसने बनवाया, और किसके लिए
इसे बनवाने वाला कोई राजा या शासक नहीं था, एक रेलवे कंपनी थी। GIP रेलवे का गठन 1 अगस्त 1849 को ब्रिटिश संसद के एक अधिनियम से हुआ। 16 अप्रैल 1853 को दोपहर 3.35 बजे इसकी पहली यात्री ट्रेन बंबई के बोरी बंदर से चली और 21 मील (33.8 किलोमीटर) दूर ठाणे पहुँची। इसी सफर से भारत में यात्री रेल की शुरुआत हुई। यह कहानी भारतीय रेलवे और लॉर्ड डलहौजी वाले नोट्स में विस्तार से है। कंपनी का मुख्यालय बोरी बंदर में ही रहा, और विक्टोरिया टर्मिनस उसी जमीन पर खड़ा हुआ।
बंबई को एक बड़े टर्मिनस की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि शहर तेजी से बदल रहा था। ICOMOS का मूल्यांकन इस उछाल की जड़ दो बातों में देखता है: भीतरी इलाकों से जुड़ती रेल लाइनें, और 1869 में स्वेज नहर का खुलना। इसके बाद बंबई यूरोप के साथ व्यापार के लिए पश्चिमी तट का मुख्य बंदरगाह बन गया। फिर बंबई के गवर्नर ने समुद्र को पाटकर नई जमीन निकालने का काम आगे बढ़ाया, और समुद्र-तट पर हाई विक्टोरियन शैली की सार्वजनिक इमारतों का एक पूरा समूह खड़ा करवाया। विक्टोरिया टर्मिनस इनमें सबसे प्रभावशाली था। UNESCO के अनुसार यही इमारत ‘गोथिक शहर’ के रूप में बंबई की पहचान बन गई।
विक्टोरिया टर्मिनस के वास्तुकार थे फ्रेडरिक विलियम स्टीवंस। वे एक सलाहकार वास्तुकार थे, जिनका जीवनकाल 1848 से 1900 तक रहा। रेल मंत्रालय के अनुसार इमारत पर 16,13,863 रुपये खर्च हुए, और यह खर्च लगभग एक दशक में फैला रहा। ICOMOS डिजाइन के सबसे करीबी संदर्भ के रूप में लंदन के सेंट पैंक्रस स्टेशन का नाम लेता है, जिसे सर जी. जी. स्कॉट ने बनाया था। फिर वह यह भी जोड़ता है कि विक्टोरिया टर्मिनस का अपना अलग चरित्र है। इसमें चिनाई का एक विशाल गुंबद है, और कई तरह की सामग्री में उकेरी गई इतालवी गोथिक सजावट है, रंग-बिरंगे पत्थर से लेकर रंगीन कांच (stained glass) तक।
लेकिन काम करने वाले हाथ भारतीय थे। UNESCO के विवरण के अनुसार ब्रिटिश वास्तुकारों ने भारतीय कारीगरों के साथ मिलकर डिजाइन में भारतीय निर्माण परंपराओं और उनकी शैलीगत बारीकियों को शामिल किया। इससे एक नई शैली बनी, जो सिर्फ बंबई की अपनी थी। मानदंड (ii) का असली तर्क यही है: यह इमारत आपसी लेन-देन की गवाही देती है, किसी बाहरी चीज को ज्यों का त्यों उठाकर रख देने की नहीं। UNESCO का बयान एक कदम और आगे जाता है। वह इस टर्मिनस को व्यावसायिक महल कहता है, जिसे देश की आर्थिक समृद्धि दिखाने के लिए बनाया गया था।
CSMT का इतिहास, एक-एक चरण में
इस इमारत का जीवन चार चरणों में बँटता है, और हर चरण ने यह बदला कि स्टेशन किस काम आता है। पहले दो चरण विकास के हैं, तीसरा नामों और मान्यता का है, और चौथा उस रात का है, जब यह स्टेशन निशाना बना।
एक कंपनी का मुख्यालय, 1888 से 1951
अपने पहले छह दशकों तक यह इमारत GIP रेलवे का मुख्य दफ्तर रही, और इसके पीछे का स्टेशन लगातार बढ़ता गया:
- मूल स्टेशन में 6 प्लेटफॉर्म थे, जो 10.4 लाख रुपये में बने थे।
- 1925 में भारत की पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन बंबई विक्टोरिया टर्मिनस और कुर्ला हार्बर के बीच चली।
- 1 जुलाई 1925 को सरकार ने GIP रेलवे का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया।
- 1929 में मेन-लाइन ट्रैफिक के लिए एक नया स्टेशन बना, और पहली रीमॉडलिंग में प्लेटफॉर्मों की संख्या बढ़कर 13 हो गई।
इन्हीं वर्षों में जो ढर्रा बना, संरक्षण का काम आज भी उसी से जूझता है। धरोहर इमारत अपनी जगह पर टिकी रहती है, और रेलवे उसके चारों ओर फैलती जाती है।
मध्य रेलवे का मुख्य दफ्तर, 1951 से आगे
5 नवंबर 1951 को GIP रेलवे को नई बनी मध्य रेलवे में मिला दिया गया। मध्य रेलवे का गठन GIP रेलवे को तीन रियासती रेलवे के साथ जोड़कर हुआ था। GIP का पुराना मुख्य दफ्तर मध्य रेलवे का मुख्यालय बन गया, और आज भी वही है। यार्ड भी बढ़ता रहा। 1994 तक यहाँ 15 प्लेटफॉर्म हो गए, और 2018 तक 18 प्लेटफॉर्म, साथ में पूर्वी तरफ एक खुला और चौड़ा प्रवेश द्वार भी बना।
नए नाम और विश्व धरोहर का दर्जा, 1996 से 2017
21 वर्षों में स्टेशन का नाम दो बार बदला, और विश्व धरोहर का दर्जा पाने में दो कोशिशें लगीं:
- 1996: विक्टोरिया टर्मिनस का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रखा गया। यह नाम मराठा राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर है।
- 21 अप्रैल 1997: इमारत को हेरिटेज ग्रेड I संरचना घोषित किया गया, और भारतीय रेलवे ने लंबी अवधि की प्रबंधन योजना बनाने के लिए आर्किटेक्चरल कंजर्वेशन सेल को नियुक्त किया।
- 1999: विशेषज्ञों के एक मिशन के बाद ICOMOS ने सिफारिश की कि नामांकन को तब तक टाल दिया जाए, जब तक एक ठीक-ठाक संरक्षण कार्यक्रम और दुनिया भर के रेलवे टर्मिनसों का तुलनात्मक अध्ययन तैयार न हो जाए।
- 2004: विश्व धरोहर समिति ने अपने 28वें सत्र में इस संपत्ति को सूची में दर्ज किया।
- दिसंबर 2012: धरोहर इमारत को कामकाजी दिनों में आम लोगों के देखने के लिए खोल दिया गया।
- जुलाई 2017: स्टेशन का नाम फिर बदला, और यह छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस बन गया।
विश्व धरोहर सूची ने दूसरे नामकरण को कभी अपनाया ही नहीं। उसकी प्रविष्टि में आज भी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (पूर्व नाम विक्टोरिया टर्मिनस) लिखा है। इसीलिए अध्ययन सामग्री में दोनों नाम मिलते हैं, और अपने-अपने संदर्भ में दोनों सही हैं।
26 नवंबर 2008 का हमला
26 नवंबर 2008 की रात अरब सागर के रास्ते मुंबई में उतरे दस बंदूकधारियों में से दो CST पहुँचे। उन्होंने स्टेशन के मेन-लाइन हॉल में यात्रियों पर ग्रेनेड फेंके और गोलियाँ चलाईं। सुप्रीम कोर्ट के 29 अगस्त 2012 के फैसले ने जिंदा पकड़े गए इकलौते हमलावर की मौत की सजा बरकरार रखी। यही फैसला स्टेशन पर 52 मौतें और 109 घायल दर्ज करता है। पूरे शहर में, 29 नवंबर को आखिरी हमलावर के मारे जाने तक, 166 लोग मारे गए और 238 घायल हुए। स्टेशन पर ड्यूटी दे रहे पुलिसकर्मी और रेलवे सुरक्षा बल के जवान भी मारे गए और घायल हुए लोगों में थे। इस हमले से उठे सुरक्षा के सवालों पर भारत में आतंकवाद वाले नोट में चर्चा है।
विक्टोरियन इटैलियनेट गोथिक रिवाइवल का मतलब क्या है
यह नाम बहुत से पाठकों को उलझा देता है, और इसकी वजह जायज है: यह इतना लंबा इसलिए है, क्योंकि इसमें कई विचार एक के ऊपर एक रखे गए हैं। हर हिस्से को सीधे शब्दों में खोलकर समझा जा सकता है:
- गोथिक उत्तरी यूरोप के चर्चों की मध्यकालीन शैली है, जो नुकीले मेहराबों और घनी नक्काशी वाली सजावट के लिए जानी जाती है।
- रिवाइवल यानी पुनरुद्धार का मतलब है कि इंग्लैंड ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में इस शैली को फिर से जिंदा किया, ठीक उसी समय जब बंबई सरकार अपने सार्वजनिक निर्माण करवा रही थी।
- विक्टोरियन इटैलियनेट इसे उस हाई विक्टोरियन रूप तक सीमित करता है, जो मध्यकाल के आखिरी दौर की इतालवी इमारतों को देखकर गढ़ा गया था। CSMT में यह पॉलीक्रोम, यानी कई रंगों वाली पत्थर की चिनाई के रूप में दिखता है।
- भारतीय पारंपरिक तत्व वे हिस्से हैं, जिन्हें UNESCO भारतीय महलों की वास्तुकला के करीब पाता है। इनकी सूची नीचे है।
UNESCO ऐसे चार भारतीय तत्व गिनाता है:
- पत्थर का गुंबद;
- बुर्ज;
- नुकीले मेहराब;
- लीक से हटा हुआ, अनियमित जमीनी नक्शा।
यह मेल कामयाब क्यों रहा? ICOMOS इसकी वजह बताता है। हाई विक्टोरियन गोथिक यूरोपीय और भारतीय, दोनों की पसंद पर खरा उतरता था, क्योंकि इसके रंग और अलंकरण मुगल और हिंदू इमारतों के साथ सहज रूप से मेल खाते थे। तो CSMT में भारतीय तत्व किसी यूरोपीय ढाँचे पर चिपकाया गया गुंबद भर नहीं है। वह पूरी इमारत में दौड़ता है, ऊपर की छतरेखा से लेकर नीचे की नक्काशी तक।
इंजीनियरिंग भी उतनी ही नई थी, जितना इसका रूप। ICOMOS बताता है कि एक-दूसरे में फँसी पसलियों (dovetailed ribs) वाला गुंबद सेंटरिंग के बिना बनाया गया था। सेंटरिंग लकड़ी का वह अस्थायी ढाँचा है, जो आम तौर पर मेहराब या गुंबद को तब तक थामे रखता है, जब तक उसकी चिनाई खुद खड़ी न हो जाए। ICOMOS इसे उस दौर की एक नई उपलब्धि कहता है। रेल मंत्रालय के अनुसार, बताया जाता है कि यह पहला अष्टकोणीय पसलीदार चिनाई वाला गुंबद था, जिसे किसी इतालवी गोथिक इमारत में ढाला गया। दफ्तरों के पीछे यात्री हॉल (concourse) के लंबे फैलाव स्ट्रक्चरल स्टील पर टिके हैं। भारत के नामांकन में इसे मुंबई की किसी सार्वजनिक इमारत में औद्योगिक वास्तुकला का सबसे पहला इस्तेमाल बताया गया था।
सामग्री भी उतनी ही सोच-समझकर चुनी गई, जितने आकार। UNESCO का प्रामाणिकता वाला बयान इनकी सूची देता है:
- स्थानीय पीला मलाड पत्थर, जिसके साथ इतालवी संगमरमर और कुछ जगहों पर पॉलिश किया हुआ ग्रेनाइट मिलाया गया;
- वास्तु की बारीक सजावट के लिए सफेद चूना पत्थर;
- दरवाजों और खिड़कियों के लिए बर्मा सागौन;
- अष्टकोणीय पसलीदार गुंबद के ड्रम में लगे, कुल-चिह्नों वाले रंगीन कांच के पैनल।
गेट से गुंबद तक एक सैर
यह इमारत उसी क्रम में सबसे अच्छी तरह समझ आती है, जिस क्रम में कोई दर्शक इससे मिलता है: पहले सड़क से भीतर की ओर, और फिर ऊपर की ओर। हर पड़ाव उस तर्क का एक टुकड़ा है, जो वास्तुकार अपनी इमारत के जरिए रख रहा था।
- गेट। प्रवेश के दोनों खंभों पर सबसे ऊपर एक शेर है, जो ब्रिटेन का प्रतीक है, और एक बाघ, जो भारत का प्रतीक है।
- नक्शा। इमारत C-आकार की है और पूर्व-पश्चिम धुरी पर सममित है। इसके बगल वाले हिस्से (विंग) एक आँगन को घेरते हैं, जो सड़क की ओर खुलता है। चारों कोनों पर खड़े विशाल बुर्ज बीच के गुंबद को घेरकर फ्रेम करते हैं।
- अग्रभाग। GIP रेलवे के 10 निदेशकों की उभरी हुई नक्काशी (bas-relief) प्रमुख जगहों पर लगी है। उनके साथ भारत की अलग-अलग जातियों और समुदायों को दिखाने वाली उभरी हुई आवक्ष मूर्तियाँ हैं। गार्गोयल और प्रतीकात्मक विचित्र आकृतियाँ झंडे और फरसे थामे हुए हैं।
- नक्काशी। पूरे पत्थर पर स्थानीय जीव-जंतु और पेड़-पौधे त्रिआयामी रूप में उकेरे गए हैं। मेहराबदार टिम्पैनम (दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर के पैनल) में मोर भरे हैं, और गोल गुलाब-खिड़कियों में पत्थर की जाली का काम है।
- गुंबद। सबसे ऊपर 16 फुट 6 इंच ऊँची एक स्त्री-मूर्ति खड़ी है। उसके दाएँ हाथ में ऊपर उठी हुई जलती मशाल है, और बाएँ हाथ में नीचे की ओर तीलियों वाला पहिया। यह मूर्ति प्रगति का प्रतीक है।
- स्टार चैंबर। भीतर, उत्तरी विंग के भूतल वाला हॉल, जिसे स्टार चैंबर कहते हैं, आज भी बुकिंग ऑफिस है। इसमें इतालवी संगमरमर और पॉलिश किया हुआ भारतीय नीला पत्थर लगा है।
गेट और अग्रभाग को साथ रखकर देखिए, तो एक संदेश साफ निकलता है। शेर और बाघ एक ही प्रवेश द्वार पर हैं। कंपनी के निदेशक सामने की दीवार पर भारत के समुदायों के साथ जगह बाँटते हैं। और सबसे ऊपर प्रगति की मूर्ति खड़ी है। यह एक रेलवे कंपनी की अपनी छवि है, पत्थर में उकेरी हुई।
CSMT नव-गोथिक है या इंडो-सारसेनिक?
CSMT नव-गोथिक है। औपनिवेशिक शहरों पर NCERT का अध्याय विक्टोरिया टर्मिनस को इस शैली का सबसे प्रभावशाली उदाहरण कहता है, और इंडो-सारसेनिक नाम को बाद के एक अलग विचार के लिए रखता है। यह अध्याय औपनिवेशिक बंबई की सार्वजनिक इमारतों को तीन शैलियों में बाँटता है:
- नव-शास्त्रीय: ऊँचे खंभों वाले अग्रभाग के साथ ज्यामितीय इमारतें, जिनकी प्रेरणा प्राचीन रोम से आई। बंबई का 1833 का टाउन हॉल इसका सबसे जाना-माना पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण है।
- नव-गोथिक: वह मध्यकालीन यूरोपीय शैली, जिसे उन्नीसवीं सदी के मध्य में इंग्लैंड में फिर से जिंदा किया गया। सरकारी और विश्वविद्यालय इमारतों के एक पूरे समुद्र-तटीय समूह ने इसे अपनाया, और विक्टोरिया टर्मिनस इस शैली का चरम है।
- इंडो-सारसेनिक: बीसवीं सदी की शुरुआत की एक मिली-जुली शैली, जिसमें भारतीय और यूरोपीय रूपों को जोड़ा गया। ‘इंडो’ हिंदू के लिए छोटा शब्द था, और ‘सारसेन’ मुसलमान के लिए यूरोपीय शब्द था। 1911 में किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी के आगमन की याद में बना गेटवे ऑफ इंडिया इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
यह गड़बड़ी होना आसान है, क्योंकि UNESCO के अपने शब्दों में गोथिक को भारतीय तत्वों के साथ मिला हुआ बताया गया है, और CSMT पर गुंबद भी है। दोनों को अलग करने की कसौटी यह है कि उधार लेना कहाँ से शुरू होता है। इंडो-सारसेनिक इमारतें अपना भारतीय आधा हिस्सा मध्यकालीन भारतीय इमारतों के गुंबदों और मेहराबों से लेती हैं। यह वही परंपरा है, जिसकी कहानी इंडो-इस्लामिक वास्तुकला वाले नोट में है। CSMT यूरोपीय गोथिक से शुरू होता है, और फिर उसमें भारतीय कारीगरी और महल जैसी बनावट पिरोता है। NCERT एक क्षेत्रीय मोटा नियम भी देता है: बंबई गोथिक रिवाइवल का मुख्य केंद्र बना रहा, जबकि इंडो-सारसेनिक शैली मद्रास में फली-फूली।
आगे चलकर स्टीवंस खुद मिली-जुली शैली की ओर बढ़े। NCERT में उनकी 1888 की म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बिल्डिंग के चित्र के नीचे लिखा परिचय उसके प्राच्य और गोथिक डिजाइनों के मेल की ओर इशारा करता है। यह इमारत टर्मिनस के ठीक सामने, सड़क के उस पार खड़ी है। CSMT के आसपास के गोथिक शहर को 2018 में अपने आप में मान्यता मिली, जब UNESCO ने मुंबई के विक्टोरियन गोथिक और आर्ट डेको समूहों को विश्व धरोहर सूची में दर्ज किया।
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस आज
आज CSMT दोहरी सुरक्षा में है: एक तरफ उसकी UNESCO सूची है, दूसरी तरफ मुंबई के अपने धरोहर नियम। साथ ही यह एक बड़े पुनर्निर्माण के बीच में भी खड़ा है। सूची, संरक्षण और दबाव, तीनों पर एक छोटी नजर डालना जरूरी है।
UNESCO सूची, सीधे शब्दों में
विश्व धरोहर समिति ने 2004 में अपने 28वें सत्र में, निर्णय 28 COM 14B.34 के जरिए, इस संपत्ति को दो मानदंडों पर सूची में दर्ज किया:
- मानदंड (ii), यानी मानवीय मूल्यों का एक अहम आदान-प्रदान: CSMT में विक्टोरियन इटैलियनेट गोथिक रिवाइवल और भारतीय पारंपरिक इमारतों के बीच असर का आना-जाना दिखता है, और यह एक बड़े व्यापारिक बंदरगाह शहर के रूप में मुंबई का प्रतीक बन गया।
- मानदंड (iv), यानी किसी खास तरह की इमारत का उत्कृष्ट उदाहरण: यह ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में 19वीं सदी के उत्तरार्ध की रेलवे वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें उन्नत संरचनात्मक और तकनीकी समाधान अपनाए गए।
भारत ने इससे ज्यादा का दावा किया था। उसके नामांकन में (i) से (vi) तक, सभी छह सांस्कृतिक मानदंडों के तहत दलील दी गई थी, लेकिन ICOMOS ने सिर्फ (ii) और (iv) को सही माना। यह संपत्ति 2.85 हेक्टेयर में फैली है, और इसका बफर जोन 90.21 हेक्टेयर का है। पूरा रिकॉर्ड UNESCO विश्व धरोहर केंद्र के पेज पर है। भारत के UNESCO विश्व धरोहर स्थल वाला नोट इसे देश की बाकी सूची के बीच रखकर दिखाता है।
इसकी देखभाल कौन करता है
UNESCO के रिकॉर्ड के अनुसार CSMT की देखभाल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के बजाय रेलवे और शहर के हाथ में है:
- संपत्ति के सारे कानूनी अधिकार रेल मंत्रालय के पास हैं।
- मुंबई धरोहर कानून बनाने वाला पहला भारतीय शहर था। यह 1995 का एक सरकारी विनियमन था, और CSMT और उसके आसपास का फोर्ट इलाका इसी के तहत संरक्षित हैं।
- यह इमारत शहर की 624 सूचीबद्ध इमारतों में से 63 ग्रेड I संरचनाओं में एक है, और मुंबई हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी शहर की धरोहर इमारतों की निगरानी करती है।
- रोजमर्रा के रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेदारी मध्य रेलवे के मुंबई मंडल के मंडल रेल प्रबंधक की है।
एक चालू स्मारक पर दबाव
UNESCO का बयान इस संपत्ति पर मंडराते खतरों के बारे में साफ-साफ बात करता है। स्टेशन से रोज 3 मिलियन यानी तीस लाख से ज्यादा यात्री आते-जाते हैं। इसकी मूल 4 पटरियाँ बढ़कर अब 7 उपनगरीय और 11 बाहरी (आउट-स्टेशन) पटरियाँ हो गई हैं। बयान इन खतरों को नाम लेकर गिनाता है:
- शहर के केंद्र में विकास का दबाव, जहाँ नए निर्माण पर लगाम रखना एक लगातार चलने वाली चुनौती है;
- स्टेशन के आसपास भारी ट्रैफिक और प्रदूषित हवा;
- समुद्र से आने वाली खारी हवा;
- आग से बचाव की व्यवस्था, जिसकी जाँच और अपग्रेड जरूरी है।
उन्नीसवीं सदी की किसी बंदरगाह-शहर वाली इमारत के लिए इनमें से कुछ भी अनोखा नहीं है। CSMT को अलग बनाती है यह बात कि इन्हें ठीक करते समय इसे बंद नहीं किया जा सकता, क्योंकि ट्रेनों को तो चलते ही रहना है।
पुनर्विकास, 2020 से 2026
CSMT पुनर्विकास का मकसद यह है कि आधुनिक ट्रैफिक का बोझ गोथिक इमारत से हटाया जाए, लेकिन उसे छुए बिना। अब तक के तारीखवार कदम ये हैं:
- अगस्त 2020: भारतीय रेलवे स्टेशन विकास निगम (IRSDC) ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी से पुनर्विकास के लिए योग्यता बोलियाँ मँगाईं। इसमें अनिवार्य स्टेशन लागत 1,642 करोड़ रुपये रखी गई, और स्टेशन चलाने का ठेका (concession) 60 साल के लिए था। यह मॉडल भारतीय रेलवे में PPP वाले नोट में समझाया गया है।
- 28 सितंबर 2022: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नई दिल्ली और अहमदाबाद स्टेशनों के साथ CSMT के पुनर्विकास को मंजूरी दी। तीनों पर कुल मिलाकर लगभग 10,000 करोड़ रुपये का निवेश होना था।
- 13 जुलाई 2024: 382 मीटर बढ़ाए गए प्लेटफॉर्म 10 और 11 राष्ट्र को समर्पित किए गए, जिससे अब इन पर 24 डिब्बों तक की ट्रेनें आ सकती हैं।
- सितंबर 2025: अखबारों की रिपोर्टों में बताया गया कि स्टीवंस की मूल योजना का एक भूमिगत तहखाना, जो पुराने कैश ऑफिस के नीचे है, बहाल करके पहली बार आम लोगों के लिए खोला गया। कभी पूरे नेटवर्क के टिकट काउंटरों की नकदी रात भर इसी तहखाने में रखी जाती थी।
- 15 अप्रैल 2026: मुंबई के एक अखबार ने बताया कि रेल भूमि विकास प्राधिकरण की देखरेख में चल रही 2,450 करोड़ रुपये की यह परियोजना 21.5 प्रतिशत पूरी हो चुकी है। जिप्सम की कमी से मुख्यालय के दफ्तरों का भीतरी काम धीमा पड़ा है, और परियोजना को 2027-28 तक पूरा करने का लक्ष्य है।
लागत के आँकड़े अलग-अलग इसलिए हैं, क्योंकि वे परियोजना के अलग-अलग चरणों और दायरों की बात करते हैं। इसलिए हर आँकड़ा उसकी तारीख के साथ ही लिखिए। पूरे नेटवर्क में स्टेशनों के पुनर्विकास का हाल अमृत भारत स्टेशन योजना वाले नोट में है। CSMT को अलग बनाती है यह बात कि यहाँ स्टेशन की इमारत खुद विश्व धरोहर संपत्ति है। इसलिए हर नया डेक और यात्री हॉल उसी के चारों ओर सोच-समझकर बनाना होगा।
परीक्षा के लिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस कैसे पढ़ें
CSMT उस जगह खड़ा है, जहाँ सिलेबस के कई हिस्से आकर मिलते हैं:
- कला और संस्कृति, GS पेपर I: औपनिवेशिक वास्तुकला और धरोहर संरक्षण।
- आधुनिक इतिहास, GS पेपर I: रेलवे और औपनिवेशिक बंबई का विकास, जिसका पूरा संदर्भ आधुनिक इतिहास वाले नोट में है।
- बुनियादी ढाँचा, GS पेपर III: स्टेशन पुनर्विकास और PPP मॉडल।
- धरोहर सूचियाँ: UNESCO सूची में दर्ज होना और उसके मानदंड।
यह विषय किसी एक स्मारक के रूप में कम, और धरोहर प्रबंधन के रूप में ज्यादा पूछा जाता है। मुख्य परीक्षा 2018 के GS पेपर I में पूछा गया था: “भारतीय कला विरासत की रक्षा करना इस समय की जरूरत है। चर्चा कीजिए।” उस उत्तर के लिए CSMT एक मजबूत उदाहरण है, क्योंकि यह टिकट लेकर देखा जाने वाला स्मारक नहीं, एक चालू स्टेशन है। इसलिए इसे बचाने का मतलब है रोज 3 मिलियन यात्रियों को संभालना। इतिहास वैकल्पिक विषय 2017 के पेपर II में उम्मीदवारों से इस कथन पर टिप्पणी करने को कहा गया था: “उन्नीसवीं सदी में भारत में ब्रिटिश रेलवे निर्माण नीति से ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को फायदा हुआ।” उस उत्तर के लिए GIP रेलवे का मुख्य दफ्तर एक ठोस तस्वीर देता है। प्रीलिम्स की तरफ देखें, तो 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 94 कला और संस्कृति से आए हैं। यह आँकड़ा Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक का है, और मुख्य परीक्षा के उत्तर-ढाँचे कला और संस्कृति की मुख्य परीक्षा PYQ गाइड में इकट्ठा हैं।
इन बातों को तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:
- स्टीवंस और GIP रेलवे: फ्रेडरिक विलियम स्टीवंस ने इसे ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के लिए डिजाइन किया, और यह 1878 से 1888 के बीच बना।
- तीन नाम: 1887 के जुबली दिवस से विक्टोरिया टर्मिनस, 1996 से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, और जुलाई 2017 से छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस।
- शैली: भारतीय पारंपरिक तत्वों के साथ मिली विक्टोरियन इटैलियनेट गोथिक रिवाइवल, और NCERT के अनुसार नव-गोथिक शैली का सबसे प्रभावशाली उदाहरण।
- UNESCO: 2004 में 28वें सत्र में, मानदंड (ii) और (iv) के तहत सूची में दर्ज।
- संरक्षण: 21 अप्रैल 1997 से हेरिटेज ग्रेड I; मालिकाना हक रेल मंत्रालय का; 5 नवंबर 1951 को बनी मध्य रेलवे का मुख्यालय।
- प्रतीक: गुंबद पर प्रगति की मूर्ति, और गेट पर ब्रिटेन के लिए शेर और भारत के लिए बाघ।
- स्थान: बोरी बंदर, जहाँ से 16 अप्रैल 1853 को भारत की पहली यात्री ट्रेन ठाणे के लिए चली।
चार उलझनें अक्सर नंबर कटवाती हैं:
- VT, CST और CSMT। नामों को अलग-अलग तथ्यों की तरह नहीं, एक क्रम की तरह याद करना समझदारी है: 1996 तक VT, 1996 से CST, और जुलाई 2017 से CSMT। UNESCO की सूची में आज भी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (पूर्व नाम विक्टोरिया टर्मिनस) ही लिखा है।
- नव-गोथिक और इंडो-सारसेनिक। CSMT भारतीय तत्वों वाला नव-गोथिक है; गेटवे ऑफ इंडिया इंडो-सारसेनिक शैली का प्रसिद्ध उदाहरण है।
- 1887 और 1888। स्टेशन का उद्घाटन और नामकरण 1887 में हुआ, और इमारत 1888 में पूरी हुई।
- मानदंड। CSMT मानदंड (ii) और (iv) मुंबई के समूहों और भारत की पर्वतीय रेलों के साथ साझा करता है; एलिफेंटा को (i) और (iii) के तहत सूची में रखा गया था।
CSMT को उससे मिलते-जुलते स्थलों के बगल में रखकर देखने से ये मानदंड दिमाग में साफ रहते हैं:
| स्थल | यह क्या है | सूची में दर्ज | मानदंड | CSMT से रिश्ता |
|---|---|---|---|---|
| छत्रपति शिवाजी टर्मिनस | रेलवे टर्मिनस और मुख्य दफ्तर, 1878 से 1888 | 2004 | (ii), (iv) | इसी नोट का विषय |
| मुंबई के विक्टोरियन गोथिक और आर्ट डेको समूह | ओवल मैदान के आसपास की विक्टोरियन गोथिक सार्वजनिक इमारतें और आर्ट डेको इमारतें | 2018 | (ii), (iv) | वही गोथिक शहर, एक समूह के रूप में सूची में |
| भारत की पर्वतीय रेलें | दार्जिलिंग हिमालयन, नीलगिरि माउंटेन और कालका-शिमला लाइनें | 1999; 2005 और 2008 में विस्तार | (ii), (iv) | रेलवे धरोहर, लेकिन स्टेशन की इमारत नहीं, चालू लाइनें |
| एलिफेंटा की गुफाएँ | मुंबई बंदरगाह के एक द्वीप पर चट्टान काटकर बने शिव के गुफा मंदिर | 1987 | (i), (iii) | मुंबई का दूसरा शुरुआती विश्व धरोहर स्थल, एक बिल्कुल अलग युग का |
CSMT उस अभ्यर्थी का साथ देता है, जो ठीक-ठीक बता सके कि इसमें गोथिक क्या है और भारतीय क्या। यह बँटवारा सही पकड़िए और तीनों नाम क्रम से याद रखिए। फिर यह एक इमारत औपनिवेशिक वास्तुकला वाले उत्तर में भी उतनी ही आसानी से काम आएगी, जितनी धरोहर प्रबंधन वाले उत्तर में।
सामान्य प्रश्न
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस को किसने डिजाइन किया?
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस को फ्रेडरिक विलियम स्टीवंस ने डिजाइन किया था। वे एक ब्रिटिश सलाहकार वास्तुकार थे, जिनका जीवनकाल 1848 से 1900 तक रहा। यह इमारत ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के लिए बनी थी, और इसकी नक्काशी और बारीक काम में ब्रिटिश वास्तुकारों ने भारतीय कारीगरों के साथ मिलकर काम किया।
विक्टोरिया टर्मिनस कब बना?
काम 1878 में शुरू हुआ, और इमारत करीब दस साल बाद 1888 में पूरी हुई। इसका औपचारिक उद्घाटन और महारानी विक्टोरिया के नाम पर नामकरण 1887 में जुबली दिवस पर हुआ, यानी काम पूरा होने से एक साल पहले।
विक्टोरिया टर्मिनस का नाम क्यों बदला गया?
1996 में इसका नाम मराठा राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रखा गया। जुलाई 2017 में इसमें ‘महाराज’ शब्द जोड़ा गया, और आज का नाम छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, यानी CSMT बना।
CSMT की वास्तुकला शैली क्या है?
UNESCO CSMT को भारतीय पारंपरिक तत्वों के साथ मिली विक्टोरियन इटैलियनेट गोथिक रिवाइवल शैली का बताता है। NCERT की इतिहास की पाठ्यपुस्तक इसे औपनिवेशिक बंबई में नव-गोथिक शैली का सबसे प्रभावशाली उदाहरण कहती है। यह इंडो-सारसेनिक नहीं है। वह नाम गेटवे ऑफ इंडिया जैसी इमारतों के लिए रखना बेहतर है।
CSMT को UNESCO विश्व धरोहर स्थल का दर्जा कब मिला?
CSMT को 2004 में विश्व धरोहर समिति के 28वें सत्र में विश्व धरोहर सूची में दर्ज किया गया। इसे मानदंड (ii) और (iv) के तहत सूची में रखा गया: ब्रिटिश और भारतीय निर्माण परंपराओं के आपसी लेन-देन के लिए, और 19वीं सदी के उत्तरार्ध की रेलवे वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में।
क्या CSMT आज भी चालू रेलवे स्टेशन है?
हाँ। CSMT से उपनगरीय और लंबी दूरी की ट्रेनें चलती हैं, और इसी में मध्य रेलवे का मुख्यालय है। UNESCO के अनुसार यहाँ से रोज 3 मिलियन से ज्यादा यात्री आते-जाते हैं। इसीलिए यहाँ संरक्षण का काम चलते ट्रैफिक के बीच करना पड़ता है।
26 नवंबर 2008 को CSMT पर क्या हुआ था?
उस हफ्ते मुंबई पर हमला करने वाले दस बंदूकधारियों में से दो ने स्टेशन के मेन-लाइन हॉल में यात्रियों पर ग्रेनेड फेंके और गोलियाँ चलाईं। सुप्रीम कोर्ट के 29 अगस्त 2012 के फैसले में CST पर 52 लोगों के मारे जाने और 109 के घायल होने का रिकॉर्ड है।
CSMT के गुंबद के ऊपर कौन-सी मूर्ति है?
बीच वाले गुंबद पर लगी मूर्ति प्रगति का प्रतीक है। यह 16 फुट 6 इंच ऊँची एक स्त्री-मूर्ति है, जिसके दाएँ हाथ में ऊपर उठी जलती मशाल है और बाएँ हाथ में तीलियों वाला पहिया।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसे फ्रेडरिक विलियम स्टीवंस ने डिजाइन किया था। 2. इसे ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के मुख्यालय के रूप में बनाया गया था। 3. इसे मानदंड (i) और (iii) के तहत विश्व धरोहर सूची में दर्ज किया गया था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) CSMT को 2004 में मानदंड (ii) और (iv) के तहत दर्ज किया गया था, (i) और (iii) के तहत नहीं।
2. NCERT की इतिहास की पाठ्यपुस्तक में निम्नलिखित में से किसे इंडो-सारसेनिक शैली का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बताया गया है?
- (a) विक्टोरिया टर्मिनस
- (b) गेटवे ऑफ इंडिया
- (c) टाउन हॉल, बंबई
- (d) एल्फिंस्टन सर्कल
उत्तर: (b) विक्टोरिया टर्मिनस नव-गोथिक है और टाउन हॉल नव-शास्त्रीय; 1911 की शाही यात्रा की याद में बना गेटवे ऑफ इंडिया इंडो-सारसेनिक शैली का प्रसिद्ध उदाहरण है।
3. स्टेशन के नाम और उसे अपनाए जाने के वर्ष के निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. विक्टोरिया टर्मिनस : 1887 2. छत्रपति शिवाजी टर्मिनस : 1996 3. छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस : 2004। ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 1 और 2
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) ‘महाराज’ शब्द जुलाई 2017 में जोड़ा गया था; 2004 तो UNESCO सूची में दर्ज होने का वर्ष है।
4. छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की सजावट के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसके बीच वाले गुंबद पर लगी मूर्ति प्रगति का प्रतीक है। 2. इसके प्रवेश द्वारों के खंभों पर सबसे ऊपर एक शेर और एक बाघ हैं। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) गुंबद पर मशाल और तीलियों वाले पहिये के साथ प्रगति की मूर्ति है, और गेट के खंभों पर ब्रिटेन के लिए शेर और भारत के लिए बाघ है।
5. भारत की निम्नलिखित विश्व धरोहर संपत्तियों में से किन्हें मानदंड (ii) और (iv) के तहत सूची में दर्ज किया गया था? 1. छत्रपति शिवाजी टर्मिनस 2. एलिफेंटा की गुफाएँ 3. भारत की पर्वतीय रेलें। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 1 और 3
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) एलिफेंटा की गुफाएँ 1987 में मानदंड (i) और (iii) के तहत दर्ज की गई थीं।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में सार्वजनिक निजी भागीदारी (PPP) की जरूरत क्यों है? भारत में रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास में PPP मॉडल की भूमिका का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2022, GS पेपर III।
- छत्रपति शिवाजी टर्मिनस को अक्सर दो संस्कृतियों का मिलन कहा जाता है। इमारत के डिजाइन, सामग्री और सजावट के संदर्भ में इस मत का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- औपनिवेशिक वास्तुकला की नव-गोथिक और इंडो-सारसेनिक शैलियों में अंतर स्पष्ट कीजिए, और बंबई से उदाहरण दीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- जिस विश्व धरोहर इमारत को एक व्यस्त रेलवे स्टेशन के रूप में लगातार चलते रहना है, उस पर ऐसे दबाव होते हैं जो किसी संग्रहालय पर नहीं होते। छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर संरक्षण की चुनौतियों की चर्चा कीजिए, और सुझाइए कि पुनर्विकास उसके धरोहर मूल्य का सम्मान कैसे कर सकता है। (15 अंक, 250 शब्द)
- उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में रेलवे और स्वेज नहर के खुलने ने औपनिवेशिक बंबई के विकास को किस तरह आकार दिया? (10 अंक, 150 शब्द)